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जीवन में कम से कम एक बार प्यार कीजिए,ठंड हो या न हो, उजाला हो या न हो,अनुभूतियां शिखर तक जाएं या नहीं,रास्ता उबड़-खाबड़ हो या सरल,हवायें सुल्टी बहें या उल्टी बहें,पगडण्डियां पथरीली हों या कटीली,कम से कम एकबार दिल को खोल दीजिए।तुम्हारी बातें कोई सुने या न सुने,तुम कहते रहो ," मैं प्यार करता हूँ।"तुम बार-बार आओ और गुनगुना जाओ।तुम कम से कम एक बार सोचो,एक शाश्वत ध्वनि के बारे में जो कभी मरी नहीं,एक अद्भुत लौ के बारे में जो कभी बुझी नहीं,उस शान्ति के बारे में.जो कभी रोयी नहीं,कम से कम एकबार प्यार को जी लीजिए।यदि आप प्यार कर रहे हैं तो अनन्त हो रहे होते हैं,कम से कम एक बार मन को फैलाओ डैनों की तरह,बैठ जाओ प्यार की आँखों में चुपचाप,सजा लो अपने को यादगार बनने के लिए,सांसों को खुला छोड़ दो शान्त होने के लिए।एकबार जंगली शेर की तरह दहाड़ लो केवल प्यार के लिए,लिख दो किसी को पत्र,पत्रऔर पत्र,नहीं भूलना लिखना पत्र पर पता और अन्दर प्रिय तुम्हारा,लम्बी यात्राओं पर एकबार निकल लो केवल प्यार के लिए।***महेश रौतेला

jeevan mein kam s..

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यथार्थबोधदिवारें ताकती सी हैं,  झरोखे झांकते से हैं  |दराजें दर्ज करती सी,   लगे कुछ आंकते से हैं तमन्नाओं की ग़ुरबत में,  रहे ताउम्र यूँ तन्हाकहूँ चिलमन से ये कैसे जुबां अब कांपते से हैं |घड़ी अब घूरती सी है, के मानो तंज कसती सीजीया ना एक भी लम्हा, रहे बस भागते से हैं |दिखावे में दिखाई दी थी, अपने आप कि हस्तीना झाँका मन के अन्दर क्यूं, आईने डांटते से हैं |ना आयी नींद आखों में, ये तकियों को तजुर्बा हैखुले आँखों से देखा था,  वो सपने जागते  से हैं |सफ़र कटती रही उम्मीद में कि उलझने कम होकवायत रह गयी सारी, उमर अब हांफते से हैं  |-धीरेन्द्र

yatharthbodh

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hum to wo he jo khud se nafrat hone par, aaina bhi tod dete he.kaise todu nafrat dil ki teri,nahi mili tere dil me tasveer meri.

aaina bhi tod det..

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me nazuk tha, na kabhi bol paya. na koi mujhe samajh paya.tumhare paiso ke ghamand, takbbur aur dard ne mujhko banaya he,me nahi tha aisa tumhare suluk ne banaya he.me aaj bhi wo masum ka dard janta hu, lekin aap nahi jan paoge,kyu ke tumne apne aap ko paisa jo banaya he.aaj bhi piche dekhne se darta hu, kahi wo ehsas firse mujhe na ho jaye,dua karta hu rab se ke wahi halat tumhari na ho jaye.me nazuk tha, na kabhi bol paya. na koi mujhe samajh paya.

me nazuk tha

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tujhse ishq kuch yu kiya ke, mere dil-o-jaan pe,mera nahi haq tha tera.nahi karenge lanat ya nafrat bhi tujhse,kyu ki ab mujhpe bas ek haq he mera.

tujhse ishq kuch ..

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andhero se darta nahi, ujalo me udta nahi.he sokh aasman chhune ka lekin,kisi aur ke kandho pe pair rakhta nahi.khud banata hu apni mazil ke raste,kisi aur ke rasto pe chalne ki aadat nahi.wo log jo muje jante hue bhi anzan he,ek din tum mujhse pehchan nikaloge aur me tumhe pehchanuga nahi.andhero se darta nahi, ujalo me udta nahi.

andhero se darta ..

