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ओ आदमीकहाँ हो, कहाँ जा रहे हो,कौन मिलेगा, कौन बिछुड़ेगा,किस-किस से परिचय होगा?ओ मनुष्य,नाममात्र  भी नहीं दिख रहे हो,कहाँ दृष्टि गड़ाऊँ?ब्रह्मांड बड़ा होते जा रहा है,मोह पर हाथ पड़ा है,माया पर मुँह गड़ा है।ओ मनुजदिख रहे हो,सुन रहे हो,गीता से ज्ञान ले रहे हो,समय के समर में लड़ रहे हो।ओ मनुष्यबहुत उधेड़बुन करते-करते,यह संस्कृति निकली है,यह सभ्यता बनी है,कहाँ हो, कहाँ जा रहे हो?**महेश रौतेला

o aadami

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मेरा कहता है ,जाना मेरी तू बन जाचेहरे हज़ारों हैं, इनमे मुझको तू चुन जादिल में रखूँगा तुझे अपना बनाके में, दुनिया से लड़ कर केसुन ओ दीवानी तू , कर न नादानी तू, आजा तू हाँ कर केमीठी सी यह बातें तेरी, तीखी सी निगाहें तेरी , करती हैं मुझे घायलसच सच कहता हु,तेरी हर अदाओं पर हो गया दिल कायलरात न ढल जाये कहीं पर, चाँद ज़रा थम जादिल मेरा कहता है...,दिल मेरा कहता है..,दिल मेरा कहता है ,जाना मेरी तू बन जासुन ए हवा तू , ऐसे मचल के पास वोह आ जाये,पास वह जब, ऐसे मचल के, दूर न जा पाएकानो की  यह बाली तेरी, पैरो की यह पायल तेरी, कहती है क्या तू सुनचारो दिशा में बजने लगी है, प्यार की मीठी धुनबीत न जाये पल कहीं पे, वक़्त ज़रा रुक जादिल मेरा कहता है...,दिल मेरा कहता है..,दिल मेरा कहता है ,जाना मेरी तू बन जाइश्क़ में जीना, इश्क़ में मरना, इश्क़ के लाखों रंगमें तो बस इतना ही जानू, जीना तेरे संगख्वाबों में आके, नींदे उड़ाके सुन ओ दीवानीबन जा मेरी दुल्हन तू, मैं राजा तू रानीसाथ रहूँगा में हरदम, बात मेरी मन जादिल मेरा कहता है...,दिल मेरा कहता है..,दिल मेरा कहता है ,जाना मेरी तू बन जा

