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writingHindustan hamara

हा हम बुलबुलें है इसकी है ये गुलसिताँ हमारा
पर सारे जहाँ से अच्छा नहीं है हिंदुस्तान हमारा।

तस्वीर ये नहीं है अब तक हुई मुकम्मल
अब तक नहीं बना है ख़्वावें जहां हमारा


हाकिम अभी वही है बस रंग बदल गया है
अब भी  कहा मिला है हमको चमन हमारा


हम ढूंढते वतन को सरहद की लाइनों में
तारीख में कभी, किताबी मायनों में
अहल-ए- वतन बताओ क्या है वतन हमारा

मजहब सिखा रहा है आपस मे बैर करना
नफरत जला रही है चैनों अमन हमारा

पर्वत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमां का।
शर्मिंदा है वो हमसे वो संतरी हमारा

हा हम बुलबुलें है इसकी है ये गुलसिताँ हमारा
पर सारे जहाँ से अच्छा नहीं है हिंदुस्तान हमारा।

ग़ुर्बत में है वतन पर हमको नही पड़ी है।
हो जाति धर्म या के हो रंग क्षेत्र भाषा
वो जो हो सबसे छोटा, है दायरा हमारा


यूनान, मिस्र, रोमा सब थे चले जहां से।
अब तक वहीं खड़ा है। ये कारवां हमारा

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारी
जो आज तक लड़े है उनको नमन हमारा ॥

'इक़बाल' ढूंढता क्यों मरहम कहीं जहां में।
मालूम है उसे जब  दर्दे निहां हमारा ॥

::::::अमित:::::

इकबाल साहब का सारे जहां से अच्छा।।।। तार्किकता की कसौटी पर

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Writing by

amit verma

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