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में चला, में चला,अपनी धून में चलाज़िन्दगी ढूंढने अपनी राहें चला..ला ला ला ला ला लाचला चला, चला बेफिक्र,किधर है मंज़िल, नहीं है खबर (2)गर मिल भी जाये जो मुझको मोहब्बत तो उसको  में यूँ थाम लूकह दू ज़माने से, दिल के पैमाने से आ बस तेरा नाम लू,बढ़ती ही जाती  है यह बेकरारी, न आता है दिल को सुकूनतेरा नशा है यह चारो  दिशाओं में, छाया यह तेरा ज़नूनहाले दिल क्या कहूँ,बिन तेरे न रहूँचाहत में दूरियां , इक पल भी न साहू.सुनो सुनो, तुम दिल की सुनो,करो वही जो दिल यह कहे(२)बंधन सारे तोड़ के, लम्हो को जोड़ केमें चला , में चला, खुशियां ढूंढ़ने.ला ला ला ला ला लासोचा नहीं था, कभी ऐस होगा, चमकेगी यह किस्मत मेरी.देखा था ख्वाबों में, चाहा था बाँहों  में, वह हो जाएगी बस मेरीदिल का यह आलम न पूछो मेरा बस,खोया है यह इस कदरजगता हु रातों को, सोता नहीं हू,में, खुद की नहीं है खबरमेरा  दिल खो गया,बस में अब न रहा,मांगी थी जो दुआ,हमसफ़र मिल गयामिला मिला जो मौका तुम्हे,इसे कभी न तुम जाने दो(२)ख्वाबों को सजाके में, नींदो को बुलाके मेंमें चला ,में चला, सपने करने अपने ला ला ला ला ला ला.