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mujhe dekhte to sab he, lekin me dikhti nahi hu.mere chehre ke khusi dekhte to sab he,lekin aankho ki kahani dikhti nahi he.meri aankho ki palke palakti he bar bar,lekin uski tasveer nazro se mitti nahi he.mujhe dekhte to sab he, lekin me dikhti nahi hu.

mujhe dekhte to s..

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kale se badal me chandani kahi chhup gayi he,apne hi bistar me nind udd gayi he.kashmkash zindagi me he,aur tamasha nind ban gayi he.

tamsha nind ban g..

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me sharabi na hota jo tu meri sabab hoti.me yu betaj na hota jo tu meri mumtaz hoti,me yu kafir na hota jo tu meri peer hoti,me yu andhero me na likhta jo tu mera noor hoti.lekin ab farak nahi padta, tu hoti ya na hoti,ab farak nahi padta tu jo khud khuda bhi hoti.me sharabi na hota jo tu meri sabab hoti.

me sharabi na hot..

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bas ho tha pagal tere ishq me, bas ho tha pagal tere ishq me.pehli jalak mili office me, bas dil kho gaya uas pal me,me bat na kar paya tujhse uas moment me,fir ping kiya skype me aur dost bane facebook me aur chat kiya whatsapp me,fir lunch kiya dinner kiya par tu na samjhi kya mere dil me.ab lagta nahi he kuch tere dil me, shayad kami he koi mujhme.bas ho tha pagal tere ishq me, bas ho tha pagal tere ishq me.

bas ho gaya tha p..

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                                      mere papa हर रिश्ता जैसे छूटता का जा रहा है सदा के लिए| मेरे पापा के झुकते हुए कंधे मेरी बेचैनी को बढ़ाते जा रहे हैं| यह वही हाथ है जिसकी उंगलियों को थाम कर मैंने चलना सीखा था वक्त आ रहा है या फिर मैं यह कहूं कि वक्त आ चुका है कि पापा अब मेरी उंगली थामने लगे|  बोलते हुए तेरे लब  कप कपा रहे हैं aur आंख dab daba रही है,  जीवन से सांसों की डोर कब टूट जाए कह नहीं सकता और करने के लिए बहुत काम अभी बाकी  है| मेरे पापा की ख्वाहिशें अभी भी बहुत अधूरी है जिन्हें चाह कर भी सिर्फ मैं पूरा नहीं कर सकता| उसके लिए मेरे भाइयों का अपने दायित्वों को समझने का उचित ज्ञान चाहिए|  बहुत हिम्मत आती है मुझे अपने  माता-पिता को देखकर कि कम से कम वह मेरे साथ तो है l जब मैं अपने बूढ़े माता-पिता को देखता हूं तुम हमेशा इस बात की तकलीफ रहती है   दर्द  रहता है कि क्यों मैंने अपनी जिंदगी के सफर को इतनी देर से शुरू किया | कभी-कभी मेरी आंखें खास करके मेरे पिता को गौर से देखने के लिए मजबूर हो जाती है और मैं सोचता हूं कि कितना समय है मेरे पास और मेरे भाइयों के पास 1 साल 2 साल या फिर ज्यादा से ज्यादा 3 4 या 5 साल| मैं अपने पिता को किसी भी स्थिति में  खो नहीं सकता खोना नहीं चाहता| माता-पिता नहीं है तो दुनिया में कुछ भी भी नहीं है ना होने की कल्पना से मेरा मन कांपने लगता है आंख रोने लगती है| क्या करूं मैं एक इंसान हूं और मोह ने मुझे ऐसा घेरा है कि मेरी सांस उखड़ने के बाद भी मेरे दायित्वों का बोझ कम नहीं होगा,  क्योंकि मैंने बहुत देर कर दी|                             सोचता हूं कि मैं ऐसा क्या करूं कि मेरे माता-पिता मेरे साथ रहे सदा सदा के लिए,  पर यह कान्हा की नगरी बहुत ही बुरी| ऐसा लगा जैसे सीने में किसी ने चट्टान रख दी और मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं,  jiye तो जा रहा हूं पर मन में डर समाया हुआ है अपने माता पिता को किसी भी  समय खो देने का| ऐसा लगता है जैसे कल की ही तो बात है तो फिर ऐसा क्या हो गया कि मेरे पापा के कंधे झुकने लगे हैं जिंदगी chhutne लगी है| दादी थी तो moh का बंधन था दादी चली गई तो moh का बंधन और बढ़ गया| कहां bhagunga मैं , कब तक bhagunga मैं| मेरे पिता ने अपनी क्षमता के अनुसार हर दायित्व को  पूरा करने की भरपूर कोशिश की और एक  बेटे के रूप में मैं कभी सफल तो कभी असफल होता रहा| सफल इस महीने में क्योंकि कुछ हद तक मैंने अपने माता-पिता के भूख को थोड़ी देर के लिए शांत कर पाया और असफल इसलिए हो गया क्योंकि मैं उनका बड़ा बेटा होकर नहीं जन्मा| अगर मैं बड़ा बेटा होता तो शायद हालात बहुत अलग होते ,  परिस्थितियां कुछ और होती और निश्चित रूप से मैं यह कह सकता था कि मेरे पापा के झुके हुए कंधे अभी मजबूत है|jaha tak मां की बात करूं तो थोड़ी हिम्मत आती है मां को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कुछ समय अभी और है मेरी मां के पास और मैं अपने बेटे के दायित्व ko  को कुछ समय तक और निभा सकता hoon,  शायद 10 साल पर वह भी तो कभी ना कभी सोचेंगे कि जीवन के सफ़र में जिसने हमेशा मेरा साथ निभाया वह मुझे छोड़ कर चले गए हैं और आज मैं अकेली रह गई| एक bete के रूप म, ek संतान के रूप में औलाद के रूप में मैं ऐसा क्या करूं कि मेरे माता पिता सदा मेरे साथ रहे| बहुत दुख है मुझे,  बहुत दुख l काश कि यह दिमाग मेरे शरीर का साथ ना देता तो na moh होता और ना माया पति तेरी दुनिया होती| बहुत समय बीत गया है अपने माता पिता के पैर दबाए हुए पापा भी नहीं कहते कि बेटा थोड़ा पैर हाथ दबा do , सर दबा दो बदन दर्द कर रहा है| पर मुझे तो समझना चाहिए l जब बुखार होगा तभी बोलेंगे कि थोड़ा सर दबा दो उस वक्त मैं सोचने के लिए और भी ज्यादा मजबूर हो जाता हूं कि आखिर कि कितना समय है मेरे पास| ऐसा लगता है जैसे कल की ही बात hai मैं अपने पापा की उंगली पकड़कर चलना सीख रहा हूं , बस लगता है कि कल की ही तो बात है पर मेरे पापा के झुके हुए कंधे | tears in my eyes ......

