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नैनीताल-एक अहसास:नैनीताल के दृश्य देखकर मन कभी प्रफुल्लित हो उठता है तो कभी उदास।प्रफुल्लित होने के अपने कारण हैं। अयारपाटा में होने का आभास।एक दिन में दो-तीन बार उतरना -चढ़ना। तब यह नहीं सोचते थे कि थकान हो जायेगी। यह तो नहीं बता सकता हूँ कि  किन पगडंडियों में कितनी बार किस लिए गया। रात में कब्रिस्तान से जाने में बहुत डर लगता था। बचपन में सुनी भूत-प्रेतों की सभी कहानियां अचानक घनीभूत होकर सामने खड़ी हो जाती थीं।उन कहानियों का अलग एक रोमांच होता है। वे सपाट होती हुए भी उत्सुकता लिए होती हैं। तब प्रकृति प्रेम भव्य और दिव्य रूप में महसूस नहीं होता था। मंदिर भी कभी कभार ही जाना होता था।अपने मतलब के लिये। काम हुआ या नहीं, पता नहीं। अपने ढंग से हुआ हो तो कह नहीं सकता हूँ। अधिकांश समय भौतिकी, रसायन और गणित करने में निकल जाता था।लेकिन रात को कब्रिस्तान में भूत -प्रेतों की उपस्थिति के किस्से भौतिकी, रसायन और गणित का ज्ञान तिरोहित नहीं कर पाता था। गणित के दुरूह सूत्र, रसायन शास्त्र के रसायनिक समीकरण, भौतिकी के सिद्धांत प्रकृति से हमें बाँधे रखते हैं। कण का तरंग और कण के रूप में चलना किसी भूत की क्रियाओं से अलग नहीं लगता था। क्योंकि भूत के किस्से भी उटपटांग ही हुआ करते हैं। लगता है हमारी सृष्टि एक विशेष व्यवहार और प्रकृति लेना चाहती है। छोटे से बड़ा और फिर बड़े से छोटा।वह विराट कृष्ण रूप भी धर सकती है और बाउन अंगुल की भी बन सकती है।ज्ञान का गागर जो देव सिंह बिष्ट  महाविद्यालय में रखा है वह हमने कितना भरा और कितना खाली किया, यह तो समय पर छोड़ दिया है। उस गागर में जब तब झांकने का मन तो होता ही है। वहां पर जाकर कहने को मन होता है-  "मेरे बचपन का आकाशमेरे बचपन के नक्षत्रमेरे बचपन की नदीमेरे बचपन का गांवमेरे बचपन का घराटमेरे दोस्त हैं।वह भोर का तारावे खेत खलिहानवह घड़ी बना सूरजवृक्षों की कतारमेरे मित्र हैं।वे वन जाती गायेंबादलों के घिरावऊँचे-नीचे झरनेपहाड़ों की दिव्यतामेरे सखा हैं।वे विद्यालय की किताबेंवे कक्षा के विद्यार्थीवह लिखती हुई कलमवे लिखे गये पन्नेमेरे साथी हैं।उन लड़कियों का होनाउन लड़कों का पूछनालोगों की गपसपबच्चों की शरारतेंमेरे संगी हैं।वह रूखी सूखी रोटीवह खेत की फसलवह राहों की चढ़ाईवह चिंता की रेखाएंवे देश के जवानमेरी आवाज हैं।"मनुष्य ने भूतों के लिये भी लक्ष्मण रेखा खींच रखी है।कहते हैं वे मंदिर में नहीं आते हैं। एक बार एक भूत को उदास देखा गया जब उससे उसकी उदासी का कारण पूछा गया तो उसने बताया," उधर बहुत से वृक्षों ने आत्महत्या कर दी है।और शहर में बहुत गंदगी हो गयी है।झील की दशा भी ठीक नहीं है। सब देख कर मन उचाट हो गया है,उदेख लग रहा है।" कहते-कहते उसके आँसू निकल आये।नैनीताल-एक अनुभव:जीवन एक रहस्यमय कविता है। कुछ समझ में आता है, कुछ समझ में नहीं आता है। कुछ विराट है, कुछ सूक्ष्म है और कुछ, कुछ नहीं है। कल एक पुराने दोस्त का फोन आया लगभग ३८ साल बाद।अप्रत्यक्ष रूप से फेसबुक ही इसमें सहायक भूमिका निभा रहा था।एक अन्य दोस्त ने फेसबुक पर उसका फोन नम्बर लिखा था। फोन नम्बर देखते ही बहुत खुशी हुई।फोन लगाया लेकिन उसने उठाया नहीं।रात को उसका फोन आया परिचय पुरानी बातों के सहारे होने लगा। हमारी अन्तिम भेंट जबलपुर में हुई थी, रेल स्टेशन पर। मैं मंबई से इंटरव्यू देकर आ रहा था। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र में इंटरव्यू था। साक्षात्कार में थर्मोडायनामिक्स के प्रथम नियम को विस्तार से बताने और उत्पत्ति करके उसकी  विवेचना करने को कहा गया था। पूर्ण हमेशा पूर्ण रहता है। फोन पर बातें अतीत की ओर मुड़ने लगीं और आगे बढ़ती गयीं।कुछ नाम उसने लिये जो मुझे याद नहीं आ रहे थे मुझे लगा कहीं अलजाइमर बीमारी तो नहीं होने लगी है? उसे भी कुछ नाम नहीं याद थे।लेकिन अधिकतर यादों में थे। कुछ नामों के बारे में उसने कहा सपने जैसे लग रहे हैं।जो मुझे पता था मैंने बताया। जो नाम नहीं बताये, वह बताने लगा।कौन कहाँ है उसकी भी संक्षिप्त जानकारी दी और ली गयी।अब नैनीताल अपने यौवन में आने लगा था।