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में चला, में चला,अपनी धून में चला
ज़िन्दगी ढूंढने अपनी राहें चला..ला ला ला ला ला ला

चला चला, चला बेफिक्र,किधर है मंज़िल, नहीं है खबर (2)

गर मिल भी जाये जो मुझको मोहब्बत तो उसको  में यूँ थाम लू
कह दू ज़माने से, दिल के पैमाने से आ बस तेरा नाम लू,
बढ़ती ही जाती  है यह बेकरारी, न आता है दिल को सुकून
तेरा नशा है यह चारो  दिशाओं में, छाया यह तेरा ज़नून

हाले दिल क्या कहूँ,बिन तेरे न रहूँ
चाहत में दूरियां , इक पल भी न साहू.

सुनो सुनो, तुम दिल की सुनो,करो वही जो दिल यह कहे(२)

बंधन सारे तोड़ के, लम्हो को जोड़ के
में चला , में चला, खुशियां ढूंढ़ने.ला ला ला ला ला ला

सोचा नहीं था, कभी ऐस होगा, चमकेगी यह किस्मत मेरी.
देखा था ख्वाबों में, चाहा था बाँहों  में, वह हो जाएगी बस मेरी
दिल का यह आलम न पूछो मेरा बस,खोया है यह इस कदर
जगता हु रातों को, सोता नहीं हू,में, खुद की नहीं है खबर


मेरा  दिल खो गया,बस में अब न रहा,मांगी थी जो दुआ,हमसफ़र मिल गया


मिला मिला जो मौका तुम्हे,इसे कभी न तुम जाने दो(२)

ख्वाबों को सजाके में, नींदो को बुलाके में
में चला ,में चला, सपने करने अपने ला ला ला ला ला ला.

 

 

 

mein chala

Lyrics 0

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
सृजन की यह आभा है
हिन्दी केवल एक गाना नहीं
जीवन की जयगाथा है।

हिन्दी केवल एक वर्ग नहीं
विविधताओं का भंडार है
हिन्दी केवल एक तर्क नहीं
समीक्षाओं का संसार है।

हिन्दी बहुत सरल है
प्रकृति जिसकी तरल है
संवेदनाओं की भूमि में
यह परिपक्व फसल है।

हिन्दी केवल मातृभाषा नहीं
संवैधानिक एक पर्व है
हिन्दी केवल राजभाषा नहीं
गणतांत्रिक यह गर्व है।

हिन्दी केवल एक बोली नहीं
चिंतन की यह उपमा है
हिन्दी केवल एक मोती नहीं
मंथन की यह महिमा है।

अभिव्यक्ति का अंश है
यह न कोई अपभ्रंश है
आदिकाल से भी आदि
सभ्यताओं का वंश है।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की यह ज्वाला है
हिन्दी केवल परिभाषा नहीं
सृजन का यह प्याला है।

हिन्दी केवल एक संकाय नहीं
ज्ञान की यह दृष्टि है
हिन्दी केवल एक पर्याय नहीं
सम्मान की यह सृष्टि है।

इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं
के साहित्यिक पतन रोकती यही
पठन-पाठन अतिसुंदर लेखन
लोक-लुभावनी लोकोक्ति यही।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की जिज्ञासा है
हिन्दी केवल एक आशा नहीं
मन की महत्वाकांक्षा है।

हिन्दी केवल एक मंत्र नहीं
आध्यात्मिक अनुनाद है
हिन्दी केवल एक छंद नहीं
यह आत्मिक अनुवाद है।

अनुदार नहीं बहुत उदार है यह
उद्वेलित मन का उपहार है यह
वैचारिक व्याकरण से सुसज्जित
हृदय का उद्दीप्त उद्गार है यह।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
जीवन की जिजीविषा है
हिन्दी केवल अभिलाषा नहीं
सृजन की सही दिशा है।

हिन्दी केवल एक मुक्तक नहीं
मर्म की मधुशाला है
हिन्दी केवल एक पुस्तक नहीं
कर्म की पाठशाला है।

राष्ट्रीय गौरव है यह
शासकीय सौरव है यह
क्लिष्ट और कर्कश नहीं
मधुर कलरव है यह।

हिन्दी केवल एक पथ नहीं
चिंतन की उपमा है
हिन्दी केवल एक रथ नहीं
मंथन की महिमा है।

हिन्दी केवल चलचित्र नहीं
अभिव्यक्ति का संगीत है
हिन्दी केवल एक क्षेत्र नहीं
अनुभूति का यह गीत है।

हिन्दी केवल एक प्रदेश नहीं
बल्कि संपूर्ण भारत है
हिन्दी केवल राजआदेश नहीं
बौद्धिक अभिभावक है।

हिन्दी केवल शब्दकोश नहीं
विधाओं का विस्तार है
हिन्दी केवल ज्ञानकोश नहीं
मेधाओं का मल्हार है।

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं
कवि की कविता है
हिन्दी केवल एक आशा नहीं
रवि की सविता है।

हिन्दी केवल एक अक्षर नहीं
यह विशिष्ट योग्य वर्ण है
हिन्दी केवल हस्ताक्षर नहीं
अपितु हृदय का दर्पण है।

हिन्दी केवल मातृभाषा नहीं
सृजन की यह आभा है
हिन्दी केवल राष्ट्रभाषा नहीं
जीवन की महागाथा है।।

-राॅकशायर इरफ़ान अली ख़ान

Hindi kewal ek b..

Poems 0

तसव्वुर में मेरे आजकल तुम्हारी तस्वीर चलती है
काग़ज़ पर अल्फ़ाज़ नहीं बल्कि तस्वीर उभरती है।

तेरी तस्वीर जब भी देखता हूँ, ख़यालों में खो जाता हूँ
मैं कुछ नहीं लिखता हूँ, तेरी तस्वीर मुझसे लिखवाती है।

तेरी रूह, तेरा नक़्श, तेरा नाम, सब चाँदी जैसे सफ़ेद हैं
दिल के अंधेरे कमरे में, तू रौशन कोई खिड़की लगती है।

तेरी खुशबू का अंदाज़ा तो इस बात से मालूम चलता है
कि जिस गली से गुज़रे तू, वो गली फूलों सी महकती है।

तेरे आने से मेरी ज़िंदगी का अधूरापन अब खत्म हुआ
ज़िंदगी पहले के बजाय इन दिनों ज्यादा मुस्कुराती है।

मुझे ये ख़बर है कि तुम्हें मेरे फ़ितूर की कोई ख़बर नहीं
सुन ओ बेख़बर, तेरी तस्वीर तो मेरी आँखों में बसती है।

दुआओं की दरख़्वास्त है, ये जुदाई नाकाबिले बर्दाश्त है
सुना है कि दुआओं से तक़्दीर की तस्वीर बदल जाती है।।

Tasawwur mein mere

Poems Sher-o-shayari 0

ना तुम्हें याद कर सकता हूँ, ना तुम्हें भूल सकता हूँ
शर्त यही है मोहब्बत के इम्तिहान की।

जिस पल में साँस लेता हूँ, उस पल में याद आती हो
जिस पल में याद आती है, उस पल के साथ आती हो।

चाहत के समंदर में जब भी गोता लगाया
मन का हर एक मोती चमकता हुआ पाया
लेकिन जब मन के अंदर गोता लगाया
तो मन के समंदर को सूखा ही पाया
मीलों गहराई तक, काई तक नहीं जमी थी वहाँ
पानी तो बहुत था मगर, था सब आँखों में जमा।

वही पानी, जिसे बेवज़ह बहने की इज़ाज़त नहीं
हाँ गर जज़्बात अश्क़ों की शक़्ल अख़्तियार कर सके
तो इज़ाज़त है बहने की।

इज़ाज़त मिलते ही आँसुओं का सैलाब उमड़ने लगता है
आँखों से अश्क़ों की रिहाई का
यह मंज़र बड़ा ही गीला है।

ना तुम्हें महसूस कर सकता हूँ, ना तुम्हें छू सकता हूँ
शर्त यही है इश्क़ के इम्तिहान की।।

Shart yahi hai

Poems 0

जब मन नहीं करता है कुछ करने का, तो लिखता हूँ मैं
जब मन करता है मन को छूने का, तो लिखता हूँ मैं।

ज़िंदगी से लड़ते-लड़ते, ज़िंदगी गुज़र जाती है
जब मन करता है कभी जीने का, तो लिखता हूँ मैं।

कोशिश करता हूँ लफ़्ज़ों से,
जज़्बात जता सकूँ, जज़्बात छुपा सकूँ
जब मन करता है तुझे याद करने का, तो लिखता हूँ मैं।

बिन बादल बरसात,
देखी है कभी, सुनी है कभी
जब मन करता है कभी भीगने का, तो लिखता हूँ मैं।

मन की गहराई,
जितनी गहरी है, उतनी सुनहरी है
जब मन करता है इसमें उतरने का, तो लिखता हूँ मैं।

आसमान में उड़ने की ख़्वाहिश,
हर परिंदे की बस यही ख़्वाहिश
जब मन करता है कभी उड़ने का, तो लिखता हूँ मैं।

हँसते हुये कैसे रोया जाये,
सोचा है कभी, किया है कभी
जब मन करता है ऐसा करने का, तो लिखता हूँ मैं।।

#RockShayar

Toh likhta hoon ..

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आँखों मे आँसू छिपा कर 
अंजाने शहर, उसे छोड़ आई
मजबूरी ही कुछ ऐसी थी 
चाह कर भी उसे रोक ना पाई
याद बहुत आती है लेकिन
कौन करे उसकी भरपाई 
आज के व्हाट्स एप वीडियो कॉलिंग
चेहरा तो दिखा सकते हैं
लेकिन, क्या दूर होने का दर्द दिखा सकते है.
जो मैं उसे देकर आई
उसके भविष्य और अपने कर्तव्य की खातिर
वही दर्द तो में भी साथ ले आई
पर इसी में तो उसका भला है
उसे मजबूत ढाँचे में ढालना भी तो है
बहुत मुश्किल है समाज मे जीना
रोज एक परीक्षा लेता है जमाना
हर परीक्षा में सफल होना है उसे
अग्नि परीक्षाओं से निकलना है उसे
ऐसे में कोई और तो क्या
अपना साया भी साथ देता नही है
अकेले ही उसे हर राह पर चलना होगा
फूल और कांटो मे फ़र्क करना होगा
रोज एक नई राह बनानी होगी
अपनी नई कहानी बनानी होगी
बस अब ये दुआ है मेरी
दुआ क्या ये तमन्ना है मेरी
ना राह मे कोई अड़चन आए
गर आए तो कुछ लम्हों मे ही सिमट जाए
फिर एक नया सवेरा आए
और रोज नई खुशियाँ लाए

MERI BITIYA

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“न फनकार तुझसा तेरे बाद आया मोहम्मद रफ़ी तू बहोत याद आया” । मोहम्मद रफ़ी यह नाम सुनते ही मन ही मन में सैकड़ो गीत बजट हैं । फिर उसमे सुबह के प्रभात गीत हो या चुलबुलाते गीत या भजन । रफ़ी साहब के कितने दीवाने हैं यह कहना मुश्किल होगा क्योंकि रफ़ी साहब के गीतों के बिना कोई भी संगीतमय कार्यक्रम अधूर होता हैं । क्योंकि की उनके गानों की इतनी वेरायटी थी की क्या कहना । रफ़ी जी का जन्म पंजाब के कोटला सुलतान सिंह में २४ दिसम्बर १९२४ को हुआ । रफ़ी जी की गायकी देखकर उनके बड़े भाई के एक मित्र ने उन्हें गाने के लिए प्रेरित किया । इनका पहला सार्वजनिक गीत था लाहौर में के एल सहगल के सामने गाया हुआ गीत वह भी मात्र १३ साल के उम्र में । १९४४ में रफ़ी और उनके बड़े भाई के मित्र हामिद साहब मुम्बई आये और  भेंडीबाजार में रहने लगे । इनको गाने का पहला मौक़ा मिला एक पंजाबी फिल्म गुल बलोच में १९४४ में । इनको  हिंदी फिल्म में गाने का मौक़ा मिला फिल्म गाँव की गोरी  में साल १९४५ में । रफ़ी जी ने जितने भी गीत गाये वह कमाल के थे । फिर वह चाहे कोई मुझे जंगली कहे या फिर जहा डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती हैं बसेरा वह भारत देश हैं मेरा या फिर मधुबन में राधिका नाचे रे या फिर जोनी वॉकर पर फिल्माया गया चुलबुल गीत तेल मालिश फिल्म 'प्यासा' का गीत हो, सब में ऐसा लगता था मानो रफ़ी ना गाकर खुद वह अभिनेता गया रहा हो । संगीतकार श्याम सूंदर ने उन्हें जी एम् दुरानी के साथ एक डुएट गाना गाने का मौक़ा फिल्म गांव की गोरी में दिया था । जिसके बोल थे " अजी दिल हो काबू में तो दिलदार की ऐसी तैसी " जिसे रफ़ी का पहला रिकार्डेड गाना कहा जाता हैं । रफ़ी जी ने नौशाद के संगीत निर्देशन में फिल्म 'शाहजहां' में "मेरे सपनो की रानी रूही रूही" यह गाना के एल सहगल के साथ कोरस में गाय था । रफ़ी जी के पहले सोलो गीत रहे नौशाद के साथ फिल्म 'चांदनी रात', 'दिल्लगी' और 'दुलारी' तथा शाम सूंदर के साथ 'बाजार' तथा हुस्नलाल भगतराम के साथ 'मीना बाजार' । जब १९४८ में गांधीजी की ह्त्या हुई थी तब उन्होंने "सुनो सुनो दुनियावालो बापू की अमर कहानी " यह गीत गाया था । उस समय पंतप्रधान पंडित नेहरू जी ने उन्हें अपने निवास स्थान पर बुलाया था । उन्होंने स्वतंत्रता दिवस पर रफ़ी जी को सिल्वर मैडल प्रदान किया था । रफ़ी जी ने १४९ गीत नौशाद के संगीत निर्देशन में गाये हैं जिसमे से ८१ गीत सोलो हैं ।“ओ दुनिया के रखवाले”, “मन तड़पत हरी दर्शन को आज” यह गाने नौशाद ने ही संगीतबद्ध किये हैं ।“ए मोहब्बत ज़िंदाबाद” फिल्म ‘मुग़ल ए आजम का यह गाना नौशाद ने १०० कोरस के साथ मिलकर बनाया था । संगीतकार ओ पी नय्यर ने रफ़ी और आशा भोंसले को लेकर इतने सुरीले गीत दिए है के जिसे आज भी बड़े प्यार से हम सुनते हैं । संगीतकार ओ पी नय्यर ने किशोर कुमार के लिए रफ़ी के आवाज का इस्तेमाल फिल्म ' रागिनी' में किया था । जबकि किशोर कुमार एक बेहतरीन गायक थे । रफ़ी जी को पहला फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड फिल्म 'चौदहवी का चाँद\' के "चौदहवी का चाँद हो या आफताब हो " इस गीत के लिए मिला था जिसे संगीतकार रवि ने संगीतबद्ध किया था । उन्हे पहला राष्ट्रीय पुरस्कार भी रवी के संगीतबद्ध किये हुये गाने के लिये मिला था वो गाना था “बाबुल कि दुआये लेती जा, जा तुझको सुखी संसार मिले “ फिल्म थी ‘नीलकमल’ । इस गाने को गाने के बाद रफी खुद रोये थे ऐसी बात उन्होने बीबीसी के एक इंटरव्यू मे बताई थी । मदन मोहन के चुनिन्दा पसंदीदा गायक थे जिनमे लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी का नाम सबसे अग्रक्रम मे आता है । उनके द्वारा संगीतबद्ध किये और रफी द्वारा गाये गीत काफी हिट हुये है । जैसे “ ये दुनिया ये महफिल मेरे काम कि नही“, “ तेरी आंखो के सिवा दुनिया मे रखा क्या है“। संगीतकार सचिन देव बर्मन के साथ कालाबाजार, तेरे घर के सामने, अभिमान मे गाये गीत काफी हिट हुये है । संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के साथ रफी जी और लता जी का खास रिश्ता रहा हैं । क्यों की उनकी पहली संगीतमय फिल्म ‘पारसमणी’ से जो उनका इन दोनो गायकों के साथ रिश्ता रहा वह काफी हिट रहा । उनकी फिल्म ‘ दोस्ती’ में रफी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को फिल्मफेअर अवार्ड मिला । रफी जी ने लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के लिये सबसे ज्यादा गाने गाये हैं जो की ३६९ थे जिसमे से १८६ सोलो गीत थे । रफी जी अगर किसी निर्माता के पास पैसे नही होते थे तो उनके लिये मुफ्त मे गाना गाते थे । “ हमको तुमसे हुआ है प्यार क्या करे , बोलो तो जीये बोलो तो मर जाये “ यह अकेला ही गीत हैं जिसे मोहम्मद रफी, लता मंगेशकर, किशोर कुमार और मुकेश ने एक साथ मिलकर फिल्म ‘ अमर अकबर अंथोनी’ के लिये गाया था और वो भी लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में । जिसे अकेला गीत हि कहा जा सकता हैं जिसे इन चारो महान गायकों ने मिलकर गाया था । इनका लता मंगेशकर के साथ रॉयल्टी के लिये मनमुटाव हुआ था किंतु बाद मे कूछ संगीतकारो के सुलह करने के बाद दोनो फिर साथ मे गाने लगे । किशोर कुमार के आने से रफी कि गायकी के करिअर को थोडा धक्का लगा किंतु रफी फिर से उभरकर सामने आये । १९७४ मे उन्हे “ तेरी गलीयों में ना रखेंगे कदम आज के बाद “ फिल्म ‘हवस’ के लिये वर्ल्ड मँगजीन बेस्ट सिंगर का अवार्ड मिला । जिसे उषा खन्ना ने संगीत दिया था । १९७७ में उन्होने फिल्म ‘ हम किसीसे कम नही’ के “ क्या हुआ तेरा वादा “ इस गाने के लिये फिल्मफेअर अवार्ड और राष्ट्रीय पुरस्कार दोनो जीता । उन्होने गिनीज बुक ऑफ रेकॉर्ड्स के उस बात का विरोध किया था जिसमे कहा था के लता मंगेशकर ने २५००० से कम गीत गाये हैं जबकी लता जी ने उससे ज्यादा गीत गाये हैं । १९९१ मे यह बात गिनीज बुक ऑफ रेकॉर्ड्स ने कबुली और उसे सुधारा । लक्ष्मीकांत प्यारेलाल कि संगीतबद्ध फिल्म ‘ आसपास’ का गाना रफी जी का आखरी गीत कह्लाता हैं । उनकी दिल का दौरा पडने के कारण ३१ जुलाई १९८० को मौत हो गयी। जिस दिन उन्हे दफनाया गया उस दिन भारत सरकार ने दो दिन कि सार्वजनिक छुट्टी घोषित कि थी । जुन २०१० को आउटलूक म्युझिक पोल के हिसाब से आउटलूक मँगजीन ने लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी जी को सबसे सर्वश्रेष्ठ गायक घोषित किया । वही रफी द्वारा गाये गीत “ मन रे तू हि बता “ जो कि फिल्म ‘चित्रलेखा’ मे था उसे गाना नंबर १ का खिताब दिया गया. रफी जी को ६ फिल्मफेअर अवार्ड और एक राष्ट्रीय पुरस्कार १९६७ में मिला था । ऐसे महान गायक को भारत सरकार ने १९६७ में पद्मश्री से नवाजा । ऐसे महान गायक को हमारा शत शत नमन ।

Mohammad Rafi

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MONTH’1न’ AUGUST
आग का दरिया है, डूब कर जाना है!
एक नई दुनिया का रास्ता!
                            यह मुंबई के ‘बीच’ पर धूप से चमकदार एक सुबह थी. मौसम सुहाना था तो सभी लोग इस दिन का भरपूर मजा लूट रहे थे. बड़े क्या बच्चे, सभी आज के दिन के गुनगुने पानी और साफ़ मजेदार रेत में लोटपोट हो रहे थे. कुछ व्यस्क लडकियां समंद्र के हिचकोले खाते ज्वार-भाटे के साथ खेल रही थीं. पानी के पीछे जाते ही वो पानी का पीछा करने लगतीं और जैसे ही पानी ‘बीच’ पर लौटता वे उससे बचकर भाग लेतीं. एक छोटा सा चार या पांच साल का बच्चा अपने पिता से पानी में उतारे जाने की जिद कर रहा था. उसका पिता उसे जैसे ही पानी में उतारता है, एक तेज लहर उस बच्चे से टकरा जाती है. बच्चा डर के मारे चींख मारता हुआ अपने पिता की टांगों से चिपक जाता है. अब उसके माता पिता के पास हंसने के सिवा और कोई चारा नहीं रह जाता. पूरा ‘बीच’ कुल मिलाकर खुशियों भरा लग रहा था.
           बीच पर एक तरफ कुछ लोग जमा थे. दो आदमी आपस में शायद लड़ रहे थे. पास खड़े लोगों को उन दोनों के इर्द-गिर्द लगी भीड़ की वजह से दोनों के सिर्फ धड़ ही दिखाई दे रहे थे. अजीब सी आवाज़ लिए लम्बा दिखने वाला एक आदमी अपने से छोटे कद के आदमी को घूरते हुए उसकी आस्तीन को पकड़ उसे धमका रहा था:
“ऐ भाया! ऐ गुरिल्ले सा दिखणे वाला थारा मुंह हम एक ही ‘डैश...डैश’ में तोड़ देंगे, ‘मुट्ठी में’.” लम्बा वाला आदमी गुस्से में दूसरे आदमी की आस्तीन खींचते हुए कहता है.
“मेरा मुंह तोड़ेगा, मेरी कॉलर खींचता है. ठहर.....पहले मै ही तुझे खींचता हूं.” छोटा दिखने वाला आदमी लम्बे आदमी को धमकाता है.
“ऐ सांड संभल जा, नहीं तो थारी सात पुश्तें ‘डैश...डैश’ पैदा होवे हैं, ‘बैल’. चला जा...” लम्बा आदमी कॉलर को और ज्यादा खींचते हुए कहता है.
“तू ठिंगना ऐसे नहीं मानेगा ठहर....” छोटा दिखने वाला आदमी अपने निचले ओंठ दबाते हुए एकाएक ही कुछ लम्बा हो जाता है.
           असल में लम्बा दिखने वाला आदमी एक बौना था जिसे छोटे कद के दिखने वाले एक लम्बे-तगड़े आदमी ने उसकी बगलों से अपने सिर के ऊपर उठा रखा था, जो अब उसे नीचे ले आया था. बौने की धमकीयों से गुस्साया वो आदमी उसे भीड़ के ऊपर से उछालकर समंद्र की रेत पर फैंक देता है.
           तभी उस बौने की नींद खुल जाती है जो कि अपने घर के बिस्तर पर सोए हुए सपना देख रहा था. बौना उठकर अपने घर से बाहर की और भागता है. शहर की सड़कों से भागता हुआ वो एक राशन की दूकान पर पहुंच जाता है जो किसी बौने की ही थी.
“आज म्हारे हाथों एक लम्बू बच गयो. आज तो हम उसे ‘डैश...डैश’ दिखाकर ही रहते, ‘उसकी औकात’.” वो बौना डींग मारते हुए उस दुकानदार बौने से कहता है.
“आज फिर से सपना देख लिया. क्या कभी किसी लम्बू को असल में मारेंगे भी के नहीं, प्रताप जी.” दुकानदार हंसते हुए

सामान का थैला पहले वाले बौने की और करता है.
“कितनी बार कहा थारे को, ‘प्रताप’ नहीं....” पहले वाला बौना अपने कानो को पकड़ते हुए ‘प्रताप’ शब्द कहता है, जैसे किसी महान हस्ती का नाम लेते हुए किया जाता है. फिर वो बौना अपनी छाती फुलाते हुए गर्व से कहता है, “भ्रताप! महान महाराणा प्रताप जी के बजीर के पौते का बीटा, ‘बहूराणा भ्रताप’” वो एक बार फिर से ‘भ्रताप’ कहते हुए अपनी छाती फुला लेता है.
           वहीं दूसरी और एक और सपना टूटता है. लेकिन इस बार कोई बौना नहीं था. ये एक तीस साल का आदमी था जो अपने बिस्तर के किनारे पर सोया हुआ था. कुछ देर बाद वो आदमी ‘कमोड’ पर बैठकर अपनी आंखें मल रहा था, फिर वो शीशे के सामने अपने दांत साफ़ करने लगता है, फिर नहा-धोकर, कमीज पहनते हुए अपने कमरे से नीचे हॉल की सीढ़ियां उतरने लगता है.
“हो गया टुम टैयार आ जाओ जल्दी से, नाश्ता टैयार है.” सफेद बालों वाली एक बूढ़ी पारसी औरत मेज पर नाश्ता लगा रही थी.
“नहीं आंटी जी मै लेट हो जाऊँगा. बाहर ही कुछ खा लूँगा. आप खा लीजिये.” कहते हुए वो आदमी हॉल के दरवाजे के पास पहुंच जाता है.
“अगर एक कदम भी और बढ़ाया टो टुम्हारा टांगे टोड़ देगा. वापिस आओ और नाश्टा करो नि ‘ढीगरा’.” वो औरत, ‘त’ को ‘ट’ कहते हुए हुकुम चलाती है, टो..तो आदमी वापिस आ जाता है.
“कल भी टुम बिना नाश्टे के चला गया ठा. टभी आज मैं सुबह जल्दी उठकर नाश्टा बनाया और टुम बिना खाए भाग रहा है. वैरी बैड! टुम्हारा मां को क्या जवाब देगा मैं, कि टुमको भूखा रखटा है.” औरत उसे प्यार से डांटती है.
“परसी आंटी...आपकी छाँव तले भी मुझे कुछ हो सकता है भला? मुझे कभी नहीं लगा कि मैं अपनी मां से मीलों दूर हूं.” वो आदमी उस औरत के गालों को पुचकारते हुए कहता है.
“लो...आज मैं टुम्हारे लिए मेठी का परांठा बनाया है. टुम्हे पसंद है ना..” औरत अपनी हथेली पर ठोड़ी टिकाते हुए उसे प्यार से खाते हुए देखती है.
“मम्म...मुझे नहीं मेरी दीदी को...वैसे अच्छे होते हैं मेथी के परांठे.” वो आदमी मुंह ठूंस कर खाते हुए कहता है.
“अच्छा कल टुम्हारा मां का फ़ोन आया ठा. टुम्हारे लिए कोई रिश्टा देखा है. वो फोटो भेज रही हैं. वैसे मैं भी टुम्हारे लिये एक लड़की पसंद किया है. वो बाजू वाले की ‘मोहिनी देशवानी’. खुबसूरत, तुम्हारी तरह पर्सनालिटी, अच्छा मैच होगा टुम दोनों का. देख लेना, जो पसंद होगा, बटा देना.” परसी आंटी उत्सुकता और प्यार भरे लहजे में कहती है.
“आप देख लेना जो पसंद आएगी वही फाइनल...पक्का.” वो आदमी अपना बैग उठाकर जाते हुए कहता है.
“मिस्टर आनंद चंद्रा, मजाक नहीं. मैं टुमको बोल देता है. अब टुम्हारा उम्र शादी बनाने का हो गया है. कब टक नहीं बनाएगा टुम शादी. पेट बढ़कर प्रेगनेंट हो गया है, उम्र हो रही है, बूढ़ा हो जाएगा टो कौन देगा टुमको अपना लड़की.” परसी आंटी प्यार से गुस्से में कहती है.
“आंटी जी, आर्कियोलोजी विभाग में काम करता हूं. कोई न कोई प्राचीन वस्तु तो मिल ही जाएगी....क्यों आप नहीं हो. आप भी बूढ़े, मैं भी बूढ़ा......जब मिल बैठेंगे दो बूढ़े...तो बाजू वाले ‘कीशन’..अंकल का पत्ता....कट.” चंद्रा मजाक  करते              

हुए परसी आंटी के गाल चूमकर जाने लगता है.
“’ढीगरा’, कह देता है. अगर इस बार भी हमको बेवकूफ बनाया टो....टो शाम को घर मट आना.” परसी आंटी गुस्से में उंगली हिलाते हुए कहती है.
“प्रॉमिस, शाम को आपकी बहू आपके सामने होगी. ‘लौटे’ में चावल भर कर रखना.” चंद्रा कहता हुआ दरवाजा बंद कर देता है.
“टुम शादी टो बनाओ, चावल के पूरे बोरे को लाट मरवाएगा बहू से.....” कहकर परसी आंटी अपना माथा पकड़ लेती है.
           क्रच..क्रच...क्रच...क्रच एक सुनसान जंगल में हरे-पीले पतों की चादर सी बिछी हुई थी जिसपर कुछ जूतों के चलने की आवाजें आ रही थीं. तभी ‘..चप..’ की आवाज़ के साथ उनमें से किसी एक आदमी के जूते में कुछ चिपक जाता है. अब चलते हुए जूता आवाज़ कर रहा था. वो आदमी रुककर अपना जूता देखने लगता है. ये चंद्रा था, जो तीन और लोगों के साथ जंगल में भटक रहा था. उसके जूते की तली में किसी तरह का आधा फटा हुआ कागज चिपक गया था. उसे निकालकर वो देखता है कि उस मैले-कुचैले कागज पर काली स्याही से कुछ बना हुआ था. ये एक इमारत थी जिसकी एक तरफ तितली के पंखों जैसी आकृति थी. दाएं से बाएं छोटी-बड़ी दो मीनारे थीं जिनके ऊपर छोटे-बड़े गुम्बद बने हुए थे. उनके बाद एक और मीनार थी जो शायद दोनों से बड़ी थी. लेकिन कागज के आधा फटे होने की वजह से आधे गुम्बद के साथ आधी ही दिख रही थी. बीच में आधे दरवाजे और आधी उतरती हुई सीढ़ियों के साथ तस्वीर कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रही थी और बीच-बीच में मिट भी गई थी.
“क्या हुआ चंद्रा जी, क्या किसी खजाने का नक्शा हाथ लग गया?” एक ‘बैक-पैक’ धारी आदमी पूछता है.
“जरा देखो इसे, क्या है ये?” चंद्रा सबको पास बुलाकर तस्वीर देखने के लिए कहता है.
“चंद्रा जी, आप भी क्या किसी बच्चे की बनाई तस्वीर के पीछे पड़ गए. फैंको इसे, आगे भी जाना है.” एक और आदमी कहता है.
           चंद्रा उस कागज को अपने पेपर बोर्ड पर पटककर आगे बढ़ जाता है. दोपहर दो बजे के बाद सभी प्राकृतिक छटा से भरपूर ‘सायन फोर्ट’ के अपने ऑफिस में खाना खाते हुए ‘गपिया’ रहे थे. उनके साथ एक सुंदर, शर्मीली सी दिखने वाली लड़की भी थी. चंद्रा उस लड़की की और चोरी-चोरी देख रहा था. लेकिन उस लड़की का उसकी और कोई खास ध्यान नहीं था. ऐसा लग रहा था जैसे चंद्रा उस लड़की को मन ही मन पसंद करता था. चंद्रा जब भी उस लड़की के साथ मजाक करता वो लड़की भी मुस्कुरा देती, लेकिन उसके चंद्रा की और देखने के ढंग से ये साफ़-साफ़ नहीं कहा जा सकता था कि उसके मन में क्या था. खाना खा-पी लेने के बाद सभी अपने-अपने काम में जुट जाते हैं.
           शाम को छुट्टी के वक्त चंद्रा उस लड़की से ‘बीच’ पर घूमने को जाने के लिए पूछता है, तो लड़की कहीं जाने की बात कहकर मना कर देती है. ‘जिम’ जाने के बाद, चंद्रा बीच पर अकेले ही पहुंच जाता है. बीच पर घूमना उसे अच्छा लगता था. अपने घर चंबा की सुहानी वादियों से दूर, शायद, उसके पास अपने अकेलेपन को दूर करने का यही एक जरिया था. अंधेरा घिरने से पहले वो अपनी मकान मालकिन परसी आंटी के पास आ जाता है. परसी आंटी एक विधवा पारसी महिला थी जिसका पति ‘जनेव दीयोन’, बीमारी के चलते तीन साल पहले ही चल बसा था. उसकी एक बेटी थी जो गुजरात में ब्याही हुई थी और साल में एक बार ही अपनी मां के पास आ पाती थी. अकेली पड़ चुकी परसी आंटी को चंद्रा अपने बेटे की तरह लगता था और उसी तरह उसे प्यार भी देती थी. परसी आंटी अकेली पड़ चुकी एक ऐसी औरत थी जिसके पास बातें करने और टाइम पास करने का सिर्फ एक ही जरिया बच गया था, चंद्रा.
          