mein chala

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बचपन सरल सा:         मेरी उम्र तब लगभग ग्यारह वर्ष होगी। ननिहाल पढ़ने गया था कक्षा ६ में। पहले पहल घर से बाहर। जब बड़े भाई साहब छोड़ने गये थे तो खुश था लेकिन जब वे मुझे छोड़कर वापिस जा रहे थे, मेरी आँखें डबडबाने लगीं। अक्टूबर की छुट्टियों में घर आया था। तब बचपन में पढ़ने की रुचि कम ही हुआ करती थी। दस पास करना बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। गणित और अंग्रेजी बहुतों को फेल करने के कारण होते थे। छुट्टियाँ समाप्त हुयीं और ईजा (माँ) ने सामान तैयार कर रवाना कर दिया।बहुत बुरा लग रहा था बचपन छोड़ने में। चौखुटिया पहुंचा और सोचा द्वाराहाट के रास्ते जाऊं। बस का टिकट लिया, तब साठ पैसे का टिकट हुआ करता था। द्वाराहाट में भाई साहब पढ़ते थे। वहाँ चला गया। वे स्वयं ही खाना बनाते थे। उस दिन जिस बर्तन में चावल बना रहे थे वह उल्ट गयी। उनके स्कूल में हड़ताल चल रही थी। एक रात वहाँ रूककर दूसरे दिन ननिहाल की ओर चल पड़ा। चलते-चलते दिमाग दौड़ने लगा।रास्ते में एक प्राथमिक विद्यालय आया। विद्यालय के चारों ओर चारागाह था जिसमें गायें चर रही थीं।मैंने प्राथमिक विद्यालय की ओर देखा। दिमाग चल रहा था।पढ़ने में मैं अच्छा था पर उसके महत्व को नहीं समझता था।कक्षा ५ में अपने केन्द्र में मेरा स्थान प्रथम था। उधर गायें चर रही थीं, प्राथमिक विद्यालय ऊंची जगह पर था। मैं सोच रहा था क्यों न अपने स्कूल में भी काल्पनिक हड़ताल करा दी जाय। हड़ताल घोषित कर दी मन ही मन। और आगे जाने की जगह पीछे मुड़ लिया। द्वाराहाट बस स्टेशन पहुंचा और बस में बैठकर चौखुटिया पहुंच गया। चौखुटिया पहुंचते पहुंचते शाम हो गयी थी। वहाँ हमारे गांव के एक दुकानदार थे। रात उनके यहाँ बीतायी। जो सामान ईजा ने भेजा था उसे उनके यहाँ रख दिया। उन्हें पूरी कहानी बताकर और उन्होंने विश्वास कर लिया। घर को रवाना हुआ और नदी के किनारे आराम से चला जा रहा था। एक जगह मछली पकड़ने को मन हुआ तो पकड़ने के लिए नदी पर गया। काफी कोशिश की पर असफल रहा। शाम को घर पहुंचा। बोला स्कूल में अनिश्चितकालीन हड़ताल हो गयी है। कब खुलेंगे पता नहीं। घरवाले भी मान लिये।. भला, इतना छोटा बच्चा इतना बड़ा बहाना कैसे बना सकता है? वैसे भी प्रारंभ से ही बोला गया है," सत्यमेव जयते।"  इसका मतलब झूठ की बहुतायत हमेशा रही है इसलिए कहना पड़ा ," सत्यमेव जयते।"  ईजा ने पूछा," तेरी अम्मा क्या कह रही थी? मैंने कहा," कुछ नहीं। " मन ही मन सोच रहा था जब वहाँ गया ही नहीं तो क्या कहेगी। फिर बोली खबरबात कैसी है वहाँ की? मैं बोला,"सब ठीक है।"  सब कुछ एक माह तक ठीक ठाक चला। खूब खेला कूदा। बीच बीच में बात उठती यह कैसी हड़ताल है जो टूटती नहीं। मैं चुप रहता। एक दिन ईजा खबर लायी कि ये तो वहां गया ही नहीं। हड़ताल -वड़ताल कुछ नहीं हो रखी है। आधे रास्ते से लौट आया था। खबरची मेरे ताऊ का बेटा था। उनका ससुराल वहां था। वे वहाँ गये थे तो उनको सब पता चल गया। अब मैं घर की अदालत में बिना वकील के खड़ा था। मुझे फिर से ननिहाल भेज दिया गया। हमारे अंग्रेजी के अध्यापक जब हमें पढ़ाते थे तो उनके मुँह से छर्रेदार थूक निकलता था। अत: कक्षा में जब नजदीक आते थे तो सजग होना पड़ता था नहीं तो थूक मुँह पर गिरने की पूरी संभावना रहती थी।तब बीड़ी,सिगरेट और तम्बाकू पीने का शौक पैदा हो गया था।एक साल में ही इस शौक ने दम तोड़ दिया। स्कूल मिडिल स्कूल कहलाता था जहाँ कक्षा ६,७ और ८ की शिक्षा दी जाती थी। उस समय की सामाजिक स्थिति में लड़कियों की शिक्षा का महत्व बहुत कम था। हमारे विद्यालय में उन दिनों एक भी लड़की नहीं थी। लड़कियों को कक्षा ५ तक ही पढ़ाया जाता था या पढ़ाया ही नहीं जाता था। घर का काम ही उनके हिस्से आता था। हालांकि, साक्षरता प्रतिशत उस समय लगभग तीस के आसपास रहा होगा। गर्मियों में सुबह का स्कूल हुआ करता था। एक बजे जब छुट्टी होती थी हम पास बहती नदी में नहाने जाते थे। पानी में पिताड़ ( जोंक की एक प्रजाति) होते थे जो शरीर पर ऐसे चिपक जाते थे कि निकालना कठिन हो जाता था। पास ही शिवालय भी था। वहाँ पर एक घट(पनचक्की) था, कुछ दूरी पर श्मशान। घट जब आते थे तो बहुत साथियों और लोगों से भेंट होती थी। लेकिन जब सूर्यास्त होने लगता तो श्मशान का डर मन में आने लगता था। माना कि भूतों का साम्राज्य आने वाला है।इसी क्रम में-मेरी छाया कब लम्बी हुईऔर कब छोटीपता ही नहीं चला,जब तुम्हारे सामने चुप बैठा थातब भी बहुत कह रहा था,जैसे मूक वृक्ष कहते हैंफल-फूलों के बारे में,मूक मिट्टी कहती हैअन्न के विषय में,मूक राहें कहती हैंयात्राओं के बारे में।*** महेश रौतेला