dil mera kehta hai

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पीपल पानी और वैतरणी मुझे उनके पीपप पानी में जाना था। कुमाऊं में मृत्यु के  बारवे दिन पीपल पानी की प्रथा संपन्न की जाती है।लोग श्रद्धा से पीपल में,   पानी में कुछ बूंदें दूध की मिलाकर चढ़ाते हैं। इस प्रथा में धर्म का प्रकृति से अविच्छिन्न संबन्ध स्थापित किया गया है।पीपल को कलियुग का कल्पवृक्ष माना जाता है जिसमें देवताओं के साथ-साथ पितरों का भी वास है, ऐसा कहा जाता है।श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है “अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम, मूलतो ब्रहमरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे, अग्रत: शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नम:” अर्थात, “मैं वृक्षों में पीपल हूं। जिसके मूल में ब्रह्मा जी, मध्य में विष्णु जी तथा अग्र भाग में भगवान शिव जी का साक्षात रूप विराजित है।"सुबह पांच बजे की उड़ान है। रात एक बजे नींद टूट गयी है। बैठे-बैठे  एक विचार घुमड़ता आया।"मेरी नींद फिक्रमंद हो जाती हैजब सुबह की उड़ान पकड़नी होती हैकितनी कोशिश करो आती नहीं,समझो,वे प्यार के दिन, दोहरा जाती है।"सुबह सात बजे दिल्ली पहुंच गया हूँ। सार्वजनिक परिवहन में यात्रा करने का एक अलग आनंद है। बगल की सीट में बैठे व्यक्ति से धीरे-धीरे बातचीत होने लगती है। मेरे बगल में एक ठेकेदार बैठा है, जो पुल बनाने के ठेके लेता है। वह बीच-बीच में फोन में बता रहा कि कितना कट्टा सीमेंट और बालू भेजना है। वह अपने काम के बारे में बता रहा है और मैं उन बातों का रस ले रहा हूँ। राजमार्ग पर अब अच्छे-अच्छे ढाबे बन गये हैं। जिस ढाबे पर बस रूकी है,उसका शौचालय एअरपोर्ट के वासरूम जैसा  साफ सुथरा है। खाना भी जी खुश करने वाला है। हल्द्वानी पहुंच कर हम अपने-अपने गंतव्य की ओर चल दिये। शाम हो चुकी है। दूसरे दिन दिवंगत आत्मा का पीपल पानी है। पता नहीं कितने लोग पीपल पानी का अर्थ समझते हैं! मैं भी इंटरनेट पर इसके बारे में पढ़ता हूँ। पंडित जी भी किसी को इसके बारे में कुछ नहीं बताते हैं। परंपरा के रूप में इसका अनुसरण हो रहा है। पीपल में पानी डालने से पहले पंडित जी क्रिया कर्म घर में और घर पर आवश्यक पूजा- पाठ करते हैं। जजमान जब दक्षिणा देते हैं तो पंडित को दक्षिणा कम लगती है तो वह कहता है," दक्षिणा कम है, इतनी दक्षिणा में दिवंगत की आत्मा वैतरणी पार नहीं कर पायेगी।"  पंडित वैतरणी का डर दिखाकर जजमान की आस्था का दोहन कर रहा है। हमें बचपन में पढ़ाया जाता था कि शादी और मृत्यु संस्कारों में अवांछित धन खर्च  नहीं करना चाहिए। पर समाज में अधिकांशत: ऐसा नहीं होता है।वे गायत्री परिवार, हरिद्वार से जुड़े थे। मृत्यु से तीन दिन पहले उन्हें जब गायत्री की याद दिलायी गयी तो उन्होंने कहा," गायत्री तो हमारी प्राण ठैरी।" गायत्री परिवार में सभी अनुष्ठान सादगी से होते हैं। लेकिन ऐसा लग रहा है कि सब व्यक्ति तक सीमित है। और  परंपरागत लोभ,मोह दिखायी दे रहा है। वैतरणी दिवंगत आत्मा पार होगी या नहीं,यह तो पता नहीं, लेकिन पंडित का लोभ उसे वैतरणी से उलझा कर रख रहा है।पहले मुट्ठी में भरकर दक्षिणा दी जाती थी।अब सामने गिना जाता है और साथ में लोभ की वैतरणी बहती रहती है। लोग अपने पसंद के विषयों पर चर्चा कर रहे हैं। किस अस्पताल की क्या नीति है, कहाँ कितना बिल आता है। ईलाज का व्यवसायीकरण। इस बीच अच्छे डाक्टर भी हैं। इन्हीं प्यार, लड़ाई, झगड़े ,दया, करुणा ,संघर्ष के बीच मनुष्य होने का एहसास होता है। ये बात भी उठती है कि अस्पताल दस हजार का बिल देता है, लेकिन बाहर लोग बोलते हैं तीस हजार रुपये खर्च आया। धन की जड़ में मित्रता और वैमनस्य दोनों होते हैं। सच कहने का रिवाज कम होते जा रहा है।मरीज की सेवा किसने कितनी की उसके भी अपने-अपने मापदंड हैं। अंत में कह दिया जाता है ," ऊपर वाला देख रहा है।" पीपल में पानी देने के बाद खाना खाते हैं। टीका लगा कर रिश्तेदारों को विदा किया जाता है। आजकल एक कहावत भी प्रचलित है।"  मरे माँ-बाप को दाल-भात, जिन्दा माँ-बाप को मारे लात।"  बूढ़े माँ-बाप जब कभी नाराज होते हैं तो इस लोकोक्ति को दोहराते हैं। यह चक्र चलता रहता है। देहांत के बाद आत्मा को प्रथम नौ दिन प्रेत योनि में क्यों डालते हैं, पता नहीं। शायद हमारी सांसारिक गलतियों के लिए। जैसे एक झूठ के लिए युधिष्ठिर को नरक के रास्ते ले जाया गया था, ऐसा कहा जाता है।आधुनिक क्रियाक्रम पर बातें हो रही हैं। क्रिया-घर में दो गाय के बछड़े हैं हर मृतक के लिए उन्हीं का प्रयोग होता है। पंडित भी एक जजमान से  प्राप्त बिस्तर, चारपायी को कई  मृतकों के अन्तिम संस्कार में प्रयोग करते हैं और उनके बदले में नकद रुपये जजमानों से ले लेते हैं। पीपल पानी के दिन मैंने शाम को दिल्ली की बस पकड़ी है। बगल में उच्चतम न्यायालय में वकालत करने वाले एक वकील बैठे हैं। वे लगभग सप्ताह में दो दिन नैनीताल उच्च न्यायालय आया करते हैं। कभी अपनी कार से, कभी सार्वजनिक परिवहन से। मैं भी अपना परिचय देता हूँ। बातें बस की गति के साथ बढ़ती जाती हैं।वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य से लेकर संयुक्त परिवार आदि तक। उसने पूछा," एअरपोर्ट कैसे जायेंगे?"  मैंने कहा टैक्सी से। उन्होंने कहा," टैक्सी वाले वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं को टार्गेट करते हैं। एक बार मेरी पत्नी ने उच्चतम न्यायालय के लिए टैक्सी ली और टैक्सी वाला उसे नौयडा की ओर ले जाने लगा। उसने पुलिस को खबर की। तब से वह सार्वजनिक यातायात से ही चलती है। एक डर मन में बैठ गया है।"  आनंद विहार में उतरकर हमें विदा ली और मैं टैक्सी से एअरपोर्ट पहुंचा हूँ। मेरी उड़ान  एअर इंडिया से है। अन्तर्राष्ट्रीय टर्मिनल से। पहले  गेट 9  बताया गया। फिर बदलकर गेट 17 किया गया। अन्त में गेट 4 हुआ। लम्बे-चौड़े टर्मिनल पर अच्छी खासी कसरत करा दी है। इस उड़ान के सब यात्री परेशान दिख रहे हैं। वरिष्ठ नागरिक और लचक-लचक कर चलते बूढ़े यात्रियों को अधिक परेशानी हो रही है। बैटरी से चलने वाले वाहन दो ही दिख रहे हैं। एक बार में एक गाड़ी चार यात्रियों को ही ले जा सकती है।जहाज उड़ान भर रहा है, आसमान में और मैं सोच रहा हूँ, उन्होंने वैतरणी पार की होगी या नहीं।

