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अब सपने में ही गाँव जाना होता हैकल सपने में गाँव गया थाअपने खेत में गेहूँ बो रहा था,हल चलाते समयहल का फल रूक गया था,जैसे राजा जनक के साथ हुआ था।धूप बहुत थीबैलों को छाया में खड़ा करपानी पी रहा था,खोयी वस्तु को खेत में खोज रहा था,घर से आये खाने को उतावला था,आखिर पेट की भूख मन की भूख से तेज होती है।फिर एकाएक गेहूँ पक गयेऔर बंदर खेत में आ धमके,मेरी लाठी छोटी थीअतः उन तक पहुँच नहीं रही थी।ओह, मेरा पहाड़ी गाँवकितना बेबस हो चुका है,घराट पर मिले लोगबूढ़े हो चुके हैं,घराट बंद हो चुके हैं,ओहो, मेरा गांव कितना बदल गया है।अचानक मैं अपनी प्रेम कहानी पर आता हूँ,जिसे मेरे और उसके अलावा सब जानते हैं।चाय के लिए बैठा हूँदेश-विदेश की राजनीति उड़कर आने लगी है,तूफान बनने लगे हैंजो चाय की गिलास से उठचाय की गिलास में खत्म हो जाते हैं।गाँव पंचायत बैठ गयी हैशराब के ठेकेदार शराब लाये हैं,बोतलों का टकराव सुनायी दे रहा हैशराब खुली है, स्वतंत्र है,प्रधान पीकर लुढ़क चुका है,पंचायत में सन्नाटा हैखबर है इस साल पिछले साल से अधिक शराब बिकी है,गालियां भी अधिक दी गयी हैं,फिर भी सपने में संगीत सुनायी दे रहा है,क्योंकि मेरा देश बदल रहा है।*महेश रौतेला

aab sapane mein h..

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जीकर लिखता हूँ ,या लिखकर जी लेता हूँ !मुझे नहीं आता ,जीना कुछ और...लिखना कुछ और !!

zindagi aur main

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badi kambakth hoti hain ye khwahishen....udan asmano ka deke , mayusion ki jamin pe ye girayebadi kambakth hoti hain ye khwahishen….pyar kikhubsoort galiyon meye ghumaye  magar galiyan gumnami ke andhere me kho jati hain   ye kyu ye na batayebadi kambakhth hoti hain ye khwahishen….kisi ki aankhon ka taara, kisi ke jine ka sahara ye hume banati haintare tut jate hain sahare v chut jate hainye kyu ye humse chupati hainbadi kambakth hoti hain ye khwahishen………milne ki bekarari ye jagaye , magar bichadne ka gam kyu ye  na batayechehre ki hasi badalti hai palko ki nami me ye ahsas tak na karayebekarari ban jati hai bechainion ka samandardard ka sailab rh jata hai bas apne andarghutan dard aur naummidi bas ye chor jati hainbadi kambakth hoti hain ye khwahishen…….

kambakhth khwahis..

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झूठ बोल लेता, तो सारा जहाँ मेरा था .  सच बोलकर मैंने खुद को अपना बना लिया ...

the power of truth

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jindagi,kayee baar aati rahi hai tu.mere samne mauke liye hazaar.anjaani si maine jinhe.ganwa diya baar baarapni hi dhun mein khoyi sijiti rahi niradhaar.par ab o meri jindgiek baar to aa mere dwarhaath pakad kar rok loongijaane na doongi abki baar.teri di gayi har maukon ko.apne prayason se karoongi saakar.ye mera vaada hai tujhse.aazma le mujhe bas ek baar..

bas ek baar

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            कत्ल करने को हथियार की जररूत क्या है , जान लेने को औजार की जरूरत ही क्या है ॥                   बस एक बार प्यार से हाँ कह दे फिर इस ज़माने  की जरूरत क्या है ॥

jaroorat

poems sher-o-shayari 1

मेरा दिल  किसी  के  प्यार को  तरसे  इतना भी इसे नाकारा मत समझो,और  प्यार  के  लिए कोई  न मिल पाए इतना भी इसे बेचारा मत समझो,करने  को  प्यार  दुनिया  में  लोगो  की  कमी  नहीं है ,पर हर किसी  को हम प्यार  कर   लें  इतना  भी हमे  आवारा मत समझो ॥

