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writingTere husn ka

तेरे हुस्न का..

अभी जो यूँ ज़िंदा हूँ मैं,
तेरी नज़र का कमाल है...
बेवक़त चाँद जो निकल गया....
तेरे हुस्न का जमाल है...

ये रात कैसे महक गई?
तेरी ज़ुल्फ़ें शायद बिखर गई...
मेरा होश जैसे खो गया,
एक तेरा हो के रह गया...

ये शोखियां आसमानी है,
तेरे होटों पे सिमटा रूहानी है...
अजीब ये भी कहानी है,
हर वक़्त तेरी मनमानी है...

ख्यालों पर जो तेरा पहरा है,
कुछ राज़ जैसे गहरा है...
जब सोचता हूँ मैं तुझे,
तू परियों का कोई चेहरा है...

तेरा रंग यूँ सुन्हेरा है,
लगा आशिक़ों का मेला है...
तू है एक तिशनगी की तरह,
मेरा दिल बस तुझ पे मरता है...

अभी जो यूँ ज़िंदा हूँ मैं,
तेरी नज़र का कमाल है...
बेवक़त चाँद जो निकल गया....
तेरे हुस्न का जमाल है...

-फरहाना फिरदौस
 

A poets praise for the beauty in his love, description of his love, his fantacy for her beauty..

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