peepal paanee aur..

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sidney sheldon           it is a most empowering book based on women power that too specifically a girl's power. it tells about a girl who is a from a town and later on enters into a city which welcomes / awaits her with so many challenges and difficulties that she tries to face with some true love that sometimes disappoints her.           let's see about her past and wonderful life first :               that's the life when she was in town with her father who was a lawyer too with some social qualities who doesn't want money at all as his fees. so her all time dream was to become a loyal and efficient lawyer or a successful prosecutor with her father's same qualities. her father dies without leaving her any properties but leaves with a greatest possession of loyalty to the society. she leaves the town and enters into a city which is very well famed with cheatings and many rude and crooked minds.as she enters the city :                she joins as junior for a successful prosecutor who doesn't even have noticed her. he is being loyal too proceeds a case against mafia leader who has been caught with proofs off lately. he successfully proceeds and when there was a little time to hear the victory, the girl makes some mistakes not knowingly. but it causes a great impact on her principles victory.revenge of love:              she runs & runs & runs from the media, photographers as she becomes the headlines for many months. when she was about to quit herself from this exhaustive life, a man arrives in her life who takes some care and concern about her. after some dinners and lunches together she fell for him at last which is known to tear off her trust. he was a married man besides it was not a successful marriage but somehow he was married. he was a presidential candidate and if is to become the president her love fails but if he fails in the election, her love will get a chance! let's see what happens next!! 

a pretty warrior

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ओ, नदी मेरी ओर झांको,अपने पुण्य  सशक्त करने,मैं तुम्हें साफ रख रहा हूँ।ओ, वृक्ष मेरी ओर देखो,अपनी सांसों के लिए औरआने वाली पीढ़ियों के लिए,मैं तुम्हें सींच रहा हूँ।ओ, धरती मेरी ओर देखो,मैं तुम्हें प्यार कर रहा हूँ,अपनी जननी जान करकि तुम युगों-युगों तक अच्छी बनी रहो।ओ, धरा दृष्टिगत रहो,मैं प्रदूषण नहीं कर रहातुम्हें अपना मानकर।***महेश रौतेला

o nadee meree oor..