bachapan saral saa

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आपको मेरी रचना पढ़ने की आवश्यकता नहींआप बेझिझक पढ़ सकते हैंटिमटिमाते आकाश को,घूमती-फिरती धरती को।ऋतियों में घुस सकते हैंअन्न के खेतों में पसर सकते हैंवृक्ष को बढ़ता देख सकते हैं,ईश्वरीय परिकल्पना कर सकते हैं।पत्थर हाथ में लेबहुत दूर फेंक सकते हैं,फल -फूल चुन सकते हैंपानी से स्वयं को सींच सकते हैं,लोगों के बीच गीत बन सकते हैंया उनसे संवाद कर सकते हैं।आप मधुमक्खियों के छत्ते से होशहद बन टपक सकते हैं,या बंजर को सींच सकते हैं,तब तुम्हें कविता पढ़ने की जरूरत नहींन लम्बी कहानियां, न उपन्यासन महाकाव्य, न नाटक।तब तुम जीते जागते रचनाकार हो,और कविता शब्दों का गुच्छाचाबी के गुच्छे की तरह,जिससे हृदय खुल भी सकते हैंऔर बंद भी हो सकते हैं।

aapko meree racha..

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jeevan me abhi bhi woh saakh baaki hai ,                                                                                                                                                                                                  kyun ki dil me kahi tera ahsaas baaki hai.                                                                 aason aate nahi kyun ki  nazron me tera pyar baki hai ,                                                                                                                                                                                                 gam bhula sakte hai peekar magar.                                                                                kaano me tere  sabdo ki  awaaj aati hai .                                                                                                                                                                                                ankhen takraati nahin kisi aur se,                                                                                  ankhon me teri  chaap baaki  hai.                                                                                                                                                                                                     pyar se pyara punche koi toh ,                                                                                               bas meri  yaadon  me teri  yaad aati hai .                                                                                                                                                                                          dhan daulat ,shaurat  nahi ,                                                                                                meri nazme toh tera saath chaahti hai .

baaki hai

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            wafa likhta hai ……by sahal.roz jo naam mere zakhm ek naya likhta hai,suna hai wo har marz ki dawa likhta hai.wo likhta hai to lehrein aker mita deti hai,najane deewana rait pe kya likhta hai.wo shakhs bhi to mujh se juda sa rehta hai,mere haq mein jo hijer ki saza likhta hai.marzi ko apni kaatib e taqeer ki raza pe mitade agar,phir jo tu chahta hai wohi khuda likhta hai.tu puchhta hai jahan mein to log hanste hain“sahal”,shayad tu lafz e afwaa ko wafa likhta hai~sahal kunn. 