वह जवान झील और गरीब नाविक। तेज दौड़ते रिक्शे और दीन रिक्शे वाले। वह बोला बीच में एक बार नैनीताल गया था।यादें चुभ रही थीं, अतः कालेज तक नहीं गया। मैंने बताया कि मई में मैं भी गया था।होटल ट्रीबो में रूका था। झील मायूस लग रही थी, कटे हाथों वाली।उसने भविष्य के बारे में पूछा। मैंने बताया वह दिल्ली में है, फोन नम्बर व्हाट्सएप पर भेज दूँगा। फिर वह बोला," मेरे पास कोई पुरानी फोटो भी नहीं है, हम सब की।"  मैंने कहा व्हाट्सएप से भेज दूंगा, जो भी मेरे पास है। आगे कहा, श्रुति इलाहाबाद में है, बहुत मोटी हो गयी है,पहचान में नहीं आती है। उसने साथ में अपनी पुरानी फोटो लगा रखी थी, अतः कुछ आभास हो रहा था कि वही है। फिर वह बोला तीन थी ना, एक सीधीसादी थी(उसने जो शब्द बोला वह याद नहीं आ रहा है)। मुझे लगा वह सठिया गया है, लगता है। बातों को वहीं पर विराम दे, फोन रखने को हुआ तो वह बोला," यार, आज नींद नहीं आयेगी।" दूसरे दिन मैंने उसको एक समूह फोटो तथा नैनीताल झील पर लिखी चिट्ठी व्हाट्सएप पर भेजे। चिट्ठी इस प्रकार थी-प्रिय,      मैं तुम्हारी याद में सूखे जा रही हूँ।कहते हैं कभी सती माँ की आँखें यहाँ गिरी थीं।नैना देवी का मंदिर इसका साक्षी है। कभी मैं भरी पूरी रहती थी।तुम नाव में कभी अकेले कभी अपने साथियों के साथ नौकायन करते थे।नाव में बैठकर जब तुम मेरे जल को छूते थे तो मैं आनन्द में सिहर उठती थी।मछलियां मेरे सुख और आनन्द की सहभागी होती थीं।बत्तखों का झुंड सबको आकर्षित करता था। वक्त फिल्म का गाना" दिन हैं बहार के...।" तुम्हें अब भी रोमांचित करता होगा। प्रिय, अब मैं तुम्हारे कार्य कलापों से दुखी हूँ।तुमने गर्जों,गुफाओं में बड़े-बड़े होटल और कंक्रीट की सड़कें बना दी हैं।मेरे जल भरण क्षेत्रों को नष्ट कर दिया है।गंदगी से आसपास के क्षेत्रों को मलिन कर दिया है। यही गंदगी बह कर मुझमें समा जाती है।प्रिय, यह सब दुखद है।मेरे मरने का समय नहीं हुआ है लेकिन तुम मुझे आत्महत्या को विवश कर रहे हो। मैं मर जाऊँगी तो तुम्हारी भावनाएं, प्यार अपने आप समाप्त हो जाएंगे और तुम संकट में आ जाओगे।जो प्यार मेरे कारण विविध रंगी होता है, वह विलुप्त हो जायेगा।प्रिय, मेरे बारे में सोचो।अभी मैं पहले की तरह जीवंत हो सकती हूँ, यदि भीड़ , गंदगी और अनियंत्रित निर्माण को समाप्त कर दो।तुम मेरे सूखे किनारों से भयभीत नहीं हो क्या? मैंने बहुत सुन्दर कहानियां अतीत में कही हैं और बहुत सी शेष हैं।मैं जीना चाहती हूँ , यदि तुम साथ दो।तुम्हारीप्यारी नैनी झील।"सुबह बगीचे में घूम रहा था। भविष्य को फोन लगाया और पूछा सुखेन्दु से बात हुई क्या? उसने बताया हुई और जब पूछा कि संपर्क बीच में तोड़ क्यों दिया तो कह रहा था," आप लोग अच्छी सरकारी नौकरी में थे और मुझे अच्छी नौकरी नहीं मिल पायी।"भविष्य से बात करने के बाद सुखेन्दु को फोन लगाया। उसने पुरानी बातें छेड़ी। शायद, रात को गठरी बना ली थी। फटाक से बोला,"श्रुति के कितने बच्चे हैं?" मैं प्रश्न सुनकर चकित हो गया। फिर धीरे से बोला,पता नहीं।उसने फेसबुक पर मुझे पहिचाना ही नहीं। वह बोला हाँ, इतने लम्बे समय बाद पहिचाना कठिन है,वैसे वह कुछ नाक चढ़ी थी, तब भी। आगे बोला, विभा सुना था शिक्षा विभाग में थी। सुना था तुम वहाँ गये थे। मैंने बात काटी और कहा," मेरा विभाग इंडियन ग्लाईकोहल से सामान खरीदता था, अतः वहां जाता रहता था।"आजकल क्या दिनचर्या रहती है?मेरी अगली जिज्ञासा थी। वह बोला," सुबह योग करता हूँ, घूमने जाता हूँ। बस, योंही समय कट रहा है।"  मैंने कहा ," कभी-कभी मेरी दिनचर्या भी ऐसी ही है। कभी लिख भी लेता हूँ। गूगल से खोज सकते हो कुछ।" वह बोला ,"तुम तब भी कविता लिखते थे और सुनाता था।" मुझे सुनाने की याद नहीं है, अतः चुप रहा। फिर वह बोला," तुम्हारा फोन का बिल बहुत हो गया होगा, रखता हूँ।"मैं बगीचे  के एक बेंच में बैठ गया और व्हाट्सएप पर उसे अपनी नयी  रचना लिख भेजी -" मैं चमकता सूरज नहींपर चमक लिये तो हूँ,मैं चमकता चंद्र नहींपर स्पष्ट दिखता तो हूँ,मैं बहती नदी सा नहींपर  बहाव तो हूँ,मैं पहाड़ सा नहींपर अडिग तो हूँ,मैं वृक्ष सा नहींपर फलदार तो हूँ,मैं फूल सा नहींपर  खुशबूदार तो हूँ।"      ******the