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kuch andar hai khamosh sa...jo goom gya ehsaas sa..ek khalipan us banjar sa..kuch kho gya!!shayad kuch kho gya!!

khamosh

poems sher-o-shayari 0

ये बारिश भी किसी साजिश सी लगती है।कुछ बात बिगड़ने और धुंधली मुस्कान सी लगती है।।ये तो उन बूंदों का कहर है जनाब।जो सब कुछ उजाड़, बदहवाश सी गिरती है।।

baarish

poems sher-o-shayari 0

tera hi saaya hu me,tujhme samaaya hu me,tujhko jo paaya mene,khudko hi paaya hu me.o maaa meri maa, meri maaaraat ko jab teri yaad aati hai,aankhen to meri yu bhar aati hai,chehra tera hi to hai aankhon  mere,lori ke har lafz yaad hai tereo maaa meri maa, meri maaajab me kisise bhi ladd kar aata hu,khudko ko me itna akela pata hu,jo maa tu yahan par hoti sang,jeevan ke mere to kuch alag hi hote rang.o maaa meri maa, meri maaaaaj wo pyara sa din aaya hai,rehmmat uss khuda ki jisne tumhe banaya hai,khushiyon se dil tera maa jhume sada,yu hi sath hum rahe ye mangu me dua.o maaa meri maa, meri maaa

meri maa

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world will stand still. on the football field.when the three lions roar.you'll be torn asunder by the clap of the thunder. when the three lions roar. you will know fear. when you hear. the three lions roar. we stand with pride.  by their side. when the three lions roar. they'll surge past you before you realise. they'll lay to waste as you blink your eyes. they are the three lions and they roar. earth will shake and the stars will burn. when the three lions roar. mountains will tremble and seas will churn. when the three lions roar. 

