Follow Us
  • SIGN UP
  • tumbhi microsites
tumbhi microsites

writingKahuin to kya kahuin

कहूँ तो क्या कहूँ,
ठंड की बातें जो कंपकपाती हैं,
मंदिर की मुलाकातें जो आस्था जगाती हैं,
उन मोड़ों की जो लुकाछिपी करते हैं,
आकाश से गिरते तारे की जो खो जाता है,
उठते-बैठते लोगों की जो उम्र गुजार रहे हैं,
गरजते बादलों की जो डराते हैं,
उन शामों का जिन का समय बताता आया हूँ,
उन दिनों की जो गिनती में नहीं हैं,
उन आँखों की जो मुझे देखती हैं,
बहसों की जो सूखती जा रही हैं,
बैठकों की जो अब नहीं होती हैं,
झील के पानी की जो कम हो चुका है,
नदी का जल जो रूका हुआ है,
उस चढ़ायी की जो सड़क के नीचे दब चुकी है,
उस जीवन की जो आस-पास हाथ-पैर मार रहा है,
उस पक्षी की जो अभी-अभी उड़ा  है,
प्यार की जो हमेशा उगता रहता है।
शहर की जो घिसापिटा लगता है,
गाँव की जो शान्त पड़ा है,
बिमारियों की जो बिगड़ती जा रही हैं,
राजनीति की जो पसीना पसीना हो चुकी है।

*महेश रौतेला

कहूँ तो क्या कहूँ, ठंड की बातें जो कंपकपाती हैं, मंदिर की मुलाकातें जो आस्था जगाती हैं, उन मोड़ों की जो लुकाछिपी करते हैं, आकाश से गिरते तारे की जो खो जाता है, उठते-बैठते लोगों की जो उम्र गुजार रहे हैं,

Report Abuse

Please login to report abuse.
Click on the Report Abuse button if you find this item offensive or humiliating. The item will be deleted/blocked once approved by the admin.

Writing by

MaheshRautela

Likes

0

Views

1

Comments

0

View More from me

You May Also Like

GO