aik anubhav naini..

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एक नेताजी सुबह सबेरे , चल दिये मीडिया के घेरे में,अपनी हि शान में मगन, बैठ गये मुलाकतों के फेरे में,मै अपना इस्तीफा देता हुं मंत्री के पद से ,क्यों की यह पद मुझे ना भाया छोटा मेरी कद से ,फिर मीडिया ने की खासी पुछताछ, क्यो दे रहे आप पदत्याग,तो झट से बोले मुझे हायकमांड ने बह्काया,उन्ही के बह्कावे में मै इस पार्टी में आयाफिर मीडिया ने पुछ ही लिया ,कैसे हायकमांड ने आपको बह्काया बोले नेताजी उन्होने मुझसे कहाआओ मेरी पार्टी में मैं आपकी सुध लेती हुंबस नौ महिने रुक जाईए मैं आपको मुख्यमंत्री का पद देती हु,मेरी मती मारी गयी थी जो शिव कि सेना को ठुकरायाना मुख्यमंत्री का पद मिला उल्टा सबने दुत्कारा,बस अब मैं हायकमांड से मिलता हुं,अपने दिल के जख्म उन्हे दिखाता हुं,तुरंत गये दिल्ली दरबार ना मिला कोई तारणहार,फिर लौट के बुद्धू आये अपने हि घरद्वारमीडिया तो बैठी हि थी कर रही थी इंतजार ,फिर नेताजी ढूंढने निकले नई पार्टी का द्वारएक जगह रुककर अंदर की ओर चल दिये ,अपनी हि पुरानी पार्टी के फल चखने खो गएमगर ये क्या थोडी ही देर में  वापस आयेंफिर मिडीया ने रोका क्यूं नेताजी हो बौखलाये ,फिर सबने पुछा क्या इस पार्टी से कली खिलती ,नेताजी बोले मेरी विचारधारा अब इससे नही मिलती,फिर नेताजी चल दिये मायुसी के घेरे में,अपनी ही धून में मगन किसी नयी पार्टी के खोज में