england18

poems 1

   परी और जादुई फूलकड़ाके की ठंड है।नैनीताल की ठंडी सड़क पर धीरे-धीरे चल रहा हूँ।सड़क के किनारे बर्फ अभी भी जमी है। इस सड़क पर बहुत बार अकेले और कुछ बार साथियों के साथ आना-जाना हुआ था।इस पर  बोलता हूँ ,"वो भी क्या दिन थे?" रात का समय है। लगभग ग्यारह बजे हैं। यह कहानी वैसी नहीं है जैसे बड़े भाई साहब रूसी लेखक टाँलस्टाय की एक कहानी बचपन में सुनाते थे। सौतेली लड़की और उसकी सौतेली माँ की।कैसे 12 महिने एक-एक कर बदल जाते हैं उस लड़की की सहायता के लिये।अब हल्की सी उस कहानी की याद है।उस सफेद रात में आगे मोड़ पर एक परी खड़ी है।धीरे-धीरे उसके पास पहुँचता हूँ। वह मेरे बाँये हाथ को छूती है और उसके छूते ही मेरे सफेद बाल काले हो जाते हैं। और मैं बोल उठता हूँ ," ओह, वे भी क्या दिन थे, जब सब बाल काले हुआ करते थे?" देखते ही देखते चारों ओर एक मायावी दृश्य बन गया है।झील में अनगिनत परियां उतर गयी हैं।कुछ नहा रही हैं।और कुछ नावों में बैठी हैं।एक परी उदास किनारे पर बैठी है क्योंकि उसे एक दिन बाद मनुष्य बन जाना है।उसकी सब चमत्कारी शक्तियां समाप्त हो जानी हैं।उसके आँसुओं से झील भरते जा रही है।झील में झांकता हूँ तो देखता हूँ कि बड़ी मछली छोटी मछली के पीछे दौड़ रही है।सामने मालरोड पर लोग रुपयों के लिये लड़ रहे हैं। इतने में परी मेरा दायां हाथ छूती है, और मेरे सारे बाल फिर सफेद हो जाते हैं।चढ़ाई चढ़ता महाविद्यालय के पुस्तकालय में जाता हूँ। पुस्तकालय में बहुत कम विद्यार्थी हैं। मैं वहाँ अपनी पुस्तकें खोजता हूँ। जैसे ही बैठता हूँ एक किताब वह अनाम परी सामने रख देती है।वह कहाँ से आयी कुछ पता नहीं चला।परी को छूना चाहता हूँ, लेकिन वह तभी गायब हो जाती है। मैं किताब पलटकर पढ़ता हूँ-"उसने झुझलाहट में कहा-तुम रद्दी खरीदते होरद्दी पढ़ते होरद्दी सुनते हो,तभी रद्दी लेने वाला वहाँ आयाउसने सब शब्दों को तराजू पर रखाउठे पलड़े पर कुछ और शब्द डालेवजन जब बराबर हो गयाशब्दों को बोरे में समेट दिया।कुछ क्षण मुझेसारा आकाश नहीं सुहाया,धरती भी नहीं सुहायी,दूसरे ही क्षणमैं उनको महसूस करने लगासौन्दर्य अन्दर आ,बुदबुदाने लगाअनुभूतियां छलक, अटकने लगीं।,फिर एक रद्दी कागज पर लिखने लगा,अक्षर और नये अक्षर।"इतना पढ़ने के बाद इधर-उधर नजर दौड़ायी, कोई परिचित नजर नहीं आया।शान्त बैठा रहा।कुछ देर बाद मैंने सामने शीशे में देखा और मन ही मन कहा," सफेद बालों का भी अपना महत्व होता है।और उम्र के साथ यादें गुम होने लगती हैं!" पुस्तकालय से बाहर निकलता हूँ। सामने एक बुढ़िया दिखती है। उसके पास जाता हूँ। वह मुझे गले लगाती है और मैं और बूढ़ा हो जाता हूँ। वह कहती है उसने सतयुग में राजा हरिश्चंद्र को देखा है। वह आगे बताती है-राजा हरिश्चन्द्र  इतिहास के चमकते सितारे हैं।ऋषि विश्वामित्र ने उनकी परीक्षा लेने के लिये उनका राजपाट छीन लिया था। राजपाट भी उन्होंने सपने में  विश्वामित्र को दिया था। विश्वामित्र सपने  में आते हैं, राज्य माँगते हैं। दूसरे दिन पहुँच जाते हैं दरबार में। बोलते हैं," राजन, आप अपना राज्य  दे दीजिये।" हरिश्चन्द्र बोले,"आपको तो राज्य  दे चुका हूँ, सपने में।" कैसे राजा थे तब !  राज्य चले जाने के बाद, दक्षिणा के लिये उन्होंने पूरे परिवार को बेचना पड़ा।उन्होंने श्मशान पर काम किया, जीविका के लिये।पत्नी तारा को किसी घर में।वे श्मशान पर दाह संस्कार का कर उसूलते थे। पुत्र रोहताश की साँप के काटने से मृत्यु हो जाती है तो उसके शव को लेकर वह उसी श्मशान में जाती है जहाँ हरिश्चन्द्र कर वसूलते हैं।वे तारा से श्मशान का कर देने को कहते हैं लेकिन उसके पास देने को कुछ भी नहीं होता है, अत: वह अपनी धोती  फाड़ने लगती है, कर के रूप में देने के लिये। तभी आकाशवाणी होती है और विश्वामित्र भी प्रकट  हो जाते हैं।विष्णु भगवान रोहताश को जीवित कर देते हैं और विश्वामित्र हरिश्चंद्र को राजपाट लौटा देते हैं।आगे त्रेतायुग में राम को वन में देखा है।द्वापर में कृष्ण को देखा है। कलियुग में आते आते बूढ़ी हो गयी हूँ। मैंने कहा,”तुम मेनका या उर्वशी की तरह तो नहीं हो?” वह चुप रही।उसके हाथ में एक फूल था। उसने उस फूल को मुझे थमाया और बोली," इस फूल को तुम जिसे दोगे वह बुढ़ापे से मुक्त हो जायेगा।" मैंने फूल पकड़ा और सोचने लगा किसे इस फूल को दूँ। सोचते-सोचते में मल्लीताल पहुंच गया। मेरे मन में संशय जगा। सनेमाहाँल के पास एक बूढ़ा बैठा था। मैंने फूल की चमत्कारी शक्ति देखनी चाही और उसे वह फूल देने लगा। लेकिन उसने वह फूल लेने से मना कर दिया। उसने कहा उसे भूख लगी है यदि देना ही है तो दस रुपये दे दीजिए, कुछ खा पी लूंगा।फूल से क्या करूंगा? कंसल बुक डिपो  में एक बुढ़िया दिख रही थी। वह किताब खरीद रही थी। मैंने उसे फूल दिया और उसने वह जादुई फूल पकड़ लिया और वह जवान हो गयी। सभी लोग यह चमत्कार देखकर चकित हो रहे थे। किसी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह बी. एसी. में हमारे साथ पढ़ने वाली लड़की थी। मैंने झट से फूल को अपने हाथ में लिया और तेजी से दुकान से बाहर निकल गया। मैं चौराहे पर रूका और वहाँ पर खड़े होकर रिक्शे वालों को देखने लगा। कुछ बूढ़े रिक्शेवाले भी थे। मैं बूढ़े रिक्शे वाले को अपने पास बुलाता और उसे फूल पकड़ता। वह झट से जवान हो जाता। जब दस बूढ़े रिक्शे वाले जवान हो चुके थे तो वह बूढ़ी परी मेरे पास आयी और फूल को वापिस मांगने लगी। बोली," इस फूल की चमत्कारिक शक्ति समाप्त हो चुकी है। मैं भविष्य में फिर तुम्हें दूसरा जादुई फूल दूंगी।" मैं उदास हो गया और बेमन से फूल उसे लौटा दिया। वह फूल को लेकर झील की ओर चली गयी।मैं बैठा-बैठा जवान हुए रिक्शे वालों को देख, खुश हो रहा था।                         महेश रौतेला

