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writingChand Ashaar Meri kalam Se

ना मैंने ही कभी पहल की, ना उसने हाथ बढ़ाया कभी
ज़िन्दगी से मेरा ताल्लुक़ कभी ख़ुशगवार ना रह सका!
***


मौहब्बत थी जुनूँ था… क़रीब आये थामे हाथ;
क़ुर्बत मिटी टूटे रिश्ते, मुख़्तसर सा रहा साथ!
***


रोज़ी-रोटी के मरहलों में दर-हक़ीक़त बड़ा दम था
वर्ना मेरी तवज्जो का हक़दार तू भी कहाँ कम था!
***


तुम जुदा हो जाओ, ना ठौर ठिकाना मिले
मुझे भी शायरी का एक और बहाना मिले!
***


साथ चलते भी तो आख़िर चलते कैसे
तुम्हारे ख़्वाब जुदा मेरी मंज़िल अलग..!
***
बिछड़ना ही था अगर तो हम मिले क्यों
वाक़ई हैं मजबूर तो… फिर ये गिले क्यों!
***


छोटी थी बस कट गयी और जी कर भी क्या कर लेते
लुत्फ़े-मज़ीद का पता नहीं, नाकामियां और सर लेते!
***


बर्बादियों में मेरी तेरा हाथ नहीं
तू पास तो थी कभी साथ नहीं!
***


परछाई सी दिखती है, कहीं यह क़ज़ा ना हो…
मेरे परवरदिगार की कोई नयी रज़ा ना हो !!
***

बस किताब-ए-दर्द लिए फिरते रहे, पढ़ने वाले की जुस्तुजू में..
पूछा हर एक ने कि कैसे हो, सुना किसी ने नहीं हाल हमारा!
***


--  ‘एमके’ (मोहनजीत कुकरेजा) --

 

क़ुर्बत: नज़दीकी; मुख़्तसर; संक्षिप्त; मरहला: झमेला; दर-हक़ीक़त: वास्तव में; तवज्जो: ध्यान; हक़दार: योग्य;

लुत्फ़-ए-मज़ीद: और अधिक आनंद; क़ज़ा: मौत; परवरदिगार: खुदा, भगवान; रज़ा: इच्छा, मर्ज़ी

Some Hindi/Urdu couplets from my pen, depicting various moods and emotions. Enjoy!

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