khoj

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samaye ke sath-sathaaj desh meinsamaanta ki baat haishasan tantra ke dayare meinvyakti aur samaaj ek hainkaryakram anekanek hainkriyanvayan unka bhinn hsamaaj mein stree ho ya purushdonon mein samaanta kevyapak adhikar hainpariwaar mein vyakti vibhaktalgaav ki privrittiapni apni paddhatiapna apna karya haivyakti samta meinapne seemit sadhanon seaseemit hokar chal rahaapne aap mein samaye ke sath sathaaj desh mein samaanta ki baat hai 

samaanta

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himshe was waiting for himhe was thinking about herand then the wind camesoft and gayhe fell for itit turned into a stormthe storm within to empower ,destruct and shieldshe watched silentlythe tears mingling with the rainthe rain of despair , lost dreams battering the void heart that was hers as the morning dawnedhe fell like the moonbut never to risei love you she cried as he slowly ebbed by

him

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मैं एक ख़्वाबख़्वाब सा हूँ,जो फिर एक बार आया हूँ-अब न आऊँगा दुबारा लौट के-मैं एक तूफान हूँ, दर्द हूँ-अज़ाब हूँ-एक बार आने के बाद फिर न आने की बात-एक बार आपस में दिल लगाने की बात-एक झोका हूँ, समुंदर के लहरजो एक बार जाने के बाद,शायद ही कभी सोचता है आने के लिए-रोकना हैं तो रोक लो,इन मस्त वादियों में खोने से-लहरों के बीच, विचलित मन-अकेले हीं डूब जाने से-बाँध लो अपने इस अनेपन कि डोर को-जकड़ लो इस नेह की जंज़ीरों को-शायद रुक जाऊँ मैं तेरे लिये-बना लो मुझे अपनी बाजुओं में जकड़ के-अपने गले में मेरा हार बनाके-बस, ये ना हो कहने को कि-काश! मैं ये-----काश! मैं वो----आज मेरे जाने के बाद-तेरी है सुबह-ओ-शाम,मेरी यादों में कटने वाली है-बस ख़ुद को ये समझा लेना-जहाँ भी रहूँगा मैं-तेरी परछाईयाँ मेरे साये में रहेगी!तेरी हर एक बात याद दिलाएगी,जो दिन हमारे अपने थे-जो एक दूसरे के लिए हमने चुराई थी-#प्रियरंजन 'प्रियम'