wafa likhta hai

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चालीस साल पहले:मुझे  उसका चालीस साल पहले का पहनावा याद है।क्यों ऐसा है पता नहीं! हल्के पीले रंग की स्वेटर। खोजी सी आँखें और गम्भीर चेहरा। मुस्कान अछूत सी।अपने अन्य दोस्तों का पहनावे का कोई आभास नहीं हो रह है। यहाँ तक की अपने कपड़ों का भी रंग याद नहीं है।दोस्त अजनबी बन जाते और अजनबी दोस्त।एक दोस्त को फोन किया। बातें होती रहीं जैसे कोई नदी बह रही हो, कलकल की आवाज आ रही थी पुरानी बातों की। वह डीएसबी, नैनीताल पर आ पहुँचा। बीएससी प्रथम वर्ष की यादें उसे झकझोर रही थीं। गणित वर्ग में हम साथ-साथ थे पर दोस्ती के समूह तब अलग-अलग थे। उस साल बीएससी गणित वर्ग का परिणाम तेरह प्रतिशत रहा था। वह बोला," आप तो अपनी मन की बात कह देते थे लेकिन मैं तो किसी को कह नहीं पाया। दीक्षा  थी ना।" मैंने कहा ," हाँ, एक मोटी-मोटी लड़की तो थी,गोरी सी।" वह बोला," यार, मोटी कहाँ थी!" मैं जोर से हँसा। फिर वह बोला," उसने बीएससी पूरा नहीं किया। वह अमेरिका चली गयी थी।" मैंने कहा," मुझे इतना तो याद नहीं है और मैं ध्यान भी नहीं रखता था तब।" मेरे भुलक्कड़पन से वह थोड़ा असहज हुआ।मैंने किसी और का संदर्भ उठाया, बीएससी का ही। वह विस्तृत बातें बताने लगा जो मुझे पता नहीं थीं। फिर उसने कहा कभी मिलने का कार्यक्रम बनाओ। दिल्ली में रेलवे स्टेशन पर ही मिल लेंगे एक-दो घंटे। मैंने कहा तब तो मुझे एअरपोर्ट से रेलवे स्टेशन आना पड़ेगा या फिर रेलगाड़ी से आना पड़ेगा। उसने कहा," एअरपोर्ट पर ही मिल लेंगे।" मैं सोचने लगा मेरा दोस्त ऐसा क्यों बोल रहा है? अक्सर, हम किसी परिचित को घर पर मिलने को कहते हैं। नैनीताल में तो कई बार एक ही बिस्तर पर सोये थे।सोचते-सोचते सो गया।रात सपने में यमराज आये। बोले, मुझे एक सूची बना कर दो।मैं उन्हें देखकर पहले तो बिहोश होने वाला था पर फिर संभला और पूछा कैसी लिस्ट। वे बोले उसमें केवल नाम होने चाहिए, स्वर्ग में कुछ जगह रिक्त हैं। मैंने उन्हें चाय के लिये पूछा। वे कुछ दोस्ताना दिखाने लगे। मैंने उन्हें चाय दी। चाय पीकर वे चले गये। मैं तैयार हुआ और जो मिलता उससे पूछता," स्वर्ग जाना है क्या?" जिससे भी पूछता वह मुझ पर नाराज हो जाता। जब थक गया तो अपने मन से सूची में नाम डालने लगा। नाम इस प्रकार थे-गंगा,यमुना, सरस्वती, गोदावरी, नन्दा देवी, हिमालय,  आदि। नींद टूटी तो सोचने लगा-"सपना देखना चाहिएमनुष्य बनने का,यदि मनुष्य ही न बन पायेतो राष्ट्र कैसे बनेगा?राम बने थेतभी राम राज्य आया था।"एक बार महाविद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रम में नाटक होना था। लोकेश उस नाटक को निर्देशित कर रहा था। मल्लीताल में उसका घर था। नाटक के सिलसिले में एक-दो बार मैं उसके घर भी गया था।उसे नाटकों का बहुत शौक था। उन दिनों लड़की का अभिनय लड़के भी कर लेते थे। लड़कियाँ कम होती थीं और अभिनय के प्रति कम उत्सुक रहती थीं।