mera dil

poems sher-o-shayari 1

खामोश......, ये दील कहता कुछ,बंद आँखे भी..... देखती हे कुछ ।।पर.... ना पता हे उसका,ना उसके दि-दार का।।दिल धडकता हे कुछ,आँखे बयाँ करती हे कुछ ।।ना सागर की घहराई ने, समझा कुछ,ना आसमा की दुरीयोँ.. ने कुछ।।हम तो नाव लेके निकले थे उसे ढूँडने,मारे फिरते समँदर मे कुछ, गलीयोँ मे कुछ।।ना तो हम खुदा से कहेँगे कुछ,ना आपने आपसे कुछ।।हम तो मोहब्बत के मारे हे तेरे,तुम ही हो अब हमारे सब कुछ।।

khamosh dil

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to be and not to be?                     that's the question​माणूस जन्माला येतो,मग मरणार चं।।                  सुखाच्या शामियाना ला,                  दुखाचे सावट असणार च।।म्हणून कोणी जगणं सोडतं का,नाही लढत न लढत च असतं।।                   तरचं ह्या प्रश्नाला,                   आता तर खरा अर्थ मिळतो।।रंग मंचा च्या ह्या अवाढव्य मंचावर,मला तर फक्त नाटक प्रदरशित करायचं आहे।।                   दैवताने लिहिलेल्या लेखणी चा,                   अर्थ च शोधायचा आहे।।तरचं ह्या प्रश्नाला,आता तर खरा अर्थ मिळतो।।                   अश्या ह्या black and white दुनियेला,                   नविन रंग तर द्यायचा आहे।।या नर रूपी शरीराचा,मी आहे नटसम्राट।।                  मला तर फक्त माझ्या कलेला,                  या खोट्या दुनियेत वाव मिळवायचा आहे।।समाजाने घेतलेल्या परिक्षेत,एकदाच उत्तीर्ण व्हायचय आहे।।                    तरचं ह्या प्रश्नाला,                    आता तर खरा अर्थ मिळतो।।

manushya janm

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दौर अब ये आ चुका है,हर हर्फ़ अब आज़ाद है,पर ना कोई सुनने को तैयार है,ना समझने को। 

harf

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तेरा ख्वाब आँखों में और पाला नहीं जाताबेवजह पलकों पर बोझ डाला नहीं जातातेरा ख्वाब आँखों में और पाला नहीं जातायूँ तो तुझको भूलने की कोशिश में हैं मगरतेरा जिक्र हर बात पर टाला नहीं जाताजो रख दिया हाथ एक बार अंगारों परताउम्र हथेली का छाला नहीं जाताजो बुझती है इश्क की लौ तो बुझने दोइस आग में अब ओर घी डाला नहीं जाताआप कहते हैं इस मुल्क को तहस-नहस कर देंगेअजी छोङिये, एक पत्थर तो आपसे उछाला नहीं जाताइस शहर में कोहराम है ओर आपको आराम हैहमारे तो हलक से एक निवाला नहीं जाता !दिनेश गुप्ता 'दिन'https://www.facebook.com/dineshguptaofficial/

tera khwaab aankh..

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तुम दुर्गा नहीकाली नहीलक्ष्मी नहीतुम बस इंसान होदेवी नहीतुम्हारा देवी होनाउस फूल जैसा हैजो किसी पत्थर के पैरों परचढ़ने के लिए डाल से तोड़ लिया जाता हैऔर उस गाय जैसाजो चुनावी मौसम मेंइरादतन महान बना दी जाती हैतुम्हारे लिए कभी नहीहोता है तुम्हारा देवी होनाये वो चमकीले दाने हैजिन्हें चुनने की सजा में कोई चिड़ियाताउम्र जेल पाती हैपरिवार की इज़्ज़त का मुकुटसलीकेदार , शालीन होने कीतारीफे सब तुम्हारे पिंजरे केके तार है।अपने आप से तोड़करतुम भुला दिए जाओगेउस फूल की तरहतुम्हारा बेमकसद सड़ जानाकोई नही देखेगातुम देवी मत बननातुम कुछ भी बन जानाकोई कलंककोई दागकोई दुख कोई रोड़ाकोई आगकोई रंगकोई गीत कोई धुनया बस कोई सूखा पत्ताजो हिम्मत करे हवा से भिड़ जाने की

