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सुबह आँख खुलते ही  .......  लगाने लगती थी वो , एक होड़ ,
बिना किसी मकसद के  …… बस ईर्ष्या था उसका , एक मोड़ ।

सबसे पहले तैयार होकर  …… सबसे पहले विद्यालय जाना ,
सबसे आगे रह-रहकर  .......  बस सबसे ऊपर अपना नाम लिखवाना ।

दूसरे की सफलताओं को  ……… अपनी असफलताओं से झुकाना ,
क्योंकि होड़ ही था मकसद उसका  ....... फिर कैसे उसमे पीछे रह जाना ।

कभी थी वो खाने की होड़ लगाती .......  कभी खेलने में झूठा लाभ उठाती  ,
कभी गिरा कर औरों को वो   …… खुद जीत के ऊपर उठ जाती  ।

हज़ार बार उसको समझाया   …… कि होड़ से नहीं मिलती कोई माया  ,
गर जीतना ही है ,तो बिन होड़ के जीतो  .......  अपने कर्मों को खुद कर्मों से सींचों  ।

मगर वो नादान बड़ी थी  ……… क्योंकि होड़ ही उसके जीवन की एक कड़ी थी  ,
इसलिए उसने किसी की बात ना मानी  .......और होड़ की भाषा से ही बनती रही ज्ञानी  ।

दरअसल होड़ लगाना कोई अपराध नहीं है  ……… मगर होड़ का भी अपना एक साज़ नया  है   ,
होड़ लगाएँ गर प्रतिभागिओं के बीच .......तो उस होड़ में छिपी होती है , सफलता की नींव ।

लेकिन होड़ होगी यदि द्धेष और ईर्ष्या से भरी ……… तो वो कभी नहीं उतरेगी खरी  ,
इसलिए द्धेष नहीं है सफलता का द्धार  ....... होड़ से मिलता नहीं मूरख को व्यापार  ।

मगर वो नादान ये सब ना जाने  ……… और होड़ से लगी अपने सपन सजाने  ,
ऐसे सपन जो बिखर गए कुछ पलों के बाद  ....... और असफलता ही लगी अंत उसके हाथ ॥

This Hindi poem highlights the story of a girl child who always try to get something with competition with others but as that competition has no motive and fills with jealousy so she always fail to get success .

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Writing by

Praveen Gola

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