उस नाटक में एक लड़की का भी किरदार था। उस समय तक मैंने दिनकर जी की उर्वशी नहीं पढ़ी थी और न नोबेल पुरस्कार प्राप्त लोलिता का जिक्र सुना था। नोबेल कमेटी को उपन्यास इतना अच्छा कैसे लगा होगा, पता नहीं। बहरहाल, लोकेश ने मुझे एक सूची दी और कहा लड़कियों से ये सामान लेना है। मैं लिस्ट लेकर लड़कियों के पास गया। लिस्ट एक -एक कर वे देखने लगीं और आँखें नीचे करती गयीं। मुझे बाद में पता चला की उसमें "ब्रा" भी लिखी हुई थी तब तक मैं उससे अनभिज्ञ था, क्योंकि उस जमाने में गांवों में महिलाएं उसका उपयोग नहीं करती थीं। मैं बिना उनकी सहमति के लौट आया। बाद में मेरे एक दोस्त को उनमें से एक लड़की ने सभी परिधान देने की सहमति जतायी, लेकिन बोली थी कि किसी को नहीं बताना। उसने यह भी बताया कि एक लड़की बोल रही थी," मैं तो नहीं दूँगी।"   हम लोग शाम को छात्रावास गये और उससे सामान लिया और नाटक का सफल मंचन किया।कार्यक्रम देखते-देखते बहुत देर हो गयी थी। लगभग रात का एक बज गया था। मैं हाँल से निकला और तेज कदमों से अपने आवास की ओर चलने लगा। मन में डर घर कर रहा था,अंधेरे का, भूतों का।बचपन के भूत ऐसे समय ही याद आते हैं। और हर ऊँचा पत्थर  व झाड़ियां भूत जैसे दिखते हैं।नैनीताल की ठंड बदन को कंपकंपा रही थी।आधे रास्ता तय हो चुका था। एक कोठी मुझे दिखायी दी, उसमें एक लालटेन जल रही थी। मुझे आगे जाने का साहस नहीं हुआ। मैं उस कोठी की ओर बढ़ा और दरवाजा खटखटाया। एक बुढ़िया अम्मा ने दरवाजा खोला। मैंने उनसे पूछा," रात बीताने के लिए जगह मिल सकती है, अम्मा।" बुढ़िया खुश होकर बोली क्यों नहीं बेटा। अपना ही घर समझो। मैं अन्दर गया। उसने मेरे सोने के लिए मखमली बिस्तर तैयार कर दिया। और स्वंय बगल के कमरे में बिना बिस्तर के लेट गयी। मैं बिस्तर में करवटें बदल रहा था। बुढ़िया बीच-बीच में पूछती," बेटा सो गया?" मैं कहता नहीं, नींद नहीं आ रही है। एक घंटे बाद वह फिर बोली,"बेटा सो गया?"  मैं चुप रहा। तो मैंने देखा वह मेरी ओर आ रही है। जैसे ही नजदीक पहुंची मैंने कहा नहीं अभी नहीं आयी है। यह सुनते ही वह झट से लौट गयी। मेरे अन्दर डर बैठने लगा। लगभग सुबह पाँच बजे वह फिर बोली,"बेटा सो गया?" मैंने कहा नहीं। सबेरा होने वाला है अतः चलता हूँ। वह मेरे पास आयी और अपने हाथ से मेरे हाथ को पकड़ने लगी। मुझे लगा जैसै हड्डियां ही हड्डियां मेरे हाथ को जकड़ रही हैं। मैंने हाथ खींचा और घर की ओर तेज कदमों से निकल पड़ा। दूसरे दिन रात की बात मैंने अपने पड़ोसियों को बतायी तो वे बोले वह भूतुआ कोठी है।कहते हैं वहाँ एक बुढ़िया रहती है जो नींद में लोगों को मार देती है। मैं उनकी बातें सुन पसीना-पसीना हो गया। दूसरे दिन दो घंटे ही कार्यक्रम देखा।एक नाटक देखा जिसमें महिला का पति युद्ध में शहीद हो जाता है और महिला को सरकार से बहुत रुपये मिलते हैं और वह अपने सास-ससुर को छोड़ दूसरी शादी कर लेती है।दूसरी शादी के बाद भी वह पेंशन लेती रहती है। नाटक चल रहा होता है लेकिन मेरे मन में गत रात की घटना घूम रही है कि कोई बोल रहा है," बेटा, नींद आ गयी?"

