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गर्भ में थी एक कली ,
गर्भ में ही मिट गई ,
गर्भ की बदनसीबी का ,
एक और लेख लिख गई ।

क्या कसूर था उसका ?
जो इस तरह से उसका क़त्ल हुआ ,
क्या कसूर था उसका ?
जो एक मानव मन इतना क्रूर हुआ ।

चली थी "वो" नापने सपन ,
एक सुन्दर से बालक को धर अपने मन ,
जब भेद उसके गर्भ का खुला ,
तब उस कली का पतन हुआ ।

फिर ठहरा एक और गर्भ ,
वो मन ही मन प्रसन्न हुई ,
इस बार गर्भ में था जो कण ,
उसकी पुष्टि पर मद से चूर हुई ।

जन्म हुआ उस गर्भ का ,
जिसमे था एक प्यारा सपन ,
पर जीवन भर वो चल ना सका ,
उस कली का जो हुआ था , वहाँ श्रापित दफ़न ॥

This Hindi poem highlights the revenge of a female foeticide in which the dreams of an unborn girl turned into the shape of a revenge for the other born creature .

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Writing by

Praveen Gola

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