tum devi nahi

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(फितूर)प्रश्नों को ,दायरे में ही रहने दो,जो कहते हैं हमवही तुम होने दो।पथ्थरों को,पूजती है दुनिया,तो क्या-------इंसान जो पथ्थर हैंपथ्थर ही रहने दो।चलेंगे बाण आसमानों मेंजख्मी होएगेंदिल गैरों केहोने दो।बेहिसाब कर ली हैमोहब्बत हमने भी सदियों सेअब दुश्मनी भीबेहिसाब होने दो।कल जिंदगी फुसफुसाई थीमेरे कानों मेंबहुत हो गया खेलअब जमाने मेंमौत है जालिमदो दो हाथ होने दो।(विकास कुमार)

phitur

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(अभीप्सा)भरी दोपहरीगर्म रेततपते मरुथलबढ़ती पिपासामरुधान हैं जिस ओररे मन चल उस ओरघोर अंधेरामान घनेरासांसे जलतीगति माध्यम सीठहराव सा  जिस ओररे मन चल उस ओरप्रश्न भँवर हैंउत्तर मौन हैंचलते राहीउद्देश्य विहीन हैंसूरज है जिस ओररे मन चल उस ओररावण हँसताराम सिमटताजनता त्रस्तसत्ता मस्तसुशासन  है जिस ओररे मन चल उस ओर।(विकास कुमार)

quest

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आज फिर कलम मेरी ने सोचा है-तारीफ तेरी लिखने को,लिख कर तुझे लफ्जो में-खुद अच्छा दिखने को,शायद इसीलिए तेरे ख्यालों में खोई है-कलम मेरी की स्याही,पिरो कर तुझे इस गीत में-लूटना चाहे वाह-वाही...तूं ही बता मैं लिखूं कैसे तुझे-न ये हवाएं न ये बहारें किसी काम की,कोई मौसम नहीं- कोई लफ्ज़ नहीं-तूं रूह नहीं कोई आम सी..मासूमियत के साये में रखा है-मन तूने अपना महकता गुलाब सा,एहसासों की गहराई ऐसी-कि शरमा जाए पानी भी आब का...आँखों में सितारों सी चमक-चेहरे पे चाँद सा नूर है,आफताब की आभा तूं-तूं ही मेरा गरूर है..मेरे बागीचे की वो तितली है तू-जो फूलों को देख खिलती है,तेरी तरफ ही है राहें मेरी-राहें जो मंजिल को मिलती हैं..मेरी वफ़ाएं, मेरी बेवफाई -सब तेरे नाम की,तेरे नाम है ज़िंदगी ये मेरी-बिन तेरे अपमान सी..एहसास जो कराए रूहानियत का-आवाज़ तेरी वो अलौकिक गीत है,तूं मेरी शुरुआत, तूं ही मेरी अंत-तूं ही है मेरा प्रभ, तूं ही मेरी जीत है..तूं पारस सी, तूने सोना है बनाया-इस धूल के तिनके को,आज फिर कलम मेरी ने सोचा है-तारीफ तेरी लिखने को,लिख कर तुझे लफ्जो में-खुद अच्छा दिखने को,शायद इसीलिए तेरे ख्यालों में खोई है-कलम मेरी की स्याही,पिरो कर तुझे इस गीत में-लूटना चाहे वाह-वाही...

tareef teri

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जब बेठ जाता हूं में फिर से अकेले,यादों की किताबो को साथ लेकरवो पुराने दोस्त फिर अब याद आते हैजैसे शहरों में सुबह सुबह रोजवो जो अखबार आते हैवो पुराने दोस्त फिर अब याद आते हैकुछ व्यस्त हम होते हैकुछ व्यस्त वो भी होते हैकभी साथ आते थे यादे बनाने के लिएअब अकेली सड़को पर चलतेचलते फिर वो याद आते है,अब जरूरत उनको नहीया हमे उनकी याद नही आईफिर भी बेवजह वो कभी याद आते हैवो पुराने दोस्त फिर अब याद आते हैअब तो सपने बचे है बस शायदमिलने मे हमको उनको अबजैसे सूरज को चांद से मिलने केपर फिर आसमान में वो साथ आते हैइन गहरी नींदों में वो हर बार आते हैवो पुराने दोस्त फिर अब याद आते हैसब शुमार है वो अलग शहरों मेंअकेले वो वापस हर बार आते हैवो पुराने दोस्त फिर अब याद आते हैकरोड़पति हो कर बैठे है अब वो भीपर उधारी के दिन अभी भी याद आते है,आज तरसते है बिल चुकाने को दोनोंकभी वो अपनी बारी के बाद याद आते हैमुस्कुरा लेते थे हम साथ चलते चलतेदफ्तरों से परेशान अब हर बार आते हैवो पुराने दोस्त फिर अब याद आते हैसही कहती है शायद दुनिया यहबिछड़े कभी तो वापस याद आते हैचाहे बुरे हो या अच्छे वो भीमन मे वो हमारे कई बार आते हैवो पुराने दोस्त फिर अब याद आते हैनिकाल लो वक्त अब तुम भी यारोमिलकर कभी फिर बच्चे बनकरबचपन के वो दिन सबको याद आते हैवो पुराने दोस्त फिर अब याद आते है