paree aur jaduee ..

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resembling bubbles escapingstagnated pools down the lanenow and then they pop up -induced errors stealthily appearmarred lines of thoughtspitch into disheveled brainsending down a wave of pain -unnoticed negative vibesnegotiate every now and thento set mimes of unknown blunderseconds lost in unnumbered tasksstrive to build arid feelingsthat would set my heart on fireevading ways to be there again!

induced errors

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वक्त ना रुका हैना रुकेगाकभी किसी के लिएजीतना है तो चलना पड़ेगासाथ वक्त के सदा के लिएजो सोचोगे कि आएगा एक पलकामयाबी लिए हुएजो रुक जाओगे इंतजार मेंउस पल के लिएतो खो दोगे सारे रास्तेजिंदगी की जीतजो खो चुके हो आज तकऔर हो रहे हो अब भीभूल जाओ  सबकोचल पड़ो आज से नई राह मेंजीत होगी सिर्फ तुम्हारीथाम लो तुम हाथ वक्त काचल पड़ो साथ में वक्त केसदा के लिएवक्त ना रुका हैना रुकेगा कभी किसी के लिए

waqt na ruka hai

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              tere binaतेरे  बिना दिल कहीं लगता नहीं, लगता नहीं , यारा लगता नहीं,चेहरा भी कोई जचता नहीं, जचता नहीं , यारा जचता नहीं,तू ख्वाबों में नींदो में, तू साँसों में धड़कन में,ढूंढी हज़ारो दुनिया में पर मिली नहीं कोई तुझ सी हसीं ,तेरे  बिना दिल कहीं लगता नहीं,.....सुन मेरी रानी, हा दिल की ज़ुबानी, छोटी सी है मेरी यह कहानी...तुझसे शुरू, तुझपे ख़तम, अपनी तो येही है ज़िंदगानीप्यार को मेरे ,तू रुसवाना करना, न कर यह नादानीजीना है तो जम के जिले ,आती नहीं फिर यह जवानीतेरे बिना रहना मुमकिन नहीं, मुमकिन नहीं यारा मुमकिन नहीं,दूर तुझसे रह सकता नहीं, सकता नहीं यारा सकता नहीं,तू दिन में है रातों में,तू सुबह में शामों मेंखुशबू को ढूंडू चारो तरफ पर मिलती नहीं है तेर बिन कहींतेरे  बिना दिल कहीं लगता नहीं,..सुन ऐ हवा, तू धीरे मचल, होने दे तू यहां कोई हलचल,हाथों में हो जब हाथ उसका, बीत न जाए देखो कहीं यह पलतू ज़िन्दगी, तू बंदगी, तू ही तो  है दिल की अमानतदिल के पिंजरे में , कैद कर लू, हॉगी न फिर कोई जमानततुझसे यह नज़रे हटती नहीं, हटती नहीं यारा हटती नहींतुझ बिन ज़िन्दगी कटती नहीं, कटती नहीं यारा कटती नहींखुश्बू तेरी हवाओं में,बहकी इन फिज़ाओ मेंचाहु तुझको अपना कर लू पर किस्मत अपनी खुलती नहींतेरे  बिना दिल कहीं लगता नहीं,....लाल ला ला ला ला ला ला लाला। ..

