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writingBand karo ye Maykhaane

                           मयखाने

पैदा होंगे और शहर में, मयकश कितने ना जाने
गली गली हर मोड़ मोड़ पर, खुले हुए हैं मयखाने
छीन रही है जीवन का सुख, मौत बाँटती दुकाने
बहुत हो चूका यारों अब तो, बंद करो ये मयखाने

मधुशाला के हवनकुण्ड में, कितनी साँसे हवन हुई
मयघट के मर्घट में जाने, कितनी लाशें दफ़न हुई
कितने ही बुझ गए दिये, इस आग में जलकर ना जाने
बहुत हो चूका यारों अब तो, बंद करो ये मयखाने

हमने मयकश की साँसों की, अंतिम तड़पन देखी है
यौवनकाल में विधवा होकर, रोती दुल्हन देखी है
देखी है मासूम लबों से, गायब होती मुस्काने
बहुत हो चूका यारों अब तो, बंद करो ये मयखाने

हाला की ज्वाला में, भस्मीभूत हो रही तरुणाई
मातम के सुर छेड़ रही है, मंगल-काल की शहनाई
नूतन देह का नाश कर रहे, सुरा-विसुध ये परवाने
बहुत हो चूका यारों अब तो, बंद करो ये मयखाने

मय के सौदागरों तुम्हारे, कारोबार फले-फूले
लेकिन तुमने रिक्त कर दिए, कितने सावन के झूले
कितने घर बर्बाद किये ये, तुमको पता चलेगा
कितने बाल यतीम हुए, पूरा हिसाब मिलेगा
यम के द्वार पे जाओगे जब, लेखा-जोखा पढ़वाने
बहुत हो चूका यारों अब तो बंद करो ये मयखाने
बहुत हो चूका यारों अब तो बंद करो ये मयखाने

 

 

It's voice of my heart . Band karo ye MAYKHAANE

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Writing by

GAJENDRA SHROTRIYA

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