purane dost

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pyaaaar deewana hota nahiiiiii ab ,dil ka bhi kya kuch kaam hai?ishq hota nahi ab shayar ki tarah..kya pyaar saayad ab isliye badnaam hai?yun to... ab bhi ...jahaan me..pyaar hotaaa hai....pyaar hotaaaa hai ...pyaar se kah do ye par..pyaar aise....hota nahi...yaar se kah do ye par... pyaar aise hota nahi...--------ab to raate soti hai..ab to din bhi jagta hai..ab to neende bhi aati hai..sab kuch ...sapna lagta hai..kuch lamho me.. jeete hai..kuch uski yaade ..hoti hai..hote juda,yaadon se..na kuch apna lagta hai....yun to.. ab bhi ...jahan me ,pyaar hotaa hai ...pyaar hotaaaa hai...pyaar se kah do ye par... .pyaar aise hota nahi.  yaar se kah do ye par... pyaar aise hota nahi...(music interlode)pahle se  apna koi...kuch bhi naata nahi...dil yunhi koi ,ab lubhaata nahi. ..itnaaa bhi pyaar koi..ab to karta nahi...juda hokar rote hai.... koi marta nahi. ..ab marne ki kasme khate hai..jeene ke waade hote hai....ho jootha sachaa pyaar magar...pyaar ki yaadein hoti hai. ...zindagi se maange ,bhi aur  kya ...jhoomti din aur raate  hai ...kuch ho rona hasna tab...puraane gaane gaate hai. ..yun to ab bhi ..jahaan me ...pyaar hota hai ...pyaar se kah do ye par .. pyaar aisa hota nahi.yaar se kah do ye par ..pyaar aisa hota nahi ...har pal bechaini badhaye..aisa ... hota nahi..saari neende churaye.. aisa ... hota nahiwo paagal... paagal banaye..aisa ... hota nahi..pahli najar.. me ho jaye ..aisa ...  hota nahi...yun to ,ab bhi.. jahaan me....pyaar hotaaa hai ..pyaar hotaaa hai ...pyaar se kah do ye par..pyaar aise hota nahi..  yaar se kah do...ye par pyaar aise hota nahi...gulaabi aaankho se sharaabi hote ab dekha nahi..dil lekar jigar ab koi deta nahi...aanheey  koi bhare, aaankhe kisiki baharepalko ko sharmaate ,waise ab dekha nahi...

pyar aisa hota nahi

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ajar nature's doors opened wideinstilling high spiritson untrodden trackswinding its way up the hill...unfamiliar footfallsgained momentumto crush nature on its way....dried leaves and twigsalong dangling tree brancheswith engulfed climbers and creepersbuilt thick pyres to be laid...warm noon air dazzledthrough hot rays of sunsearching for a spotto trickle a game of fire....waiting stealthilyto capture those secondswho triggered those tiny sparksto engulf so many lives later?knowingly or unknowinglywhat lead them into a death trapthat charred their dreams forever.....within seconds those tiny sparksgrew into stretched tongues of firecooked both flesh and bones -eating lives on its way...rescued from fiery tongues of firepeeled survivors dangled life and death.....is it right to thinkblessed are the deadfor they were deprived of the painto survive before they breathed their last.....nothing could have saved themexcept their destiny that sustainedwith good deeds, thoughts, and lives...whatever it may be - now and thennature sends in the warningnever tamper with someonewho will not react at the first instancebut will give you back in multiplesthat could leave you stumped forever....

charred dreams

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