           थका होने की वजह से चंद्रा खाना खा लेने के बाद अपने कमरे में सोने चला जाता है. रात को सोए हुए चंद्रा के दिमाग में वो आधी तस्वीर चमक सी जाती है जिससे चंद्रा की नींद खुल जाती है. घड़ी रात के ग्यारह बजा रही थी. शायद दिन की थकान की वजह से उसे पता भी नहीं चला था कि कब उसे नींद आ गई थी. अब चंद्रा को नींद में दिखी वो तस्वीर परेशान कर रही थी. चंद्रा अपने बैक-पैक से पेपर बोर्ड निकालकर स्टडी टेबल के पास बैठ जाता है. उसके क्लिप पर कई पेपर फंसे हुए थे लेकिन वो तस्वीर गायब थी. शायद उसने उसे गिरा दिया था. तभी दरवाजे के  खट-खटाने से चंद्रा चौंक जाता है. चंद्रा दरवाजा खोलता है और परसी आंटी अंदर आ जाती है.
“टुम अभी टक सोया नहीं, ग्यारह बज गया है. ‘बैड’..’वैरी बैड’!” आंटी प्यार से चंद्रा के सिर पर हाथ फेरते हुए कहती है.
“आंटी जी, आप भी तो नहीं सोए? वैसे भी हम बूढों को नींद कहां? ‘माते’ की तरह आप भी मेरे जागने की जासूसी कर रहे थे....?” चंद्रा, परसी आंटी का हाथ पकड़कर कहता है. चंद्रा अपनी मां को प्यार से ‘माते’ कहकर पुकारता था.
“ये टुम्हारा मां का ही ऑर्डर है कि मैं देखटी रहूं की टुम सोया है कि नहीं. चलो अब सो जाओ....चलो.” परसी आंटी चंद्रा को कुर्सी से उठाकर बिस्तर में सुलाकर चली जाती है.
           उस रात चंद्रा को सपने में वो आधी तस्वीर फिर से दिखाई देती है. लेकिन इस बार वो एक पूरी इमारत के रूप में उसके सामने आती है जिसकी दूसरी तरफ भी वैसी ही मीनारें बनी हुई थीं. सुबह ऑफिस में चंद्रा अपने पेपर बोर्ड पर कुछ कागजों को क्लिप कर रहा था कि एक कागज नीचे गिर जाता है. ये वही आधी तस्वीर थी जो कीचड़ की वजह से बोर्ड के पीछे चिपकी हुई थी. अब चंद्रा अपने सपने के हिसाब से उस तस्वीर को पूरा करने लगता है. कुछ ही पलों में तस्वीर सामने थी, वो इमारत किसी कहानी के महल जैसी लग रही थी. इसकी कुल पांच मिनारें थीं और एक लम्बी सीढ़ी नीचे उतर रही थी. उस रेखा चित्र के ढांचे और उसकी उपस्थिति के बारे में मंत्रमुग्ध होकर रहने सोचते रहने के कुछ पलों बाद चंद्रा का मोह उसका सहकर्मी आकर तोड़ता है.
“ये क्या है...किसी नए खंडर का स्केच? यार ये तो उसी स्केच की कॉपी है जो हमे जंगल में मिली थी. तुम भी सारा काम छोड़कर किसी बच्चे की कल्पना के पीछे पड़ गए हो.” सहकर्मी उस आधी तस्वीर को देखते हुए कहता है.
“पता नहीं नकिल, इस आधी तस्वीर का पूरा स्केच मुझे सपने में दिखा. तो मैं देख रहा था कि आइने क्या देखा था?” चंद्रा उलझे अंदाज़ में कहता है.
“यार तुम अगर सारा दिन इन चीजों के ही पीछे पड़े रहोगे तो तुम्हे ये सब दिखेगा ही ना. आज रात एक खूबसूरत परी आएगी तुम्हारे सपने में....उठो और चलो मेरे साथ.” नकिल, चंद्रा को जबरदस्ती उठाकर अपने साथ ले जाता है.
           मुंबई शहर की भीड़-भाड़ भरी ट्रैफिक से होते हुए, आधे घंटे की बाइक राइड के बाद दोनों पहुंच जाते हैं, ‘मालाबार हिल्स’ की चोटी पर. सामने विशाल समंदरी मैदान फैला था जिसके ऊपर सूरज एक चमकती गेंद सा दिख रहा था. चोटी से नीचे बीच पर नजारा बहुत ही भरा-भरा लग रहा था. ‘टूरिस्ट’ से लेकर मुंबईवासी हर कोई बीच पर अपने-अपने ढंग से मजे कर रहा था. तभी तेज हवा की एक लहर चंद्रा के मन की सारी सुस्ती निकाल बाहर करती है. नकिल, चंद्रा को ‘हिल्स’ के रिहायशी इलाके में घुमती लड़कियों की और इशारा करता है.
“मन कुछ हल्का हुआ? हसीन वादियां, हसीं नजारे..” नकिल का इशारा लड़कियों की तरफ था. चंद्रा हल्के से मुस्कुरा देता है और दोनों ही उस चोटी से प्राकृतिक दृश्य को निहारने लगते हैं.
           चोटी पर काफी समय तक टहलते रहने के बाद दोनों समंद्र तक जाने का फैसला लेते हैं. समंद्र किनारे कुछ ‘टूरिस्ट’ चहल-कदमी कर रहे थे. नकिल कुछ लड़कियों को देखकर चंद्रा को कोहनी मारता है और दोनों वहीं रेत पर बैठ

जाते हैं. दोनों समंदरी किनारे का मज़ा ले रहे थे कि तभी समंद्र के एक लहरदार किनारे पर शोर मचने लगता है और लोगों की भीड़ लगनी शुरू हो जाती है. दोनों दोस्त भी उस और भाग लेते हैं. वहां पहुंचकर वे देखते हैं कि कुछ लोग एक बेसुध लड़की को लहरों के बीच से उठाकर ला रहे थे. किनारे पर कुछ लड़कियां भी थीं जो परेशान सी उस बेहोश लड़की को बाहर लाए जाने का इंतज़ार कर रही थीं. उस लडकी के किनारे पर आते ही वो लड़कियां उसे घेर कर खड़ी हो जाती हैं और उसे होश में लाने के लिए चिल्लाने और शोर करने लगती हैं. लड़की अभी भी बेसुध पड़ी थी और पूरा शरीर जम सा गया था. उसकी सहेलियां डॉक्टर और एम्बुलेंस बुलाए जाने के लिए चिल्ला रही थीं. कुछ लोग फ़ोन पर मदद मांगने लगे थे लेकिन लड़की के पास जाने की हिम्मत कोई भी नहीं कर रहा था जैसे कि कहीं वो मर जाती तो उसका दोष उनके सिर मढ़ा जाने वाला था. अब नकिल, चंद्रा से कुछ करने को कहता है. चंद्रा भीड़ में से आगे बढ़कर उसके गले की नसों और सांसों को जांचने लगता है. जांच के बाद चंद्रा बताता है कि उस लड़की की हृदय गति बंद हो चुकी थी. यह सुनकर उस लड़की की सहेलियां और जोरों-शोरों से चिलाने और रौने लगती हैं.
“यार तो तू कुछ करता क्यों नहीं. तू तो जानता है, क्या करना चाहिए. कुछ कर नहीं तो ये मर जाएगी.” नकिल परेशान सा कहता है.
“इससे ज्यादा और क्या मरेगी...” बुदबुदाते हुए चंद्रा, लड़की की हृदय गति को दोबारा से जांचने के बाद बिना समय गंवाए उसकी छाती को दबाने लगता है और कृत्रिम सांसें देने लगता है.
           बीच-बीच में लड़की की नब्ज़ को जांचते हुए और अपने प्रयास करते हुए चंद्रा को एक-एक मिनट घंटों जैसा लग रहा था. उसकी नाक से पसीना टपक रहा था और उसके दबाने की रफ्तार धीमी पड़ने लगी थी. अब चंद्रा थकने लगा था. सभी टूरिस्ट उन्हें घेरे बस तमाशा ही देख रहे थे. लड़की टस से मस नहीं हो रही थी कि तभी चंद्रा के कंधे पर कोई हाथ रखकर उसे हटने के लिए कहता है. वह ‘मैडिकल इमरजेंसी सर्विसेज’ का कोई कर्मचारी था. चंद्रा के पीछे हटते ही दो ‘इमरजेंसी प्रोफेशनल्स’ अपने काम में जुट जाते हैं. एक छाती दबा रहा था और दूसरा एक मास्क के साथ कृत्रिम सांसें दे रहा था. कुछ समय के बाद वो ‘रेस्कुअरस’ लड़की की धड़कन शुरू हो जाने की बात करते हैं. ये सुनकर पूरी भीड़ मानो राहत की सांस लेती है. भारी शोर और तालियों की गड़गड़ाहट के बीच लड़की को स्ट्रेचर पर लिटाकर बीच से बाहर ले जाया जाता है.
“’वेल डन’, सर. आपकी कोशिशें काम आईं. अगर समय रहते आपने इसका ‘सी.पी.आर.’ शुरू न किया होता तो हमारे पहुंचने तक ये शायद रिकवर करने की हालत में नहीं रहती. आपका शुभ नाम?” ‘लीडर रेस्कुअर’ चंद्रा से हाथ मिलाते हुए पूछता है.
“आनंद चंद्रा, हिमाचल से हूं. मुंबई में ‘आर्कियोलोजी डिपार्टमेंट’ में काम करता हूं.” चंद्रा हाथ मिलाते हुए परिचय देता है.
“आर्कियोलोजी..? सी.पी.आर. अच्छा कर लेते हैं आप. मैने समझा ‘मेडिकल प्रोफेशनल’ होंगे आप.” रेस्कुअर कहता है.
“था..पर अब नहीं. पहले ‘मेडिकल इमरजेंसी सर्विसेस’ में ‘ई.एम.टी’ था. अब आर्कियोलोजी विभाग में ‘ड्राफ्ट्समैन’ हूं.” चंद्रा जैसे ये जवाब देना नहीं चाहता था.
“इतना नोबल प्रोफेशन छोड़ आप....? किसी की जान बचाने का मौका ऊपर वाला हर किसी को नहीं देता.” रेस्कुअर हैरानी से पूछता है जैसे चंद्रा ने कोई गुनाह कर दिया हो.                                                       
“वो तो है, लेकिन जिंदगी को सही ढंग से जीना हो तो सिर्फ नैतिकता ही एकमात्र साधन नहीं रह जाती. चौबीस से छत्तीस घंटों की ड्यूटी के बदले चिल्लर मिले तो शायद आप भी इस काम को छोड़ दें. और ऊपर से तानाशाही  

मैनेजमेंट हो तो.” चंद्रा के कहने में कड़वाहट भरी थी.
“हां....इस आज़ाद भारत में अभी भी कुछ अंगरेज़ पीछे छूट गए है, जिन्हें हम भगा भी नहीं सकते.” रेस्कुअर आह भरते हुए कहता है.
“मैं तो कहता हूं, हर स्कूल में ‘बेसिक लाइफ सपोर्ट’ की ट्रेनिंग मिलनी ही चाहिए. ताकि आज की तरह ही समय रहते जानें बचाई जा सकें. ‘इट वॉस नाइस टु मीट यु, मिस्टर चंद्रा’. मिलिएगा कभी फुर्सत में.” रेस्कुअर हाथ मिलाकर वहां से चला जाता है.
           अब सभी लोगों का केंद्र बिंदु चंद्रा था. नकिल उससे चिपककर खड़ा था ताकि लड़कियों का ध्यान उसपर भी पड़े. कुछ लोग पास आकर चंद्रा के कंधों को थपथपा रहे थे तो कुछ उसके काम की तारीफ़ किये जा रहे थे.
“साले...अगर ये सब करना था तो मुझे कह देता, तुझसे अच्छा ही करता.” नकिल सी.पी.आर. के बारे में कहते हुए मजाक करता है.
“चुप कर...कहीं इन सब ने तेरे नेक विचार सुन लिए तो तुझे सी.पी.आर. की जरूरत पड़ जाएगी और करेगा वो भैंसे जैसी शक्ल वाला ‘ठुल्ला’.” चंद्रा एक मौटे पुलिस वाले की और इशारा करते हुए कहता है.
           दोनों का आपस में मजाक चल ही रहा था कि तभी वहां से एक नाटा और लगभग नंगा नाटे कद का साधु तेज कदमों के साथ उनके पास से गुजर जाता है. वो साधु थोड़ी दूर एक चट्टानी किनारे पर खड़ा होकर पानी को देखने लगता है. ना जाने क्या हुआ कि वो पानी में फिसल जाता है या खुद ही छलांग लगा देता है. ना जाने, आज क्या था जो हर कोई समंद्र की गोद में समा जाना चाहता था. पुलिस वाले उसे पानी से बाहर खींचकर उठा ले जाते हैं. वो नाटा साधू छूटने की मुशक्कत करते हुए चींखे जा रहा था और ‘अपनों’ के पास जाने की बात कहे जा रहा था. इस सब के बाद दोनों दोस्त अपने-अपने घर की और रुख कर लेते हैं.
           कुछ दिनों के बाद चंद्रा और नकिल को वो साधु फिर से दिखाई देता है. साधू के पास पहुंचकर दोनों उसका हालचाल पूछते हैं. साधु उनको पहचान नहीं पाता तो नकिल, साधू को सारा वाक्या सुनाता है. साधू के चेहरे पर पागलों जैसे भाव थे. चंद्रा साधू के पानी में गिरने का कारण पूछता है तो साधू पागलों की तरह गाकर उसे बताता है:             “उस पार है जाना, खोए संसार को है पाना. सपनों की दुनिया है जहां, हम आजाद रहते हैं वहां.”
           चंद्रा को उसका मतलब कुछ ख़ास समझ नहीं आता. उसके गले में दो कीमती पत्थरों की एक माला टंगी हुई थी. एक हरा और एक नीला. चंद्रा उन पत्थरों को गौर से देख रहा था कि साधू एकदम से माला पकड़ते हुए चंद्रा की और आंखें फाड़फाड़कर देखते हुए बोल पड़ता है:
“जाने का है जरिया, रास्ता है दरिया.” बौने की इस हरकत से चंद्रा चौंक जाता है.
           साधु के पागलों जैसे रवैये से नकिल कुछ चिढ़ जाता है और चंद्रा को अपने साथ ले जाता है. कुछ आगे बढ़कर दोनों को उनके ऑफिस में काम करने वाली वो लड़की सामने से आती दिखाई देती है.
“यार! ले, आ गई तेरी वाली. देख कैसे लगी है फ़ोन पर. कल ऑफिस में मैने उसके पर्स में एक राखी देखी थी. बेटा, अपनी कलाई सम्भाल के रखना. कहीं तुझे भईया वाले खूंटे से ना बांध डाले.” नकिल चुटकी लेता है.
“अबे...राखी बांधेगी वो तुझे, साले. अब तुझे कैसे पता कि वो किससे बात कर रही है. अपने घर भी तो बात कर सकती है.” चंद्रा चिढ़कर बोलता है.

“तू पड़ा रह उड़ने के ख्यालों में और जहाज कोई और ही उड़ा कर ले जाएगा, देखना. अच्छा अगर मैने साबित कर दिया तो तू मुझे मेरी पसंद की जगह ले चलेगा.....’डन’?” नकिल चंद्रा से जवाब आने का इंतज़ार करने लगता है. चंद्रा सिर हिलाकर न तो हामी भरता है और ना ही इंकार करता है.
“गुड....चल आज तुझे तेरी ‘मोहिनी’ के मोह जाल से बाहर निकाल ही देता हूं. देख अभी रेश्ना को हमारे बारे में खबर नहीं है. अगर हमें सामने देख वो फ़ोन पर बात करना एकदम से बंद कर देती है तो समझ लेना कि कुछ तो है जो वो हमें बताना नहीं चाहती.” नकिल, रेश्ना की और देखते हुए कहता है.
“ओह, आप दोनों.....ऑफिस जाएंगे या फ़ील्ड पर?” रेश्ना उन दोनों को देखकर अचानक ही अपना फ़ोन एकदम से नीचे कर काट देती है.
“बस आ ही रहे है ऑफिस. एक बाबा जी मिल गए थे. सो उनसे आशीर्वाद लेने के लिए रुक गए थे. आज उन्होंने हमारी आंखें खोल दीं, कब से अंधेरे में जो थे.” नकिल मुस्कुराकर चंद्रा की और देखता है, जैसे वो जीत गया हो.
“बिलकुल, खुद को अंधेरे से निकाल लेने में ही समझदारी है. वैसे किस अंधेरे से निकाला आपको बाबा जी ने.” कहते हुए रेश्ना मुस्कुरा देती है और अपने पर्स से एक चिट्ठी वाला लिफाफा निकालकर दोनों की और करती है. जिसे देख चंद्रा की सांसे थम जाती हैं.
“ये क्या आप लोग...इस चिट्ठी को मेल कर देंगे. वो मुझे कुछ काम था सो....” रेश्ना बड़ी ही मासूमियत से कहती है.
“वो.....” चंद्रा कुछ कह पाता, इससे पहले ही नकिल बीच में टोकते हुए बोल पड़ता है:
“हां...हां क्यों नहीं हम बेकार ही तो खड़े हैं और हमारे चंद्रा ‘भईया’ दूसरों की सेवा करने में प्रसन्न रहते हैं.” नकिल फिर से चुटकी लेता है और रेश्ना ऑफिस के लिए निकल जाती है.
“क्या कहा था. और, तू....किये जा उसे ‘ट्रीट पे ट्रीट’. साले, अब देख ये चिट्ठी सीधे तेरे ही घर पहुंचेगी. अब मेरी ट्रीट कल ऑफिस के बाद.” नकिल फीके पड़े चंद्रा को बाँहों से पकड़कर चलने लगता है जैसे किसी भी वक्त उसे चक्कर आने वाला हो.
“पता तो तेरे ही घर का लिखा होगा इसमें, कमीने....!” दोनों ही मजाक करते हुए बाज़ार की और बढ़ जाते हैं.
           चंद्रा का मन फिर भी मानने को तैयार नहीं था और वो नकिल को ट्रीट देने के लिए मना कर देता है. इस पर नकिल अपनी बात को साबित करने के लिए रेश्ना का पीछा करने की बात करता है. लेकिन चंद्रा इसके लिए मना कर देता है. ऑफिस में अपनी मेज पर किसी चीज़ को ढूंढते हुए चंद्रा गुस्सा हो रहा था. पिछले दिन उसका ‘क्लिप बोर्ड’ ऑफिस में ही छूट गया था. अब आपा खोकर वो चपरासी ‘नवी मेंठा’ को आवाज लगाकर बोर्ड के बारे में पूछता है. चपरासी उसके बारे में कोई भी जानकारी ना होने की बात करता है तो चंद्रा चिढ़कर उसे बोर्ड को ऑफिस में ढूंढने के लिए कहता है. खुद वो नकिल के पास पहुंचकर ऑफिस की लापरवाह व्यवस्था की बात करने लगता है.
“यार तू किसी और चीज़ से परेशान है तो ‘नवी’ काका पर क्यों नाराज़ हो रहा है. वैसे भी लापरवाह तू रहा और बोर्ड ऑफिस में ही रहने दिया.” नकिल शान्ति से समझाता है.
“यंग बॉयज! क्या चल रहा है? चंद्रा इतने ‘सैड’ ‘मूड’ में? क्यों भई. क्या हुआ. अच्छा! समझा! ये रहा तुम्हारा बोर्ड. डस्टबिन में पड़ा मिला था कल मुझे. सो मैने उठाकर रखवा दिया था. ‘यंग मैन’ ये सरकारी कागज हैं. देखना कहीं गुम ही ना कर दो.” कहकर कोट-पैंट पहने, चश्में वाला, पचास साल का वो आदमी, जो उनके वृत का प्रभारी ऑफिसर था,

वहां से चला जाता है.
           शाम को चंद्रा, रेश्ना को चाय के लिए पूछता है तो वो एक बार मना करने के बाद तैयार हो जाती है. दोनों कैंटीन में चाय पीते हुए खूब गप्पे मारते हैं और आदत से मजबूर चंद्रा मजाक करना नहीं भूलता. रेश्ना भी हंसकर उसके मजाक पर प्रतिक्रिया देती रहती है. जब जाने का समय हो गया तो रेश्ना बारिश होने के डर से जल्दी चलने की बात कहती है. इस पर चंद्रा, रेश्ना को हर बार की तरह चिढ़ाने के लिए भगवान को याद करके कहता है कि ‘भगवान करे कि बारिश उसी के सिर पर पड़े’. रेश्ना के साथ घटी घटनाओं की वजह से रेश्ना का ये अंधविश्वास था कि अक्सर चंद्रा की कही बातें उसके साथ सच हो जाती हैं. इसलिए चंद्रा की इस बात का हंसकर विरोध करने के बाद दोनों वहां से चले जाते हैं. कैंटीन का बिल रेश्ना ही चुकाती है. पैसों के मामले में वो ज्यादातर लड़कियों की तरह नहीं थी. सब से इज्जत के साथ, शर्माकर बात करती थी. वो किसी के बारे में न बात करती थी और ना ही सुनना पसंद करती थी. अपने काम से काम रखना ही उसकी आदत थी. बस एक चंद्रा ही था जिसके साथ वो ऑफिस में सबसे ज्यादा घुल-मिलकर बात करती थी. शायद तभी चंद्रा भी उसे मन ही मन पसंद करता था.
           शाम को जिम के बाहर चंद्रा को नकिल मिलता है. चंद्रा की मर्जी ना होने पर भी नकिल उसे अपनी बाइक पर बिठाकर ‘इंडिया गेट’ तक ले आता है. वहां से दोनों अपनी बाइक के साथ ‘फेरी’ पकड़कर ‘मांडवा’ बीच की और चल देते हैं. रास्ते में चंद्रा उसे रेश्ना के साथ कैंटीन में चाय पीने की बात बताता है तो नकिल उसे मुबारकबाद देते हुए सम्भल कर चलने की सलाह भी दे डालता है. ‘मांडवा जेटी’ पर उतरने के बाद दोनों बाइक से एक सुनसान पहाड़ी पर बने ‘भुवनेश्वर’ शिव मन्दिर पहुंच जाते हैं. वहां का नजारा शहर की भीड़ और शोरगुल से दूर बेहद ही खूबसूरत और हरियाली भरा था. मन्दिर के दोनों और खूबसुरत तालाब थे. पहाड़ी के नीचे ‘मंग्रूव’ का विशाल मैदान, जंगल और ‘अम्बा’ नदी साथ-साथ दिखाई दे रहे थे जिनके बीचों-बीच तीन सर्पाकार सहायक नदियां बहती हुईं उस दृश्य को और भी मनोहर बनाए दे रही थीं. मन्दिर से कुछ दूरी पर पेड़ों के नीचे अकेले में एक कुटिया बनी हुई थी. अंदर का नजारा बड़ा ही धार्मिक था. ‘धूप’ की धुंद अपनी खुशबु लिए कुटिया में फैली हुई थी. कुटिया की दीवारों पर देवी-देवताओं की तस्वीरें लगी हुई थीं. चंद्रा, नकिल पर उसे वहां लाने के लिए नाराज़ होता है:
“तुझे पता है इन सब पर मैं विश्वास नहीं करता. फिर मुझे यहां क्यों लाया?” चंद्रा फुस-फुसाता है.
“तेरे लिए नहीं, मैं अपने लिए आया हूं. अब चुप-चाप बैठ.” नकिल भी फुस-फुसाकर कहता है.
“ॐ....ह्म्म?” एक ज्योतिष दिखने वाला आदमी अपने आसन पर बैठ जाता है और इशारे में ही प्रश्न भी पूछ डालता है.
           नकिल धार्मिक लड़का था और आमतोर पर वहां आता रहता था. ज्योतिषाचार्य ‘ज्योतिनाथ आर्य’ एक जाने-माने ज्योतिष थे. नकिल अपनी समस्याओं का हल पाकर चंद्रा के बारे में कुछ सवाल पूछता है, जैसे उसकी शादी, ग्रहों के बारे में आदि. कुंडली साथ ना होने की वजह से ‘ज्योतिषाचार्य’, चंद्रा की हस्त रेखाएं पढ़ने लगता है.       
“हम्म...शादी का योग तो कहा नहीं जा सकता लेकिन कुछ अप्रयाश्चित होने की आशंका है. कष्ट तो है लेकिन सुखद भी है. होनी को कोई नहीं टाल सकता. मानना ना मानना, आपके हाथों में है.” चंद्रा के अविश्वास भरे चेहरे के भाव देखकर ज्योतिषाचार्य उसका हाथ हल्के से झटक कर छोड़ देता है.
           नकिल के जोर देकर पूछने पर ज्योतिनाथ चंद्रा को नीला नीलम पहनने की सलाह देता है. अब दोनों वहां से सीधा जौहरी के पास पहुंच जाते हैं. चंद्रा के मना करने के बावजूद नकिल, चंद्रा के लिए नीले नीलम की अंगूठी बनाने का आर्डर देता है. नीलम को देखकर चंद्रा को उस नाटे साधु के हार में जड़े उन दो पत्थरों की याद आ जाती है. चंद्रा के पूछने पर जौहरी उसे बताता है कि नीलम कई रंगों में मिलता है और इसके कुछ चमत्कारी असर भी बताए जाते हैं. सब

सुन जानकर चंद्रा अपने घर चला जाता है. उस रात चंद्रा को सपने में वो इमारत फिर से दिखाई देती है. लेकिन आज चंद्रा अपने सपने में अपने पसंदीदा देव महादेव को एक नए अवतार में देखता है. अपनी छोटे कद की काया के साथ महादेव चंद्रा की और एकटक देखे जा रहे थे. उनकी अजीब सी मुस्कुराहट के साथ उनकी आंखों में आंसू दिखाई दे रहे थे. तभी चंद्रा को कुछ नुकीली आवाजों का शोर सुनाई देने लगता है जिससे चंद्रा की नींद खुल जाती है.
           अगले दिन इतवार था सो चंद्रा की छुट्टी थी. नाश्ता करने के बाद चंद्रा अपने कमरे की खिड़की से बाहर झांक रहा था. लोग अपने-अपने कामों में में व्यस्त थे और यहां-वहा आ-जा रहे थे. छुट्टी के दिन भी मुंबई कितनी व्यस्त है सोचकर चंद्रा अपनी खिड़की बंद करने ही वाला था कि मकान मालकीन परसी आंटी अंदर आती है:
“ए छोकरा! टुम खिड़की झांक रहा है. अपने कमरा का हालट देखो. इसको अभी साफ़ करने का. आज छुट्टी है मेरा घर एकदम साफ़ सुथरा होने को मांगटा. क्या बोला, सुनटा है के नि टुम?” परसी आंटी, चंद्रा को थोड़ा प्यार से डांटते हुए कहती है.
“जल्दी से साफ़ करो नि बाबा. फेर नीचे आओ, अभी नीचू कमरा का भी टो सफाई करने का है.” बड़बड़ाती हुई परसी आंटी बाहर चली जाती है.
           चंद्रा अपने कमरे को साफ़ करता है. फिर नीचे जाकर परसी आंटी की सफाई में मदद करने लगता है. दोपहर तक लगभग पुरे घर की सफाई हो चुकी थी. अब सिर्फ वो कमरा बचा था जो बंद ही रहा करता था. परसी आंटी के हिसाब से उसमें उसके ससुर और पति के पागलपन के सुबूत रखे हुए थे. चंद्रा को कमरे की सफाई करते हुए कुछ मिलता है, एक बंद थैला. चंद्रा उसे खोलने लगता है तो पारसी आंटी उसे रोक देती है और कहती है कि उसके पति और उसके ससुर के दादा जी के पागलपन का कारण भी यही थैला था. कमरे की सफाई होने के बाद दोनों दोपहर का खाना खाने बैठ जाते हैं. चंद्रा के जोर देकर पूछने पर परसी आंटी उसे बताती है कि उसके ससुर के दादा जी रहस्मयी घटनाओं के शोकीन थे. वे किसी रहस्मयी दुनिया की खोज में लगे हुए थे. अक्सर वे रायगढ़ जिले के, ‘मांडवा’ तट के पास की पहाड़ी पर अपना समय बिताया करते. इस थैले में उनके पागलपन के सुबूत थे.
           परसी आंटी आगे बताती है कि उसके ससुर के दादा दो दिनों के लिए अचानक ही गायब हो थे और दो दिन के बाद वापिस आने पर किन्ही रहस्मई लोगों द्वारा अगवाह किये जाने की बातें करने लगे. धीरे-धीरे लोग उन्हें पागल समझने लगे थे. लेकिन उनका मांडवा तट की उन पहाड़ियों पर जाना बंद नहीं हुआ. एक दिन वे पहाड़ी से नीचे गिरे पाए गए. फिर वो बताती है कि जब उसके पति के हाथों ये थैला लगा तो वे भी अपना सब काम छोड़कर उन पहाड़ियों के चक्कर काटने लगा था. परसी आंटी के विरोध का भी उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ता था. फिर उनकी बिमारी के चलते ही उनका वहां जाना छूटा. बाद में उस बिमारी के चलते उनके पति की मौत भी हो गई थी. ये सब बताते हुए परसी आंटी की आंखों में आंसू भर आए थे. अब वो और ज्यादा भावुक हो जाती है और चंद्रा के आगे हाथ जोड़कर रो पड़ती है:
“बाबा मैं टुम्हारा हाथ जोड़ता है. इस थैला की वजह से हमारा घर का आदमी चला गया. मैं अपना पटि खोया. अब अपना बच्चा नहीं खोना चाहटा. इससे दूर रहना. मैं सुबह ही इसको फेंक देगा.” परसी आंटी चंद्रा के आगे जैसे गिड़गिड़ा रही थी.
           चंद्रा रोती हुई परसी आंटी को हॉल में ले जाकर समझाता है. परसी आंटी का मूड बदले के लिए चंद्रा उन्हें शाम को समंद्र किनारे घुमाने ले जाता है. दोनों ही वहां अपना अच्छा वक्त गुजारते हैं. रात हो गई थी सो दोनों घर पर खाना खाकर सोने की तैयारी करते हैं. चंद्रा अपने कमरे में बिस्तर में घुस जाता है. उसके हाथों में वो रहस्मयी थैला था.

