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writingShy lover

शर्मीला साजन

आसमां के चाँद तारों

बागों की बहारों

तुम यूँ  ना निहारों

महबूब को मेरे

वो तो शर्मा जाये

अपना रुख है छुपाये

लाज के मारे

तुम यूँ  ना निहारों ...................

वो तो वैसे ही घर से निकलते हैं कम

गालों पे शर्म की लाली रहती है हरदम

सावन की काली घटाओं

बसंती हवाओं

तुम यूँ  ना  निहारों /Sataon

महबूब को मेरे

वो तो शर्मा जाये

अपना रुख है छुपाये

लाज के मारे

तुम यूँ  ना निहारों ...................

उनका श्रृंगार तो है खुद सादगी

बातों में भी है उनके, एक  मौसिकी

सागर की मस्त लहरों

नदियाँ की धारों

तुम यूँ  ना  निहारों /pukaron

महबूब को मेरे

वो तो शर्मा जाये

अपना रुख है छुपाये

लाज के मारे

तुम यूँ  ना निहारों ...................

Kishore

 

sharmila sajan

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Writing by

Kishore

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