ek khwaab

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नैनीताल के दृश्य देखकर मन कभी प्रफुल्लित हो उठता है तो कभी उदास।प्रफुल्लित होने के अपने कारण हैं। अयारपाटा में होने का आभास।एक दिन में दो-तीन बार उतरना -चढ़ना। तब यह नहीं सोचते थे कि थकान हो जायेगी। यह तो नहीं बता सकता हूँ कि  किन पगडंडियों में कितनी बार किस लिए गया। रात में कब्रिस्तान से जाने में बहुत डर लगता था। बचपन में सुनी भूत-प्रेतों की सभी कहानियां अचानक घनीभूत होकर सामने खड़ी हो जाती थीं।उन कहानियों का अलग एक रोमांच होता है। वे सपाट होती हुए भी उत्सुकता लिए होती हैं। तब प्रकृति प्रेम भव्य और दिव्य रूप में महसूस नहीं होता था। मंदिर भी कभी कभार ही जाना होता था।अपने मतलब के लिये। काम हुआ या नहीं, पता नहीं। अपने ढंग से हुआ हो तो कह नहीं सकता हूँ। अधिकांश समय भौतिकी, रसायन और गणित करने में निकल जाता था।लेकिन रात को कब्रिस्तान में भूत -प्रेतों की उपस्थिति के किस्से भौतिकी, रसायन और गणित का ज्ञान तिरोहित नहीं कर पाता था। गणित के दुरूह सूत्र, रसायन शास्त्र के रसायनिक समीकरण, भौतिकी के सिद्धांत प्रकृति से हमें बाँधे रखते हैं। कण का तरंग और कण के रूप में चलना किसी भूत की क्रियाओं से अलग नहीं लगता था। क्योंकि भूत के किस्से भी उटपटांग ही हुआ करते हैं। लगता है हमारी सृष्टि एक विशेष व्यवहार और प्रकृति लेना चाहती है। छोटे से बड़ा और फिर बड़े से छोटा।वह विराट कृष्ण रूप भी धर सकती है और बाउन अंगुल की भी बन सकती है।ज्ञान का गागर जो देव सिंह बिष्ट  महाविद्यालय में रखा है वह हमने कितना भरा और कितना खाली किया, यह तो समय पर छोड़ दिया है। उस गागर में जब तब झांकने का मन तो होता ही है। वहां पर जाकर कहने को मन होता है-  "मेरे बचपन का आकाशमेरे बचपन के नक्षत्रमेरे बचपन की नदीमेरे बचपन का गांवमेरे बचपन का घराटमेरे दोस्त हैं।वह भोर का तारावे खेत खलिहानवह घड़ी बना सूरजवृक्षों की कतारमेरे मित्र हैं।वे वन जाती गायेंबादलों के घिरावऊँचे-नीचे झरनेपहाड़ों की दिव्यतामेरे सखा हैं।वे विद्यालय की किताबेंवे कक्षा के विद्यार्थीवह लिखती हुई कलमवे लिखे गये पन्नेमेरे साथी हैं।उन लड़कियों का होनाउन लड़कों का पूछनालोगों की गपसपबच्चों की शरारतेंमेरे संगी हैं।नैनीताल के दृश्य देखकर मन कभी प्रफुल्लित हो उठता है तो कभी उदास।प्रफुल्लित होने के अपने कारण हैं। अयारपाटा में होने का आभास।एक दिन में दो-तीन बार उतरना -चढ़ना। तब यह नहीं सोचते थे कि थकान हो जायेगी। यह तो नहीं बता सकता हूँ कि  किन पगडंडियों में कितनी बार किस लिए गया। रात में कब्रिस्तान से जाने में बहुत डर लगता था। बचपन में सुनी भूत-प्रेतों की सभी कहानियां अचानक घनीभूत होकर सामने खड़ी हो जाती थीं।उन कहानियों का अलग एक रोमांच होता है। वे सपाट होती हुए भी उत्सुकता लिए होती हैं। तब प्रकृति प्रेम भव्य और दिव्य रूप में महसूस नहीं होता था। मंदिर भी कभी कभार ही जाना होता था।अपने मतलब के लिये। काम हुआ या नहीं, पता नहीं। अपने ढंग से हुआ हो तो कह नहीं सकता हूँ। अधिकांश समय भौतिकी, रसायन और गणित करने में निकल जाता था।लेकिन रात को कब्रिस्तान में भूत -प्रेतों की उपस्थिति के किस्से भौतिकी, रसायन और गणित का ज्ञान तिरोहित नहीं कर पाता था। गणित के दुरूह सूत्र, रसायन शास्त्र के रसायनिक समीकरण, भौतिकी के सिद्धांत प्रकृति से हमें बाँधे रखते हैं। कण का तरंग और कण के रूप में चलना किसी भूत की क्रियाओं से अलग नहीं लगता था। क्योंकि भूत के किस्से भी उटपटांग ही हुआ करते हैं। लगता है हमारी सृष्टि एक विशेष व्यवहार और प्रकृति लेना चाहती है। छोटे से बड़ा और फिर बड़े से छोटा।वह विराट कृष्ण रूप भी धर सकती है और बाउन अंगुल की भी बन सकती है।ज्ञान का गागर जो देव सिंह बिष्ट  महाविद्यालय में रखा है वह हमने कितना भरा और कितना खाली किया, यह तो समय पर छोड़ दिया है। उस गागर में जब तब झांकने का मन तो होता ही है। वहां पर जाकर कहने को मन होता है-  "मेरे बचपन का आकाशमेरे बचपन के नक्षत्रमेरे बचपन की नदीमेरे बचपन का गांवमेरे बचपन का घराटमेरे दोस्त हैं।वह भोर का तारावे खेत खलिहानवह घड़ी बना सूरजवृक्षों की कतारमेरे मित्र हैं।वे वन जाती गायेंबादलों के घिरावऊँचे-नीचे झरनेपहाड़ों की दिव्यतामेरे सखा हैं।वे विद्यालय की किताबेंवे कक्षा के विद्यार्थीवह लिखती हुई कलमवे लिखे गये पन्नेमेरे साथी हैं।उन लड़कियों का होनाउन लड़कों का पूछनालोगों की गपसपबच्चों की शरारतेंमेरे संगी हैं।वह रूखी सूखी रोटीवह खेत की फसलवह राहों की चढ़ाईवह चिंता की रेखाएंवे देश के जवानमेरी आवाज हैं।"मनुष्य ने भूतों के लिये भी लक्ष्मण रेखा खींच रखी है।कहते हैं वे मंदिर में नहीं आते हैं। एक बार एक भूत को उदास देखा गया जब उससे उसकी उदासी का कारण पूछा गया तो उसने बताया," उधर बहुत से वृक्षों ने आत्महत्या कर दी है।और शहर में बहुत गंदगी हो गयी है।झील की दशा भी ठीक नहीं है। सब देख कर मन उचाट हो गया है,उदेख लग रहा है।" कहते-कहते उसके आँसू निकल आये।वह रूखी सूखी रोटीवह खेत की फसलवह राहों की चढ़ाईवह चिंता की रेखाएंवे देश के जवानमेरी आवाज हैं।"मनुष्य ने भूतों के लिये भी लक्ष्मण रेखा खींच रखी है।कहते हैं वे मंदिर में नहीं आते हैं। एक बार एक भूत को उदास देखा गया जब उससे उसकी उदासी का कारण पूछा गया तो उसने बताया," उधर बहुत से वृक्षों ने आत्महत्या कर दी है।और शहर में बहुत गंदगी हो गयी है।झील की दशा भी ठीक नहीं है। सब देख कर मन उचाट हो गया है,उदेख लग रहा है।" कहते-कहते उसके आँसू निकल आये।

