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🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳

         भाईचारा
        *********
दिया दिवाली की बधाई
देखा क्रिसमस का त्योहार
सिखों के बड़े निराले देखे
धर्म आैर व्यबहार
सबसे हसीन हमने देखा
ईद का आपसी प्यार
यूँही हरा भरा रहे
भारत का परिवार
रहे मुबारक भाईचारा
रहे सलामत प्यारा वतन l
आपस मे मिलकर रहें और
कायम रहे चैनोअमन ll
नोंकझोंक का मतलब नही
बंट गये आपस मे हम
आपस की टकरार को देख
बाहरी ना आंके हमको कम
जब जब दुस्साहस पर का हुआ
हमने अखण्डता बचाई है
दुश्मन के दूर्विचार विरोध मे
अपनी ताक़त दिखाई हैं
एकदूजे के खातिर मन मे इज्ज़त 
एकदूजे को करते नमन l
आपस मे मिलकर रहें और
कायम रहे चैनोअमन ll
सबका साथ सबका विकास
अपना बहुल नारा है
सुख और दुख मे साथ-साथ
एकदूजे का सहारा है
कितनी कश्तियां तूफान ढूबोया
पर सुरक्षित अभी भी किनारा हैं
नज़र उठाके देखो ज़मी से
फ़लक तक बुलंद सितारा है
डटे रहेंगे साथ-साथ जब
कौन करेगा अपना दमन l
आपस मे मिलकर रहें और
कायम रहे चैनोअमन ll
इतना बड़ा लोकतांत्रिक अड्डा
विविध विचार विविध भाषा
समस्त विश्व के पटल पे ढूंढों
ऐसी नही कहीं और परिभाषा
ऐसा क्या अद्भूत हैं यहाँ
जो समस्त विश्व के समझ से है परे 
समझ अकेला बढ़नेवाला दुश्मन
पाता एक के पीछे एक खड़े
करो विफल हर रणनीति
बचाके रखना अपना गठन l
आपस मे मिलकर रहें और
कायम रहे चैनोअमन ll
दिया दिवाली की बधाई
देखा क्रिसमस का त्योहार
सिखों के बड़े निराले देखे
धर्म आैर व्यबहार
सबसे हसीन हमने देखा
ईद का आपसी प्यार
यूँही हरा भरा रहे
भारत का परिवार
रहे मुबारक भाईचारा
रहे सलामत प्यारा वतन l
आपस मे मिलकर रहें और
कायम रहे चैनोअमन ll
**************************

BHAICHARA

Poems 0

Dil bole ok


करता हु काम वही, दिल कहे जो सही,झुकता यह सर नहीं,किसी के भी आगे कहीं
शर्तो पे अपनीही हरदम चलता हूँ,जान हथेली लिए घर से निकलता हूँ
किसी से भी डरु नहीं, किसी से भी रुकू नहीं,ठानीहै जो दिल में, करता हूँ बस वही
ऊपर निचे चर्चे हैं, दाएं बाएं चर्चे हैं,अपनी ही स्टाइल के हर जगह पर्चे हैं
डंके की चोट पर हर बात बोलता हूँ,हर एक चेहरे के राज़ यहां  खोलता हूँ

क्यों की ,क्यों की ,क्यों की ,क्यों की ,क्यों की
दिल बोले ओके,दिल बोले ओके,कोई नहीं टोके,कोई नहीं टोके
दिल बोले ओके,दिल बोले ओके,कोई नहीं टोके,कोई नहीं टोके
ज़िद पे अड़े तो,तो तो,तो, दुनिया की ठोके, दुनिया की ठोके

सुनो सुनो मेरे यारो , खुशियों को न तुम मारो,जितनी है गर बाज़ी, ऐसे तुम यु न हारो
होसलें बुलंद कर, आखियों को चार कर,ज़िन्दगी है शतरंज, दुश्मनो पर वार  कर
आना  जाना ज़िन्दगी का अपना एक फ़साना है,लाया क्या था ज़िंदगीमें, जो खो के फिर से पाना है
मेहनत से मिलती शौहरत,मेहनत से मिलता नाम,चढ़ते सूरज को यहां करते हैं सब सलाम
राज़  दिल के खोल दे तू, मन  की बात बोल दे,परवा है गर दुनिया की, बिंदास बोल दे