chalis saal pahle

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                इम्तिहान जैसी हो गई है जिंदगी जीसको मे जी रहा हूँ....                तो कहि कहि ख्वाब भी अपने अंदाज बदल रहे है...                बस वही सोच मे डुबा हुआ मे अपनी राह बदल ना चाहता हूँ...                बंदी हुई शर्म की जंजीरो से निकलकरआजाद पंछी की तरह उडना चाहता हूँ...                समंदर की गहराई मे डुबकर वो चंद अल्फाजो से मिलना चाहता हूँ....                कायरपन से सामना करके ख्वाहिशो के बादल से जुडना चाहता हूँ...                वो अंधेरो से हाथ मिलाकर उसका अहसास करना चाहता हूँ...                जहर समा बंदनो से दूर होकर उनसे फासला बनाना चाहता हूँ...                बस वो बिछडे हुए कल को भुलाकर नई जिंदगी जीना चाहता हूँ...

adhuri kuch khwah..

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गल

tik

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लम्हों के दरमियाँएक चाहत है थमीयू तो है सब मिलाइक तेरी ही कमी ..है तन्हा हर सफ़रअब कटता जा रहादरिया है साथ मेंफिर भी है तिश्नगी,,हो जाती हैं खफ़ाख़ुद से ही हसरतेंहारा हो परिन्दागिरता है जब ज़मीं-आदर्श जौनपुरी

lamhon ke darmiyaan

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1-if you think that i can't get the job done , well you don't know me .                                                                                                                                                                                                                                                                                            2- three thigs must be deleted from you life extra tension ,burden and destructive relationship.                                                                                                                                                                                                                                                3-one who  follows the book , no dout is a good student  but who follows heart is great person.                                                                                                                                                                                                                                                4- criticising other is easy but  hard to eccept  .                                                                                                                                                                                                                                                                                                                           5- finally chose a work that nobody ever done.                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            6- satisfying other is  kind  a easy job but satifying youself is hard .                                                                                                                                                                                                                                                                                        7- fear is apoplexy of mind                                                                        

the way of life

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jeevan ka saath rahega aap ke baad ,                                                                                                                                      jeendgi  ki raah toh  hai  vishvaas ki baat,                                                                                                                                                andhera  guzar jaata hai har raat ke baad,                                                                                                                                      sache saathi ki hoti kai  kuch aur hi  baat,                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      milne ko milte hai kai par aati hai sirf kuch ki yaad,                                                                                                                          saathi par vishvaas rakhna hai vishvaas ki baat ,                                                                                                                           sagar ko paar karna na hai cheeti ke bas ki baat ,                                                                                                                          tinke ke sahare sagar kar leti paar visvaas ke sath .                                                                                                                                                                                                                                  girte bache ko dikhta hai pita ka haat,                                                                                                                                                 haath  pakad kar khada hota visvaas ke  sath ,                                                                                                                                    unchi imarton par dikhti  safalta  saaf viraaj ,                                                                                                                                vishvaas hi karta hai safalta ka agaaj.                                                                                                                                                                                                                                      visvaas   hai bhaqt ki bhagvan me aastha ka adhaar ,                                                                                                                 yun  toh hota hai  fulon  ka bhi katon se vyavhaar,                                                                                                                          puri duniya gayegi vijay ka malhaar ,                                                                                                                                                bas ek baar  mil jaye visvaas ka uphaar.                                                                                                          

vishvaas

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जब मन नहीं करता है कुछ करने का, तो लिखता हूँ मैंजब मन करता है मन को छूने का, तो लिखता हूँ मैं।ज़िंदगी से लड़ते-लड़ते, ज़िंदगी गुज़र जाती हैजब मन करता है कभी जीने का, तो लिखता हूँ मैं।कोशिश करता हूँ लफ़्ज़ों से,जज़्बात जता सकूँ, जज़्बात छुपा सकूँजब मन करता है तुझे याद करने का, तो लिखता हूँ मैं।बिन बादल बरसात,देखी है कभी, सुनी है कभीजब मन करता है कभी भीगने का, तो लिखता हूँ मैं।मन की गहराई,जितनी गहरी है, उतनी सुनहरी हैजब मन करता है इसमें उतरने का, तो लिखता हूँ मैं।आसमान में उड़ने की ख़्वाहिश,हर परिंदे की बस यही ख़्वाहिशजब मन करता है कभी उड़ने का, तो लिखता हूँ मैं।हँसते हुये कैसे रोया जाये,सोचा है कभी, किया है कभीजब मन करता है ऐसा करने का, तो लिखता हूँ मैं।।#rockshayar

toh likhta hoon m..