mere papa

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हा हम बुलबुलें है इसकी है ये गुलसिताँ हमारापर सारे जहाँ से अच्छा नहीं है हिंदुस्तान हमारा।तस्वीर ये नहीं है अब तक हुई मुकम्मलअब तक नहीं बना है ख़्वावें जहां हमाराहाकिम अभी वही है बस रंग बदल गया हैअब भी  कहा मिला है हमको चमन हमाराहम ढूंढते वतन को सरहद की लाइनों मेंतारीख में कभी, किताबी मायनों मेंअहल-ए- वतन बताओ क्या है वतन हमारामजहब सिखा रहा है आपस मे बैर करनानफरत जला रही है चैनों अमन हमारापर्वत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमां का।शर्मिंदा है वो हमसे वो संतरी हमाराहा हम बुलबुलें है इसकी है ये गुलसिताँ हमारापर सारे जहाँ से अच्छा नहीं है हिंदुस्तान हमारा।ग़ुर्बत में है वतन पर हमको नही पड़ी है।हो जाति धर्म या के हो रंग क्षेत्र भाषावो जो हो सबसे छोटा, है दायरा हमारायूनान, मिस्र, रोमा सब थे चले जहां से।अब तक वहीं खड़ा है। ये कारवां हमाराकुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारीजो आज तक लड़े है उनको नमन हमारा ॥'इक़बाल' ढूंढता क्यों मरहम कहीं जहां में।मालूम है उसे जब  दर्दे निहां हमारा ॥::::::अमित:::::

hindustan hamara

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अरे भोर हो गयीनक्षत्रों से दोस्त गुम हो गये हैंगहरी रात में जो चमकते रहे थे,उम्र की दराज से खिसक गये हैं।प्यार की हवा कहाँ चल रही है,गुम हुए दोस्त कहाँ मिल रहे हैं?समझो, यादों की बड़ी नदी बन गयी है,दोस्तों की बातों की चहल-पहल दिख गयी है।पुरानी यादों में एक फकीर नजर आया है,कह दूँ, वह मेरी ही दोस्ती है,साधु सी मुलाकातें सुरमयी रहती हैं,उम्र की दराज में मेरी दोस्ती रूक गयी है।**महेश रौतेला

umra kee daraj me..