चंद्रा अपने टेबल लैंप को बिस्तर के नजदीक लाता है ताकि परसी आंटी को उसके जागने का पता ना चल सके. अब वो डेढ़ सौ साल पुराने उस थैले को खोलता है. उसमें एक पुरानी, लगभग ना पढ़ी जा सकने वाली डायरी थी और साथ में चांदी का एक लॉकेट भी था. लॉकेट कला का नायाब नमूना लग रहा था, जैसे किसी दुल्हन का हार हो. तीन अर्ध चंद्राकार पत्तियों के बीच में हल्का पीला, नीला, सफेद, और हरा नीलम जड़ा हुआ था. बीच की निचली पत्ती में लाल नीलम लगा हुआ था. थैले में से एक छोटा सा पारदर्शी पत्थर भी निकलता है.
           चंद्रा उस पुरानी डायरी को मुश्किल से ही पढ़ पा रहा था. अक्षर लगभग मिट चुके थे, पन्ने जर्र-जर्र हो चुके थे. जहां-जहां से पढ़ने लायक थे, वहीं से पढ़कर कहानी गढ़नी पड़ रही थी. उस टूटी-फूटी लिखावट से चंद्रा को पता चलता है कि परसी आंटी का ‘रास्तीन दीयोन’ नाम का एक पड़ दादा ससुर था. जब से उसे पता चला था कि मुंबई के पास रायगढ़ जिले के, ‘मांडवा’ क्षेत्र के पास की पहाड़ियों की तलहटी में एक रहस्मयी दुनिया का वास है, वो अपना ज्यादातर समय ‘मांडवा’ पहाड़ों के दूसरी और ‘अम्बा’ नदी के तटों, जंगलों और पहाड़ियों में बिताने लगा था. उसे ये भी पता चलता है कि कैसे पारदर्शी पुखराज की जादुई शक्तियों से किसी भी समानांतर चल रही घटना को देखा जा सकता है, जैसे कि ‘आत्मिक’ या ‘कालिक’, ‘भौतिक’ या ‘अभौतिक’.
           मांडवा की पहाड़ियों से उस पारदर्शी पुखराज के बीचों-बीच देखने पर ‘अम्बा’ नदी की और, घाटी में एक रहस्मयी दुनिया सामने आ जाती थी. जो नंगी आंखों से देखने पर दिखाई नही देती थी. उस दुनिया का नजदीक से साक्षात करने के लिए ‘रास्तीन दीयोन’ उस घाटी के जंगल की खाख छानने लगा था. उस डायरी में थोड़ा आगे, जहां से लिखाई कुछ पढ़ने लायक थी, वहां लिखा था कि ‘रास्तीन’ को उस जंगल में बेहोश कर पकड़ लिया गया था. पुरे दो दिनों तक वो उसी जंगल में अधबेहोशी में बंधा पड़ा रहा. उसके आगे कुछ खराब, ना पढ़े जा सकने लायक लाइनों के बाद लिखा था कि आधी बेहोशी में उसे उसके नजदीक कुछ पतली-नुकीली आवाजों में कुछ लोग आपस में बातें करते सुनाई देते थे. आगे लिखा था कि उन रहस्मयी लोगों की चाल बच्चों के चलने जैसी लग रही थी. मानो, बहुत से बच्चे उस जंगल में अपने छोटे-छोटे कदमों से चल रहे हों.
           अब आगे के कुछ पन्ने खराब थे. अंत तक उस डायरी का बुरा हाल था. कुछ दिखने वाले अक्षरों को जोड़कर भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था. सबसे अंत के पन्नों में उस डायरी में एक अलग हस्तलिपि में लिखा हुआ था. जो शायद परसी आंटी के पति ‘जनेव दीयोन’ की थी. वो लिखावट साफ़ थी जिसमें परसी आंटी के पति ने परसी आंटी के साथ अपनी मांडवा तटों, पहाड़ों और जंगल की यात्राओं का जिक्र किया हुआ था. उन्होंने उस पारदर्शी पुखराज के केंद्र बिंदु से देखने पर एक अदृश्य दुनिया के दिखने की बात को कबूला था. उन्होंने थैले में मौजूद लॉकेट को बनाए जाने का भी जिक्र किया था. अंत में लिखी एक कविता के सहारे मिस्टर ‘दीयोन’ शायद कुछ कहना चाहते थे:
                      “रास्ता है, उस पार का, जिस दुनिया को पाना है.
                      आग का दरिया है, बस डूब के जाना है.”
चंद्रा उस रात डायरी को थैले में बंद करके बिस्तर में घुस जाता है. लेकिन रात काटना उसके लिए मुश्किल था.
           रात को सही ढंग से ना सो पाने के कारण उसका सिर दर्द कर रहा था. चंद्रा पिछली रात की रहस्मयी बातों से बहुत परेशान था. वो कितनी सही थीं, इसका पता लगाने का उसके पास कोई जरिया नहीं था. बस एक लॉकेट, एक अनसुलझी डायरी और एक पत्थर था. उस पारदर्शी पुखराज को देखते हुए चंद्रा को अचानक ही ज्योतिष की कही बातों की याद आ जाती है. अब चंद्रा सीधा पहुंच जाता है ‘ज्योतिनाथ आर्य’ के पास. लेकिन कुटिया का दरवाजा बंद था. शायद वो कहीं गया हुआ था. कुछ देर तक उस पहाड़ी में यहां-वहां देखने के बाद चंद्रा वहां से लौट आता है. आज की

रात भी चंद्रा सो नहीं पाता. इसके लिए सच्चाई का पता लगाना जरूरी था और सचाई का पता लगाने का एक ही रास्ता था, मांडवा हिल्स.
           अगले दिन, शाम के पांच बजे ‘फेरी’ द्वारा अपनी बाइक के साथ, ‘मांडवा’ ‘बीच’ पर फिर से उतरने और आधे घंटे की ‘बाइक राइड’ के बाद चंद्रा ‘मांडवा’ की उन पहाड़ियों की चोटी पर पहुंच जाता है. सूरज डूब चुका था और थोड़ा अंधेरा घिर आया था. पहाड़ी की चोटी पर कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था. हवा कुछ तेज थी और चंद्रा के बालों को उड़ाए दे रही थी. समय ना गंवाते हुए, चंद्रा पुखराज को बाहर निकालता है और उसके बीचों-बीच अपनी नजरें जमाकर समन्द्री किनारे को छानना शुरू कर देता है. लेकिन बहुत देर बाद भी उसे कुछ अजीब दिखाई नहीं देता. इसी तरह वो दूसरी और अपनी नजर दौड़ाता है तो भी उसे धुन्दले नजारे के सिवा कुछ नहीं दिखता. अब हताश चंद्रा को लगने लगा था कि शायद परसी आंटी ही सही थीं. वे दोनों पागल हो चुके थे. सोचते हुए चंद्रा अपना सिर बाईं और वाली घाटी की और घुमाकर पुखराज को अपनी आंखों से हटाते हुए घाटी की और देखने लगता है. उसी पल चंद्रा उस और आंखें फाड़-फाड़कर देखने लगता है क्योंकि उसने वहां कुछ धुंदली रोशनियां देखी थीं. जो अब कहीं नहीं दिख रही थीं.
           कुछ देर तक देखते रहने के बाद वो कांपते हाथों से पुखराज फिर से निकाल लेता है और अपनी दाहिनी आंख बंद करके बाईं आंख से देखने लगता है. उसे जंगल की एक तरफ मैदानी हिस्से में कई धुंदली रोशनियां चमकती दिखाई दे रही थीं. पुखराज के हटाते ही वो रोशनियां गायब हो जाती थीं और पुखराज से वो सुनसान मैदान दमकने लगता था. बहुत देर तक यही चलता रहता है और रात उस चोटी को घेर लेती है. चंद्रा का ये सम्मोहन सियारों की हुंकारों से टूटता है. अब चंद्रा पाता है कि वो उस सुनसान पहाड़ी पर अकेला ही था. बिना रुके वो पहाड़ी से नीचे उतरना शुरू कर देता है और रात के करीब दस बजे अपने मकान पहुंचता है. दरवाजा खोलते ही वो परसी आंटी को अपने सामने खड़ी पता है जिनका मिजाज कुछ ठीक नहीं लग रहा था.
“वो थैला कीधर है? कीधर है..?” परसी आंटी गुस्से में तिलमिलाई, आंखें फाड़-फाड़कर पूछती है.
“इतनी रात को कीधर था..कीधर था? मैं टुमको मना किया था, उस थैला को हाथ मट लगाना. टुम भी अपना मन का ही सुना. अपने मन का ही करना था टो, यहां क्यों आया...निकलो...अभी का अभी निकलो मेरा घर से और वापिस जाओ घर. टुम इधर एक मिनट भी नहीं रुकेगा. वापिस जाओ अपना मदर का पास. हम टुम्हारा मदर नहीं है जो रात-रात को जग कर टुम्हारा फ़िक्र करता रहेगा.” कहते हुए परसी आंटी हॉल के फ़ोन को उठाकर कोई नम्बर घुमाने लगती है.
“आ-आंटी जी..किसे फ़ोन कर रही हैं आप?” चंद्रा हकलाते हुए पूछता है.
“टुम्हारा मां को, जो वहां मजे से सोया है और मैं यहां टुम्हारा पहरा दे रहा है.” परसी आंटी नम्बर डायल करती रहती है.
“प्लीज़ आंटी जी, मैं हाथ जोड़ता हूं, मम्मी को फ़ोन मत लगाइए. उन्हें टेंशन होगी, वो डर जाएंगी. आप मेरी बात तो सुनिए.” चंद्रा परसी आंटी का हाथ पकड़ लेता है.
“टुमको अपना मां का फ़िक्र है और मैं टुमको अपना बच्चा यूं ही कहटा रहटा है. मैं टुम्हारा हाथ तक जोड़ा था, लेकिन टुम...” परसी आंटी की आंखों में धोखा खाए इंसान जैसे भाव थे.
“आप जो समझ रही हैं, वैसा बिल्कुल भी नही है.” चंद्रा फ़ोन काटते हुए कहता है.
            अब चंद्रा परसी आंटी को बहला-फुसलाकर झूठ कहता है कि वो अपने दोस्त नकिल के साथ पार्टी में था. चूंकि, चंद्रा अपने साथ सिर्फ पुखराज और लॉकेट ही ले गया था, वो उसी बंद कमरे से थैला निकालकर परसी आंटी को दिखा देता है. थैले को देखकर परसी आंटी को अपने बर्ताव पर बहुत पछतावा होता है और वो चंद्रा को गले से लगाकर

फूट-फूटकर रो पड़ती है. रात का खाना खाकर चंद्रा सोने चला जाता है. लेकिन उस रात तो चंद्रा की हालत और भी ज्यादा बुरी होती है. उस जंगल में चमकती रोशनियां बार-बार उसके जहन में आ रही थीं. उस रात चंद्रा मुश्किल से ही तीन-चार घंटे सो पाया होगा. अगले दिन ऑफिस के बाद वो उन्ही पहाड़ियों पर पहुंच जाता है. आज चंद्रा के पास उन रोशनियों के स्त्रोतों को देखने का पर्याप्त समय था. पुखराज आंखों के सामने लाते ही उसकी आंखें चौंधिया जाती हैं. उसके सामने घाटी के मैदान में धुंदली सी दिखने वाली एक पूरी बस्ती थी. चंद्रा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. बार-बार देखने पर भी उसे वो शहर दिखाई दे रहा था. काफी देर तक उस शहर को निहारते रहने के बाद चंद्रा इसका रहस्य जाने के लिए ‘ज्योतिनाथ आर्य’ के पास पहुंच जाता है.
           ‘ज्योतिनाथ’ अपने आसन पर बैठा किसी ग्राहक की परेशानी का हल बता रहा था. उसके चले जाने पर चंद्रा सारा मसला उसके सामने रख देता है. ज्योतिनाथ इस बात पर हैरान होकर चंद्रा को किसी अनहोनी की चेतावनी देकर इस सब से दूर रहने की सलाह देता है. लेकिन चंद्रा को इस रहस्य को जानना था. सो ज्योतिनाथ, चंद्रा के लॉकेट को देखकर उसमें पंचतत्वों के समाहित होने की बात करता है. बहुत देर तक अपने पुराने ढीले पड़ चुके ग्रन्थों, उस लॉकेट और पारदर्शी पत्थर को देखते रहने के बाद ‘ज्योतिनाथ’, चंद्रा को उस पारदर्शी पुखराज को लॉकेट के साथ जोड़ने की सलाह देता है. इससे ज्यादा चंद्रा को वहां से कुछ भी पता नहीं चल पाता.
                    अब लॉकेट में सबसे नीचे पारदर्शी पत्थर जुड़वाकर चंद्रा पहाड़ी पर पहुंच जाता है और नीचे उस रहस्यमयी शहर को देखने लगता है. अब चंद्रा उस शहर तक पहुंचना चाहता था. अपने तैयार लॉकेट के साथ चंद्रा उस घाटी तक पहुंचने के लिए पहाड़ी से तट की और उतरना शुरू करता है. चंद्रा बीच-बीच में शहर को देखता हुआ जा रहा था जैसे उसे उसके गायब होने का डर था. चलते हुए उस शहर की और देखते रहने की वजह से चंद्रा को पहाड़ी की ढलान पर कई बार ठोकर भी लगी थी लेकिन उसका शहर को देखते रहना बंद नहीं हुआ था. चंद्रा एक उथली और चौड़ी जगह पर पहुंचकर फिर से उस शहर को देखने लगता है कि उसका पांव किसी चीज़ से टकरा जाता है और वो ढलान पर दस मीटर तक लुढ़क जाता है. वो खाई में गिरने से बाल-बाल बचा था.
           कपड़ों को झाड़ने के बाद वो फिर से चलना शुरू कर देता है. उसे फिर से नीचे देखने की याद आती है. लेकिन इस बार वो रुककर ऐसा करना चाहता था. रुककर वो अपनी जेब में हाथ डालता है तो उसे कुछ नहीं मिलता. अपना पूरा शरीर छान लेने के बाद भी उसे जब कुछ नहीं मिलता तो वो परेशान हो उठता है और अपने पीछे छूटे रास्ते पर देखने के लिए पीछे चल पड़ता है. बहुत देर तक भी उसे वो लॉकेट नहीं मिल पाता. शायद वो खाई में कहीं खो चुका था. चंद्रा थक हारकर वहीं बैठ जाता है. उसे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था कि वो किस तरह इतना अधिक लपरवाह होकर चल रहा था. बहुत देर तक खाई में नजरें दौड़ाते रहने के बाद भी लॉकेट कहीं दिखाई नहीं देता. अब सूरज डूबने लगा था. डूबते सूरज की रौशनी में उसे खाई से कुछ चमकता हुआ दिखाई देता है. बिना सोचे समझे चंद्रा उस चमक का पीछा करने लगता है. फिसलता-सम्भलता, सहारों को पकड़ता हुआ वो नीचे पहुंच जाता है.
           अब लॉकेट उसके पास था. बिना देरी के वो लॉकेट पहनकर उसी घाटी के मैदान की और चलना शुरू करता है कि शायद जादुई लॉकेट की शक्ति उसे इस अदृश्य दुनिया में जाने देगी. लेकिन उस मैदान में पहुंचकर उसे कोई शहर तो क्या कोई इमारत भी दिखाई नहीं देती. शायद कोई और तरीका होगा, सोच चंद्रा मैदान में दोड़ता हुआ प्रवेश करता है लेकिन लॉकेट का जादू नहीं चलता. शायद कोई मन्त्र बोलना पड़ता होगा. लेकिन कौन सा? सो वो ‘ॐ..नमः’ का जाप करता हुआ मैदान में घुसता है तो भी लॉकेट कुछ नहीं कर पाता. घंटों तक इसी प्रयास में चंद्रा अनेक करतब कर जाता है कि शायद लॉकेट किसी पल तो काम करेगा. लेकिन चंद्रा उस मैदान में गुलाटी मारते बन्दर की तरह उछलकूद करता ही रह जाता है और रात घिर आती है.

             
                    अब हर दिन उस रहस्मई शहर तक पहुंचने के प्रयोग करते रहना चंद्रा की सनक बनती जा रही थी. इन सब में चंद्रा इस बात का पूरा ध्यान रखता था कि वो समय रहते परसी आंटी के पास पहुंच जाए. महीने के आखिरी दिन चंद्रा ऑफिस से छुटी के समय रेश्ना से मिलता है. कुछ यहां-वहां की बातें करने के बाद रेश्ना, चंद्रा को कहीं चलकर चाय पीने के लिए पूछती है. लेकिन चंद्रा किसी काम का बहाना बनाकर मना कर देता है. रेश्ना के पूछने पर कि वो कहां जा रहा है, वो बताता है कि वो ‘कही दूर जा रहा है’. वो अपने लॉकेट के साथ फिर से मांडवा हिल्स पहुंच चुका था.
                      आज आसमान में बादल थे और हवा तेज चल रही थी. पुखराज से उस शहर को देखने के बाद से चंद्रा की हालत, ‘हाथ में आया, मुंह न लगाया.’ जैसी हो रही थी. हर ऊट-पटांग कोशिश करते रहने के बाद भी उसे उस अदृश्य शहर में घुसने का कोई रास्ता नहीं मिल पा रहा था. पुखराज, लॉकेट में एक चांदी की प्लेट में जड़ा होने की वजह से चंद्रा अब उस शहर को भी देख नहीं पा रहा था. थक हार कर वो नदी के किनारे नुकीली चट्टानों की और चला जाता है. उन चट्टानों पर ‘काई’ जमा थी जिसकी वजह से वहां फिसलन थी. अब इसी उधेड़-बुन में चंद्रा उन चट्टानों पर घंटों बैठा रहता है कि उसने जो महसूस किया था, सब पागलपन था, नजरों का धोखा था, ‘ज्योतिनाथ’ की बातें बकवास थीं. ‘दीयोन’ परिवार ने इस धोखे के लिए अपने दो मुखियों को खोया था. अब ये पागलपन उसे भी अपनी चपेट में लिए जा रहा था. वो अपना सब काम छोड़कर इस सब के पीछे पड़ गया था. इस पागलपन की वजह से उसने रेश्ना के साथ चाय पर चलने के लिए मना तक कर दिया था. क्या गधा था वो. चंद्रा खुद को इस बेवकूफी के लिए कौसने लगा था.
                     आसमान की और देखने पर पानी की कुछ बूँदें चंद्रा की आंखों पर पड़ती हैं जिससे वो बंद हो जाती हैं. हल्की बारिश शुरू हो गई थी. चंद्रा अभी भी वहीं बैठा हुआ था. थोड़ी देर के बाद चंद्रा आसमान की और देखता है तो बारिश की लगातार गिरती बूंदें उसकी आंखों को खुलने ही नहीं देती हैं. अब शायद चलने का समय हो गया था. सो चंद्रा वहां से चल पड़ने का फैसला लेता है और धीरे-धीरे उन फिसलन भरी चट्टानों पर खड़ा होने लगता है. तभी उसके दिमाग में लॉकेट का ख्याल फिर से आ जाता है. अपनी जेब तलाशता हुआ वो जैसे ही मुड़ने लगता है कि उसका पांव ‘काई’ पर फिसल जाता है और वो ...‘छपाक’... से समंद्र में जा गिरता है. चंद्रा को तैरना नहीं आता था सो वो समंद्र में गौते खाने लगता है और फिर कुछ फीट नीचे लहरों में खिंच जाता है. कुछ ही देर की मुशक्कत में चंद्रा बेसुध सा हो गया था. कुछ ही पलों में एक तेज लहर चंद्रा को फिर से सतह पर ले आती है. सतह पर पहुंचकर वो एक लम्बी सांस भरता है.
                     बाहर मौसम काफी बिगड़ चुका था और नदी की तेज लहरों में चंद्रा किसी तिनके की तरह झूल रहा था. तेज तूफानी हवाओं में आंखें खोल पाना और सांस लेना भी दूभर हो रहा था. तूफानी लहरों और हवाओं का शोर कान को फाड़ देने वाला था. बिना तैराकी के इस तूफानी नदी में टिक पाना मुश्किल था. चंद्रा बार-बार गोते खा रहा था. उसे अपना अंत नजदीक लग रहा था कि उसके सामने एक मोटा रस्सा गिरता है और एक आवाज़ कुछ कहती है. चंद्रा को कुछ समझ तो नहीं आता लेकिन रस्सा उसी के लिए फैंका गया था. चंद्रा पूरा जोर लगाकर रस्से को चढ़ने लगता है. आज उसके जिम में की हुई सारी कसरत निकलकर बाहर आने वाली थी. रस्से पर चढ़ते हुए आज उसे अपने भारी होने का एहसास हो रहा था और ये अफ़सोस भी कि अगर जिम में उसने अपनी मसल्स की जगह अपने पेट पर काम किया होता तो शायद ये सब इतना मुश्किल ना होता. चंद्रा खुद तो कुछ इंच ही चढ़ पाया होगा, असल में रस्से से बंधे चंद्रा को एक बड़ी सी नांव के ऊपर खींचा जा रहा था. कुछ ही देर में चंद्रा को नांव के डेक के पास तक खीँच लिया जाता है.
           चंद्रा अभी भी रस्से के ही सहारे लटका था. उसे तूफानी अंधेरे में कुछ भी नजर नहीं आ रहा था. उसे लहरों और हवाओं के शोर के बीच कुछ घसिटने की आवाज़ सी सुनाई देती है. कुछ ही पलों में उसे ये एहसास होता है कि ऊपर डेक पर खड़ा कोई उसे देख रहा था. तभी चंद्रा को कुछ सुनाई देता है: “अरे, बेवकूफों ये तो ‘बाहरी’ है. तुमने इसे खीँच लिया?” आवाज़ कुछ अस्पष्ट और अजीब सी थी. चंद्रा असहाय सा आवाज़ की और देखे जा रहा था. वो इस बेरहम तूफ़ान में यूं लटका हुआ था और वे लोग आपस में बातें कर रहे थे, सोचकर चंद्रा को गुस्सा आ रहा था. तभी वो

आदमी कुछ निकालता है. तभी तूफानी बिजली गरजती है और उसकी चमक में उसे एक अस्पष्ट सी आकृति, चमकती हुई तलवार अपने ऊपर उठाए हुए दिखती है, जो बस अब उसके ऊपर गिरने ही वाली थी. चंद्रा तलवार को अपने ऊपर आता देख एकदम से पीछे हटने की कोशिश करता है जिससे वो एक ही झटके में फिर से नदी में जा गिरता है. रस्सा अभी भी उसके हाथ में था जो अब कट चुका था जिसे उस अनजान आदमी ने काट दिया था.
           लेकिन एक तलवार धारी एक नांव पर क्या कर रहा था? सोचता हुआ चंद्रा अब फिर से लहरों के हवाले था. हाथ-पांव मारते रहने की वजह से वो कुछ देर तक अपने आप को सतह पर बनाए रख पा रहा था. लहरों से चले कुछ देर के संघर्ष के बाद चंद्रा के पांव अचानक ही नदी की तली को छूने लगते हैं. वो किसी रेतीले किनारे पर आ पहुंचा था. ताकत बटोर कर चंद्रा उस किनारे का जायजा लेता है. पेड़ों के अंधेरे के सिवा उसे वहां कुछ भी दिखाई नहीं देता है. तभी उसे चमकती बिजली के साथ ही एक नांव उसी किनारे की और आती हुई दिखाई देती है. शायद ये वही नांव थी जिसमें वो तलवारधारी समंदरी लुटेरे हो सकते थे. चंद्रा को उनके हाथों में पड़ने से ज्यादा अच्छा पानी में वापिस जाना लग रहा था. एक बड़े से लट्ठे को लेकर चंद्रा लहरों पर फिर से सवार हो जाता है. अब उसके पास एक मजबूत रस्सा और एक लट्ठा था जिससे वो खुद को बांध लेता है ताकि वो फिर से नदी में गोते ना खाता फिरे. समंद्र से आती कई तूफानी लहरों से टकराता उसका लट्ठा उसे कहां ले आया था उसे कुछ भी पता नहीं था.
           वो फिर से एक रेतीले किनारे पर था और बेहोश पड़ा लहरों के थपेड़े खा रहा था. चंद्रा को उस रेतीले किनारे पर गिरे हुए पूरी रात बीत गई थी. सिर से पांव तक वो रेत में लिपटा हुआ था. लहरों का स्पर्श पाकर उसे होश आती है. आंखें धीरे-धीरे खुल और बंद तो हो रही थीं लेकिन बाकी शरीर में हरकत ना थी. धीरे-धीरे शक्ति के लोट आने का इंतज़ार करने के बाद वो उठ खड़ा होता है और लड़खड़ाता हुआ पास के जंगल की और चलने लगता है. अभी तक रात का अंधेरा थोड़ा बाकी था. अब उसे दूर जंगल से आ रही रौशनीयां भी दिखाई देने लगी थीं. शायद वो लहरों में बहकर पास के किसी शहर तक पहुंच गया था. तभी उसे एक और जातीं रेल की पटरी दिखाई देती है. अब वो सीधा रास्ता ना लेकर उस पटरी का पीछा करने लगता है. बहुत देर तक चलते रहने के बाद उसे एहसास हो रहा था मानो ये पटरी उसे शहर से दूर ले जा रहीं थी.
           गिरते-पड़ते हुए चंद्रा अब पेड़ों की छाया से दूर दिखने वाली रोशनियों की और चलता जाता है. शहर की रोशनियां मानो उसे और ज्यादा पास आने के लिए कह रहीं थीं. अपने होंठों को जीभ से गीला कर वो शहर की और चल देता है.
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MONTH’2wo’ SEPTEMBER
एक नई दुनिया से मुलाकात

                       अगस्त महीना खत्म हो चुका था. आज सितम्बर महीने की पहली तारीख थी. अपनी धुंदली आंखों के सहारे वो उन रौशनियों के और पास आता जा रहा था जो अब सुबह की हल्की रौशनी में बंद हो चली थीं. लेकिन अब चंद्रा को पता था कि किस और जाना है. ख़ुश होने के लिए भी ताकत नहीं थी. अभी तक सूर्य देवता के दर्शन नहीं हुए थे सो उसे ठंड लग रही थी जिससे उसका पूरा शरीर कांप रहा था. नजर भी कुछ ख़ास साथ नहीं दे रही थी. कुछ और देर तक अपनी फूलती साँसों के सहारे चलते रहने के बाद उसे अपनी धुंधली पड़ चुकी नजर से एक हरी छत के नीचे काली परछाइयां दिखती हैं. कोई भी अंदाजा न लगाता हुआ वो उस और बढ़ता रहता है. पटरियां उसका साथ छोड़ चुकी थीं. अब वो हरी छत के नीचे परछाइयों में था. ये घना जंगल था जो खामोशी के साथ ‘टर्र-टर्र’ और ‘टरीँ-टरीँ’ का संगीत निकाल रहा था.
           बिना कुछ सोचे-समझे वो उस घने जंगल में घुसता जाता है. वैसे भी सोचने-समझने के लिए उसके पास होश बाकी थे भी नहीं. वह तो केवल किन्ही सुरक्षित हाथों में पहुंचना चाहता था, बस. तभी उसे धुंदली नजर से एक बच्चा चिल्लाते हुए वहां से भागता नजर आता है. उसकी आवाज़ उसे साफ़ तो नहीं सुनाई देती लेकिन वो कुछ कह रहा था. एक बच्चे के जंगल में घूमने को लेकर भी चंद्रा हैरान नहीं हो पा रहा था. वो उसकी चिल्लाहट का पीछा करता हुआ आगे बढ़ता रहता है. चिल्लाहट तो खत्म हो चुकी थी लेकिन जंगल नहीं. चंद्रा की बिगड़ी हालत इस सफर को और भी लम्बा और मुश्किल बना रही थी.
                 अब कुछ और देर तक चलते रहने के बाद चंद्रा को एक लम्बी दिवार नजर आने लगती है. बेहोश होने का जोखिम अभी भी नहीं उठाया जा सकता था. वो दिवार अभी भी दूर थी जो नजदीक जाने पर और ज्यादा लम्बी और नीचे होती जा रही थी. नीचे....!?. चंद्रा की आंखें जैसे कैमरे की तरह फोकस करना चाहती थीं, पर नहीं कर पा रही थीं. दिवार ऊंची होती जानी चाहिए थी कि, नीची? चंद्रा दिवार की और बढ़ता ही जाता है. अब दिवार उसके पास आ चुकी थी जो उसके कंधों तक ही पहुंच रही थी. कंधों तक ऊँची उस दिवार को लांघने की हिम्मत ना करते हुए चंद्रा दिवार के साथ-साथ चलने लगता है. थोड़ी और देर तक चलते रहने के बाद वो दिवार को लांघने का ही फैसला कर लेता है. दिवार को पार करने के लिए किसी बिल्ली की तरह खम्बे को नोचने जैसी कुछ हरकत करने के बाद वो एकाएक ही दिवार के अंदर जा गिरता है. फिर से उठकर वह दिवार के अंदर शहर की और चल देता है.
           थोड़ी ही देर में उसे कुछ दूरी पर कुछ बच्चे आपस में खेलते हुए दिखाई देते हैं. उनसे कुछ बड़े बच्चे यहां-वहां टहल रहे थे. तभी एकाएक शोर मचाते हुए सभी बच्चे वहां से गायब हो जाते हैं. चंद्रा अपना पूरा जोर लगाकर उन बच्चों को पास बुलाने के लिए चिल्लाता है. लेकिन उसकी वो चींख महज ‘मेमने’ की मिमियाने जैसी आवाज़ भर थी. अब वहां कोई भी नहीं था. बच्चे डर कर भाग चुके थे या अपने माता-पिता या टीचर्स को बुलाने गए थे. अब चंद्रा की धुन्धलाहट हल्के से अंधेरे में बदलती जा रही थी. तभी बहुत से बच्चे उसे अपनी तरफ दोड़कर आते हुए दिखाई देते हैं. चंद्रा उनकी दिशा में अपना दांया हाथ उठाता है और ना जाने किस चीज़ से लड़खड़ाकर गिर जाता है. अब उसे कुछ भी दिखाई देना बंद सा हो गया था. मरते हुए सांप की तरह धीरे-धीरे लोटते हुए वो खड़ा होने की नाकाम कोशिश करने लगता है.
“ये कौन है?”,  “एक और..”,  “कहीं ये वहां से तो नहीं आ गया?”,  “प्रेसिडेंट साहब, आप पता तो करवाइए.”,