tere bina

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             शक्तिपुंज मानवगलतियां करता इंसान हैमैं कोई देव  तो नहींकोई गलती हो भी गईतो छोड़ दूंगा जीना तो नहींहां सीख लूंगा इस बात सेजीवन में वह दोहराऊंगा नहींपर उस बात की आत्मग्लानि में  वर्तमान को विनष्ट करूं कदापि नहीं कदापि नहींमेरे सोच के दायरे मेंअगर वही गलती रहेगीतो सोचूंगा कैसे रास्तेनई मंजिलों केमेरे मन के हर गर्त सेनिकल जाना ही पड़ेगाविचलितताओं के चिह्न सभी अब पुनः मैं विचलित होकदापि नहीं कदापि नहीं  मेरे वर्तमान में हीमेरे भविष्य का है द्वार जड़ासुंदर सुनियोजित जीवन कीप्राप्ति का सामर्थ्य भरामैं छोड़ता आया हूंअतीत के रास्तों मेंसाथी कई ऐसे बहुतेरेजो चल न पाए कदम मिलाएमैं चल ना पाऊं और बढ़ जाएवर्तमान के  साथी सभीविवश वेदना से भरारहूं मैं खड़ाकदापि नहीं कदापि नहीं मुझे पाना है मंजिल नईऔर मुझ में है शक्ति भीशक्ति कुछ अपनी हैकुछ स्वजनों के आशीषों की  माना  चाहते हो  वे मुझसेजीत जाऊं मैं अभीपर जो मैं आज ना जी तूतो भी है वादा मेरामैं जीतूंगा कभी ना कभीहारना तो होगा उन दुर्बलताओं कोजो छीनते हैं शांति मेरीहारना तो होगा उन गलतियों कोजो रोकते हैं कदम मेरेहार सकता हूं मैं क्या कभीकदापि नहीं कदापि नहीं

shakti punj manav

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बहुत रोशनी है चकाचोंधआंखें मूंद सी जाती हैंऔर बंद आंखों से हमेंसिर्फ तन्हाई नजर आती है|दूर क्षितिज तक फैला हुआ हैसंसार का यह मेलाफिर भी इस मेले में हैमेरा मन यह अकेलाबहुत उम्मीद से संजोए थेअरमान दिलों केहर अरमान है टूटाहर उम्मीद अब छोटी इस दुनिया ने दिल की हर आस है लूटी |वह स्वप्न सरीखा कोमलअरमान मेरे मन का   बिखर  कर रह गयाहर ख्वाब मेरे मन काहै सत्य यही किहर रिश्ता यहां है झूठामत बंधना मन मेरेहै सत्य यही इकलौता |

man ki tanhai

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राजनीति से इतर कुछ बात करेंजैसे अल्मोड़ा ,नैनीताल, रानीखेतकौसानी, बद्रीनाथ, रामेश्वरमशिवसागर, डलास, पेरिस,जनेवा आदि   के बारे में,अब मेरे पाँव तले ये नहीं तुम्हारे पाँव तले तो हैं,जो यादें वहाँ दबी हैं उन्हें उखाड़ लांएपौधों की तरह रोप दें घर की क्यारियों में।बात करनी है तो पहुंच जांएकिसान के खेतों में जहाँ हल चलता है,बचपन की टेड़ी-मेड़ी पगडण्डियों परजहाँ दौड़ होती थी बिना प्रतियोगिता के।पहाड़ों पर चलने में सांस तो फूलेगी,पल आनंद सदाबहार होगा,बहुतों से पीछे होंगे, बहुतों से आगे,पर सबकी स्थिति अकाट्य होगी,सब कुछ इधर ही नहीं, उधर भी होगा।प्यार की घनी छाँव में जो वृक्ष की छाँव से भिन्न है,क्षण दो क्षण बुदबुदा लें।मन की जटाओं में उलझी गंगा को खोल दें,किया गया संघर्ष उजाला लाता है,किया गया प्यार अक्षुण्ण रहता है,ये वेद वाक्य नहींलेकिन राजनीति से इतर कुछ बातें हैं।**महेश रौतेला

rajneeti se i..