nainital kee baat

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आज की शाम कुछ यूं हुई,छत पे बैठे थे हमबादल गरजने लगे, बजली चमकने लगीऔर तकते ही तकते  बूंदे माथे पे आ पड़ीआज की शाम कुछ यूं हुई।मन में यादे चल रही थी दिलदार कीचेहरा खयालो में बसा हुआ थाऔर तकते ही तकते बादलों ने उसका रूप ले लियाआज की शाम कुछ यूं हुई।।यादों में उनकी, आंखे भरने लगी थी हमारीदीदार को उनके जी मचलने लगा थाऔर तकते ही तकते उनका फ़ोन आ गयाआज की शाम कुछ यू हुई।।।बातें शूरु हुई,कुछ हमने कहा, कुछ उन्होंने कहाप्यार उनके भी मन में थाप्यार हमारे भी मनमे थाऔर तकते ही तकते दोनो ने इज़हार कर दियाआज की शाम कुछ यूं हुई।।।।आंसू जो पहले याद के थे उनकी,बदल गए वो प्यार मेंबातें शुरू ही हुईं थीं किज़ोर से गाल पे दर्द हुआऔर माँ उठा रहीं थी सुबहकी उठ जा स्कूल जाना हैऔर आज की शाम तो अभी हुई ही नाही थी।।।।।                                             -जितेंद्र कौशिक

aaj shaam kuch yu..

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नैनीताल के बहाने:अहमदाबाद एअरपोर्ट पर चैक इन करते समय पहले सामान ड्रोप वाला काउंटर खुला तो सभी यात्री उसी पंक्ति में लग गये। जिन्होंने ओन लाइन चैक इन नहीं किया उन्हें दूसरी लाइन में जाने को कहा गया लेकिन मुझे वरिष्ठ नागरिक होने का फायदा दिया। बंगलौर में उतरा और कार में बैठा । तभी एक लड़की मेरे मन में बैठ गयी।मैंने मना किया लेकिन वह बोली ," मुझे उतरना नहीं है, आपके साथ चलना है।" मैंने कहा," ठीक है। बताओ पीछले चालीस बसंत कैसे बीते?तुम अभी भी युवा लग रही हो।" उसने कहा," आपने समय को स्थिर कर दिया है। वैसे ही जैसे हमारे देवी-देवता कभी प्रौढ़ नहीं होते हैं। अप्सराएं भी प्रौढ़ नहीं होती हैं।आप उस समय में हैं, जहाँ हम बर्षों पहले थे।" सामने एक बगीचा आता है, मन करता है थोड़ी देर वहां टहल लूं। कार से उतरता हूँ और बगीचे में पहुंच जाता हूँ।बगीचा बहुत लम्बाई में है।उसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर बेंच लगी हैं। लड़का-लड़की लगभग हर बेंच में बैठे हैं।लेकिन सभी अनाकर्षक लग रहे हैं,थके-हारे, उत्साहहीन, उबाऊ किस्म के।  लग रहा है जैसे समय बीता रहे हैं। मैं सोच रहा हूँ प्यार इतना उबाऊ भी हो सकता है क्या? जबकि जो लोग अकेले घूम रहे हैं उनके चेहरे खिले लग रहे हैं। एक घंटा बिताने के बाद कार में बैठता हूँ। कार चलती है। वह लड़की फिर मन में बैठ जाती है और पूछती है कैसा लगा बगीचे में? मैं थोड़ी देर चुप रहता हूँ फिर कहता हूँ," अच्छा, लेकिन प्यार का अलग रूप देखने को मिला। नैनीताल की अनुभूतियों से भिन्न। "  वैसा ही जैसा भगवान बुद्ध को सब देख कर अनुभूति हुई। साधु के चेहरे पर उन्होंने तेज देखा था। उसने बोला," सब लोग बुद्ध तो नहीं हो सकते हैं?" मेरे पास इस बात का सटीक उत्तर नहीं था। मैंने पूछा तुम मेरे साथ कहाँ तक चलोगी? उसने उत्तर नहीं दिया। वह बोली कुछ लिखो। मैं लिखने लगा - " मैंने प्यार किया या नहीं7पता नहीं,जब चिड़िया उड़ रही थीझील डगमगा रही थीजंगल में शान्ति थीअंधेरा घिरा थाबादल गरज रहे थेतब मैंने प्यार किया था या नहींपता नहीं।जब  किसी से बात की थीकिसी से बहस की थीकिसी को देखा थाकिसी को अनदेखा किया थाकिसी को चाहा थातब मैंने प्यार किया था या नहींपता नहीं,बर्षों बाद जब मुड़ा था पीछेदेखा था इतिहासपलटे थे पन्नेपाया था अपने को मूक दर्शकतो फिर एक बार सोचा, मैंने प्यार किया था या नहीं।"उसने लिखा पढ़ा और कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। मैंने आँखें मूँद लीं और वह मुझे कहानी सुनाने लगी। एक राजा था। मैंने उसे टोका और कहा तुम राजा भर्तृहरि  की कहानी तो नहीं कह रही हो जिसमें एक अमरफल बहुतों के हाथ में जाता है।वह बोली नहीं। सुनो, एक राजा था एक बार वह जंगल में गया और कुछ दिनों बाद जंगल गायब हो गया। फिर वह नदी पर गया, कुछ दिनों बाद नदी खो  गयी। उसके बाद नगर में गया तो नगर गायब हो गया। झील पर गया तो झील खो गयी। मंदिर में गया तो मंदिर लुप्त हो गया।जिस सड़क पर चलता है, वह सड़क उसे दोबारा नहीं मिलती है। वह आश्चर्य में डूब गया कि ऐसा क्यों हो रहा है।वह ज्योतिषी के पास जाता है और ज्योतिषी उसे कहता है कि," राजन्, इन सब बातों का उत्तर मेरे पास नहीं है। "**