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ना तुम्हें याद कर सकता हूँ, ना तुम्हें भूल सकता हूँशर्त यही है मोहब्बत के इम्तिहान की।जिस पल में साँस लेता हूँ, उस पल में याद आती होजिस पल में याद आती है, उस पल के साथ आती हो।चाहत के समंदर में जब भी गोता लगायामन का हर एक मोती चमकता हुआ पायालेकिन जब मन के अंदर गोता लगायातो मन के समंदर को सूखा ही पायामीलों गहराई तक, काई तक नहीं जमी थी वहाँपानी तो बहुत था मगर, था सब आँखों में जमा।वही पानी, जिसे बेवज़ह बहने की इज़ाज़त नहींहाँ गर जज़्बात अश्क़ों की शक़्ल अख़्तियार कर सकेतो इज़ाज़त है बहने की।इज़ाज़त मिलते ही आँसुओं का सैलाब उमड़ने लगता हैआँखों से अश्क़ों की रिहाई कायह मंज़र बड़ा ही गीला है।ना तुम्हें महसूस कर सकता हूँ, ना तुम्हें छू सकता हूँशर्त यही है इश्क़ के इम्तिहान की।।

shart yahi hai

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हिन्दी केवल एक भाषा नहींसृजन की यह आभा हैहिन्दी केवल एक गाना नहींजीवन की जयगाथा है।हिन्दी केवल एक वर्ग नहींविविधताओं का भंडार हैहिन्दी केवल एक तर्क नहींसमीक्षाओं का संसार है।हिन्दी बहुत सरल हैप्रकृति जिसकी तरल हैसंवेदनाओं की भूमि मेंयह परिपक्व फसल है।हिन्दी केवल मातृभाषा नहींसंवैधानिक एक पर्व हैहिन्दी केवल राजभाषा नहींगणतांत्रिक यह गर्व है।हिन्दी केवल एक बोली नहींचिंतन की यह उपमा हैहिन्दी केवल एक मोती नहींमंथन की यह महिमा है।अभिव्यक्ति का अंश हैयह न कोई अपभ्रंश हैआदिकाल से भी आदिसभ्यताओं का वंश है।हिन्दी केवल एक भाषा नहींजीवन की यह ज्वाला हैहिन्दी केवल परिभाषा नहींसृजन का यह प्याला है।हिन्दी केवल एक संकाय नहींज्ञान की यह दृष्टि हैहिन्दी केवल एक पर्याय नहींसम्मान की यह सृष्टि है।इसमें कोई अतिशयोक्ति नहींके साहित्यिक पतन रोकती यहीपठन-पाठन अतिसुंदर लेखनलोक-लुभावनी लोकोक्ति यही।हिन्दी केवल एक भाषा नहींजीवन की जिज्ञासा हैहिन्दी केवल एक आशा नहींमन की महत्वाकांक्षा है।हिन्दी केवल एक मंत्र नहींआध्यात्मिक अनुनाद हैहिन्दी केवल एक छंद नहींयह आत्मिक अनुवाद है।अनुदार नहीं बहुत उदार है यहउद्वेलित मन का उपहार है यहवैचारिक व्याकरण से सुसज्जितहृदय का उद्दीप्त उद्गार है यह।हिन्दी केवल एक भाषा नहींजीवन की जिजीविषा हैहिन्दी केवल अभिलाषा नहींसृजन की सही दिशा है।हिन्दी केवल एक मुक्तक नहींमर्म की मधुशाला हैहिन्दी केवल एक पुस्तक नहींकर्म की पाठशाला है।राष्ट्रीय गौरव है यहशासकीय सौरव है यहक्लिष्ट और कर्कश नहींमधुर कलरव है यह।हिन्दी केवल एक पथ नहींचिंतन की उपमा हैहिन्दी केवल एक रथ नहींमंथन की महिमा है।हिन्दी केवल चलचित्र नहींअभिव्यक्ति का संगीत हैहिन्दी केवल एक क्षेत्र नहींअनुभूति का यह गीत है।हिन्दी केवल एक प्रदेश नहींबल्कि संपूर्ण भारत हैहिन्दी केवल राजआदेश नहींबौद्धिक अभिभावक है।हिन्दी केवल शब्दकोश नहींविधाओं का विस्तार हैहिन्दी केवल ज्ञानकोश नहींमेधाओं का मल्हार है।हिन्दी केवल एक भाषा नहींकवि की कविता हैहिन्दी केवल एक आशा नहींरवि की सविता है।हिन्दी केवल एक अक्षर नहींयह विशिष्ट योग्य वर्ण हैहिन्दी केवल हस्ताक्षर नहींअपितु हृदय का दर्पण है।हिन्दी केवल मातृभाषा नहींसृजन की यह आभा हैहिन्दी केवल राष्ट्रभाषा नहींजीवन की महागाथा है।।-राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान

hindi kewal ek bh..

