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writingMaine aansu nahi bahaye


कल लहर उठी थी अंतर्मन में, कल दुःख ही दुःख देखा आँगन में,
कल प्रत्यक्ष था बीता जीवन, शोक से भरा तिमिर, गगन में,
और सभी संताप पुराने, बनकर मेघ नयन में छाये,
पर मैं न रुका, था अडिग मार्ग में, मैंने आँसू नहीं बहाये।

कुछ अधिक मेरा मन भारी था कल, मौन चुभा जाता था प्रतिपल,
जो चला गया, था सम्मुख पल को, फिर सबकुछ, होता था ओझल,
और समय के बीते बंधन सारे, पाँव रोकने मेरे आये,
पर मैं न रुका, था अडिग मार्ग में, मैंने आँसू नहीं बहाये।

कल बुला रहे थे पहचाने स्वर, स्मृतियों में है जिनका घर,
सबको जीवित, मरते देखा, हृदय काँप उठता था अंदर,
और दूर दिशा से जाने किसने, विरह विलाप के गीत लगाये,
पर मैं न रुका, था अडिग मार्ग में, मैंने आँसू नहीं बहाये।

We lose a part of ourselves every time we cry.. So try to hold on to what's given and not on what is gone.

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Writing by

puneetpantwal

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