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ना मैंने ही कभी पहल की, ना उसने हाथ बढ़ाया कभीज़िन्दगी से मेरा ताल्लुक़ कभी ख़ुशगवार ना रह सका!***मौहब्बत थी जुनूँ था… क़रीब आये थामे हाथ;क़ुर्बत मिटी टूटे रिश्ते, मुख़्तसर सा रहा साथ!***रोज़ी-रोटी के मरहलों में दर-हक़ीक़त बड़ा दम थावर्ना मेरी तवज्जो का हक़दार तू भी कहाँ कम था!***तुम जुदा हो जाओ, ना ठौर ठिकाना मिलेमुझे भी शायरी का एक और बहाना मिले!***साथ चलते भी तो आख़िर चलते कैसेतुम्हारे ख़्वाब जुदा मेरी मंज़िल अलग..!***बिछड़ना ही था अगर तो हम मिले क्योंवाक़ई हैं मजबूर तो… फिर ये गिले क्यों!***छोटी थी बस कट गयी और जी कर भी क्या कर लेतेलुत्फ़े-मज़ीद का पता नहीं, नाकामियां और सर लेते!***बर्बादियों में मेरी तेरा हाथ नहींतू पास तो थी कभी साथ नहीं!***परछाई सी दिखती है, कहीं यह क़ज़ा ना हो…मेरे परवरदिगार की कोई नयी रज़ा ना हो !!***बस किताब-ए-दर्द लिए फिरते रहे, पढ़ने वाले की जुस्तुजू में..पूछा हर एक ने कि कैसे हो, सुना किसी ने नहीं हाल हमारा!***--  ‘एमके’ (मोहनजीत कुकरेजा) --क़ुर्बत: नज़दीकी; मुख़्तसर; संक्षिप्त; मरहला: झमेला; दर-हक़ीक़त: वास्तव में; तवज्जो: ध्यान; हक़दार: योग्य;लुत्फ़-ए-मज़ीद: और अधिक आनंद; क़ज़ा: मौत; परवरदिगार: खुदा, भगवान; रज़ा: इच्छा, मर्ज़ी

chand ashaar meri..

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यह हम पर है मुनहसिर, याद रखना या भूल जाना...गुज़रे पलों का क्या, उनकी तो आदत है याद आना !माज़ी में मुब्तला रहे, या ख़ौफ़ज़दा मुस्तक़बिल से...मौजूदा दौर की अहमियत को कम ही करके जाना !!मुनहसिर: निर्भर; माज़ी: भूत काल; मुब्तला: फंसे, पड़े; ख़ौफ़ज़दा: भयभीत; मुस्तक़बिल: भविष्य; मौजूदा: वर्तमान

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आना-जाना अगर फितरत है हर शै की यहाँक्यों दुखों को जाते, ना खुशियों को आते देखारंज-ओ-मसाइब से बिलखती इस दुनिया में...चंद दीवानों को मैंने बे-वजह मुस्कुराते देखा !!रंज-ओ-मसाइब: दुःख-दर्द

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कोशिशें करले लाख समझ ना फिर भी पायेगाचूँकि उसका रुतबा, उसका जल्वा ला-सानी है !जज़्बा-ए-इबादत हो तो पत्थर भी रब लगता हैमान लो तो आब-ए-हयात वरना फ़क़त पानी है !!रुतबा: प्रतिष्ठा, ओहदा; ला-सानी: बेमिसाल, अतुल्य; जज़्बा-ए-इबादत: श्रद्धा-भाव, पूजा की भावना; आब-ए-हयात: अमृत; महज़: सिर्फ़

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तेरे आने की ख़ुशी है ना ना आने का ग़म...किसी ख़ुशी में ख़ुशी ना किसी ग़म में ग़म !कुछ इस क़दर बढ़ चली हैं उलझनें अपनीकिसी ख़ौफ़ से ख़ौफ़ज़दा होते नहीं हैं हम !​ 

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