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writingBhulawa

जानता हूँ ये भुलावा है।
पर अच्छा है ये है।
निपट गहरे द्वंद के बाद
मैं फैसला नही करता बल्कि
खो जाता हूँ बुलबुलो में।
बुलबुलो में आशाओ के
सुखों के दुखों के
तैरता रहता हूं बेसुध
यह ये द्वंद है
भुलावा है
बेमतलब ही सही
चलने का बहाना तो है
कही को आना तो है
कही से जाना तो है
खुद ही को ढूंढने में
खुद को मिटा दू तो क्या है
इसी तलाश में
खुद से मिलू बनता चलूँ
फिर आदि क्या अंत क्या
कुछ नही
बस सफर हैं
और अच्छा है ये है।।

Sometimes we find life And everything around meaningless This poem came from these moments In a positive way

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Writing by

amit verma

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