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writingKaun hoon main

कभी-कभी जब बहुत थक जाता हूँ ,

घडी-दो-घडी भर ठहर जाता हूँ,

भूली-बिसरी यादों से मुहं पोछता हूँ,

इत्मीनान के साथ फिर सोचता हूँ,

के "कौन हूँ मैं"?

 

फिर सोचता हूँ,

किसके लिए इतना जोखिम उठा रहा हूँ,

बिना सांस लिए बढ़ा चला जा रहा हूँ,

एक पल भी नहीं अंगडाई लेने के लिए,

मैं हूँ के बादलों में सीढ़ी लगाये चढ़ा जा रहा हूँ,

 

और फिर जैसे ही घुटनों पर आता हूँ,

थोडा देर बैठकर, सब भूलकर सुस्ताता हूँ,

के फिर से समाज में होने का दायित्व

और महत्वाकांक्षा की आग,

"कौन हूँ मैं" के सवालों को कर देती है खाक |

 

फिर से उठता हूँ

सांस भरता हूँ,

और लग जाता हूँ दूसरो के सपनो की खातिर,

दौड़ता रहता हूँ जिन्दगी भर निरुत्तर

पूछता रहता हूँ खुद से

के "कौन हूँ मैं"

ज़िन्दगी की शुरुआत से लेकर अंत तक हमेशा इंसान कभी पैसे के पीछे, कभी शोहरत के पीछे भागता रहता है, क्यों? और किसके लिए ? इतना हैरान-परेशान इंसान क्यों रहता है, क्या कभी इसका उत्तर मिलेगा के कौन हूँ मैं और क्यों हूँ मैं इतना परेशान?

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Writing by

Avinash Sharma

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