nainital ke bahane

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आँखों मे आँसू छिपा कर अंजाने शहर, उसे छोड़ आईमजबूरी ही कुछ ऐसी थी चाह कर भी उसे रोक ना पाईयाद बहुत आती है लेकिनकौन करे उसकी भरपाई आज के व्हाट्स एप वीडियो कॉलिंगचेहरा तो दिखा सकते हैंलेकिन, क्या दूर होने का दर्द दिखा सकते है.जो मैं उसे देकर आईउसके भविष्य और अपने कर्तव्य की खातिरवही दर्द तो में भी साथ ले आईपर इसी में तो उसका भला हैउसे मजबूत ढाँचे में ढालना भी तो हैबहुत मुश्किल है समाज मे जीनारोज एक परीक्षा लेता है जमानाहर परीक्षा में सफल होना है उसेअग्नि परीक्षाओं से निकलना है उसेऐसे में कोई और तो क्याअपना साया भी साथ देता नही हैअकेले ही उसे हर राह पर चलना होगाफूल और कांटो मे फ़र्क करना होगारोज एक नई राह बनानी होगीअपनी नई कहानी बनानी होगीबस अब ये दुआ है मेरीदुआ क्या ये तमन्ना है मेरीना राह मे कोई अड़चन आएगर आए तो कुछ लम्हों मे ही सिमट जाएफिर एक नया सवेरा आएऔर रोज नई खुशियाँ लाए

meri bitiya

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तू चल ,हा चल, तू चल, हा चलतू चल ,हा चल, तू चल, हा चलतू चल रे चल, तू मुस्कराता चलतू चल रे चल तू गुनगुनाता चलयह ज़िन्दगी तेरी, तू ही है इसका कल,राहें जो चुन ली हैं, किस्मत को दे बदलओ साथी चल, साथी चल,जिले पल..जिले पलतू चल रे चल, तू मुस्कराता चल.......ऐ यार सुन, इस दिल की धुन,धड़कन यह क्या कह रही है,देखें   हैं जो सपने तूने, सच कर उन्हें ,कह रही है,राहें अगर हैं अनजान मगर, तू न कभी हार मान जानामुश्किल सफर हैं तेरा मगर, मंज़िल तुझे ही है पानाहौसलों से अपनी , उड़ान तू यह भर लेसंग लहरों के चल के अरमान पुरे कर लेयह रौशनी है तुझ से ,जग तुझसे है रोशनचमकेगी किस्मत, कहता है यह मनओ साथी चल, साथी चल,जिले पल, जिले palचारों तरफ है तेरा नाम, हर कोई तुझको पुकारेतुझसे ही है , सबको यह आस , हर कोई तेरे सहारेयह लम्हे जो ,आज हैं मिले, कल न मिलेंगे कभी भीबन के धुआं यह उड़ जाएंगे, ठहरता नहीं वक्त कभी भीम्हणत  से अपनी , किस्मत को लिख लेअनजान डगर पे तू, राहों को चुन लेजो तूने खोया है, वोह तेरी अमानत है,जो तूने पाया है, वह तेरी इबादत हैसाथी चल,साथी चल,जिले पल, जिले पलतू चल रे चल........