क्यों की ,क्यों की ,क्यों की ,क्यों की ,क्यों की
दिल बोले ओके,दिल बोले ओके,कोई नहीं टोके,कोई नहीं टोके
दिल बोले ओके,दिल बोले ओके,कोई नहीं टोके,कोई नहीं टोके
ज़िद पे अड़े तो,तो तो,तो, दुनिया की ठोके, दुनिया की ठोके


बंदा हूँ में सीधा साधा , रखता हु नेक इरादा,होता है वह पूरा काम, करता हु जो में वादा
रिश्ते नाते होते हैं सब मतलब के,करो कुछ ऐसा यारो ,काम आओ सब के
चाहत  अगर है तो मंज़िल मिल जाएगी,कसिमत भी अपनी यारा एक दिन खुल जाएगी
सोते जागते यारों देखे तुमने जो सपने हैं,होजाएंगे पुरे सच एक दिन,वह भी सारे अपने हैं
जो भी देखो ,जो भी सोचो ,करो तुम बस  वही,बोलता हु में वही , लगता है जो सही

क्यों की ,क्यों की ,क्यों की ,क्यों की ,क्यों की
दिल बोले ओके,दिल बोले ओके,कोई नहीं टोके,कोई नहीं टोके
दिल बोले ओके,दिल बोले ओके,कोई नहीं टोके,कोई नहीं टोके
ज़िद पे अड़े तो,तो तो,तो, दुनिया की ठोके, दुनिया की ठोके

Dil bole ok

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यह भी प्यार है
काठगोदाम से नैनीताल जाना
सड़क के मोड़ों को देखना
नदी के पानी में तैरना
झील के किनारे बातचीत करना
फिर अचानक पहाड़ों में खो जाना।
नैनीताल से भवाली आना
ढलान को पकड़ना
पेड़ों के बीच लुकाछिपी होना
फिर अचानक जंगलों में लुप्त हो जाना।
यह भी प्यार है
भवाली से अल्मोड़ा तक चलना
गरमपानी में चाय नाश्ता करना
नदी के किनारों को तितर बितर देखना
नन्दा के मंदिर में होना
अपने विद्यालय को निहारना
अपने बचपन को कुरेदना
फिर अचानक गलियों को भूल जाना।
अल्मोड़ा से जागेश्वर जाना
सड़क का उतार -चढ़ाव नापना
वृक्षों को टटोलना
मंदिरों को गिनना
धूप की तलाश करना
फिर अचानक सदियों में घुस जाना।

*महेश रौतेला

Kathgodam se Nai..

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कहूँ तो क्या कहूँ,
ठंड की बातें जो कंपकपाती हैं,
मंदिर की मुलाकातें जो आस्था जगाती हैं,
उन मोड़ों की जो लुकाछिपी करते हैं,
आकाश से गिरते तारे की जो खो जाता है,
उठते-बैठते लोगों की जो उम्र गुजार रहे हैं,
गरजते बादलों की जो डराते हैं,
उन शामों का जिन का समय बताता आया हूँ,
उन दिनों की जो गिनती में नहीं हैं,
उन आँखों की जो मुझे देखती हैं,
बहसों की जो सूखती जा रही हैं,
बैठकों की जो अब नहीं होती हैं,
झील के पानी की जो कम हो चुका है,
नदी का जल जो रूका हुआ है,
उस चढ़ायी की जो सड़क के नीचे दब चुकी है,
उस जीवन की जो आस-पास हाथ-पैर मार रहा है,
उस पक्षी की जो अभी-अभी उड़ा  है,
प्यार की जो हमेशा उगता रहता है।
शहर की जो घिसापिटा लगता है,
गाँव की जो शान्त पड़ा है,
बिमारियों की जो बिगड़ती जा रही हैं,
राजनीति की जो पसीना पसीना हो चुकी है।

*महेश रौतेला

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