“कहीं ये बाहरी.....?”,  “नहीं...ऐसा कैसे हो सकता है?”,  “अरे-अरे....वो फिर से उठने की कोशिश कर रहा है.”,        ”अरे, हटो महाराज आ रहे है.”,  “प्रेसिडेंट साहब, पहचान कर ली गई है क्या?”,  “महाराज, पहनावे से तो बाहरी ही लग रहा है. और हालत देखकर लगता है कि समंद्र या नदी के रास्ते से यहां तक पहुंचा होगा.”
           ये शोरगुल इतना अधिक था कि चंद्रा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. दिखाई तो कुछ दे नहीं रहा था लेकिन जो कुछ भी वो सुन पा रहा था वो बच्चों का शोरगुल तो कतई नहीं था. आवाजें अजीब सी नुकीली और पतली थीं. लेकिन जो कुछ भी था, अब वो शायद सुरक्षित था.
           चंद्रा को शायद पता भी नहीं चला होगा कि कितना समय बीत गया था, जब उसकी आंखें खुलीं थीं. अब उसे सब कुछ सामान्य दिखाई दे रहा था. शायद उसे बचा लिया गया था. वो लेटा हुआ था और शायद उसका ‘चेक-अप’ चल रहा था. लेकिन किसके द्वारा? तभी ठंडी हवा के थपेड़ों से चंद्रा को यह एहसास होता है कि वो खुले आसमान के नीचे किसी जंगल में पड़ा है. जंगल के बारे में सोचते ही उसे मानो झटका लगा हो और वो एकाएक ही झटके से उठने की कोशिश करता है. लेकिन वो जमीन पर ही चिपका रह जाता है. झटका लेने की वजह से उसकी पूरी रीढ़ में दर्द उठने लगा था. उसका माथा किसी पट्टे से जमीन से बाँधा गया था. उसी तरह कई चौड़े पट्टों की मदद से उसका पूरा शरीर बांध दिया गया था. उसकी उंगलियाँ तक लौहे की रिंगों की मदद से जमीन से बांध दी गईं थीं. इस अधमरे शरीर से इन बंधनों को खोल पाना आसान नहीं था. कौन थे जिन्होंने उसे इस हालत में भी बांध दिया होगा. ये काम बच्चों का तो नहीं हो सकता.
           अब इस सुनसान जंगल में वो इस हालत में सुरक्षित तो कतई ना था. यहां-वहां ताकने पर भी उसे कोई नहीं दिखाई देता है  जिससे वो मदद मांग सकता था. तभी उसके कानों में पतली और नुकीली फुसफुसाहट फिर से पड़ने लगती है. दो लोग आपस में बातें कर रहे थे.
“यार, कहां इस दैत्य के साथ हमें यहां फंसा दिया. उन दोनों की ड्यूटी लगानी चाहिए थी इसके साथ.”
“अरे, होना तो ऐसा ही चाहिए था. लेकिन बाहरी मुसीबतों को रोकना फ़ौज का काम है. होम गौर्ड्स का नहीं...” इस पर दोनों ठहाके मारने लगते हैं. “अरे यार उन दोनों शाही नमूनों का वो मशहूर किस्सा क्या है?” फिर से आवाज़ आती है.
“कोन सा.....? अच्छा वो......डोंजा, घोंजा गए बाज़ार, घोंजा गिर गया पुठों के भार, डोंजा बोला देखा बाज़ार.” फिर से ठहाका गूंज उठता है.
“श...श..श. ये शायद होश में आ रहा है.” चंद्रा के कर्राहने से दोनों खामोश हो जाते हैं.
           चंद्रा को उनकी बातें ज्यादा मजेदार नहीं लग रही थीं. एक तो पिछले दिन से उसके साथ कुछ भी अच्छा नहीं हुआ था और ऊपर से अब उसकी रीढ़ भी दुःख रही थी. कौन थे ये पतली और नुकीली आवाज़ वाले जो शायद उसकी पहरेदारी कर रहे थे.
“उसके पास मत जाना, कहीं तुम्हे अपने साथ ही ना लेटा ले.” यहां-वहां ताकते चंद्रा के कानों में आवाज़ पड़ती है.
           तभी चंद्रा को अपने ऊपर एक चेहरा नजर आता है. ये एक आदमी था जिसका रूप एक बौने इंसान जैसा था. बौना..? क्या बौना उसकी पहरेदारी कर रहा था या थे? कि तभी वो बौना आदमी दूसरे वाले को भी पास आने का इशारा करता है. तभी चंद्रा को दूसरा चेहरा दिखाई देता है. यह भी एक बौना ही था जिसने अफसर वाली टोपी पहनी हुई थी. दोनों ही फ़ौज की वर्दी पहने हुए थे.

“लो तुमने तो इसे जगा दिया. अब बताओ, लोरी क्या तुम सुनाओगे इसे.” दूसरा वाला मजाक करता है. तभी चंद्रा दर्द से कराहने लगता है.
“अरे साहब ये तो गुर्रा रहा है.” डरते हुए पहले वाला बौना पीछे हट जाता है.
“गुर्रा नहीं, मुर्ख ये कराह रहा है.” दूसरा वाला फिर से मजाकिया अंदाज़ में कहता है.
           अब दोनों ही चंद्रा के होश में आने की खबर किसी महल को देने की बात करते हैं. बातें तो वो चंद्रा की समझ में आने वाली ही कर रहे थे. कौन सा महल और ये बौने यहां क्या कर रहे थे. कहीं उसका लॉकेट काम तो नहीं कर गया था. वो उनकी दुनिया में तो नहीं आ गया था, जिनके पीछे वो करीब एक महीने से पड़ा हुआ था. क्या उसकी कड़ी मेहनत रंग लायी थी? अगर ऐसा था तो उसे खुश होना चाहिए था. लेकिन उसे पहले इन बंधनों से खुद को छुड़ाना था और ये पता लगाना था कि बात असल में है क्या? वो पट्टे से बंधे अपने सिर को बाईं और घुमाता है तो उसे एक और तीसरा बौना फ़ौज की वर्दी पहने हुए दिखाई देता है जो एक पेड़ के सहारे सो रहा था. अब वहां तीन-तीन बौने थे. कहीं उसकी सोच सच तो नहीं होने जा रही थी.
           तभी चंद्रा देखता है कि सोया हुआ बौना पेड़ के सहारे से फिसलता हुआ नीचे जमीन की और गिरने लगता है. कि तभी अचानक से ही एक तीर उसके गिरते सिर के ठीक पीछे आकर पेड़ के तने में घुस जाता है जो उसके सिर को सहारा देता हुआ उसे नीचे फिसलने से रोक देता है. इससे अनजान वो बौना सोते हुए खर्राटे भरता रहता है. अगले खर्राटे के लिए वो जैसे ही अपने होठों को खोलता है उसके होंठों के बीच में एक और तीर आकर लगता है. जो उसके इस बार के खर्राटे को बीच में ही रोक देता है और मुंह से निकली ‘फुस्स’ की आवाज़ के साथ ही उस फौजी बौने की नींद खुल जाती है. खुद को इस हालत में देख बौना हड़बड़ाकर उठने की कोशिश करता है लेकिन उन तीरों के कारण उठ नहीं पाता और मुंह से शोर करने लगता है.
           चंद्रा, उन दोनों फौजियों को अपनी आंखों से उस सोए हुए फौजी की और देखने का इशारा करता है. उस और मुड़ते ही दोनों फौजियों के पांव जैसे तांडव करने लगते हैं. आगे-पीछे, दाएँ-बाएं घूमने के बाद वो दोनों पेड़ों के पास रखी अपनी बन्दूकों की और बढ़ते हैं जो उनके आकारों की ही तरह बोनी थीं. अफसर फौजी जैसे ही पेड़ के सहारे लगी हुई बंदूक को उठाने लगता है, एक और तीर बंदूक के पिस्टन वाले रिंग को भेदता हुआ पेड़ के तने में जा घुसता है. अब बंदूक पेड़ के तने के साथ फंस चुकी थी और अफसर उसे निकालने के चक्कर में. दूसरा फौजी जैसे ही अपनी बंदूक उठाकर निशाना साधता है एक पत्थर बंधा हुआ तीर उसके सिर में आकर लगता है जिससे वो बेहोश हो जाता है.
           अगले ही पल घोड़े की थापों के साथ ही एक और बौना, जिसने कुछ चमकदार से दिखने वाले कपड़े पहने हुए थे, आ पहुंचता है. दिखने में नौजवान, महत्वाकांशी ये बौना मौके को तुरंत भांपकर बंदूक को उठाकर पेड़ों की दिशा में गोलियां दागने लगता है. कई तीर उसकी अगल-बगल से निकल जाते हैं. अफसर फौजी उसे राजकुमार पुकारता हुआ वहां से भाग जाने के लिए कहता है. लेकिन वो राजकुमार उसकी एक भी नहीं सुनता है और चंद्रा के पास खड़ा होकर गोलियां दागता रहता है. चंद्रा कुछ सोचता है और अपने बाएं हाथ को छुड़ा पाने में सफल हो जाता है. उसका ये हाथ राजकुमार के पैजामे तक ही पहुंच रहा था. सो चंद्रा तीरों की अगली बोछार आने से पहले उसका पैजामा नीचे खीँच लेता है जिससे उसका पैजामा नीचे गिर जाता है. एकाएक ही राजकुमार उस पैजामे को उठाने के लिए झुक जाता है. तीरों की एक मोटी बोछार उसके ऊपर से गुजर जाती है. राजकुमार, इस बात से अनजान कि उसका पैजामा कैसे फिसला था, फिर से गोलियां दागने लगता है. अगली बौछार से पहले चंद्रा उसका पैजामा फिर से खींचता है और तीर फिर से झुके हुए राजकुमार के ऊपर से निकल जाते हैं.


           ये सब तब तक चलता रहता है जब तक कि चंद्रा अपने बंधनों को ढीला नहीं कर लेता है. ढीले पड़े बंधनों से खुद को निकालकर चंद्रा, राजकुमार को उठाकर अपने कंधे पर रख लेता है. फिर उस फौजी अफसर को भी दूसरी तरफ बिठाकर, तीरों के बीच फंसे हुए और बेहोश फौजी को अपनी बगलों में पकड़कर चंद्रा जितनी तेज हो सकता था जंगल से बाहर की और दोड़ लगा देता है. चारों खामोशी से उसके साथ चिपके रहते हैं. कोई भी बीच रास्ते में बात नहीं करता. शायद वे बौने ये समझ नहीं पा रहे थे कि वे जंगल से बच भागने की ख़ुशी मनाएं या फिर चंद्रा की बाहों में दबे होने का गम. चंद्रा अब भागते-भागते थककर धीमा पड़ने लगा था. कुछ देर के बाद वे शहर की दीवारों के पास पहुंच जाते हैं. सामने एक भव्य गेट था जो चंद्रा के सिर से लगभग दो फीट ऊपर तक था. चंद्रा गेट खोलने की पुकारें लगाता हुआ गेट की और बढ़ने लगता है. ना जाने किस चीज़ से लड़खड़ाकर वो और सभी बौने जमीन पर गिर जाते हैं. मौका सम्भाल सभी बौने उठकर गेट के अंदर की और भाग जाते हैं.
           हांफे हुए चंद्रा को उठने में कुछ वक्त लग जाता है. तभी गेट के अंदर से रंग-बिरंगे बौनों की एक लम्बी-चौड़ी फ़ौज निकलती है. चंद्रा राहत की सांस लेता है कि अब सभी सुरक्षित थे. लेकिन तभी सभी बौने उसे अलग-अलग जगहों से पकड़कर गिरा देते हैं और फिर से बांधना शुरू कर देते हैं. उसे हाथों से बांधकर फिर से जंगल की और घसीटना शुरू कर दिया जाता है. चंद्रा को ये सब बड़ा ही अजीब लगता है. उन बौनों को बचाने का इनाम ये था, उसे इस तरह घसीटा जाना. अब चंद्रा के फटे हुए कपड़ों के बीच में से फट पड़ी चमड़ी से खून निकलना शुरू हो गया था. चंद्रा दर्द के मारे चिल्लाने लगा था और खुद को छोड़े जाने के लिए चिल्ला रहा था. चंद्रा के चिल्लाने का उनपर कोई भी असर नहीं पड़ता है. वे सब तो बस शोर करते हुए चंद्रा को घसीटे जा रहे थे. कुछ दूरी तक घसीटे जाने के बाद एक तेज नुकीली बूढ़ी आवाज उन सब को रुकने का आदेश देती है. इस आदेश को सुनकर सभी रुक जाते हैं.
           सामने एक सफेद चमकती पौशाक में मोटी-लम्बी सफेद दाढ़ी वाला एक वृद्ध खड़ा था जो देखने में किसी राजा से कम नहीं लग रहा था. उसके साथ और पीछे कई बौने जमा थे. उसके आगे आते ही सभी बौने बड़े ही आदर के साथ उसका स्वागत करते हैं. वो राजा, चंद्रा को छोड़ देने का हुकुम सुनाता है. इस पर एक तल्वारधारी बौना जो कि अपने ‘राजस्थानी’ पहनावे से राजा का कोई अफसर लग रहा था, सामने आता है और राजा के आदेश पर हैरानी जताते हुए, एक ‘बाहरी’ को आज़ाद ना करने की सिफारिश करता है. राजा बड़े ही शायरान अंदाज़ में सब को चंद्रा द्वारा उसके बेटे और सभी फौजियों को बचाए जाने का किस्सा सुनाता है.
                         “माना है ये बाहरी, प्राण बचाने के लिए हैं, हम इनके आभारी.”
                             “सजा के नहीं......हैं हकदार, ये आवभगत के हमारी.”
           ये सुनकर सभी बौनों को मानो कोई बहुत बड़ा सदमा लगा हो. जैसे ये कोई अनुपेक्षित काम था जो हुआ था. एक ‘बाहरी’ ने उनकी मदद की थी!? वैसे भी जिस तरह से सभी बौने एक दूसरे को धकेलते हुए, आगे आकर, एक-दुसरे के ऊपर चढ़कर चंद्रा को देख रहे थे उससे तो यही लग रहा था जैसे उन्होंने कोई नया जानवर देख लिया हो. अब थोड़ी देर तक चली इस बातचीत के बाद चंद्रा को आज़ाद कर दिया जाता है. चंद्रा से माफ़ी मांगते हुए राजा अपना नाम ‘भ्योस सिंह लिल्लीया’ बताता है और चंद्रा को महल चलने के लिए कहता है ताकि उसकी हालत में कुछ सुधार लाए जा सकें. चंद्रा को इससे ज्यादा और कुछ चाहिए भी न था. वो तुरंत तैयार हो जाता है. राजा उसे अपने रथ की और ले जाता है जो देखने में बड़ा ही अनोखा और सुंदर लग रहा था. रथ के आगे चार छोटे कद के घोड़े बंधे हुए थे. उन घोड़ों की उंचाई तीन फीट से ज्यादा नहीं होगी लेकिन ये बौने से घोड़े उस रथ को खींचने के लिए बेताब लग रहे थे. लेकिन इन बौने घोड़ों की ही तरह ये रथ भी बौना था. रथ मुश्किल से ही चंद्रा कंधों तक पहुंच रहा था. राजा तो उसमें आराम से घुस जाता है लेकिन चंद्रा की लाख कोशिशों के बावजूद भी वो रथ में नहीं समा पाता.

           अब चंद्रा पैदल ही रथ के पीछे लंगड़ाने लगता है. एक-एक कदम उसे और ज्यादा कमजोर बना रहा था. कुछ कदम चलकर वो रुक जाता और फिर से लंगड़ाने लगता. उसके साथ-साथ कई बौने चल रहे थे और उसे घूरे जा रहे थे. मानो उसपर निगरानी रख रहे हों. अब वही अफसर घोड़े पर सवार था जो चंद्रा को आज़ाद न किये जाने की सिफारिश कर रहा था. वो राजा के अनुसार एक सेनापति था. सभी उसे ‘राणा जी’ बुला रहे थे. चंद्रा काफिले के साथ बने रहने की पूरी कोशिश कर रहा था लेकिन गेट से ठीक कुछ दुरी पर चंद्रा हांफकर लड़खड़ा जाता है. अब शायद उसके लिए चल पाना असम्भव हो गया था. वो लाचारगी के साथ रथ की और देखता रहता है.
“ऐ! भाया, जल्दी-जल्दी पैरों णे हिलाओ. एठे थारी परेड णा चाली से, जे आराम-आराम णे, रुक-रुक के चाले हो.” सेनापति ‘राणा जी’ मुंह चिढ़ाकर ताना मारता है.
           चंद्रा के पास इस बात पर चिढ़ने की भी हिम्मत नहीं थी. वो अब खुद को जमीन पर घसीटने लगता है. तभी उसे गेट खुलता हुआ नजर आता है जिसमें से बौने घोड़ों की एक फ़ौज धूल उड़ाती हुई निकलती है. उनके पीछे आदम कद का एक ठेला बंधा हुआ था. उस ठेले को खींचते हुए घोड़े चंद्रा को मानो किसी फरिश्ते के रथ को खींचते हुए से लगते हैं. चंद्रा उस ठेले के वहां पहुंचने का मकसद समझ चुका था. अब उस ठेले पर सवार चंद्रा गेट के अंदर पहली बार दाखिल होता है जो उसे एक नई दुनिया में घुसने जैसा एहसास कराता है.
           अंदर सच में एक नई दुनिया बसी हुई थी. अंदर पूरा शहर बसा हुआ था जिसकी इमारतें और घर रंग-बिरंगे, अनोखी रूपसज्जा वाले थे. सभी घर कम ऊंचाई और कम चौड़ाई वाले बने हुए थे जिनकी छतें ठेले पर बैठे हुए चंद्रा के सिर से दो-तीन फीट तक ही ऊंची थीं. कुछ घर गुड्डे-गुड़ियों के घरों जैसे प्यारे थे, तो कुछ घर कद्दू, पेड़ के तनों, गाड़ियों, पर्स, लालटेन आदि जैसे दिखने वाले थे. जिन इमारतों की मंजिले ज्यादा थीं वे किसी मुंह के बल गिरे हुए हवाई जहाज और ट्रेन के डिब्बों जैसी थीं जिनकी नीचे से ऊपर तक जाती खिडकीयां, अलग-अलग मंजिलों की खिडकीयां थीं. ये शहर किसी बच्चे की कल्पना से बनाया हुआ लग रहा था.
           चंद्रा के लिए वक्त तो जैसे थम सा गया था. उसे ये सब ‘स्लो मोशन’ में होता हुआ दिखाई दे रहा था. बौने कद के लोग जिन्होंने अजीबों-गरीब रंगबिरंगे कपड़े पहने हुए थे, सड़कों, गलियों और घरों की खिड़कीयों से छिप-छिपकर चंद्रा के धीरे-धीरे बढ़ते हुए काफिले को देख रहे थे. उस ठेले पर बैठे हुए चंद्रा के लिए समय जैसे थम सा गया था. सब बौनों की घूरती हुई निगाहें चंद्रा से मानो नफरत कर रही हों. बच्चों को थामे हुईं माताएं अपने बच्चों को चंद्रा की नजरों से जैसे छिपाने की कोशिश कर रहीं थीं.
           अब ये लम्बा चौड़ा काफिला एक बड़ी सफेद इमारत के पास पहुंच जाता है. यह पहली बड़े आकार की इमारत थी जो चंद्रा ने इस रहस्मयी दुनिया में घुसने के बाद देखी थी. यहां से एक पैंट-कोट वाला बौना, जिसे सभी प्रेसिडेंट बुला रहे थे, काफिले से विदा लेता है. काफिला इस भव्य सफेद इमारत से आगे बढ़कर एक सुंदर और मनोरम बगीचे में पहुंच जाता है. बगीचे से नजर हटाते ही चंद्रा को सामने एक और विशाल इमारत दिखती है. ये पहली वाली से भी बड़ी थी जो शायद महल ही था. यह इमारत बाहर से अंदर की और छोटी से बड़ी घुमावदार मीनारों पर बने हुए पानरुपी छोटे-बड़े गुम्बदों से सज रही थी. इन गुम्बदों पर छोटे-छोटे नोकदार पिरामिड बने हुए थे जो गुम्बदों को और भी रोचक बना रहे थे. सामने से एक लम्बी सीढ़ियों की श्रृंखला उतर रही थी. महल रोचक रंगों का एक भव्य मेल लग रहा था. इमारत को देखकर चंद्रा के दिमाग में वो फटी-पुरानी हाथ से बनी तस्वीर सामने आ जाती है. लेकिन उस तस्वीर को उस जंगल में किसने और क्यों गिराया होगा? अब चंद्रा, नकिल को साबित कर सकता था कि वो किसी बच्चे की बनाई कल्पना मात्र नहीं थी.
           इसी बीच काफिला बगीचे में बने एक भव्य फव्वारे को लांघता हुआ महल के प्रांगण में पहुंच जाता है.          

प्रांगण में वही तीन फौजी लाइन में खड़े हुए थे. अफसर के हाथ में एक तलवार थी और दोनों फौजियों के हाथों में राइफलें थीं. राजकुमार भी वहीं खड़ा हुआ था. चंद्रा के उतरते ही अफसर फौजी और राजकुमार उसका स्वागत करते हैं. अफसर फौजी अपना नाम मेजर ‘बहादुर गोम्पा’ और राजकुमार का नाम ‘सुनिकेत’ बताता है. बाकी दोनों फौजियों में एक ‘सूबा’ सूबेदार और ‘सिपा’ सिपाही था.
           अब मेजर लाइन में वापिस जाते हुए एक लम्बी चौड़ी बांग के बाद अपनी तलवार के साथ कुछ नृत्य पेश करता है. फिर दोनों फौजी अपनी-अपनी बंदूकें आस्मान की और उठाते हैं और मेजर के आदेश पर गोलियां दाग देते हैं. गोलियां चलने के साथ ही बंदुकों की नलियां भी अलग होकर हवा में काफी ऊपर तक उछल जाती हैं और दोनों फौजी उस धक्के से जमीन पर टांगें फैलाकर बैठ जाते हैं. नजारा तो हंसने वाला था लेकिन कोई भी हंसता नहीं. अभी सभी इस घटना से उबर भी नहीं पाए थे कि दो पक्षी उन दोनों फौजियों की गोद में थप-थपाकर गिर पड़ते हैं. इस सब से चंद्रा का ध्यान हटाते हुए चंद्रा को महल के अंदर चलने के लिए कहा जाता है. लड़खड़ाकर सीढ़ियां चढ़ते समय चंद्रा को सीढ़ियों की एक बात अच्छी लग रही थी, उनके कदमों की कम ऊंचाई का होना.
           अब महल के बड़े दरवाजे से चंद्रा को अंदर ले जाया जाता है. अंदर एक शानदार बड़ा हॅाल था जिसके सामने दोनों तरफ से सीढ़ियां उतरकर एक हो जा रही थीं. उसके दोनों तरफ घुमावदार सीढ़ियां थीं जो ऊपर की मंजिलों के कमरों तक जातीं थीं. हॅाल के दोनों तरफ भी ऊपर को जाती सीढ़ियां थीं. सीढ़ियों के ऊपर-नीचे बहुत से दरवाजे थे. बीच हॉल में खम्बों के पास अनेक छोटे-छोटे पौधों के गमले रखे हुए थे. जिनके पास बैठने के लिए अनेक रोचक बैठकें बनीं हुईं थीं. अब चंद्रा को सामने की सीढ़ियों से लेजाकर, गलियारों की भूल-भुल्यिाओं से होते हुए अक सुंदर कमरे में ले जाय जाता है. इस कमरे में बाहर की और एक खिड़की खुलती थी जिसमें सुंदर पर्दों के बीच से रंगीन रौशनी अंदर आ रही थी. कमरे का दरवाजा चंद्रा के सिर की ऊंचाई का ही था और कमरे की छत सिर से एक फुट की दूरी पर ही थी. सेनापति राणा जी चंद्रा को नहाकर आराम करने के लिए कहता है. चंद्रा को राणा जी की बातों से अपने लिए चिढ़ महसूस होती है:   “देख भाई जल्दी से ले नहा, है रखी तन्ने हर जगेह बदबू फैला.
                देख, णा करणा टंकी पूरी खतम, णा तोड़ना म्हारो पलंग.”
           कहकर राणा जी कमरे से बाहर चला जाता है. उस कमरे में एक छोटे आकार का पलंग लगा हुआ था. चंद्रा पलंग का आनंद लेने से पहले, नहाते हुए चंद्रा अपने अनगिनत जख्मों पर हुई साबुन की जलन का आनंद लेता है. फिर उन्ही फटे हुए कपड़ों को पहन वो बाहर आ जाता है. फटे हुए कपड़ों को छोड़कर अब चंद्रा की हालत में कुछ सुधार आया था. अब आराम करने के लिए वो पलंग का रुख करता है तो पलंग पर एक गाउन पड़ा हुआ मिलता है, जो पहनने पर चंद्रा के घुटनों तक आकर लटक जाता है. अब पलंग पर कराहते हुए लेटकर वो अपने साथ बीती पिछली घटनाओं के बारे में सोचने लगता है. उसके जख्म बिस्तर से छूने की वजह से उसे जलन कर रहे थे. जिस वजह से उसे नींद आने में थोड़ी मुश्किल हो रही थी. उसे तो ये सब सपना ही लग रहा था. जिस वजह से वो थोड़ी-थोड़ी देर में पुरे कमरे को आंखें फाड़कर देखने लगता था, चीजों को छूने लगता था, कुछ ऐसा करने की कोशिश करने लगता था जिसे वो सपने में ना कर पाता.
           कौन थे ये लोग, ये सभी बौने लग तो भारतीय ही रहे थे. उनकी भाषा तो भारतीय ही थी. बस थोड़े से  शायरान अंदाज़ और तहजीब के साथ ज्यादा बात करते थे ये बौने. लेकिन इतना बड़ा शहर इस सदी में कैसे अछूता रह सकता है. इसी उधेड़बुन में उसे कब नींद पड़ गई उसे पता ही नहीं चला. उसे तो यह भी पता नही चला कि उसके सभी जख्म ठीक हो गए थे और यह भी कि एक लम्बी लाल चमकती दाढ़ी वाला बूढ़ा बौना उसके पलंग के पास बैठा था. उसका हरे-लाल रंग का लम्बा टोपी वाला चोगा भी उसकी दाढ़ी की तरह ही चमक रहा था. अंधेरा घिर आया था, चंद्रा

की आंखें खुलती है और वो इस नए बौने को देखकर हल्का सा उठ जाता है.
“अरे-अरे, लेटे रहिये. उठने की आवश्यकता नहीं है.......ऐसा हम नही कहेंगे. जहां तक सम्भव था आपको स्वस्थ कर दिया गया है. बाकी कमजोरी है जो भोजन से ही मिट सकती है.” वो लाल दाढ़ी वाला बौना बड़ी ही नजाकत और आराम के साथ कहता है.
           उसके पास ही एक अर्ध चन्द्राकार और अंडाकार आकृति वाला एक दंड रखा हुआ था. अंडाकार आकृति में एक निहायत ही खूबसूरत सा दिखने वाला एक पत्थर लगा हुआ था. वो दंड शुद्ध चांदी का बना हुआ लग रहा था जो बाहर से पड़ने वाली रौशनी में बहुत चमक रहा था.
“अ-आप..” चंद्रा बौने से पूछता है.
“हम जादूज हैं. महाराज के शाही सलाहकार.” बौना फिर से उसी नजाकत के साथ जवाब देता है.
“और ये क्या चीज़ है.” चंद्रा, चमकते दंड की और देखते हुए सवाल पूछता है.
“ये.......ये हमारे बुढ़ापे का सहारा है. इस उम्र में आपकी तरह सुदृढ़ थोड़ी न रह सकते हैं.” बौना जवाब देता है.
“क्या आप बता सकते हैं, मैं इस समय कहां हूं और कैसे पहुंचा?” चंद्रा सवाल पूछता है.
“अब आप कैसे हमारी दुनिया में पहुंचे ये तो आपको ही मालूम होगा. मगर आप इस समय लिल्लीपुट की छोटी सी दुनिया में हैं.” फिर उसी नजाकत के साथ जवाब आता है.
“लिल्लीपुट..? तो इसका मतलब ये हुआ कि जिस चीज़ के पीछे मैं इतनी मेहनत कर रहा था वो आखिर रंग लाई है.”
           इस तरह चंद्रा अपनी पूरी कहानी जादूज को बता देता है और वो लॉकेट दिखाने के लिए जैसे ही अपनी छाती पर हाथ फेरता है तो फेरता ही रह जाता है. लॉकेट गायब हो चुका था. चंद्रा जादूज को लॉकेट के रूप-रंग के बारे में बताता है. जिससे जादूज ये अंदाजा लगा लेता है कि उसी लॉकेट की मदद से वो इस दुनिया में पानी के रास्ते पहुंचा होगा. अब उस लॉकेट को ढूंढने में मदद का आश्वासन देकर जादूज उसे तैयार होकर खाने पर चलने के लिए कहता है.
“मेरे जख्म एकाएक ठीक हो गए. कैसे?” चंद्रा अपना एक और सवाल जादूज की और फैंकता है.
“अब देखिये सवालों के उत्तर तो भोजन करते हुए भी दिए जा सकते हैं. हम आपको भोजन करते समय बात करने के लिए मना नहीं करेंगे.” कह कर जादूज चंद्रा के साथ हॅाल में खाना खाने के लिए चल देता है.
           दोनों एक बड़े से डाइनिंग हॉल में पहुंचते हैं लेकिन वो चंद्रा के लिए महज एक हाल ही था. उसका सिर अभी भी छत से एक फुट नीचे ही था. हॉल में एक लम्बी टेबल अलग-अलग तरह के व्यंजनों से सजी पड़ी थी. दोनों तरफ आकर्षक लेकिन अनोखी नक्काशीदार छोटी-छोटी कुर्सिया लगी हुई थीं. ये कुर्सियां छोटे बच्चों की कुर्सियों के आकार की थीं और मेज चंद्रा के लिए बहुत नीची थी. चंद्रा की भूख उस सजी मेज को देखकर और भी ज्यादा बढ़ जाती है. अब राजा, राजकुमारी ‘सुवन्या’ और राजकुमार ’सुनिकेत’ हॉल में आते हैं. राजकुमारी की हरकतों से उसकी नाज़-नखरों वाली प्रकृति का पता चल रहा था. वो खुद से प्यार करने वाली घमंडी लड़की लग रही थी. राजा, चंद्रा का भोजन पर स्वागत करता है और बैठने के लिए कहता है. चंद्रा मुश्किल से ही कुर्सी पर बैठ पाता है जो चंद्रा के लिए किसी ‘मोढ़े’ का ही काम कर रही थी. मेज उसके घुटनों तक ही पहुंच रही थी. उसे खुली हुई पालथी मारकर कुर्सी पर बैठना पड़ता है जो छिले हुए घुटनों के साथ एक मुश्किल  काम था.

