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writingKab banakab toot gaya

कब बना, कब टूट गया
वह रिश्ता ही कुछ ऐसा था,
सपनों के आने में देर लगी
ऐसा कभी नहीं सोचा था।

मिट्टी को जब देखा तो
वह भी अपनी लगती थी
फूलों पर जब दृष्टि गयी तो
वे भी अद्भुत याद लिये थे।

वृक्षों से नया रिश्ता था
नदियों से मानव बदला था,
राहों में पत्थर उछले थे
पहिचान बनी और टूट गयी।

**महेश रौतेला

कब बना, कब टूट गया वह रिश्ता ही कुछ ऐसा था, सपनों के आने में देर लगी ऐसा कभी नहीं सोचा था। मिट्टी को जब देखा तो वह भी अपनी लगती थी फूलों पर जब दृष्टि गयी तो वे भी अद्भुत याद लिये थे।

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Writing by

MaheshRautela

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