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ध्यान...स्वामी प्रेम अरुण रोज़ सुबह महावीर गार्डन आते हैं|उनके अनुसार यहाँ सुबह सुबह प्रकृति के नज़दीक ध्यान करना उन्हें स्वयं के और नज़दीक ले जाता है|आज वे अपने साथ निशांत को भी लाये हैं,ध्यान के बारे में सुनकर उसकी रूचि उत्पान्न हो गयी तो चला आया साथ में|”ध्यान एक बहुत गहरा अनुभव है बेटा,ध्यान की अवस्था में हम किसी और ही तल पे होते हैं,बाहरी दुनिया से वास्ता खत्म,किसी का कोई प्रभाव नहीं,स्वयं के करीब..”कहते हुए स्वामी जी बढ़े जा रहे थे अपने पीपल के पेड़ की ओर|यही स्वामी जी की ध्यानस्थली थी,रोज़ यहीं ध्यान करते थे उनके अनुसार यहाँ कुछ विशेष ऊर्जा विकसित हो गयी थी|”तो ये गहरा अनुभव होता कैसा है,आपको तो हुआ ही होगा,इतने समय से आप ध्यान कर रहे हैं”,निशांत पूंछ बैठा|”अनुभव बतलाया थोड़े ही जा सकता है, वो तो महसूस करने की चीज़ है”|हालाँकि निशांत इस उत्तर से संतुष्ट तो नहीं था पर मान गया,आखिर इसे नापने का कोई पैमाना भी तो न था|स्वामी जी अपने पीपल के पेड़ के नीचे पहुच चुके थे, निशांत के मन में प्रश्न घूम रहे थे,आखिर इस गहरे अनुभव की पुष्टी कैसे हो ,क्या इस तरह कोई भी स्वयं को गहन ध्यानी नहीं कह सकता आदि आदि प्रश्न उसके मन में हलचल मचा रहे थे|स्वामी जी पीठ सीधे कर,हाथों को घुटनों पे रखते हुए ध्यान की मुद्रा में बैठ गए|”अब मैं ध्यान में दुनिया में जाने वाला हूँ,बाहरी दुनिया का जहाँ कोई प्रभाव नहीं है, परम सुख और शांति की ओर”कहते हुए स्वामी जी ने आँखें मूँद लीं|निशांत उन्हें देख रहा था,उनके हाव भाव से से लग तो रहा था की वे एकदम शांतचित्त हो चुके हैं,उनकी लम्बी लम्बी साँसों पे गौर करते हुए निशांत सोच रहा था की शायद वास्तव में ही स्वामी जी किसी गहरे अनुभव से गुज़र रहे हैं,उनके चेहरे के भाव भी इस बात की पुष्टी सी कर रहे थे|निशांत अपने विचारों में गुम ही था की तभी पास खेल रहे बच्चों की गेंद स्वमी जी सिर पर आकर लगी,स्वामी जी हडबडा के उठे,चेहरे का शांत भाव उड़ने में पल भर भी न लगा,उसकी जगह अब क्रोध ने ले ली थी|”अरे इतने बड़े पार्क में एक ये ही जगह है क्या खेलने के लिए..!!”,स्वामी जी क्रोध से चिल्लाये,उनकी धीमी लम्बी सांसें अब तेज़ हो चुकी थीं,आँखें क्रोध से लाल,विचलित|बच्चे तो तब तक अपने अपने ठिकाने ढूंड कर उनमे छुप ही चुके थे|”बड़े बदतमीज़ बच्चे हैं,दिख नहीं रहा क्या,यहाँ मैं ध्यान कर रहा हूँ,पता नहीं इनके माँ बाप कैसे इन्हें यहाँ सुबह सुबह खेलने भेज देते हैं”,कहते हुए स्वामी जी वहीँ पेड़ के नीचे बैठ गए और बच्चों की गेंद कभी वापस न देने के इरादे के साथ पास में रखली| निशांत ये सब देख कर मन ही मन मुस्कुरा रहा था,शायद स्वामी जी के ध्यान,गहरे अनुभव,परम शान्ति इत्यादि का उदाहरण देख कर| या शायद उसे कुछ पैमाना मिल गया था तथाकथित “गहराई ” नापने का|-सम्यक मिश्र  जबलपुर

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हर इक फ़ैसला आजकल मशीनें करती हैं !इंसान का इन्सान से अब भरोसा उठ गया !!

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