        अब बातों-बातों में खाना शुरू हो जाता है. शायद चंद्रा को एहसास भी नहीं हो रहा था कि वो बौनों के मुकाबले कितना ज्यादा भोजन कर रहा था. सभी उसे बड़ी ही हैरानी के साथ देखे जा रहे थे.
“ऐ! खामा भाया, खाणा घणो बणाया है ना. लागे ना है ऐ कुछ रखने वालो है म्हारी खातिर.” सेनापति राणा जी चंद्रा के अधिक खाने पर ताना मारते हुए कहता है.
           ‘खामा’ शाही खानसामा था जो पंजाबी मूल का था. अपनी लम्बी मूंछ के साथ उसने एक लम्बा ‘एप्रन’ पहना हुआ था और एक अजीब सी बर्गर जैसी दिखने वाली टोपी पहन रखी थी.
“वोत है, सेनापति जी. ओ! तुसी फ़िक्र ना करो. ऐ..लो..ऐ स्पेसल सूप. ख़ास मशरुमां तों तैयार कित्या होया. तुसी खाके ता वेखो.” कहते हुए खामा एक बड़े ‘बाउल’ से सूप निकालकर एक छोटी कटोरी में डालता है. फिर छिपकर जल्दी से उसमें कुछ अलग से डालता है. फिर सबसे आखिर में उसमें मिलाया जाता है, सब नाराज़ परोसने वालो की पसंदीदा चीज़, ‘थूक’.
           चंद्रा खामा की इस हरकत को देख लेता है. खामा को भी एहसास हो जाता है कि चंद्रा ने उसे देख लिया है. लेकिन चंद्रा इस पर कुछ भी नहीं बोलता है और हल्के से मुस्कुरा देता है. अब राणा जी उस सूप को जिझक के साथ, खामा की और देखते हुए धीरे-धीरे पीता है जो उसे बड़ा ही स्वादिष्ट लगता है. ‘खामा’ की तारीफ़ करते हुए राणा जी पूरा सूप खत्म कर देता है. चंद्रा को उस बड़बोले सेनापति पर हंसी आ रही थी. सभी चंद्रा से सवाल-जवाब कर रहे थे. माहौल खुशनुमा था. खाते-खाते चंद्रा, राजा से महारानी के वहां ना होने की बात करता है तो राजा की सारी की सारी ख़ुशी कहीं गायब हो जाती है. सभी खामोश हो जाते हैं. चंद्रा को लगा मानो उसने कुछ गलत पूछ लिया था. इस पर राणा जी फिर से ताना मारता है.
“अरे भाया, सोच समझ के बोलण के कोई पैसे ना लागे हैं. चुप रहने पे, के थारे पेट में मरोड़ उठे....है...!?” इतना कहते ही राणा जी एकाएक ही सीधा हो जाता है और उसका मुंह लाल हो जाता है, मानो उसके पेट में मरोड़ उठी हो.
“अरे......क्यों भूली गयो....” कहता हुआ राणा जी अपना पेट पकड़ कर ‘डाइनिंग हॉल’ से बाहर भाग जाता है.
           शायद खामा का फार्मूला काम कर गया था, उसने चंद्रा को एक हल्की आंख जो मारी थी. खाना खत्म होने के बाद सभी चंद्रा से विदा लेकर अपने-अपने कमरों की और चले जाते हैं. चंद्रा अभी भी खा ही रहा था लेकिन पहले से कम रफ्तार में. वो जादूज से अपने पूछे गए सवाल के पीछे की उदासी का कारण पूछता है. तो जादूज चंद्रा को समय का इंतज़ार करने के लिए कहता है.
                      अब चंद्रा लिल्लीपुट के बारे में बातें शुरू कर देता है. जादूज उसे बताता है कि लिल्लीपुट की दुनिया बाहरी दुनिया से छिपी हुई है और मुंबई के पास मांडवा बीच पर ही एक अलग आयाम में बसी हुई है जिसका एहसास तक बाहरी दुनिया के लोगों को नही हो पाता. तभी चंद्रा, जादूज को लिल्लीपुट के बारे में, अपनी मकान मालकीन के स्वर्गीय पति व उसके पड़दादा ससुर द्वारा की गई खोजबीनों के बारे में बताता है. इस पर जादूज चंद्रा को बताता है कि उनके पड़दादा ससुर की मृत्यु अकास्मिक कारणों से नहीं हुई थी. बल्कि लिल्लीपुट के ही एक ‘मर्यान्सव’ नाम के बजीर ने अपनी जादुई शक्ति द्वारा करवाई थी ताकि वो लिल्लीपुट तक ना पहुंच सके.
                      चंद्रा, जादूज से राजकुमार और फौजियों पर जंगल में हुए हमले के बारे में पूछता है तो जादूज बताता है कि लिल्लीपुट के घने जंगलों में पेड़ों के ऊपर कहीं एक पूरा कबीला छिपा हुआ है जिसका राजमहल के साथ झगड़ा चलता रहता है, ये शायद उन्ही की करतूत थी. अब चंद्रा उस रहस्मयी नांव के बारे में पूछता है. जादूज बहुत समय से

चले आ रहे महल के साथ समुद्री लुटेरों के झगड़े की बात चंद्रा को बताता है जो समय-समय पर शाही समुद्री जहाजों या नाविकों को लूटते रहते हैं. शायद चंद्रा उन्ही के हाथों पड़ गया था. लिल्लीपुट का पूरा इतिहास जाने के इच्छुक चंद्रा को जादूज ये कह कर टाल देता है कि उसे समय का इंतज़ार करना चाहिए. अंत में चंद्रा अपना वही सवाल फिर से दोहराता है:
“आखिर मेरे जख्म इतनी जल्दी भर कैसे गए. माना कि डॉक्टर ने मेरा चैकअप किया लेकिन कोई भी मेडिकल साइंस अभी तक ऐसे चमत्कार करने के काबिल नहीं हो पाई है.”
“जादूगर ‘जादूज जी’, आपका रथ तैयार है.” तभी सेनापति राणा जी बड़े ही आदर के साथ जादूज को रथ के तैयार खड़े होने की सुचना देता है.
“तो इस बात का उत्तर तो आपको मिल ही गया होगा, शायद.” जादूज, चंद्रा को आंख मारते हुए वहां से विदा लेता है.
           अब चंद्रा भी अपने कमरे की और चला जाता है. थका होने के कारण उसे नींद भी अच्छी आती है जो उसे शायद दस सालों में पहली बार आई होगी.
           सुबह उठकर चंद्रा बालकनी से बाहर का नजारा लेता है. सामने शाही बगीचा दिखाई दे रहा था जो नजर को बहुत ही सुहाना लग रहा था. बीच-बीच में उसे घंटियों जैसी मधुर टन-टनाहट भी सुनाई दे रही थी. इस बाग़ के बीच में से गुजरती हुई एक नहर पुरे शाही बाग़ को दो हिस्सों में बाँट रही थी. छोटे-छोटे बोनसाई पोधे मानो बड़ों को अपनी सुन्दरता के लिए चिढ़ा रहे थे. फूलों के पोधे जिनपर तितलियाँ उड़-उड़कर बैठ रहीं थीं, वो भी मानो एक नई नवेली दुल्हन की तरह उन तितलियों को बालों के क्लिप की तरह अपने ऊपर सजाकर इतरा रहे थे. पोधों के बीच में से होकर जाता रास्ता मानो किसी चमकते मकड़े के जाल की तरह आंखों को आकर्षित कर रहा था. ये पौधे विभिन्न आकृतियों के चबूतरों पर छोटे-छोटे बगीचों में लगे हुए थे.
           नहर के बीचों-बीच बना हुआ मध्य आकार का फव्वारा इस बाग़ में बहुत ही जंच रहा था. नहर बस इसी हिस्से से चौड़ी थी जिसके दोनों और गोलाकार बांध थे. इस फव्वारे में लिल्लीपुट के इतिहास की झलक देखने को मिल रही थी. बीच में पानी की फुहार छोड़ती एक मशाल लिए हुए एक बौना खड़ा था जिसके नीचे कई बौने एकदूसरे को सहारा देते हुए दिख रहे थे. पानी इनके ऊपर से बहता हुआ बहुत ही आकर्षक प्रतीत हो रहा था. उसकी नजर सबसे नीचे की पंक्ति के बौनों पर पड़ती है जिनके इर्द-गिर्द बेड़ियाँ बंधी हुई थीं. दूर से कुछ ख़ास तो नहीं दिख रहा था लेकिन सबसे ऊपर खड़ी मूर्ती के नीचे दो बौने तप करते हुए दिख रहे थे, जिनमे से एक औरत थी. ये फव्वारा लिल्लीपुट नहर के बीचों-बीच बना हुआ था जो छे कोनों वाले एक सितारे रुपी चौखटे पर खड़ा हुआ था. इस चौखटे के बाहरी हिस्सों से महल की और जाते रास्ते पुल से जुड़ते थे.
           बाग़ से हटकर चन्द्रा अपनी नजर सामने के ‘पीपल्स हाउस’ पर डालता है जिसमें बहुत से बौने आ-जा रहे थे. सफेद रंग में वो इमारत सुबह के सूरज की किरणों में बहुत चमक रही थी. सामने से त्रिभुजाकार छत और बहुत से खम्बों और खिड़कीयों पर टिकी ये इमारत खुद में कला की एक अनूठी प्रदर्शनी लग रही थी. लिल्लीपुट में आने के बाद ये पहली बार था जब चंद्रा पहली बार इस दुनिया की खूबसूरती निहार पा रहा था. सामने तीन नहरों के बीच बना विशाल लिल्लीपुट शहर दिखाई दे रहा था जिसकी इमारतें और घर खुद में कलाकृतियों जैसी लग रही थीं. अब घंटियों की टन-टनाहट जैसे पुरे शहर में गूंजती हुई सी लग रही थी. सब कुछ सपनों की दुनिया जैसा लग रहा था.
           तभी इस नजारे से चंद्रा का ध्यान शाही बाग़ से दूर, महल के प्रांगण में इक्कट्ठा उन फौजियों की टोली अपनी और खींचती है. वे सभी किसी को श्रद्धांजली देने के लिए कतार में खड़े हुए लग रहे थे. उनके सामने जमीन पर

छोटे-छोटे दो सफेद कपड़ों के नीचे कुछ रखा हुआ था. अपनी तलवार से कुछ हरकतें करने के बाद मेजर उन दोनों कपड़ों को बारी-बारी से खुदे हुए गड्ढों में रख देता है. फिर मेजर के कुछ चिल्लाने पर दोनों फौजी अपनी बन्दूकों से कुछ कलाकारियां करते हुए अपनी-अपनी बन्दूकों की नाल धीरे-धीरे नीचे लाने लगते हैं. चंद्रा अब अंदाजा लगा चुका था कि ये सब पिछले दिन मारे गए दो पंछियों को श्रद्धांजली देने के लिए किया जा रहा था. तभी नीचे आती उन नलियों से गोलियां फायर हो जाती हैं जिससे दोनों फौजी बंदरों की तरह उछल-कूद करने लगते हैं और मेजर उन पर चिल्लाने लगता है.
           ‘क्या नमूने हैं ये सब’, सोचकर चंद्रा अपने कमरे की खिड़की बंद करके पीछे पलटता है तो दरवाजे पर सेनापति राणा जी को खड़ा पाता है. सेनापति, चंद्रा को महल के प्रांगण में आने के लिए कहता है. चंद्रा अपने कमरे से निकलकर महल की मुख्य सीढ़ियों तक आ जाता है जहां राजा, सेनापती और शाही सैनकों जैसी पौशाकों में दो सैनिक उसका इंतज़ार कर रहे थे. ‘‘डोंजा खान’ एक हल्की दाढ़ी वाला पठान था जो कुल चार फीट का होगा और अपने सिर पर पगड़ी पहने हुआ था. पठानी सूट में वो चंद्रा को बड़ा ही प्यारा लग रहा था. उसके साथ ही ‘घोंजा राम’ भी खड़ा था जो लगभग डोंजा खान जितना ही ऊंचा था. पुरे लिल्लीपुट में वे दोनों ही उसे अब तक सबसे ऊंचे इंसान दिखे थे. शायद तभी दोनों शाही सेना में थे. लेकिन चंद्रा को अभी तक कोई भी सेना दिखी तो ना थी.
           सामने एक आकर्षक साज-सज्जा में रथ खड़ा हुआ था जो चंद्रा के कंधों से ऊंचा नही था. चंद्रा उस रथ में बैठने की बहुत कोशिश कर लेता है लेकिन रथ का आकार उसके बैठने के लिए बहुत ही छोटा था. अब पैदल ही चलने का निर्णय लिया जाता है. चल पाने में असमर्थ राजा महल रुकने का निर्णय लेता है. तो सेनापति भी वहां से सरक लेता है. अब चंद्रा और दोनों सैनिक बगीचे की और निकल पड़ते हैं. बगीचे में एक तरफ एक बौना पोधों की कटाई-छंटाई कर रहा था. चंद्रा उसके पास पहुंचता है और उसका हाल-चाल पूछता है. वो बगीचे का मालि माल्लो था. चंद्रा उसके बगीचे के रख-रखाव की तारीफ़ करता है. तो माल्लो भी अपने ही अंदाज़ में जवाब देता है:
“कुदरत से प्यार मेरा जाता नही, फूल-पत्ती सिवा कुछ भाता नही”
           चंद्रा को माल्लो की बातों से, उसके कुदरत से अजीब लेकिन निहायत प्रेम का पता चलता है. तभी तो शाही बाग़ इतना दमक रहा था. उसका एक अजीब सा विचार था. वो सब्जी-मंडी को सब्जियों का कसाई खाना मानता था और सब्जी वालों को कसाई. उसका मानना था कि वनस्पतियां अपने प्राक्रतिक रूप में ही रहने देनी चाहिएं. उससे बातें करके चंद्रा आगे बढ़ जाता है. अब उसी फव्वारे को नजदीक से देखते हुए चंद्रा पीपल्स हाउस तक पहुंच जाता है. बाहर प्रेसिडेंट अपनी सेक्रेट्री के साथ खड़े आते जाते लोगों से बात कर रहा था. प्रेसिडेंट वहां से गुजरते लोगों को हंसते-हंसते अपनी पार्टी का स्टीकर भी चिपका रहा था और साथ ही उन्हें वोट देने के लिए भी कह रहा था. उसके बात करने के ढंग से वो एक खुशमिजाज बौना लग रहा था. डोंजा खान, प्रेसिडेंट को चंद्रा के बारे में बताता है:
“साब, ये चंद्रा जी है. शाही मेहमान, हमारा शहर देखने निकला है.”
“अरे इन्हें कौन नहीं जानता. इन्होने जो हमारे राजकुमार और हमारी फ़ौज के लिए किया उसके लिए पूरा लिल्लीपुट इनका शुक्र गुजार रहेगा. और वैसे भी इतना लम्बा-चौड़ा आदमी हमारी दुनिया में दूर से ही दिख जाता है. आप से मिलकर ख़ुशी हुई चंद्रा जी. वैसे भी अगर आप नहीं होते तो हमारी तो पूरी की पूरी ही फ़ौज ही खत्म हो गई होती. अच्छा मेरी गाड़ी आ गई...और हां vote for me.” चंद्रा को अपना पार्टी स्टिक्कर चिपका कर प्रेसिडेंट अपनी छोटी कार में बैठ जाता है जो किसी बच्चे की पैडल कार से दोगुने से ही कुछ बड़ी थी.
“अच्छा आपको आगे तक छोड़ दूँ क्या?” प्रेसिडेंट पूछता है.

“शुक्रिया, पैदल सैर अच्छी रहेगी.” चंद्रा हाथ जोड़कर मना करता है. वैसे भी वो उस छोटी सी कार में फिट होने वाला नही था.
           अब तीनों आगे बढ़ जाते हैं और जा पहुंचते हैं ‘लिल्ली’ बाज़ार. उसका गेट एक बड़े से चेन वाले तराजू की शक्ल का बना हुआ था जिसमें से होकर अंदर जाना पड़ता था. लिल्लीपुट का बाज़ार भव्य नजारा लिए हुए था. वहां कई छोटे कद के लोग यहां-वहां घूम रहे थे, खरीद-दारियां कर रहे थे, मोलभाव कर रहे थे. बाज़ार में आकर चंद्रा देखता है कि वहां सिर्फ भारतीय मूल के ही बौने नहीं थे. बल्कि पूरी दुनिया के लगभग हर कौने से आए बौने इस अनोखी दुनिया में बसे हुए थे. अफ़्रीकी मूल के हों या अमरीकी, यूरोपियन हों या अरेबियन, चीनी हों या रुसी हर जगह के बौने उस बाज़ार में मौल-भाव कर रहे थे. उन्होंने अजीब लेकिन प्यारे से दिखने वाले रंगीन कपड़े पहने हुए थे. बड़े आस्तीन, बड़े-बड़े बटन, रंगीन नोंकदार जूते, अजीब सी दिखने वाली टोपियाँ. कुछ लोग नए जमाने के तो कुछ प्राचीन समय के कपड़े पहने हुए थे.
           बाज़ार में खड़े सभी बौने गुड्डे-खिलोनों से कम नहीं दिख रहे थे. ये नजारा कुछ अजीब और मिला-जुला एहसास लिए था. बुजर्गों ने अजीब सी टेढ़ी-मेढ़ी लाठियां पकड़ रखी थीं और साथ में बौने कद के कुत्ते बहुत ही तेज आवाज़ में भोंक रहे थे. पुरे लिल्ली बाज़ार में इन बौने इंसानों की पतली, नुकीली आवाजें मधुमक्खियों के झुण्ड की तरह भिन्नभिन्ना रही थीं. हर दुकानदार अपनी-अपनी हांक दे रहा था. कुछ बौने छोटे-छोटे ठेलों, घोड़ा गाड़ियों पर सामान लादकर ले जा रहे थे. चंद्रा उन ‘पोनी’ घोड़ों को देख बड़ा हैरान होता है.
           हर दुकान की अपनी ही अलग आकृति थी. जूते वाली दुकान एक लम्बे जूते की आकृति बनी हुई थी. कपड़े की दुकान सामने से पैंट की आकृति की बनी हुई थी जिसकी टांगों के बीच दरवाजा था. राशन वाले की दूकान एक बड़ी सी खुले मुंह वाली बोरी की आकृति की बनी थी. इसी तरह बर्तनों की दुकान कुक्कर की आकृति की बनी थी. होटल, प्लेट पर छुरी-काँटों की तरह, आइसक्रीम की दुकान की आकृति ऐसी थी जैसे किसी प्याले में आइसक्रीम के गोले रखे हुए हों और उनमे एक चम्मच डाला गया हो. बर्गर-चाट की दुकान ‘बर्गर’ जैसी दिखती थी. चंद्रा, सब कुछ बड़ा ही मोहित हो कर देख रहा था. दूर से ही किसी दुकान के बारे में पता लगाया जा सकता था कि वो किस चीज़ की दूकान है. उसे ये सब कहानियों जैसा लग रहा था. बाज़ार में उसके आने के बाद से सभी बौने उसे बड़े ही हैरानी से देख रहे थे मानो चिड़िया घर में कोई नया जानवर आया हो. कुछ डर तो, कुछ दोस्ताना, तो कुछ नफरत के भाव लिए थे. तभी एक आवाज़ से उसका यह सम्मोहन टूटता है:
“सिंडी की भिंडी, सड़ेला करेला, सरकारी तरकारी, घिया से जिया.....मत हो लोभी खा ले गोभी. मिक्स कर खाया आ..हा......बड़ा मजा आया.” सब्जी वाला आवाज़ लगा रहा था.
           सब्जी वाले की रेहड़ी देखने पर सब्जियों से बनी लग रही थी मानो बहुत सी सब्जियों को जोड़-जोडकर बनाया गया हो. टायरों की जगह टमाटर लगे हुए थे. रेहड़ी की छत पालक के पत्ते जैसी थी. चंद्रा कुछ सोचकर उसके पास चला जाता है.
“क्या भाव चल रहा है सब्जियों का.” चंद्रा दोस्ताना लहजे में पूछता है.
“देखो लम्बे भईया..फोकट में पूछ टाइम भेस्ट न करो. तुमने लेनी तो है नही फिर क्यों पूछते हो.” सब्जी वाला कहता है.
“अच्छा एक बात तो बताओ क्या तुम्हारी मुलाक़ात ‘मालो’ से होती है कभी?” चंद्रा पूछता है.
“वो..पगला...उनका नाम ना लो हमारे सामने. हमें कसाई बुलाते हैं. बताओ तो..हम कहीं से भी कसाई दिखते हैं भला?

कहते हैं हम उनकी प्यारी सब्जियों को काट-काटकर भेड़-बकरियों की तरह बेच देते हैं. और इन दोनों खुले सांढों को तो देखो जरा कैसे मुफ्त की खा रहे हैं.” सब्जी वाला रेहड़ी से केले उठाकर खाते हुए दोनों सैनिकों की और इशारा करता है.
“कोई बात नहीं इनके पैसे मैं दे देता हूं. ये लो....नाम क्या है तुम्हारा.” चंद्रा जेब से मुड़े-तुडे नोट निकालता है.
“रहने दो भईया ये यहां नहीं चलते. वैसे, सब्जो नाम है हमारा.........’खाओ सब्जो की सब्जी नही होगी कब्जी’.” हांक लगाता हुआ सब्जो अपनी रेहड़ी लेकर चला जाता है.
           चंद्रा का मन बाज़ार से कुछ खरीदने का हो रहा था ताकि यादगार के तौर पर वो उसे अपने पास रख सके. लेकिन वो कोई एसा काम भी नहीं करना चाहता था जिससे इस दुनिया के अस्तित्व पर कोई खतरा मंडराता. क्या पता उसके यहां प्रवेश पर रोक ही लग जाए?
           अब सभी बाज़ार से निकलकर जा पहुंचते हैं, ‘थाने’. थाने की छत पुलिस की टोपी जैसी थी. हवालात की इंस्पेक्टर के डंडे जैसी सलाखें बाहर की और सामने ही दिख रही थीं. साथ ही खुला कमरा था जिसमे कोई दरवाजा नहीं था. उसी के बगल में पुलिस की गाड़ी खड़ी थी जिसकी घूरती आंखों जैसी हेडलाइट्स के नीचे लम्बी मुछें थीं. अंदर हवलदार ‘हवा सिंह’ किसी ‘लिल्ली’ निवासी की कंप्लेंट दर्ज़ कर रहा था. पुलिस की वर्दी में नाटा हवलदार बहुत ही प्यारा लग रहा था. उसकी शक्ल देख चंद्रा को उसकी पुलिस जीप की याद आ जाती है जो उसी की हू-बहू थी. सिवा इसके कि उसके गाल पर एक बड़ा सा मस्सा था और उसके दोनों कानों से बाल झांक रहे थे. उसकी बातें लग रही थीं. शिकायत करने वाला कीन्ही दो चोरों द्वारा उसका सामान चुरा लिये जाने की शिकायत कर रहा था. हवा सिंह उसे बाद में आने के लिए कहता है तो शिकायतकर्ता उसे उसी समय कुछ करने की विनती करता है. जिसपर चिढ़कर हवा सिंह, अपने ठेठ ‘हरयानवी’ अंदाज़ में, अपनी लाठी मेज पर पटकते हुए कहता है:
”माणे ना माणे, जाणा ठाने. मन्ने होर भी काम सै. उन्हें मैं कभी भी धर सके हूं. इब आप, अभी फुट लो एठे से.” हवा सिंह के तेवर देख शिकायतकर्ता वहां से चुप-चाप खिसक लेता है. अब हवा सिंह की नजर चंद्रा पर पड़ती है.
“अरै आप दोनों इस लम्बू कने कै कर रे हो. देखो भाई इण बाहरियों कने ज्यादा मेल-जोल ठीक ना है. मैं तो कहूं इसको अंदर करो अभी.” हवा सिंह अकड़ भरे अंदाज़ में कहता है.
“महाराज का आदेश है इन्हें लिल्लीपुट घुमाने का. इंस्पेक्टर साहब कहीं नजर नहीं आ रहे.” घोंजा राम पूछता है.
“ओ! गश्त पर गए सै. बैठो कुछ सेवा करें मेहमाण की.” हवा सिंह हाथ में लाठी पटकते हुए चंद्रा को गर्दन ऊँची कर, बड़ी-बड़ी आंखों से घूरता है.
“ओ! कोची फिर कभी ओए. अभी बड़ा घूमना है. चलते हैं. खुदा-हाफिज भाई” डोंजा खान ऊंची आवाज़ में कहता है.
           तीनो वहां से निकल पड़ते हैं. चंद्रा ने हवा सिंह की हरकतों को जैसे नज़रंदाज़ ही कर दिया था. वो लिल्ली निवासियों की मानसिकता को समझने लगा था. इस छिपी हुई दुनिया में किसी भी बाहरी आदमी का यूं अचानक घुस आना सबके लिए हैरानी और परेशानी वाली बात तो थी. जैसे हमारे लिए पृथ्वी पर एलियंस का घुसते रहना.
           अब वे ‘लिल्ली बैंक’ के बाहर से गुजरते हैं जो किसी ‘पिगी बैंक’ की तरह दिख रहा था जिसके ऊपर एक सिक्का आधा घुसा हुआ था. ‘घोंजा राम धरपकड़’ चंद्रा को बताता है कि इस बैंक में एक ही कर्मचारी है, खुद ‘बैंक मैनेजर’ साहब. वो इस बात से बड़ा परेशान रहता है कि पुरे बैंक में वो अकेला ही एक कर्मचारी है. जब चंद्रा ‘मैनेजर’ से मिलने की बात करता है तो डोंजा खान हंसी में कहते हुए उसे टाल देता है कि मैनेजर वैसे ही परेशान रहता है और चंद्रा

को देख मैनेजर को कोई ख़ुशी भी नही होगी. अब आगे बढ़कर वे हॉस्पिटल के बाहर पहुंचत जाते हैं जो लाल रंग के क्रॉस से दिखने वाले निशान के जैसा दिख रहा था. उसके बाहर सूई की शक्ल में एम्बुलेंस खड़ी थी. यहां भी दोनों सैनिक उसे ये कहकर टाल देते हैं कि वो एकदम स्वस्थ है और उसे अभी अंदर जाने की जरूरत नहीं. उन दोनो का मन तो जैसे उसे लिल्लीपुट घुमाने का था ही नही. अब चंद्रा गांव की और जाकर वहां के लोगों और मुखिया से मिलने की बात करता है.
“मुखिया आपका मतलब सरपंच जी......” घोंजा राम के इतना कहने की देर थी कि डोंजा खान कस के एक मुक्का घोंजा राम के मुंह पर दे मारता है. घोंजा खान को दिन में तारे दिखने लगे थे. गुस्साया, घोंजा राम भी डोंजा खान की धुलाई करने लगता है.
“ओए कोची! हमको....क्यों मारता है. तुम.....ही तो बोला बड़े अदब से...’सर..पंच’.” डोंजा खान पिटते हुए सफाई देता है.
           चंद्रा भी डोंजा खान की इस हरकत पर हैरान था लेकिन हैरानी से ज्यादा उसे हंसी आ रही थी. दरअसल डोंजा खान की एक कमजोरी थी कि वो किसी ख़ास शब्द का मतलब निकालकर उसे हकीकत में कर डालता था. जिसका शिकार आमतौर पर घोंजा राम होता रहता था. अब दोपहर घिर आई थी तो महल चल कर भोजन करने का निर्णय लिया जाता है.
           रात के खाने पर राजा को अपने लिल्लीपुट दर्शन के बारे में बताने के बाद चंद्रा अपने कमरे में आराम करने चला जाता है. थका होने की वजह से उसे झट से नींद भी पड़ जाती है. अगले दिन से चंद्रा लॉकेट की खोज में जुट जाता है. नदी किनारे, जंगल में, गांव में, शहर में, महल में हर जगह पूरा हफ्ता लॉकेट को ढूंडा जाता है. बिना लॉकेट वो वापिस अपने आयाम में जा पाने में असमर्थ था. लिल्लीपुट के तीन सिपाहियों की वो पूरी फ़ौज, शाही सैनिक और कुछ नागरिक बौने मिलकर भी जब उस लॉकेट को नहीं ढूंढ पाते तो अगले सप्ताह सोमवार को चंद्रा, जादूज से लॉकेट के बारे में पूछने के लिए शाही बाग़ में मिलता है.
“कुछ बातों को रहने दो राज, गिरेगी सब पे गाज. पाओगे तुम अकेले पता, हो कल या आज.” जादूज कविता के अंदाज़ में उत्तर देता है.
           चंद्रा भी इन कविताओं से मतलब निकालना सीख गया था. सो वो अकेला ही किनारे की और निकल पड़ता है. नदी का किनारा चमक रहा था. लेकिन इतने बड़े किनारे पर शुरुआत कहां से की जाए? इसी उधेड़-बुन में चंद्रा नदी के हिचकोले मारते पानी में चल रहा था कि उसके कानों में एक पतली आवाज़ पड़ती है:
“जिसकी है तलाश, मिलेगी हमारे पास.” लगभग पच्चीस साल की एक बौने कद की सुंदर लड़की अपनी मुट्ठी चंद्रा की और किये बड़ी ही मासूमियत के साथ खड़ी थी.
            चंद्रा उसके पास जाता है तो वो लड़की उसी मासूमियत के साथ अपनी मुट्ठी खोल देती है जिसमें वो लॉकेट था. चंद्रा तुरंत ही उसे सुरक्षित अपनी जेब में रख लेता है. जैसे हम यात्रा टिकट मिलते ही सम्भाल कर रख लेते हैं. ये लॉकेट ही तो चंद्रा के लिए अपनी दुनिया से इस दुनिया में आने-जाने का टिकट था. उस लड़की का नाम पूछते हुए, जो वो लड़की उसे ‘सुपर्णा’ बताती है, चंद्रा वापिस महल की और चल देता है. अब उसे सभी को ये खुशखबरी देनी थी कि उसका यात्रा टिकट उसे मिल चुका था. रास्ते में चंद्रा सुपर्णा के घर के बारे में पूछता है. सुपर्णा उसे अपनी बूढ़ी मां और एक भाई के बारे में बताती है जो गांव में रहते हैं. यहां-वहां की कुछ बातें करते हुए वे दोनों जंगल में पहुंच जाते हैं. जंगल देखने में सुंदर तो लग रहा था लेकिन ये घना जंगल जानवरों, टिड्डों और अनचाही आवाजों से भरा हुआ.