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एक ना एक दिन तो ये राज़ भी खुल जायेगादिल की आह सुनकर ये दिल पिघल जायेगा।ख़ुदा को ढूँढ़ने वाले, इतना तो ख़ुद पे यक़ीन रखख़ुदा को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते तू ख़ुद से मिल जायेगा।ज़िन्दगी की शाम का, सूरज जब ढलने लगेगालौटकर हर एक परिन्दा अपने घर पर जायेगा।जीतने की आदत, हर एक ज़ुनूनी की है यही आदतहर बार जो गिरेगा उठेगा और फिर संभल जायेगा।वक़्त की बिसात पे, कौन चलेगा अगली चालवक़्त आने पर तुम्हें सब पता चल जायेगा।आग लगाकर तमाशा देखने वालों, अब ज़रा ये भी सुन लोआग से जो खेलेगा वो ख़ुद भी जल जायेगा।इतना भी ना इतराओ, अपनी नज़रों पे तुमनिशाना मेरा चूका है मगर दूर तक जायेगा।।

nishana mera choo..

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तसव्वुर में मेरे आजकल तुम्हारी तस्वीर चलती हैकाग़ज़ पर अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि तस्वीर उभरती है।तेरी तस्वीर जब भी देखता हूँ, ख़यालों में खो जाता हूँमैं कुछ नहीं लिखता हूँ, तेरी तस्वीर मुझसे लिखवाती है।तेरी रूह, तेरा नक़्श, तेरा नाम, सब चाँदी जैसे सफ़ेद हैंदिल के अंधेरे कमरे में, तू रौशन कोई खिड़की लगती है।तेरी खुशबू का अंदाज़ा तो इस बात से मालूम चलता हैकि जिस गली से गुज़रे तू, वो गली फूलों सी महकती है।तेरे आने से मेरी ज़िंदगी का अधूरापन अब खत्म हुआज़िंदगी पहले के बजाय इन दिनों ज्यादा मुस्कुराती है।मुझे ये ख़बर है कि तुम्हें मेरे फ़ितूर की कोई ख़बर नहींसुन ओ बेख़बर, तेरी तस्वीर तो मेरी आँखों में बसती है।दुआओं की दरख़्वास्त है, ये जुदाई नाकाबिले बर्दाश्त हैसुना है कि दुआओं से तक़्दीर की तस्वीर बदल जाती है।।

tasawwur mein mere

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तेरी परछाई संभाल कर रखी है मैंनेपता था कि अंधेरा घना होने वाला हैतुम्हे ख़बर नहीं थी मेरे आने कीमगर मुझे ख़बर थी तेरे जाने कीवो पल, जो पल भर के लिए हम को मिले थेन उनमें कोई शिकवे थे, न उनमें कोई गिले थेतेरी आवाज़ सहेज कर रखी है मैंनेपता था कि ख़ामोशी कायम होने वाली हैतुमने कभी बताया नहीं, कि कौन हो तुमतफ़्तीश करता रहा, मैं ज़िन्दगी भर यहीइस बार जब मुलाक़ात होगी, तो पूछूँगाइस मुलाक़ात में कितने अलविदा छुपे हैंहर बार यह अलविदा मेरी जान ही ले लेता हैपता नहीं कब इसके मुँह, मेरा खून लग गयातेरी तस्वीर संभाल कर रखी है मैंनेपता था कि याददाश्त जाने वाली है।।#rockshayar

teri parchayi sam..

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ना किसी के आने से, ना किसी के जाने से, खुदा कसम अगर आज हमारी रूह हिली है,तो  सिर्फ आपके गाने से 

gaana

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