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jitna भी में  चाहू तुम्हे,मेरी चाहत कम लगती है
जितना भी में   सोचु तुम्हे , मेरी सोच यह कम लगती है
लगती है मुझे, जो भी ओ सनम, क्या तुमको भी कम लगती है
जितना भी में  चाहू तुम्हे,मेरी चाहत कम लगती है...

मैंने तुम्हे चाहा सनम,तू ही बता दे मेरी खता
तुझसे ही है यह, मेरी चाहत, तुझसे ही है यह मेरी वफ़ा
रात दिन तेरे बिन, कटते नहीं है यह पल
इक पल की भी दूरी अब तो सनम लगती है सदियों जैसी
धड़कन भी अब  तो तेरे बिना  , धड़कती नहीं पहले जैसी
हाले दिल क्या काहू, बिन तेरे न राहू
क्या हाल भी तेरा कुछ ऐसा है.

जितना भी में  चाहू तुम्हे,मेरी चाहत काम लगती है

मेरे लिए है तेरी मोहब्बत, जैसे हो कोई इबादत
चाहूंगा तुझको साड़ी उम्र भर ,दे दे मुझको तू इज़ाज़त
ज़िन्दगी के सफर ,आ संग चले हमसफ़र
यह रात है जो ठहरी हुई, आ इसको सजा दे हम दोनों
सपने है जो देखे सभी, आ सच कर जाएँ हम दोनों
खुशियां जो थी यहां, जाने है अब कहाँ
क्या तुमने कहीं इन्हे देखा है

जितना भी में  चाहू तुम्हे,मेरी चाहत काम लगती है

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Writing by

RajeshAllawadhi

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