“तुम्हे....आपको अकेले इस घने जंगल से डर नहीं लगा. आपको महल आ जाना चाहिए था.” चंद्रा, सुपर्णा से कहता है.
“डर तो लगा लेकिन आपको इसकी आवश्यकता अधिक थी. सो आपको ढूंढती यहां तक आ पहुंची.” सुपर्णा जवाब देती है.
“तो आप महल भी तो आ सकते थे.” चंद्रा हल्के से डांट लगाते हुए कहता है.
“हम महल नहीं जाते.” सुपर्णा उसी सोम्यता से जवाब देती है. तभी दूर से किसी गधे जैसी हांक सुनाई देती है.
“क्या इस जंगल में गधे भी है.” चंद्रा मजाक करता है.
“अरे नहीं, आईये मैं बताती हूं आपको.” सुपर्णा उसे जंगल के एक कोने की और ले जाती है.
           चुपके से एक झाड़ी को खोलते हुए सुपर्णा, चंद्रा को पास बुलाती है. चंद्रा देखता है कि पर कटे मुर्गे सा दिखने वाला लगभग तीन फीट का एक अजीब सा बड़ा पक्षी जमीन को अपनी चोंच से खोद रहा था. उसकी अजीब सी छोटी गोल आंखें और बतख सी चपटी और बाज जैसी नुकीली चोंच थी. एकबार फिर से वो अपनी गधे जैसी बांग मारता है तो पास की झाड़ियों से उस जैसा एक और पक्षी उसके पास आकर जमीन खोदने लगता है. सुपर्णा, चंद्रा को बताती है कि इस जैसे और भी बहुत से है इस जंगल में. हैरानी से इस अनोखे पक्षी को देखते रहने के बाद चंद्रा आगे बढ़ने का निर्णय लेता है. कुछ आगे बढ़कर चंद्रा को झाड़ियों में सरसराहट सुनाई देती है. चंद्रा को झाड़ियों में एक पूंछ गायब होती दिखाई देती है. चंद्रा के पूछने पर सुपर्णा उसे बताती है कि जंगल में शेर भी घूमते रहते हैं. चंद्रा, सुपर्णा को बताता है कि वो पूंछ किसी शेर की नहीं, किसी कुत्ते जैसी थी. तो सुपर्णा जंगल से जल्दी बाहर निकल जाने के लिए कहती है.
           कुछ देर के बाद दोनों जंगल से बाहर निकलकर एक दोराहे पर पहुंच जाते हैं जहां से एक रास्ता शहर की और जाता था और एक रास्ता गांव की और. अब सुपर्णा यहां से विदा लेकर गांव की और चली जाती है और चंद्रा महल की और. शाम को चंद्रा की विदाई का समय था. लगभग पूरा लिल्लीपुट चंद्रा को जाते हुए देखने के लिए समंद्र किनारे पहुंच गया था. कुछ बौने निवासी दूर पेड़ों से, तो कुछ पहाड़ी ढलानों से चंद्रा की विदाई देखने आए थे. कुछ ग्रामीणों के साथ सुपर्णा भी थी जो उसकी और मंद मुस्कान बिखेर रही थी.
“वापिस आओगे, जब भी जाओगे. राज को राज और दोस्त को दोस्ती से निभाओगे.” राजा चंद्रा से अपने स्टाइल में वचन और विदा दोनों लेता है.
“चिट्ठी लिखते रहना, कोची ओए!” डोंजा खान मजाक में कहता है.
“बस चिट्ठी णे ही काम चलाणा.” सेनापति राणा जी जैसे उसे दुबारा न आने के लिए कह रहा था.
“जो जाते रुक, तो किया था आज मैने ‘लिल्ली’ कबाब ‘कुक’.” खामा भी अपने अंदाज़ में चंद्रा को विदाई देता है.
अब जादूज आगे आकर चंद्रा की कोहनियों को पकड़ता है, मानो वो उसके कंधों पर हाथ रखना चाहता था. चंद्रा के कानों में कुछ शब्द पड़ते हैं जो जादूज के थे:
“पाया तुमने रास्ता है जिससे, ना कहना ये कीसिसे. राज़ को राज़ और निभाना दोस्ती को दोस्ती से.” चंद्रा को इन शब्दों के सुनाई देने के वक्त जादूज कुछ भी बोल नहीं रहा था. चंद्रा भी मन ही मन वचन देता हुआ समंद्र की और बढ़ जाता है, जैसे उसे मालूम था कि जादूज उसे सुन रहा था.
           सुपर्णा अभी भी चंद्रा की और एकटक देखि जा रही थी. चंद्रा पीछे मुड़कर ना देखता हुआ उन्ही चट्टानी ढलानों पर चढ़ जाता है. तेज हवाएँ चंद्रा के कपड़ों को जैसे अपने साथ ले जाना चाहती थीं. छपाक.....चंद्रा समंद्र में

छलांग लगा देता है. सभी टकटकी लगाए समंद्र के पानी में देखते रहते हैं जहां अब सिर्फ लहरें और समुद्री झाग ही बची रह गई थी.
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pg no 15

 

 

 


MONTH’थree’ OCTOBER
महान सम्राट
एक चरित्र परिवर्तन
                                          चंद्रा को परसी आंटी के पास पहुंचे एक हफ्ता बीत चुका था. वो इस बार अपना सामान बाहर फैंके जाने और घर से मुंबई आए अपने माता-पिता, भाई-बहन और जीजा के कहर से बच चुका था. उसका, बिना बताए हफ्ता भर गायब रहना किसी को भी रास नहीं आ रहा था. ऊपर से उसका ये सफाई देना कि वो अपने विदेशी दोस्तों के साथ ‘क्रूज़’ की यात्रा पर निकल गया था, कोई भी पचा नहीं पा रहा था. मां ‘लीलावती चंद्रा’ तो उसे लिए बिना घर जाने को तैयार ही नहीं हो रही थीं. उसकी मां और बहन उसे नौकरी छोड़ चंबा चलने के लिए अड़ बैठी थीं. ऑफिस में भी सब परेशान हो उठे थे. पुलिस को उसकी गुमशुदगी की रेपोर्ट तक लिखवा दी गई थी.
           एक दम से ही प्लान का बन जाना, मुफ्त यात्रा का फायदा, बीच यात्रा में ही एक और जगह की यात्रा पर निकल जाना, मोबाइल नेटवर्क का न होना, ना जाने क्या-क्या बहाने मारने पड़े थे चंद्रा को ये सब शांत करने के लिए. अब परसी आंटी उसका ज्यादा भरोसा नहीं करती थी और शाम को आठ बजे तक मकान आ जाना और हर दिन अपने घर चंबा फ़ोन करना उसके लिए बेहद जरूरी हो गया था.
           पूरा महीना लिल्लीपुट की रहस्मयी दुनिया से दूर रहने और अपनी शर्तों को नियमानुसार पूरा करने के बाद माहोल शांत होने लगा था. समंद्र में गिरने और डूबने से बच जाने के बाद चंद्रा, रेश्ना की और ज्यादा झुक गया था. अब वो रेश्ना से चिढ़ाने वाले मजाक कम किया करता था और उसे पहले से भी ज्यादा ‘ट्रीट’ करने लगा था. शायद जिन्दगी के दिए एक और मौके का वो भरपूर फायदा उठाना चाहता था. इतने दिनों के बाद अब लिल्लीपुट की दुनिया से खुद को दूर रख पाना चंद्रा के लिए मुश्किल हो रहा था. लेकिन उस पर थोंपी गई शर्तों की वजह से वो ज्यादा देर तक वहां रह नहीं सकता था. इसके लिए वो एक मनघडंत कहानी तैयार करता है जिसे वो ऑफिस, परसी आंटी और घर हर जगह फैला देता है. वो सब को बताता है कि काम के सिलसिले में वो हर शनिवार किसी दूर के गांव में ठहरता है. इसके लिए वो हर शनिवार अपने दोस्त नकिल के साथ वहां के ‘रेस्ट हाउस’ में शिरकत करनी शुरू भी कर देता है ताकि किसी को जरा सा भी शक ना हो सके.
           सितम्बर महीना बीत कर, अक्टूबर महीना शुरू हो चुका था. इस दौरान चंद्रा ने तैराकी भी सीखना शुरू कर दी थी. अब चंद्रा को शानिवार आने का इंतज़ार था. शनिवार आया और वो उसी गांव की और चल देता है. वहां रेस्ट हाउस में अपना कमरा बुक करवाकर चंद्रा वहां से दूर मांडवा तट पर आ जाता है. शाम के पांच बजे होंगे. सूर्य देवता अपने घर लौटने की तैयारी कर रहे थे. लेकिन लोग अभी भी मस्त थे. चंद्रा उन सभी को छोड़ नदी की उन्ही चट्टानी किनारों की ओर चल पड़ता है. वहां वो अपने ‘डाइविंग सूट’ और ‘वाटर प्रूफ बैग’ के साथ कुछ डरते हुए नदी में छलांग लगा देता है.
              अपनी तैराकी की क्लास में सीखी हुई बातों को ध्यान में रखते हुए वो अपने हाथ पांव चलाना शुरू करता है और सतह पर आना शुरू कर देता है. कुछ ही पलों में सतह पर आकर उसे वही बीच फिर से दिखाई देता है. बीच सुनसान पड़ा था. क्या लॉकेट ने अपना काम किया था या फिर वो अभी भी अपनी दुनिया में ही था. कहीं उसके जाने के बाद यहां के लोगों ने उसका प्रवेश रोकने के लिए फिर से कोई जादू तो नहीं कर डाला था. बाहर निकलकर वो मैदान की और बढ़ना शुरू करता है. तभी उसे रेल की पटरियां दिखाई देती है और उसे अपनी पिछली यात्रा याद हो आती है. वो लिल्लीपुट में दुबारा से प्रवेश कर चुका था. लेकिन क्या, वहां के निवासी उसे दुबारा से स्वीकार करेंगे या फिर उसे         

अस्वीकार कर दिया जाएगा. अपने पिछले कड़वे अनुभवों से वो डर रहा था. सोचते हुए वो उसी दौराहे के पास पहुंच जाता है जहां से लिल्लीपुट शहर और गांव शुरू होते थे. शहर की और का रुख कर वो गेट के सामने पहुंच जाता है.
           गेट, महल की हूबहू शक्लों-सूरत लिए था. गेट के पास पहुंचकर चंद्रा गेट खटखटाता है. अंदर से एक छोटी खिड़की खुलती है और उसमें से बड़ी मुछों वाला एक पहरेदार झांकता है. चंद्रा अपना नाम बताते हुए उनसे अंदर आने देने की विनती करता है.
“हो गई शाम, आपका ना है कोई काम. आना जब होगा दिन, है प्रवेश वर्जित आज्ञा बिना.” पहरेदार कविता में जवाब देते हुए गेट खोलने के लिए मना करता है.
           इस पर चंद्रा उन्हें राजा से आज्ञा ले आने की विनती करता है और वहीं इंतज़ार करने लगता है. एक घंटे के बाद गेट के बाहर बैठे हुए चंद्रा के सिर से कुछ टकराता है. एक और हूबहू बौना पहरेदार खिड़की से एक लम्बे लट्ठ से उसके सिर पर धक्के दे रहा था. वो पहरेदार चंद्रा को अंदर आने के लिए कहता है. अंदर घोंजा राम और डोंजा खान उसे लेने के लिए आए थे. गेट के पास वो दो दरबान भी खड़े थे. वे बड़े ही अजीब लग रहे थे. चेहरे पर रुखापन लिए दोनों ने बड़ी-बड़ी आंखें निकाल रखी थीं. हाथों में उनसे बड़े लट्ठ और बगल में छोटी तलवारें. चंद्रा उनसे दोस्ती बढ़ाने के लिए उनकी और हंस कर देखता है. लेकिन वो बिना किसी भाव के वैसे ही खड़े रहते हैं. लिल्लीपुट से गुजरते हुए चंद्रा को फिर से ’लिल्ली’ निवासियों की शक भरी नजरों का सामना करना पड़ता है.
           महल में राजा, जादूज, सेनापति, मेजर साहब, राजकुमार सभी उसका स्वागत करते हैं. रात के खाने पर चंद्रा सभी से मेल-जोल बढ़ाने की कोशिश करता है. सभी उसके साथ खूब गप्पे मारते हैं. राजकुमारी ‘सुवन्या’ को छोड़कर, पूरा समय वो अपनी खूबसूरती पर इतरा रही थी. आज की दावत में बहुत से पकवान बनाए गए थे. लेकिन इस बार सेनापति राणा जी इस दावत में कुछ भी खाने की हिम्मत नहीं करता और चुप-चाप बैठा रहता है.
“चंद्रा तुम्हारी सेहत में कुछ गिरावट आई है. क्या बात है?” राजा, चंद्रा से पूछता है कि तभी पनीर-पालक का बर्तन पकड़े हुए डोंजा खान बर्तन को गिरा देता है.
“अब आपको किसने कहा इसे गिरा देने के लिए. हम क्या आपके सामने बात भी नहीं कर सकते.” राजा, डोंजा खान को डांट लगाता है. चंद्रा, डोंजा खान की इस हरकत पर हैरान हुए जा रहा था.
           अब वहां ‘सैंफु’ नाम का एक सफाई कर्मचारी बौना आता है. उसने हाथों में एक लम्बा डंडे वाला पोछा था और पीठ पर एक झाड़ू बंधा हुआ था. शरीर पर कई तरह के साफ़ करने वाले ‘लिक्विड डिटर्जेंटस’ की कई बोतलें टंगी हुई थीं. फर्श पर गिरी हुई सब्जी को साफ़ करने के बाद वो देखता है कि थोड़ी सी सब्जी डोंजा खान के चेहरे पर भी लगी हुई थी. वो एक कपड़ा निकालकर उसका मुंह पोछे से साफ़ करना शुरू कर देता है. इस बात से गुस्साया डोंजा खान उसे धक्के मारकर वहां से निकाल देता है.
           अंत में सभी के लिए खास शाही ‘लिल्ली दूध’ लाया जाता है. हर प्रकार के मेवों से सजा दिखने में प्यारा, ये पेय सभी के आकर्षण का केंद्र बिंदु बना हुआ था. राजा के पीना शुरू करते ही सभी उसे पीते हुए उसकी वाह-वाही करने लगते हैं. बस राणा जी को छोड़कर. वो अभी भी डर रहा था. लेकिन उस दूध के शीशे के गिलास में तैरते वो रंग-बिरंगे मेवे राणा जी को जैसे दूध को अपने हलक में उतारने के लिए ललचा रहे थे. और दूध का मजा लेते सबके मुंह उसे अपना संयम तोड़ने के लिए कह रहे थे. राजा के कहते ही राणा जी से रुका नहीं जाता और वो अपना गिलास उठाकर अपने ओठों से लगा लेता है. चंद्रा का ध्यान खामा की और ही था. उत्सुकता में इंतज़ार करता खामा का चेहरा जैसे किसी आने वाले नतीजे का इंतज़ार करने लगता है कि तभी:

“आआ..ईईइइ..” किसी डायन जैसी चिल्लाहट से सब उछल पड़ते हैं. राजकुमार के तो दूध का गिलास ही छलक जाता है.
“क्या हुआ सेनापति जी, क्यों चिल्लाए? हमारे पेट का सारा दूध दहीं बन गया....” राजकुमार पूछता है.
“क्या बतमीजी, है सेनापति जी. हमारा सारा मेकअप बिगड़ गया.” राजकुमारी अदा दिखाते हुए डांटती है. दूध राजकुमारी के चेहरे पर जो छलक गया था.
“इ..इ....इसमें करंट है.” राणा जी गिलास को मेज पर पटकते हुए कहता है.
“करंट? कैसा करंट?. हमे तो नहीं लगा. आपको वहम है.” जादूज पूछता है.
“जादूज जी, इसे पीते ही हमें झटका लगा. तेज झटका. हम इसे नहीं पिएंगे.” राणा जी एकटक जवाब देता है.
“कोई झटका नहीं है. हम भी तो पी रहे है क्यों पिता जी....?” राजकुमारी, राजा को पूछने के लिए राजा की और देखती है तो देखती है कि राजा अपनी कुर्सी पर ढेर पड़ा था और सारा दूध उसकी दाढ़ी पर. उसे होश में लाया जाता है.
“क..कौन..कौन चींखा था.” राजा होश में लाए जाने के बाद गुस्से से पूछता है.
“माराज, साडे राणा जी सिगे.” खामा झट से बता देता है.
“राणा जी इतने जोर से.....इस तरह तो जंगल की ‘ब्ला’ भी नहीं चिल्लाती. हमारी सारी दाढ़ी नहा गई.” राजा अपने दिल पर हाथ रखते हुए कहता है. कि तभी डोंजा खान भी जोर से चिल्ला देता है.
“अब तुमने कोन सा दूध पी लिया.? क्यों कर चिल्लाए?” राजकुमार पूछता है तो डोंजा खान कहता है कि राजा के हुकुम पर उसने ऐसा किया था. उसकी और कोई भी ध्यान ना देकर सभी राणा जी की और देखने लगते हैं.
“मराज, इसमें म्हारी गलती न होवे. दूध के गिलास मां करंट से. पीते ही जोर का झटका लागा.” राणा जी अपनी सफाई देते हुए कहता है. लेकिन राजा उसे जबरदस्ती गिलास खत्म करने की आज्ञा देता है. जो उसे पूरी करनी पड़ती है.
“आ..आं’,  ‘आ..आं’” मराज मन्ने क्षमा करें.” राणा जी के हाथों से छूटकर गिलास मेज पर सीधा खड़ा गिर जाता है. उसे फिर से दो कोशिशो में झटका लगा था.
“हमें तो कोई झटका नही लगा. आप क्या कहते हैं जादूज जी?” राजा हैरान हो पूछता है.
“हमें भी नहीं लगा. दूध तो बड़ा ही आनंद दायक है, क्यों खामा जी” जादूज, खामा की और मुस्कुराते हुए कहता है तो खामा मुस्कुराते हुए नीचे देखने लगता है.
“अजीब बात है. इसकी जांच के लिए ‘विज’ को बुलाया जाए.” राजा आदेश देता है. ‘विज’ कुछ ही पलों में आ पहुंचता है.
“ह्ह्ह्हह....म्म्म...म्माह्ह्ह्हराआजज्ज्ज....क्क्की....ज्ज्जय...ह्ह्ह्हो.” एक हिलता हुआ बौना कांपती हुई आवाज़ में राजा को सलाम करता है. बीच-बीच में वो ऐसे हिल रहा था मानो उसे बिजली के झटके लग रहे हों. उसके बाल खड़े थे मानों करंट लगने की वजह से ऐसे हुए हों. वो एक अजीब सी वेश-भूषा में था. उसकी पैंट में प्लास, पेचकस, मीटर, टेप लटकी और चिपकी हुई थीं. उसके कपड़ों से जगह-जगह से तारें निकली हुई थीं जिनसे बीच-बीच में चिंगारियां निकल रही थीं. वो किसी मैकेनिक की अस्त-व्यस्त दूकान से कम नहीं दिख रहा था.
           ‘विज’ को, गिलास से राणा जी को लगे बिजली के झटकों की वजह ढूंढने के लिए कहा जाता है. जिसके  

लिए पहले ‘विज’ उस गिलास में अपनी एक उंगली डालता है और एक हल्का झटका महसूस करता है.
“मुब्बब्बबारक हो आ...आ..आ.आप सही थे...इसमें क्क्क्रर्रन्न्नट है.” कांपता हुआ ‘विज’, राणा जी से हाथ मिलाता है.
“आआआआ....ऐ भाया आप अपणा काम करो, हाथ ना मिलाओ.” राणा जी अपने हाथों को मलते हुए कहता है. राणा जी को ‘विज’ से हाथ मिलाते हुए भी झटका लगा था.
           ‘विज’ अक्सर अपनी जेब में बैटरी लेकर घूमता था जिससे उसे झटके लगते रहते थे और उससे हाथ मिलाने वाले को भी. इसलिए लोग अक्सर उससे हाथ मिलाने की जगह उसे दूर से ही नमस्ते कर दिया करते थे. लेकिन झटकों से बौखलाया राणा जी इस बात को भूल गया था. अब ‘विज’ राणा जी से माफ़ी मांगते हुए एक छोटा सा बल्ब निकालता है जिससे दो तारें जुडी हुई थीं. वो जैसे ही उन तारों को दूध के गिलास में डुबाता है वो छोटा सा बल्ब चमक उठता है जो इस बात की पुष्ठी कर देता है कि गिलास में करंट था. गिलास को खाली करने पर उसमें एक बैटरी से जुड़ी तारें निकलती है. अब जाते हुए ‘विज’ सबसे हाथ मिलाने की कोशिश करता है लेकिन सभी अपने हाथ जौड़कर उसे प्रणाम कर देते हैं. झटके खाता हुआ ‘विज’ वहां से चला जाता है.
           अगले दिन चंद्रा नाश्ता करने के बाद लिल्लीपुट के अपने दर्शन के लिए दोनों सैनिको के बिना अकेले ही निकल पड़ता है. इस बार वो शहर का रास्ता न लेकर कुदरत को निहारने के लिए गांव का रास्ता पकड़ लेता है. थोड़ा पैदल चलने के बाद उसे लिल्ली गांव दिखाई देता है. हर गांव की तरह प्रकृति की छांव में गांव के घर बड़े ही खूबसूरत लग रहे थे, जो शहर के घरों की ही तरह थोड़े से अजीब और प्यारे थे. पहले चंद्रा, ‘कुम्भ’ कुम्हार के पास पहुंचता है. उसकी झोंपड़ी घड़े के जैसी दिखती थी जिसके ऊपर खपरैल वाली छत थी. कुम्भ के बनाए नए-निराले घड़ों की आकृतियों को देख चंद्रा हैरान रह जाता है. चंद्रा को कुम्भ अपने ही स्टाइल में घड़े दिखाता है:
“देखो कुम्भ के ये घड़े. नये-निराले, छोटे-मोटे और बड़े.”
           घड़ों की तारीफ़ करते हुए चंद्रा गांव के बारे में पूछता है. कुम्भ उसे गांव में रह रहे लगभग सभी लोगो के बारे में बता देता है, सरपंच से लेकर नाई तक. कुम्भ, चंद्रा को जंगल की और ना जाने की सलाह भी देता है. चंद्रा के कारण पूछने पर वो जंगली जानवरों के होने की बात कहता है. उससे बात करके चंद्रा आगे बढ़ जाता है. आगे ‘बधिया’ बढ़ई लकड़ी पर कुछ काम कर रहा था. उसकी दुकान लकड़ी के लठों से बने पलंग जैसी दिख रही थी. अंदर कई आकर्षक दिखने वाले पलंग, मेज, कुर्सी, स्टूल वगैरह बने हुए थे जो साइज़ में बच्चों के लिए बने हुए लग रहे थे. चंद्रा दुकान के अंदर खड़ा भी नहीं हो पा रहा था इसलिए वो वहां बैठकर ‘बधिया’ से उसके काम के बारे में पूछता है. बधिया अपने काम में लगा होने की वजह से ज्यादा बात नही कर पाता है और चंद्रा को सरपंच से मिलने की सलाह देता है. साथ ही जंगल की तरफ ना जाने की चेतावनी भी दे डालता है. चंद्रा घुटनों के बल बाहर निकलता है और दरवाजे के पास एक पट्टी लगी हुई देखता है, जिसपर लिखा था:
‘बात ना कर पाने के लिए है खेद. सब कुछ मिलेगा पलंग, कुर्सी हो या मेज. नाम है ‘बधिया टक्का’, हर माल मिलेगा बढ़िया-पक्का’.
           अब चंद्रा, सरपंच से मिलने के लिए आगे बढ़ जाता है. अगली झोंपड़ी ‘नईया’ नाई की थी. वहां कुछ बौने अपने बाल कटवाने और दाढ़ी बनवाने आये हुए थे. एक लम्बे आदमी को अपनी दुकान के बाहर खड़े देख नईया और बाकी सभी बौने चुप हो जाते हैं और चंद्रा की और हैरानी से टक-टकी लगाए देखने लगते हैं.
“हजामत बनानी है का?” नईया कुछ अकड़ और कुछ चिढ़ भरे अंदाज़ में पूछता है. चंद्रा द्वारा सरपंच के घर का रास्ता
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पूछने पर नाई एक पगडंडी की और इशारा कर देता है
“अरे नईया भिया आप इस लम्बू की ह्ज्जाम्त कयसे बनाते., शटूल लगाई कर.” दाढ़ी बनवा रहा बौना हंसकर पूछता है.
“अरे..हट. हम काहे ऊंचा जाएं. उका ही भुइयां बिठाई देंगे और खड़े-खड़े ऐसी ह्ज्जामत करेंगे, ऐसी ह्ज्जामत करेंगे कि ओ ससुरे के सर की सारी जूएं ही मर जाएंगी.” सभी ठहाका मर कर हंस पड़ते हैं.
           चंद्रा इसे अनसुनी करके आगे बढ़ जाता है. सामने खेत लहलहा रहे थे जो ‘किस्सो’ नाम के किसान के थे. किस्सो एक मिलनसार बौना था. लेकिन इस बात से परेशान रहता था कि उसकी एक भी सन्तान नही थी. अगर होती तो वो और भी ज्यादा फसल उगा सकता था. वो चंद्रा को अपने खेत और फसल दिखाता है. वो अपने खेत के जानवरों से भी चन्द्रा की मुलाक़ात करवाता है, ‘डग्गा’ कुत्ता, ‘कती’ बिल्ली, ‘मलेलु’ बकरा जो हर समय मै-मै करता रहता था. उसका एक दांत भी गायब था, ‘प्ग्गु’ सुअर, ‘ककड़’ मुर्गा और एक मुर्गी. किस्सो इन सभी को अपनी सन्तानों की तरह पालता था. उसकी पत्नी ‘किसनी’ उसके हर काम में हाथ बांटती थी. अब चंद्रा वहां से रुक्सत हो कर सरपंच से मिलने के लिए चल पड़ता है.  
           वो एक बरगद के पेड़ के पास लगी हुई सभा में पहुंचता है जिसके बीच एक पगड़ी वाला अधेड़ उम्र का व्यक्ति बैठा हुआ था. यही सरपंच होगा, सोच चंद्रा उस सभा की और बढ़ जाता है. वहां कई ग्रामीण बौने आये हुए थे. उसके पहुंचते पर सभा भी समाप्त हो चुकी थी. कुछ बौने जाने लगे थे. जो रुके थे वो चंद्रा को देख कर रुक ही जाते हैं. सरपंच उठकर चंद्रा का स्वागत करता है लेकिन इस बात का भी ध्यान रखता है कि बाकी चंद्रा को नापसन्दिगी की नजर से देख रहे थे. सरपंच पगड़ी, धोती, खाकी जैकेट पहने एक मजेदार बौना लग रहा था. सरपंच चंद्रा को राजकुमार की जान बचाने के लिए धन्यावाद देता है और साथ घर चल चाय पीने का न्योता देता है. इतने में वहां बैठे लोगों में फुसफुसाहट बढ़ गई थी. सरपंच सभी को शान्ति रखने के लिए कहता है तो वहां बैठा ‘बलवा’ नाम का एक हट्टा-कट्टा बौना जो पैंतीस साल के लगभग का होगा अपनी लठ उठाकर खड़ा हो जाता है और चंद्रा के लिल्लीपुट में आने का विरोध करता है. सरपंच उसे बैठने के लिए कहता है और सबको बताता है कि चंद्रा एक शाही मेहमान है.
           सरपंच चंद्रा को अपने घर ले जाकर उससे, उसके और उसके घर-बार के बारे में बात करता है. लेकिन चंद्रा को तो लिल्लीपुट को जानने में ही दिलचस्पी थी. तो सरपंच उसे चाय पीते-पीते बताता है कि लिल्लीपुट में उसे हर कुछ दोस्ताना ही मिलेगा. हालांकी वो इस बात से भी इन्कार नहीं करता है कि अभी लिल्लीपुट में बहुत से लोग उससे ‘बाहरी’ होने की वजह से डरते हैं और शायद नफरत भी करते हैं. लेकिन उसे डरने की जरूरत नहीं. जब तक कि वो जंगल की और ना जाए. अब चंद्रा को ‘कुम्भ’ और ‘बधिया’ की दी चेतावनी भी याद आ जाती है और वो इसके रहस्य के बारे में पूछता है. सरपंच बात को यह कहकर घुमाने की कोशिश करता है कि उसके बारे में बात ना ही की जाए तो अच्छा होगा और ‘कौन जाने वो उन्हें देख ही रहीं हों’. चंद्रा के जोर डालने पर भी जब उसे कुछ पता नहीं चलता तो वो वहां से विदा लेता है और आगे बढ़ जाता है. पगडंडी पर कुछ आगे निकलने पर उसे किसी के गुनगुनाने की आवाज़ आती है. वो आवाज एक झोंपड़ी से आ रही थी.
           नजदीक पहुंचने पर चंद्रा क्या देखता है कि सेनापति राणा जी उस झोंपड़ी के बाहर अपने छुटके से घोड़े के साथ खड़ा था. वो घोड़े की गर्दन को सहला रहा था. चंद्रा को देख राणा जी झट से अपने घोड़े पर सवार होकर वहां से चला जाता है. अब चंद्रा झोंपड़ी में झांकता है तो उसे सुपर्णा गीत गुनगुनाती हुई दिखाई देती है. उसके साथ एक और बौना बैठा था जो उसका गुरु लग रहा था और बाकी सभी बौने ‘साजों’ पर बैठे थे. चंद्रा को देखते ही सुपर्णा गाते-गाते कुछ शर्मा जाती है. छत चंद्रा के सिर के साथ लग रही थी तो गुरु के इशारे पर चंद्रा बैठ जाता है. चंद्रा सुपर्णा के इस गुण से बड़ा खुश होता है. गीत बहुत मधुर था लेकिन बीच-बीच में गुरु जी की जुगलबंदी सारा मजा किर-किरा कर देती