tu chal

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वो बेवफ़ा हमें इश्क़ का क्या तोहफा दे गयाकिसी और की ज़िन्दगी सजा के, हमको तन्हाई की सजा दे गया…देव कुमार

wo bewafa

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दिल को दर्द और ज़हन को आराम लिखूंगा,इश्क़ की वसीयत पर सारे अरमान लिखूंगा,लुटा कर दौलत-ऐ-ज़िन्दगी तुझ पर मैं,सब कुछ तेरी मोहब्बत के नाम लिखूंगा…देव कुमार

dil ko dard

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अगर वो दरिया-ऐ-हुस्न रखते हैतो हम भी गम-ऐ-सागर रखते हैवो रखते है अगर दामन में, खंज़र-ऐ-बेवफाईतो हम भी, तन्हाई का गागर रखते हैदेव कुमार

agar wo

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क्या बेच कर हम तुझे ख़रीदे ए ज़िन्दगीसब कुछ तो गिरवी पड़ा है, मोहोब्बत के बाज़ार में…देव कुमार

kya baich kar

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तलाश-ऐ-यारज़िन्दगी जो गुज़री हमारी, तलाश-ऐ-यार के खातिरकुछ लोगो ने वाजिब कहा, तो कुछ ने आवारगी से नवाज़ा हमकोइम्तिहान-ऐ-सब्र भी और गम-ऐ-दिल को खुशामदिनचर्चा-ऐ-यार और शेखी मोहोब्बत कीकभी हम गुमशुदा तो कभी ये दिल गुमशुदाहर जगह होती बातें ग़ुरबत कीज़िन्दगी जो गुज़री हमारी, तलाश-ऐ-यार के खातिरकुछ लोगो ने वाजिब कहा, तो कुछ ने आवारगी से नवाज़ा हमकोन हसीं सवेरे की कहानी, न ढलते शाम का किस्सासबकी जुबां पर सिर्फ हमारे नाम का किस्साकोई समझता सोहरत-ऐ-इश्क़, कुछ ने मजहब-ऐ-दिल कहा इसकोकिसी की निग़ाह में नफरत-ऐ-आंसू, किसी में खुसी का खज़ानाज़िन्दगी जो गुज़री हमारी, तलाश-ऐ-यार के खातिरकुछ लोगो ने वाजिब कहा, तो कुछ ने आवारगी से नवाज़ा हमकोदो पहलू दिखे इस मोहोब्बत के हमकोअच्छी और बुराई दोनों से पला पड़ाकुछ ने डराया हमें सूली का नाम ले करकुछ ने हमें शक्श-ऐ-बुज़दिल कहाज़िन्दगी जो गुज़री हमारी, तलाश-ऐ-यार के खातिरकुछ लोगो ने वाजिब कहा, तो कुछ ने आवारगी से नवाज़ा हमकोअरमान-ऐ-दिल कुछ बैरंग मिले थेकुछ खुवाइशों का जैसे इंतकाल हुआगुनाह-ऐ-खास था ये सबकी नज़र मेंकुछ का फैसला हमारे हक़ में हुआज़िन्दगी जो गुज़री हमारी, तलाश-ऐ-यार के खातिरकुछ लोगो ने वाजिब कहा, तो कुछ ने आवारगी से नवाज़ा हमको….!!देव कुमार

talaash e yaar

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सुकून हम अपने दिल का अब खो चुके हैहम खुद को गम-ऐ-सागर में डुबो चुके हैक्यों मजबूर करते हो हमें, ये खत दिखा करहम पहले से ही उदास है, बहुत रो चुके हैदेव कुमार

sukun ham apne di..

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it was the time of morning around 8:45 am. when i came out from my house and began to run. when i reached park area then my one friend came and told me do you know about komal? then i replied yes i know but what happend?. he told me last night she did suicide. i replied- what. it is not possible she was a breve girl in our street. my friend replied me no it is totally true she did it. then we went komal's house.  we saw there was much crowd in the courtyard of house. after a couple of minutes police came on the spot. they instructed to all please maintain silence and piece. then one of the police officer entered in the komal's room.​then officer told to constable please search the suicide note if any in the room. after 5 minutes constable found suicide note under the geomatery box then officer opened that, and completely read it and after that he was totally shocked since in that note she wrote " i am sorry my father and my mother please forgive me because i did this mistake but i was helpless at that time i had no any way except it so i decided to do it actually i was suffering from my life's tensions which i can't describe to you when i saw there is no any solution about my problems then i took this decision i know it is very painable and shamable for me but yes this is my " the last pain of my life"dev kumar

the last pain of ..

short stories 1

चल आज तू मुझे अपना रहनुमा बना दे,इसी बहाने मेरी ज़िन्दगी भी खुशनुमा बना दे।देव कुमार

chal aaj tu mujhe

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