थी. बेशक वो सुर का तो पक्का था लेकिन सुरीला तो कतई नही था. गाना खत्म होता है तो सुपर्णा कक्षा खत्म कर चंद्रा के साथ बाहर आ जाती है. चंद्रा से मिल सुपर्णा बड़ी खुश नजर आ रही थी. वे दोनों बातें करते-करते आगे बढ़ जाते हैं. चंद्रा, सुपर्णा से राणा जी के झोंपड़ी के बाहर खड़े होने की बात कहता है.
“छोड़िये उन्हें, वो ऐसे ही हैं.” तो सुपर्णा कुछ सोचकर बात को टाल देती है.
           सुपर्णा को थोड़ी सिर दर्द हो रही थी. सो वो अस्पताल जाकर दवा लेने की बात करती है तो चंद्रा भी साथ चल अस्पताल देख लेने की बात कहता है. अब कुछ यहां-वहां की बातें करते हुए दोनों शहर पहुंच जाते हैं. सभी लोग एक छोटे कद की लड़की को एक लम्बे कद के बाहरी इंसान के साथ बड़ी हैरानी के साथ देख रहे थे. मानो वो एक गुनाह कर रही हो. दोनों अस्पताल के सामने थे. अंदर जाकर वो डॉक्टर से मिलने के लिए नर्स के पास जाते हैं. नर्स सुपर्णा की पर्ची बनाकर अपने पास रख लेती है और बारी का इंतज़ार करने के लिए कहती है. अब ‘फरुआ’ नाम का एक  बौना नर्स के पास पहुंचता है और बताता है कि खेतों में हल जोतते हुए बैल ने अपने सींग से उठाकर उसे पटक दिया था. उसके माथे और टांगों से थोड़ा खून टपक रहा था. नर्स जल्दी से उसे डॉक्टर के कमरे में ले जाती है. लंगड़ाकर जाते हुए फरुआ की पैंट में, पीछे हुआ एक छेद, सारी कहानी बयाँ कर रहा था जिसका इज़हार फरुआ ने नहीं किया था.
           अंदर कमरे में एक विदेशी बौना डॉक्टर ‘मिस्टर ड्रॅाक’ बैठा हुआ था. उसकी जड़ें इंग्लैंड से जुड़ी हुई थीं. कई सालों तक यहां-वहां भटकते रहने के बाद जादूज की सहायता से वो लिल्लीपुट में आकर बस गया था. उसकी मेज पर अजीब-अजीब सी चीजें पड़ी हुई थीं, जैसे-एक बड़ा सा हथौड़ा, कुछ डरावनी तस्वीरें, बदबूदार जुराबें, एक नकली हाथ जिसकी एक उंगली बाहर निकली हुई थी. उस नकली हाथ के ऊपर लिखा हुआ था, ‘उल्टी करवाने के लिए, उंगली को गले में डालें.’ ऐसी बहुत सी अजीब चीजें मेज पर सजी हुई थीं. ‘फरुआ’ की जांच करते हुए डॉक्टर अपने ओठों को बार-बार चाट रहा था. जैसे उसका गला सूख रहा हो. जांच के बाद डॉक्टर, नर्स को फरुआ को इंजेक्शन लगाने और मरहम पट्टी करने की सलाह देता है. नर्स उसे लेजाकर उसकी पट्टी करना शुरू कर देती है. 
           अगला मरीज ‘घसीटू’ नाम का एक बिखारी था. फटा कुरता पहने, बिखरे बालों, मैले-कुचैले मुंह-हाथों के साथ एक बौना खुद को अपने नीचे बंधी एक चटाई पर घसीट-घसीट कर डॉक्टर के पास ले जाता है. डॉक्टर के पास जाकर वो चटाई पर से खड़ा होकर कुर्सी पर बैठ जाता है. वो डॉक्टर को बताता है कि खुद को घसीटते रहने की वजह से उसके पुठों में बहुत तेज दर्द होने लगी थी. उसी समय फरुआ अंदर आ धमकता है और डॉक्टर को अपना एक पुट्ठा दिखाकर कहता है कि नर्स ने सूई उसके पुठे में ही लगी छोड़ दी. उसे इस बात का तो तब पता चला जब उसने पैंट पहनने की कोशिश की. डॉक्टर उसे समझा-बुझाकर वहां से भेज देता है. अब डॉक्टर, घसीटू को भी नर्स के पास जाकर इंजेक्शन लगावाने के लिए कहता है. लेकिन फरुआ की हालत देख घसीटू, नर्स के पास जाने की हिम्मत नहीं करता है और डॉक्टर से ही इंजेक्शन लगा देने की विनती करता है.
           अब डॉक्टर अपने कांपते हाथों से इंजेक्शन को भरकर फरुआ को अपना हाथ आगे करने के लिए कहता है. इंजेक्शन ‘नस’ में देना था. लेकिन कुशलता ना होने की वजह से इंजेक्शन एक जगह पर सही ढंग से ना लगा पाने के कारण घसीटू के हाथों पर कई जगह पर गोल उभार बन जाते हैं. जिससे चिढ़कर घसीटू, डॉक्टर पर नाराज़ हो जाता है.
“ये क्या लड्डू बना दिए डॉक्टर साहब?” चिढ़ा हुआ घसीटू अपने कई जगह से सूजे हुए हाथ को दिखाते हुए कहता है.
“चलो अच्छा हुआ. अब तुम्हे मिठाई का दूकान जाने का जरूरत नाहीं.” हंसते हुए डॉक्टर, घसीटू के कंधे पर हल्के से थपकी देता है.
“वो सूई छोड़ देती हैं. आप लड्डू छोड़ देते हो, कुछ तो रख लिया करो अपने पास.” घसीटू चिढ़कर बोलता हुआ कमरे

से बाहर चला जाता है.    
           अब एक और बौने की बारी थी. घसीटू से उसके लड्डुओं की जानकारी लेकर वो भी डॉक्टर के पास चला जाता है. उसकी जांच के बाद डॉक्टर उसे भी इंजेक्शन लगाने की सलाह देते हुए इंजेक्शन भरने लगता है. इंजेक्शन भरने के बाद डॉक्टर जैसे ही उस मरीज की और मुड़ता है तो देखता है कि वो बौना दरवाजे को खोलकर भाग रहा था. सुपर्णा की भी बारी आ जाती है. इंजेक्शन की सलाह पर चंद्रा ओर सुपर्णा इसके लिए एकसाथ मना करके खाने की दवा लेकर वहां से चले जाते हैं. उसके बाद दोनों ही अपनी-अपनी राह चले जाते हैं.
              एक दिन ‘लिल्ली’ स्कूल के एकमात्र मास्टर जी अपनी विशेष पुस्तक के साथ बड़े परेशान से महल की और जा रहे थे. उनकी पुस्तक के सभी पन्ने खाली थे. उनका यह मानना था कि स्टूडेंट खाली पन्नों की तरह ही होता है जिसमे कुछ भी भरा जा सकता है, अच्छा या बुरा. लेकिन अपनी खाली पुस्तक के उलट मास्टर जी अपने ज्ञानवर्धक मुहावरों से भरे रहरे थे. महल में राजदरबार लगा हुआ था. सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति जैसे कि साइंटिस्ट महोदय, गीतकार, जादुगर जादूज, सेनापति, राजकुमार, राजकुमारी, राष्ट्रपति, आदि अपने-अपने स्थानों में बैठे हुए थे. वहां कई बौने अपनी-अपनी समस्याएं लेकर आए थे. अक्सर ही इस तरह से ‘लिल्ली’ निवासी अपनी-अपनी समस्याएं वहां उपस्थित महानुभावों के समक्ष रखते थे और यथा उचित समाधान पाते थे. तभी लिल्लीपुट की शाही दरबारी धुन के बीच राजा अपने सिंहासन की और पधारता है.
”आज काफी ‘समस्याएं’......हमारा मतलब प्रजा आई हुई है. दरबार आरम्भ किया जाए.” राजा आदेश देता है. दशहरा नजदीक था तो राजा सबसे पहले लिल्लीपुट के प्रेसिडेंट से दशहरे की तैयारियों के बारे में पूछता है.
“माहराज तैयारियां जोरों-शोरों पर हैं. अच्छाई पर बुराई की विजय के प्रतीक रावण और उनके भाइयों के पुतले अपने विनाश के लिए तैयार हैं. और बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक राजा ‘राम चंद्र जी’, राम लीला की समाप्ति के पश्चात पुतलो को देहाग्नी दिखाने के लिए तैयार हो जाएंगे. आप निश्चिन्त होकर वोट हमें ही करीएगा.” कहते हुए प्रेसिडेंट अपने पार्टी का स्टीकर पास ही खड़े साइंटिस्ट की पीठ पर चिपका देता है.
अब सभा आरम्भ करने का आदेश देकर राजा पहले फरियादी को बुलाता है, जो ‘किस्सो’ किसान था.
“किस्सो सुनाओ अपना ‘किस्सा’.” राजा चुटकी लेते हुए कहता है    
”महाराज, राणा जी के घोड़े ने मेरे खेत रौंद-रौंदकर, रौंद-रौंदकर सारी फसल बिगाड़ रखी है. बार-बार कहने पर भी राणा जी के घोड़े को काबू में करने वाला कोई भी नही है. आप ही कुछ सुझाइए.” किस्सो अपना ‘किस्सा’, मतलब अपनी व्यथा सभा के समक्ष रखता है.
“अच्छा तो राणा के घोड़े ने तुम्हारी फसलों को चार बार रौंदा है.” राजा पूछता है. 
“नहीं, महाराज.” किस्सो भन्नाकर रौंदा सा होकर कहता है.
“तो तुमने ‘रौंद-रौंद’ चार बार क्यों कहा. जितनी बार रौंदा है उतनी बार कह कर सुनाओ ताकि ज्ञात हो सके....”                
“इसका कोई हिसाब ही नही कितना बार रौंदा है.”  किस्सो दुखी हो कहता है
“हिसाब नहीं है? तो जाओ, पहले हिसाब लगा कर आओ. ताकि न्याय हो सके. अगला कौन है..” राजा अगले फरयादी को
बुलाने लगता है तो किस्सो फिर से बोल पड़ता है.

“मेरा मतलब महाराज बहुत बार रौंदा है. पूरी मक्की की फसल बर्बाद हो गई है. कुछ करें.” किस्सो फरयाद लगाता है
                         अब राजा, राणा जी से उसका पक्ष मांगता है तो राणा इस बात से इन्कार करता है और किसान से सुबूत मांगता है. तो किसान भी घोड़े के पेट में न झांक पाने की बात कहता है. इसपर राजा डॉक्टर को घोड़े का पेट काटकर उसमें से सुबूत ढूंढने और फिर पेट को टांको से सिलने का हुकुम देता है.
“नहीं, महाराज! खाए होंगे.....इस कमबख्त णे खाए होंगे. ना जाणे म्हारी पीठ पीछे कहां-कहां ‘डैश...डैश’ करता फिरे है ये, ‘मुंह काला’” राणा जी चिल्ला पड़ता है.
            तो राजा, राष्ट्रपति को राष्ट्रीय खजाने से ‘किस्सो’ को दो हजार रूपये हर्जाना देने की बात कहता है. इस फैसले से किस्सो और राणा जी दोनों खुश हो जाते हैं. लेकिन जब राजा, राणा जी को चार हजार रूपये जुर्माना लगाता है तो राणा जी की शक्ल देखने वाली हो जाती है. उसके बाद माली ‘माल्लो’ भी नर्स पर इल्जाम लगाता है कि वो सूई लगाने के बाद सूई एक तरफ के पुट्ठे पर लगी छोड़ देती है. तो राजा सलाह देता है कि ‘वो दूसरे पर भी लगवा कर बैलेंस करवा ले’ और हंसने लगता है. अब हमारे ‘बोंगाली बाबू’, बैंक मैनेजर साहब पीसा बाबू सामने आते हैं:
“कहिए हमारे पैसों के खाताधारी, मैनेजर साहब, कैसे आना हुआ.” राजा बड़ी ही खुश मिजाजी से पूछता है.
“कीधर का मैनेजर, मोहराज? पुरे बैंक में ओकेला ही एक कोर्मचारी हूं क्रोप्या कोर के नियुक्तियां कोरिये.” मैनेजर खीजकर कहता है. राजा ये मामला राष्ट्रपति से सुलझाने को कहता है.
“यार मैं भी तो पुरे लिल्लीपुट में अकेला राष्ट्रपति हूं. मैं कुछ कहता हूं. काम मन लगा के किया करो और हां! vote for me.” कहते हुए राष्ट्रपति, मैनेजर की पीठ पर अपना ‘पार्टी स्टीकर’ चिपका देता है.
           इतने में दरबार में शाही खानसामा आता जाता है. आज उसने ‘केक’ जैसी दिखने वाली टोपी पहनी हुई थी और हाथ में एक लम्बी कड़छी पकड़ी हुई थी. वो राजा से अपनी परेशानी का हल मांगता है.
“माराज, मेरी शिकैत सेनापति जी कोलों सी. मैं जदों वी उदे कोलों मुर्गा मंगादा...ओ जिंदा मुर्गा मेरी रसोई ते शड जांदा. मैं रोटी बनावां की मुर्गे फड़ां.” खामा सिंह परेशान हो कहता है. इसपर राजा सेनापति को मुर्गे को बांधकर लाने का हुकुम सुनाता है और खानसामे को रसोई में जाकर दाल जांचने के लिए कहता है कि कहीं वो जल ना जाए.
           अब नांव वाला ‘नवि’ अपनी नांव में एक छेद हो जाने की शिकायत करता है. तो राजा उसे दूसरा छेद करवा लेने का हुकुम देता है ताकि दूसरे छेद से पानी बाहर निकल सके. इसी तरह कई फरियादी दरबार में आते रहते हैं और राजा या वहां बैठे अफसरों से उनके ऊट-पटांग हल पाते रहते हैं.
“अंत निकट है.” साधू भेसधारी एक बौना दरबार में घुस आता है. ”...निकट है....” साधू के कंधे पर बैठा एक तोता उसकी कही इस बात को दौराता है. हाथों और गले में रुद्राक्ष मालाएं, चेहरे पर भस्म, माथे पर भस्म रेखाएं, दाहिने हाथ में कर्मंडल और बाईं और ‘साधू दंड’ जिसके बीच में एक छोटा सा नगीना आंख जैसा दिख रहा था. जांघों पर धोती और कंधे पर एक तोता, झूमती हुई काय के साथ वो एक अलग ही शक्शियत लग रहा था.
“किसका....?” राजा घबराकर पूछता है.
“आपका.......सबका.” भविष आगे झुककर बड़ी-बड़ी आंखें निकालते हुए जोर से कहता है.
             
         
इतना सुनते ही राजा बेहोश हो जाता है. अब दबी हुई हंसी के साथ दरबार में आवाजें आने लगती हैं कि राजा का नाम ‘भ्योस सिंह लिल्लीया’ है या ‘बेहोश सिंह लिल्लीया’? तो राजा को होश में लाया जाता है. अब भविष शिकायत करता है कि उसकी इस भविष्यवाणी पर कोई भी ध्यान नहीं देता है और ‘अंत सच में ही निकट है’. तो राजा उसे नजर अंदाज करता हुआ और शिकायतें पड़ने के लिए कहता है. राजा के इस बर्ताव पर भविष अपने कर्मंडल में से घूंट पीते हुए जाते-जाते ठहाका मारते हुए कहता जाता है:
“इग्नोरेंटा ऐटिटयूडा”, “अंत आने वाला है, हर कोई जाने वाला है..हा.हा.हा..अंत निकट है.”  “निकट है.”...“निकट है” उसका तौता ‘टोतु’ दोहराता है.
अब सेनापति एक पट्टिका निकालकर कुछ अजीब सी शिकायत पढ़ने लगता है:
“आह्र्रर्र्र...ह्म्म्मर्र्र्रर...ग्र्र्रर्र्र्र...ख्र्र्रर्र्र्र.” उसे टोकते हुए राजा पूछता है कि वो क्या पढ़ रहा है और साथ ही उसे अपना गला साफ़ करके आने की भी सलाह देता है.
“महाराज, म्हारो गला शतप्रतिशत सही है. ऐ शिकायत जायत की है. उसणे एही सब लिखो है.” सेनापति अपनी सफाई देता है तो राजा उसे अगली शिकायत पढ़ने के लिए कहता है.
           अगली शिकायत समुद्री लुटेरों की थी कि आजकल शाही जहाजों में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है जिससे उन्हें लूटने में कठिनाई होती है. तो लुटेरों द्वारा सुरक्षा नियम कुछ ढीले किये जाने की मांग की गई थी. इंतना पढ़ते ही उस पट्टिका में एक सफेद भुताहा आकृति प्रकट होती है और कहती है, “मेरी भी कुछ सुन लो.” इस भुताहा आकृति को देखते ही सेनापति डर कर पट्टिका नीचे गिरा देता है. अब मास्टर जी आगे आकर अपने स्कूल के बच्चों के पढ़ाई से ऊबने की बात रखते हैं. राजा अगले दिन साइंटिस्ट, संगीतकार, जादुगर और सेनापति को स्कूल जाकर बच्चों की पढ़ाई का माहौल बदलने का सुझाव देता है.
           अगली सुबह आसमान बादलों से ढका था और सभी महानुभाव स्कूल पहुंच चुके थे. स्कूल की इमारत किसी स्टैंड पर रखी खुली किताब जैसी लग रही थी. जिसकी छत उस किताब के पन्नों जैसी थी. लिल्लीपुट की यही खासियत है कि किसी इमारत को देखकर ही आप उसका अंदाजा लगा सकते हैं. अंदर कक्षाओं में किताबों, बस्तों, पैंट-कमीज़ जैसे दिखने वाले बैंच लगे हुए थे. सभी महानुभावों ने बारी-बारी अपनी कक्षाएं लीं जिसे सभी बच्चों ने कुछ हद तक पसंद भी किया. साइंटिस्ट ने अपने विज्ञान के करतब दिखाए जिन्हें बच्चों ने बेहद पसंद किया और साइंटिस्ट की लैब देखने की मांग की. साइंटिस्ट उन्हें अगले दिन अपनी लैब दिखाने का वायदा करता है. उसके बाद बच्चों का चहेता जादूज अपने छुटपुट जादू के खेल बच्चों को दिखाता है और जादुई गोलियां बच्चों को खाने को देता है. तभी चंद्रा वहां आ पहुंचता है. जादूज उसे बच्चों का मन पढ़ाई में लगाने का तरीका निकालने को कहता है.
           चंद्रा खेल-खेल में बच्चों को पढ़ाने की सोचता है. वो बच्चों की एक टोली तैयार कर, सभी को मैदान में इकट्ठा होने के लिए कहता है. वो सभी बच्चों और महानुभावों के समक्ष एक नाटक पेश करता है जो सम्राट अशोक पर आधारित था. इसमें वो बच्चों के नाटक द्वारा सम्राट अशोक के गद्दी पर बैठने से लेकर, युद्ध जीवन और बोध जीवन अपनाने तक की एक छोटी लेकिन प्रभावी झलकी पेश करता है. सभी इसे काफी पसंद करते हैं और बहुत कुछ सीखते भी हैं. जो टोली नाटक प्रस्तुत कर रही थी, वो चंद्रा के पास जाती है और उसे एक प्रतीक चिन्ह बनाकर देने की जिद करती है. चंद्रा एक शीशे की खाली बोतल में रेत भरकर, उसका एक गुड्डा सा तैयार करके बच्चों को दे देता है. इसके बाद सभी अपनी-अपनी राह पकड़ कर चले जाते हैं.
           महल की और जाते हुए चंद्रा को रास्ते में एक बौना दिखाई देता है जिसने गडरिये के गंदे कपड़े पहने हुए
          
थे. वो सीटियां बजाते हुए अपनी बकरियों को आवाजें लगा रहा था. लेकिन बहुत देर तक भी जब कोई बकरी बाहर नहीं आती तो चंद्रा, डोंजा खान से इसकी वजह पूछ्ता है. डोंजा खान चंद्रा को बताता है कि एक साल पहले एक तूफ़ान में फंसकर इस गडरिये की बकरियां कहीं खो गई हैं. उन्ही को खोजते हुए वो ‘गद्दु’ गडरिया सारा दिन यहां-वहां भटकता रहता है. वो आपस में बातें कर ही रहे थे कि ‘गद्दु’ गडरिया उनके पास आकर अपनी बकरियों का पता पूछता है. दोनों के मना करने पर गडरिया सीटियां मारता हुआ वहां से चला जाता है. उसके चले जाने पर डोंजा खान, चंद्रा को ‘गद्दु’ गडरिये की शादी की घटना बताता है. वो बताता है कि अपनी शादी के अगले ही दिन ‘गद्दु’ अपनी भेड़ो को चराने दूर पहाड़ों पर निकल गया था. रास्ते में मौसम के बिगड़ जाने की वजह से उसे वहीँ रुकना पड़ा.
           बहुत देर तक जब मौसम ने कोई भी करवट ना ली तो गद्दु ने उन्ही तेज हवाओं और धूल भरी आंधियों के बीच अपनी भेड़ों के साथ घर पहुंचने की ठानी. घर पर उसकी नई नवेली दुल्हन भी तो उसका इंतज़ार कर रही थी. लेकिन रास्ते में उसके इस फैसले ने उसकी सभी भेड़ों को तूफ़ान में कहीं गायब कर दिया और खुद भी ‘गद्दु’ रास्ता भटक गया. करीब एक महीने तक भटकते रहने के बाद वो अपने घर पहुंचा तो उसे पता चला कि उसके मरने की खबर से उसके पिता का देहांत हो गया था.
           अपनी बीवी से मिलने जब वो अपने कमरे पहुंचा तो वो सो रही थी. महीनों बाद अपनी पत्नी को देख ‘गद्दु’ इतना खुश हुआ था कि उसने दरवाजे पर ही खड़े होकर जोर से चिल्लाकर उसका नाम पुकारा था. उसकी सोई हुई बीवी ने जब ‘गद्दु’ के चिल्लाने की आवाज़ सुनी थी तो वो हड़बड़ाकर उठ बैठी थी. मरे हुए ‘गद्दु’ को अपने सामने पाकर वो एकाएक ही अपने बिस्तर से उठकर उसकी और लपकी थी. बेचारा ‘गद्दु’ इस उम्मीद में अपनी बाहें फैला देता है कि अब उसकी पत्नी उसे गले लगाने ही वाली थी. लेकिन इसके उलट उसकी घबराई हुई बीवी ‘भूत..भूत’ चिल्लाती हुई घर से ही भाग खड़ी हुई थी. बहुत ढूंढने पर भी उसका कुछ पता नहीं चला था. अपनी बहू खोने के गम में ‘गद्दु’ की मां भी चल बसी थी. डोंजा खान बताता है कि इसी गम में गद्दु गडरिया पगलों सा अपनी खोई भेड़ों को तलाशता रहता है. ‘गद्दु’ गडरिये की इस मिली-जुली दास्तां को सुनते-सुनते चंद्रा महल आ चुका था.
           अगले दिन स्कूल खुलता है और सभी बचे मास्टर जी से एक और एतिहासिक कहानी सुनाने के लिए कहते हैं. लेकिन मास्टर उन्हें पाठ्यक्रम के हिसाब से चलने के लिए कहता है. आधी छुट्टी के समय सभी बच्चे साइंटिस्ट के कहे मुताबिक़ उसकी लैब देखने जाते हैं. वहां साइंटिस्ट, बच्चों को अपनी लैब के बहुत से आविष्कार दिखाता है. साइंटिस्ट की लैब में बच्चों का अच्छा समय गुजरता है. इसी तरह कुछ दिन और बीत जाते हैं. आधी छुट्टी के समय स्कूल के सभी बच्चे खेलते थे. केवल नाटक वाली उस टोली को छोडकर. वे बच्चे एक गुट बनाकर आपस में नाटक खेलते रहते थे. एक दिन मास्टर जी को सुबह-सुबह राणा जी बिना घोड़े के दिखता है. उसे कुछ हल्की चोटें आई थीं. मास्टर जी के पूछने पर वो बताता है कि रास्ते में कुछ लोगों ने पेड़ों पर से उस पर हमला बोला और उसके घोड़े को चुरा कर ले गए. उस दिन भी स्कूल में सभी बच्चे खेले पर उस टोली को छोड़कर. वो अभी भी नाटक-नाटक ही खेल रहे थे. उस शाम ‘साइंटिस्ट’ थाने में दारोगा के पास अपने किसी ‘ना दिखने’ वाले गैजेट के चोरी होने की रिपोर्ट लिखवाने पहुंच जाता है.
“अरे बांवरे जो चीज़ दिखे ना है मैं उसे ढूंढूंगा कैसे. जाओ...पैल्ले उसणे दिखन वाली बनाओ फेर एट्ठे आओ.” हवलदार ‘हवा सिंह’ चिढ़कर कहता है.
“आप सुनिए तो, वो ऐसे तो दिखता है लेकिन जब इस्तेमाल किया जा रहा हो तो, नहीं दिखता. उसे ढूंढना जरूरी है. गलत हाथों में वो किसी टाइम बम से कम नहीं.” साइंटिस्ट उसे समझाने की कोशिश करता है.
“बम्ब....आप बम बणाते हो. साइंटिस्ट हो के उग्रवादी.” हवा सिंह हैरान हो पूछता है.

“आप समझ नहीं रहे. वो एक ‘इन्विजीबिलिटी’ गैजेट है. एक बड़ी बॉल जैसा. उसके इन्विसिबिलिटी सर्किल के अंदर आने वाला हर कोई इनविजिबल हो जाता है. वो दिखेगा तो नहीं लेकिन आपको उसे ढूंढना है.” साइंटिस्ट कहता है.
“तू...माणे ना माणे. जाणा ठाने” हवा सिंह साइंटिस्ट की बातों से कंफ्यूज होकर उसे डराकर भगा देता है.
           दिन बीत जाता है और अगली सुबह ‘मिस्सो’ मिस्त्री लिल्लीपुट शहर की चार दिवारी की मुर्र्मत्त कर रहा था. सीमेंट की थोड़ी-थोड़ी मात्रा दिवार के साथ पड़ी हुई नजर आ रही थी और साथ-साथ वो अपना बनाया हुआ एक गाना भी गाए जा रहा था:
“मैं हूं मिस्त्री, दीवारों की करता हूं इस्त्री. जहां भी हो इमारत मुड़ी-तुड़ी, हाथों से मेरे मिनटों में जुड़ी.”
“ये सीमेंट नीचे क्यों गिरा रखा है.” तभी ‘मिस्सो’ को आवाज़ आती है जिससे ‘मिस्सो’ चौंक जाता है. लेकिन किसी को भी ना पाकर फिर से अपने काम में जुट जाता है.
“सीमेंट बर्बाद हो रहा है, उठाते क्यों नहीं.” फिर आवाज़ आती है, अब डरने वाली बात थी.
           मिस्सो कुछ ठहर जाता है और आस-पास देखता है कि कौन है. पर कोई हो तो दिखे. वो फिर डरते हुए तिरछी नजरों से ताकते हुए अपना काम करने लगता है. कि तभी उसे एसा लगता है कि किसी ने उसे डंडे से मारा हो. चोट इतनी अधिक तेज़ नहीं थी. उसी क्षण उसे ऐसा लगता है कि उसके ऊपर बहुत सी हल्के भार की चीजें आ गिरीं और वो जमीन पर गिर जाता है. अब कुछ पलों की अनदेखी पिटाई के बाद वो उठ कर भाग खड़ा होता है. कुछ समय बाद ‘लिल्ली’ स्टेडियम में दशहरे के लिए अपनी अंतिम तैयारियां कर रहे साइंटिस्ट को भी कुछ अदृश्य आवाजें पुतलों को सही ढंग से तैयार करने की सलाह देती हैं. ऐसा ना करने पर वो आवाजें, साइंटिस्ट को पुतलों के अंदर ही बंद करके दशहरा मनाने की चेतावनी दे डालती हैं. अब दोनों ही पीड़ित, जादुगर जादूज़ के पास पहुंचकर अपना वाक्या सुनाकर कहते है कि किन्हीं बच्चों की आत्माएं लिल्लीपुट में भटक रही हैं. जादुगर उन्हें आश्वस्त कर घर भेज देता है कि वो स्वयं इसकी जांच करेगा.
           दोपहर को बाज़ार में कुछ हल्ला मचा था. फलों-सब्जियों की रेहढ़िय़ों में से फल हवा में उठकर गायब हो रहे थे, दुकानों से चोकलेट, टॉफी, खिलोने की बंदूकें, तलवारें गायब हो रही थीं. दुकानदार डर के मारे कुछ कर भी नहीं पा रहे थे. तभी ‘‘डोंजा खान’ और ‘घोंजा राम’ वहां आ जाते हैं और अनदेखी दिशाओं में चुनौती देने लगते हैं. कुछ बच्चों की आवाजें उन्हें सम्राट की आज्ञा का पालन करने के लिए कहती है. दोनों सिपाही केवल राजा की आज्ञा का पालन करने की बात करते हैं तो उनका भी हश्र ‘मिस्सो’ मिस्त्री जैसा ही होता है. भागकर वे जादुगर के पास पहुंचते हैं और उसे बाज़ार तक साथ ले आते हैं. वहां पहुंचकर वे देखते हैं कि एक तरफ हवलदार और दूसरी तरफ सेनापति गिरा पड़ा था. पूरा बाज़ार अस्त-व्यस्त हुआ था. जादुगर को मिठाई की दूकान से हल्ला सुनाई देता है. वहां वो देखता है कि दूकान वाला डरता हुआ मेजों पर खुद प्लेटें परोस रहा था. कुछ प्लेटें खाली थीं और कुछ में से पकवान गायब हो रहे थे.
“बच्चों.........” जादुगर कर्कश आवाज़ में पुकारता है. सन्नाटा छा जाता है और सभी मेजों के हिलने की आवाजें आने लगती हैं. जैसे वहां से सभी उठ खड़े हुए हों.
“हमें जादुई गोलियां खिलाइए ना.” सन्नाटे के बीच आवाज़ आती है. जादुगर उन्हें ये सब बंद करने की चेतावनी देता है.
“सम्राट की सेना को कोई भी नहीं रोक सकता और जीत हमारी ही होगी.” एक कोने से आवाज़ आती है. फिर दरवाजा खुलता है और ऐसा लगता है मानो दुकान खाली हो गई हो.
             
           अब शाम, सभी भोगी मिलकर राजा के दरबार में सारा मामला रखते हैं. सभी लिल्लीपुट के उन बच्चों को लेकर चिंतित तो थे लेकिन उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही करने के असमंजस में भी. सभी इस मुसीबत से पार पाना चाहते थे. तभी राणा जी सामने आकर चंद्रा पर इस सब की जिम्मेवारी डालता है. दुकानदार भी उसका साथ देते हैं. राजा जादूज से उसकी राय मांगता है तो जादूज आरोप तय करने की जगह समस्या से पार पाने की सलाह देता है. राजा चंद्रा को बुलावा भेजने का आदेश देता है. रात के समय चंद्रा, राजा के कक्ष पहुंच जाता है और सारी समस्या पर अपना खेद प्रकट करता है कि वो बच्चों को सही संदेश दे पाने में असमर्थ रहा. तभी कक्ष में हल्का सा अंधेरा छा जाता है. चंद्रा, राजा से ‘विज’ को बुलाने की बात करता है तो राजा उसे शांत रहकर किसी के आने की बात कहता है. चंद्रा देखता है कि धूमिल से दिखते पर्दों में से एक मानव आकृति उभरती है जो मानो उनकी तरफ पीठ किए खड़ी थी.
“कहो ‘खबरी’, क्या है खबर?” राजा उस आकृति से पूछता है.
“नाम है खबरी लाया हूं खबर, रखो थोड़ा.....सबर.” खबरी कहता है.
           खबरी राजा को अगली सुबह महल पर होने वाले किसी अज्ञात हमले की चेतावनी देता है. ये सुनते ही राजा ‘भ्योस’ बेहोश हो जाता है. होश में आने पर राजा द्वारा हमलावर के बारे में पूछने पर खबरी बताता है कि उसने हमलावरों को केवल सुना ही है, देखा नहीं. अब राजा के दिल की धड़कन तेज हो चुकी थी. वो सेनापति को महल सुरक्षित करने की आज्ञा देता है. इस बीच चंद्रा समझ जाता है कि हमलावर कौन हो सकते थे. बस अब उसे सुबह का इंतज़ार था.
           अगली सुबह छः बजे के करीब घोंजा राम महल की प्रातःकाल की गश्त पर निकलता है तो उसे पश्चिमी दिशा का दरवाज़ा कुछ खुला मिलता है. इस पर घोंजा राम, डोंजा खान को मन ही मन यह कह कर कौसता है कि ‘वो लापरवाह है’. दरवाज़ा बंद करने के बाद वो थोड़ी ही दूर गया था कि उसे पास की झाड़ियों में ‘डोंजा खान’ बेसुध पड़ा मिलता है. घोंजा राम, ‘डोंजा खान’ को उठाकर उसकी बेहोशी का कारण पूछता है तो ‘डोंजा खान’ उसे पीछे से हुए हमले के बारे में बताता है. घोंजा राम उसे तुरंत सेनापति को सूचित करने के लिए कहता है और खुद बाकी के दरवाजों की सुरक्षा निहित करने के लिए चला जाता है. जब ‘डोंजा खान’ और सेनापति, घोंजा राम के पास पहुंचते हैं तो उसे रस्सियों से बंधा पाते हैं. अब पुरे महल में चेतावनी जारी कर दी जाती है. महल की सुरक्षा में जादुगर, हवलदार, हवा सिंह और लिल्लीपुट की आर्मी भी पहुंच जाती है. सभी महल की सुरक्षा में अपनी-अपनी जगहों पर तैनात थे कि सामने वाली मुख्य सीढ़ियों पर खड़े हवलदार से एक पत्थर टकराता है.
“माणे ना माणे......ओ जाणा ठाणे. कोन प्त्थरिया रा है. सामणे आ तन्ने पत्थर ते नैलाऊं.” हवलदार चौंक कर चिल्लाता है कि अगला पत्थर सीधा उसके सिर में लगता है और वो गिर पड़ता है. उठकर वो अपनी सीटी बजाकर सब को इकट्टा कर लेता है.
                     सभी मुख्य हिस्से की तरफ आ जातें है पर पाते कुछ भी नही. सभी हवलदार से उसके सिर में चोट लगने का कारण पूछते हैं कि तभी एक पत्थर घोंजा राम को लगता है. अब सभी सतर्क हो जाते हैं और पत्थर की दिशा तलाशने लगते हैं, पर विफल रहते हैं. वहां दूर तक कुछ ना था. अब एक और पत्थर मेजर साहब को लगता है ओर वो भी गिर जाता है. सभी महल के खम्बों की ओट में छिप जाते हैं. सेनापति, ‘डोंजा खान’ को राजा की सुरक्षा के लिए भेज देता है. ‘डोंजा खान’ राजा को हमले के बारे में खबर देता है और सुरक्षित रहने के लिए कहता है. हमला होने की खबर सुनते ही राजा चारों खाने चित हो जाता है. ‘डोंजा खान’ उसे कक्ष में बंद करके खुद डर से कांपते हुए बाहर पहरा देने लगता है. उधर बाहर सभी पर पत्थराव हो रहा था और महल छोड़ भाग जाने की चेतावनी दी जा रही थीं. लेकिन ये सब कहां से हो रहा था किसी को कुछ भी मालूम ना था. कुछ ही देर में जादुगर और चंद्रा भी वहां पहुंच जाते हैं.
             
           अब दोनों ही पत्थराव वाली दिशा की और खड़े हो कर बच्चों से ये सब बंद करने के लिए कहते हैं. जादुगर भी उन्हें जादुई गोलियां खिलाने का लालच देता है. पर इन सब का कुछ असर न होते हुए, कुछ पत्थर उनके पास आ गिरते हैं. अब जादुगर और चंद्रा के पास आड़ लेने के सिवा कोई चारा न था. बच्चों की स्थिति से परेशान जादुगर अपनी छड़ी को उसी दिशा में घुमाता जाता है जहां से पत्थराव हो रहा था. उसकी छड़ी की घूमने की दिशा में एक हल्का सा बवंडर उठता जाता है और वहीं समाप्त हो जाता है, जहां छड़ी जाकर थम जाती है. बवंडर के धूमिल होते ही सभी बच्चे जमीन पर यहां-वहां गिरे नजर आते हैं. उनके पास चंद्रा का दिया बोतल का वो पुतला भी पड़ा था जिसके साथ बच्चों ने साइंटिस्ट का चुराया हुआ ‘इन्विसिबिलिटी’ का वो ‘गैजेट’ बांधा हुआ था.
           अब चंद्रा उन गिरे हुए बच्चों की तरफ भागता है और उन्हें समझाने लगता है. तभी सेनापति, चंद्रा पर इस सारे हंगामे का इलज़ाम लगाता है कि यह सब उसी का किया धरा है. बच्चे, सेनापति की चिल्लाहट सुनकर उस पुतले को उठाकर चंद्रा को खींचते हुए आड़ में ले जाते हैं और फिर से अपने हमले शुरू कर देते हैं. इस बीच कुछ और लोग जख्मी हो जाते हैं. अब बात चंद्रा के बर्दाश्त से बाहर हो रही थी. वो उठता है और जिस बच्चे के हाथ में पुतला था उससे पुतला छीनकर एक बड़े से पत्थर पर दे मारता है. इस टक्कर से बोतल दो जगहों से टूट जाती है और उसमें भरी रेत हवा में बहने लगती है. यह सब देख कर बच्चे जोरों से चिल्ला पड़ते हैं और पुतले की और दोड़ते हैं. अपने सम्राट के प्रतीक चिन्ह को टूटा देख बच्चे रोने लगते हैं. अब हर जगह ख़ामोशी थी और रोते हुए बच्चे चंद्रा की और आश्चर्य भरी निगाहों से देख रहे थे. अब चंद्रा उन बच्चों को उस पत्थर के पास बिठाता है और उन्हें सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के बाद हुए चरित्र परिवर्तन के बारे में बताता है कि कैसे उसने इस अहिंसा से दुखी होकर बोद्ध धर्म अपना लिया था. कैसे सम्राट अशोक ने अपना सारा जीवन जीवों की भलाई में लगा दिया. बच्चे उसे धैर्य से सुनते रहते हैं.
              अगले दिन सब कुछ आम सुबह जैसा ही था. बस उन बच्चों की टोली को छोड़ कर. अभी भी उन बच्चों को एक टोली के रूप में देखा जा रहा था. बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक दशहरे को जलता देखते उन बच्चों में भी महान सम्राट अशोक की ही तरह चरित्र परिवर्तन हुआ था. और वो था हिंसा से अहिंसा की और परिवर्तन, बुरे से अच्छे का परिवर्तन, नासमझी से समझदारी का परिवर्तन. कोई पोधों को पानी दे रहा था, तो कोई बूढ़ों की मदद कर रहा था, कोई बीमार की सेवा कर रहा था तो कोई सफाई में मदद.
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pg no 29

 

MONTH’4R’ NOVEMBER


                        समंद्र के ऊपर कुछ समंदरी पक्षी ऊपर-नीचे होती लहरों के झूले का आनंद ले रहे थे. कि तभी लहरें पहले से कुछ ज्यादा ऊपर उठती हैं जिससे वहां बैठे पक्षी उड़ जाते हैं. लहरों के उस उभार के बीच से चंद्रा बाहर निकलता है जो लिल्लीपुट में अपनी हाजरी देने फिर से आ पहुंचा था. नदी किनारे तक पहुंचने के लिए ‘बोट’ ना मिल पाने की वजह से आज उसने मांडवा तट के पास ही समंद्र में गोता लगा लिया था. बाहर निकलकर वो अपनी नाक, आंख से पानी पौंछकर सामने देखता है तो पाता है कि वो एक मध्यम आकार के समंदरी जहाज़ के सामने था. जहाज के ऊपर बादलों से गिरने वाली बिजली के जैसा दिखने वाला झंडा लगा हुआ था जिसके बीच तीन सितारों के बीच-बीच में खोपड़ियां बनी हुई थीं. 
           इससे पहले वो समझ पाता कि वो जहाज़ किसका था उसके ऊपर एक जाल आ गिरता है. कुछ देर तक समंद्र में गोते खिलाए जाने के बाद उसे जहाज़ के ऊपर खींचा जाने लगता है. छूटने की कोशिश बेकार साबित हो रही थी. कुछ ही देर में चंद्रा जहाज़ के डेक के ऊपर जाल में बंधा लटका हुआ था. सामने देखने पर उसे कई बौने दिखते हैं जिन्होंने अजीब तरह के कपड़े पहने हुए थे और बगलों में तलवारें लटकाई हुई थीं. बेशक चंद्रा आज समंदरी लुटेरों के हत्थे चढ़ गया था. लिल्लीपुट में अपने अनुभवों से चंद्रा को ऐसी कई कहावतों का एहसास होने लगा था जिनमें से एक थी, ‘एकता में बल’. तभी सामने से एक टूटी टांग वाला बौना, चंद्रा के सामने बड़े ही भाव खाते हुए आता है. उसकी टूटी हुई टांग की जगह पर स्प्रिंग बंधा हुआ था जिसकी वजह से वो बौना एक तरफ उछलते हुए चल रहा था. उसने अपनी आंखों पर चश्मा पहना हुआ था. जिसपर सिर्फ एक तरफ ही काला शीशा लगा हुआ था जबकि दूसरी तरफ का शीशा गायब था. उसका सामने का एक दांत टूटा हुआ था जिसमें वो अपने हाथ में पकड़ा हुआ सिगरेट फंसाता है और एक कश मारकर उसी टूटे दांत की जगह से धुआं छोड़ देता है.
“हो.हो..हो...शाही मेहमान! महल का वफादार. किसने पकड़ा?...किसने पकड़ा?” सरदार दिखने वाला ‘लूटिया’ नाम का वो बौना पागलों की तरह चिल्लाता है. सरदार का नाम चंद्रा को उसकी फटी हुई कमीज़ पर सिले हुए कपड़े से चलता है.
           सरदार के पूछने पर डेक के नीचे जाती सीढ़ियों से किसी पागल कुत्ते सी हरकतें करने वाला एक बौना निकलता है. उसके पागलों से मुस्कुराते चेहरे से हांफती हुई जीभ बाहर निकल रही थी जिसमें से लार टपक-टपक कर गिर रही थी. किसी पागल पहलवान की तरह चलते हुए वो सीधे ही सरदार के सामने आ खड़ा होता है. उसे देखकर ऐसा लग रहा था मानो वो किसी भी पल उछलकर हमला करने को बेताब था. उस बौने का नाम ‘लारू’ था. जिसे सरदार इस काम के लिए शाबाशी देता है और ‘उछालु’ नाम के एक और बौने को पुकारता है.
           अपने मुंह को हाथों से दबाए हुए एक बौना ‘डेक’ के नीचे से बाहर आता है. उसकी खराब तबियत को देखकर लग रहा था कि उसे समंद्र से चिढ़ थी. सरदार ‘उछालु’ को ‘लारू’ से सबक सीख कर डेक पर रहकर कुछ काम करने की सलाह देता है. ‘उछालु’, समंद्र की अपनी कमजोरी का हवाला देते हुए अंदर ही रहकर खाना बनाने के काम पर डटे रहने पर जोर देता है. तभी लहरों का एक जोरदार झोंका जहाज़ को कुछ ज्यादा ही हिला देता है. इस वजह से ‘उछालु’ की तबियत और ज्यादा खराब हो जाती है और वो डेक के किनारे जाकर उलटियां करने लग जाता है. डेक पर मौजूद हर बौना लुटेरा ‘उछालु’ का यह कहकर मजाक उड़ाने लगता है कि उसने फिर से ‘उछालु’ करना शुरू कर दिया. ‘उछालु’ दोड़कर डेक के नीचे चला जाता है. हम बता दें कि ‘उछालु’ बच्चे द्वारा दूध की उल्टी करने को कहा जाता है.

           अब सरदार एक और बौने को पुकारता है जिसका नाम ‘छ्लांगु’ था. वो बौना लुटेरा भी डेक के नीचे से उछलता हुआ बाहर आता है. उसने अपने पांव पर ‘जम्पिंग रोड्स’ जैसा कुछ बांधा हुआ था. लेकिन वो बौना अपनी लगाई हुई गलत छलांगों की वजह से डेक पर खड़े हर किसी के ऊपर गिर रहा था. सरदार उसकी छलांगों को देखकर उसे वापिस चले जाने को कहता है. इसी तरह कई बौने लुटेरे जहाज के डेक के नीचे से निकलकर बाहर आते रहते हैं और जहाज़ का सरदार उन्हें वापिस भेजता रहता है. कोई डिस्को-डांडिया का फैन था तो कोई तानसेन का, किसी ने लड़िकयों के कपड़े पहने हुए थे तो कोई बिना कपड़ों के ही बाहर आ गया था. डेक के नीचे से आते हुए इन सभी बौनों को देख चंद्रा हैरान था कि आखिर इस छोटे से जहाज़ में ये सब बौने आ कहां से रहे थे.
           तभी सरदार को सामने से शाही जहाज आता दिखाई देता है. उसकी बगल में एक छोटा हवाई जहाज़ भी उड़ता हुआ उसी और आ रहा था. सरदार पागलों की तरह चिल्लाते हुए चंद्रा को डेक के नीचे छिपाने के लिए कहता है. सभी बौने एक साथ मिलकर चंद्रा को डेक के नीचे लुढ़का देते हैं. शाही जहाज़ पास आ जाता है. बड़े-बड़े बटनों वाला लम्बा कोट पहने जहाज़ का कप्तान समंदरी लुटेरों के सरदार से लिल्लीपुट के पास आने का कारण पूछते हुए उसे लिल्लीपुट से दूर चले जाने के लिए कहता है. समंदरी लुटेरों का सरदार अपने टूटे हुए दांत के बीच फंसी सिगरेट को निकालकर धुआं छोड़ते हुए अपने लुटेरे साथियों को वहां से खिसक लेने का इशारा करता है. अब दोनों जहाजों के ऊपर वो हवाई जहाज़ मक्खियों की तरह मंडराने लगता है. जो कभी डेक के बहुत पास आ जाता था तो कभी दूर चला जाता था. शायद पायलट ये देखना चाहता था कि वहां चल क्या रहा था.
           ‘डेक’ की सीढ़ियों से नीचे लुढ़काए जाने की वजह से चंद्रा जाल की पकड़ से ढीला पड़ चुका था और ये भी जान चुका था कि उसके बाहर निकलकर भागने का वक्त भी आ चुका था. वो दम लगाकर डेक की और दोड़ पड़ता है. चंद्रा डेक पर पहुंचकर देखता है कि वो हवाई जहाज़ ‘डेक’ के बहुत ही ज्यादा पास से गुजरने वाला था. चंद्रा, ‘डेक’ के किनारे से कूदकर उस हवाई जहाज़ के टायरों को कसकर पकड़ लेता है. चंद्रा को देखकर शाही कप्तान सारा माज़रा समझ जाता है और समंदरी लुटेरों को ललकारता है. अब समदरी लुटेरों के सरदार का चेहरा देखने वाला था. अपने टूटे हुए दांत से सिगरेट निकालकर मुस्कुराते हुए वो शाही कप्तान की और देखता है क्योंकि उसकी चोरी पकड़ी गई थी. शाही जहाज़ का कप्तान अपने जूनियर को, जिसने आधुनिक नाविक जैसे कपड़े पहने हुए थे, लुटेरे जहाज़ पर हमला करने का आदेश देता है. अब शाही जहाज़ से लुटेरों के ऊपर गोले बरसने शुरू हो जाते हैं. गोले रबर के बने हुए लग रहे थे. टकराने पर गोले उछल-उछलकर दोनों जहाजों के सदस्यों को लग रहे थे जिससे वो इधर-उधर उछल-उछलकर गिर-पड़ रहे थे. आगे-आगे लुटेरे और पीछे-पीछे शाही जहाज़, दोनों एक दूसरे पर गोले बरसाते हुए वहां से दूर निकल जाते हैं.
           दूसरी और हवाई जहाज़ से लटका हुआ चंद्रा शायद उस छोटे से हवाई जहाज़ के लिए भारी साबित हो रहा था जिस वजह से हवाई जहाज़ हिचकोले खाता हुआ उड़ रहा था. चंद्रा अभी भी जहाज़ को कसकर पकड़े हुए था. कुछ सेकंडों की मक्खी जैसी उड़ान के बाद हवाई जहाज़ जंगल में पेड़ों को चीरता हुआ जमीन पर आ गिरता है.
           चंद्रा ने शायद जहाज़ के क्रैश होने से ठीक पहले ही छलांग लगा दी थी जिस वजह से वो जहाज़ से कुछ दूर जाकर गिरा था. थोड़ी देर की बेसुधी के बाद चंद्रा उठकर जहाज़ की खोज में लग जाता है. अंधेरा घिरना शुरू हो चुका था. पेड़ों के टूटे हुए निशानों का पीछा करने की कोशिश करता हुआ चंद्रा जंगल के एक निचले घने कोने में जा पहुंचता है. झाड़ियों और पेड़ों के बीच साफ़ रास्ते को तलाशते हुए चंद्रा को अचानक ही थोड़ी दूर जले हुए पेड़ों के झुर्मुट के बीच किसी बौने के खड़े होने का एहसास होता है. शायद पायलट उठकर बाहर आ गया होगा, समझकर चंद्रा उस और चल पड़ता है. उन पेड़ों के नजदीक पहुंचकर चंद्रा देखता है कि पायलट वहां से जा चुका था.
           अब अंदाजा लगाते हुए चंद्रा जैसे ही लिल्लीपुट शहर की दिशा की और मुड़ता है उसे उन्ही पेड़ों के पीछे फिर से एक संदेहास्पद आकृति दिखाई देती है जिसका चेहरा शायद जला हुआ था. कहीं हवाई जहाज़ में लगी आग से

पायलट को तो कोई नुक्सान नहीं पहुंचा होगा? सोचकर चंद्रा फिर से उन पेड़ों के झुर्मुट के बीच देखने की कोशिश करते हुए आगे बढ़ता है तो अचानक ही डर के मारे पीछे हटते हुए जमीन पर जा गिरता है. उसने अपने सामने आधा अधूरा जला हुआ एक बौना देखा था जिसकी आंखें बाहर निकली हुई थीं. हिम्मत करके दोबारा देखने पर वो जला हुआ बौना गायब हो चुका था. अब चंद्रा वहां रुकने के मूड में कतई नहीं था.
           तेज कदमों से लड़खड़ाकर जंगल से बाहर निकलते हुए चंद्रा को सामने से तीनों फौजी, सेनापति राणा जी और उसके दो सिपाही, अफ़्रीकी मूल के पायलट के साथ दिखाई देते हैं. चंद्रा, चैन की सांस लेते हुए उनके साथ हो लेता है. पायलट को सही सलामत देखकर चंद्रा को अब ये यकीन हो गया था कि जले हुए पेड़ों के झुर्मुट के बीच उसने पायलट को तो नहीं देखा था. इसी उधेड़-बुन में सभी के पीछे-पीछे चलते हुए चंद्रा कब गांव तक पहुंच जाता है उसे पता ही नहीं चलता. गांव पहुंचकर राणा जी और उनकी छोटी शाही सेना के मात्र दो जवान फिर से जंगल में घुस जाते हैं.
           दिवाली पास ही थी सो गांव में रंगाई-पुताई का काम जोरों-शोरों पर था. गांव में उनकी मुलाकात पहलवान बलवा और उसकी बहन सुपर्णा से होती है. चंद्रा को घूरते हुए बलवा, मेजर साहब से उसका हाल-चाल पूछता है. मेजर साहब, चंद्रा के साथ घटी घटना का ब्यौरा बताता है. जिसपर सुपर्णा के चेहरे के भाव तो चिन्ताजनक हो जाते हैं लेकिन बलवेन कोई भी अफ़सोस जाहिर नहीं करता है. इस दौरान सुपर्णा, बलवेन से नजरें छिपाकर चंद्रा की और देखे जा रही थी. अब मेजर ‘गोम्पा बहादुर’ और उसके सिपाही चंद्रा को महल तक छौड़ आते हैं. महल को भी रंगा जा रहा था. रंग-बिरंगे कपड़ों की टल्लियों को जोड़कर बनाए गए कपड़ों में रुसी मूल का एक बौना, सीढ़ियों और रस्सियों से बंधी मचानों पर महल की रंगाई में लगा हुआ था. ‘पैन्टर’ नाम का वो पेंटर, लिल्लीपुट का इकलौता पेंटर था. लेकिन थका होने की वजह से उस और ध्यान न देकर चंद्रा महल के अपने कमरे में आराम करने चला जाता है. पलंग पर लेटे हुए उसका सारा ध्यान सुपर्णा की और था. इसी उधेड़-बुन में वो छत की और टक-टकी लगाए हुए था.
“कहीं सुपर्णा मुझे प्या...नहीं-नहीं एसा नहीं हो सकता. वो और मैं.....जिस ढंग से वो मुझे.....नहीं.” वो आंखें खोल देता है, जैसे उसे कोई झटका लगा हो.
           आंखें खोलने पर चंद्रा देखता है कि सामने लगभग आठ साल का एक लड़का उसे खम्बे के पीछे से देखे जा रहा था. वो चन्द्रा को देख डर तो रहा था लेकिन उत्सुक भी उतना ही लग रहा था. उस लड़के के बालों में सफेद राख लगी हुई थी. चन्द्रा उसे देख उठकर अपने पलंग पर बैठ जाता है. मुस्कुराते हुए वो लड़के को अपने पास आने का इशारा करता है. एक बच्चे को अपने कमरे में आया देख उसे हैरानी नहीं हो रही थी क्योंकि इससे पहले भी कई बच्चे एक ऊंचे कद के आदमी को देखने के लिए महल में उसके पास आते रहते थे. आज तो कोई अंदर ही घुस आया था. बुलाने पर भी बच्चा पास नही आता तो चन्द्रा उठकर उसके पास जाने की कोशिश करता है लेकिन बच्चा खम्बे से निकलकर आग के शामियाने में भाग जाता है. चन्द्रा उसे रुकने के लिए कहता है और अपने बैग में से गुलाब जामुन का डिब्बा निकालकर बच्चे की और करता है. बच्चा झिझकते हुए पास आता है और गुलाब जामुन उठाकर जल्दी से आग के शामियाने में भाग जाता है. चंद्रा उसे फिर से पास आने के लिए कहता है और एक और गुलाब जामुन देता है. चंद्रा को उसका व्यवहार अजीब सा लगता है. वो न तो बाकी बच्चों की तरह घुल मिल रहा था और ना ही बात कर रहा था.
           अब उस बच्चे से ज्यादा नजदीकी बनाने के लिए चंद्रा उसे अपना मोबाइल दिखाने के लिए अपने बैग में से मोबाइल निकालने लगता है. लेकिन बच्चा अचानक ही गायब हो जाता है. बहुत ही शर्मीला है, भाग गया. सोचकर चंद्रा मोबाइल वापिस बैग में डाल देता है. तभी खानसामा खामा सिंह, चंद्रा को चाय पर बुलाने आता है. आज वो तन्दूरी मुर्गे जैसी दिखने वाली टोपी पहने था.


“चंगा जी.....चाय लग गी है. आ जाओ, जी. माहराज तुआडा ही इंतज़ार कर रे सी.” खामा सिंह, चंद्रा से खुश मिजाजी में कहता है.
“आज कि बना रे हो...गामा जी.” चन्द्रा पलंग पर पालथी मारते हुए पूछता है.
“वोत कुछ है जी, तुसी आके-ते-खाके ता वेखो. वैसे साडा नां ‘खामा’ है.” खामा सिंह कहता है.
“आज वोत खुश नजर आ रे हो, की गाल ऐ.” चन्द्रा मजाकिया अंदाज में खामा को अपना कंधा मारता है.
“ओ! की दसां! ओ आज राणा जे है न....नि है.” खामा चन्द्रा को आंख मारते हुए कहता है.
“नि है?....मतलब?” चन्द्रा हैरानी में पूछता है.
           खामा सिंह खुश होते हुए चन्द्रा को बताता है, “आज राणा दावत दे मौके ते हाजर नि होण गे. असी माहराज नूं तुआड़े आन दी ख़ुशी लेई रात नूं इक ख़ास दावत रखन दी फरमाइश कित्ती सी. ते राणा नूं जंगली मुर्गा, हिरण ते खरगोश लान लेई केया है. हुण वेखो जंगल उदी की हालत करदा है. मजा आऊ जे शामी ओदी खस्ता हालत होए. वैसे तुआनु कि लगदा शेर ओनु शड देगा, कि आज ओदी ही दावत बन जाऊ.” कहते हुए खामा सिंह हंस पड़ता है.
“आप राणा जी से इतना नाराज़ क्यों रहते हैं? माना कि वो कुछ अलग किस्म के हैं....” चंद्रा पूछता है.
“कि दस्सां! ओदे काम ही खोते वाले सन. जे वी काम दस्सो, अद्धे-अधूरे ते जलान वाले ही करदा है. इक वारि मैं ओदे कोलों ताज़ा दुध मंगाया., ओ गधे दा पुत ‘माझ’ फड़ ले आया. दसो हुन मैं दुध दुआं. चोल मंगाए ता धान ही सुट गया. हुन मैं कि करां उनां दा? इक बारी ता हद ही हो गी जी. अंडे दी भुर्जी लेई मैं अंडे मँगाए. दसो..मुर्गी ही पेज दित्ती...है ओ बन्दा.” खामा सिंह चिढ़ के मारे सिर हिलाता है.
“वो ऐसा क्यों करते हैं, कोई...” चंद्रा हंसते हुए पूछता है.
“बेबकूफी है जी. तिन साल पहले जदों मैं नवां-नवां आया सी ता इक वारी राती दी दावत विच मैं सब लेई ‘मच्छी कड़ी’ बनाई. मच्छी पूरी ही थी. मैनू कि पता कोन शरारत कर गया. मच्छी ओदे थाल विच फड़फड़ाई ता थोड़ी क कड़ी ओदे मुंह विच गिरी. हुण, बिना मच्छी दे कड़ी दा कि काम सी. मच्छी दी अगली उड़ान ओदे मुंह विच थी. सब वोत हंसे ओदे पर. बस ओ दिन है ते ऐ दिन है, तंग कर छडेय़ा मैनू.”
“आपने समझाया नहीं उसे.......उन्हें” चन्द्रा अटक कर कहता है.
“कोई गाल नि जी. वैसे भी ओ इतनी इज्जत लायक है नि. पर इस दुनिया दा उसूल ही एस तरह दा है. ना चाह कर भी इज्जत देन ही पेंदी है. ओस वांदर नु मैं वड़ा समझाया. पर ओस मेंढक दे बच्चे दा ठेठ राजस्थानी दिमाग हार मनन लेई तैयार ही नि है. राजा भी इन्ने भोले ने कि शिकैत करना ते बाद राणा नूं हुकुम दित्ता कि अग्गे तों ‘माझ नाल बाल्टी वी होवे’. ‘अंडे ता टूट जाणगे नाल घोंसला वी शडो’. ऐ कोई गाल बणदी...तांग करना दे और मसाले शड जाओ. एक वारी ता ओस कुकड़ ने मैनू कुक्कर विच पकेदा मुर्गा होण दी गाल केही कि मैं ओनु गर्म करके खा लेवां. मैं वी खोते दा पुत बिना देखे ही गैस चला दिती. इन्ने जोर दी बांग मैं कदे नि सुनी, जिन्नी ओस मुर्गे ने मारी होनी. कुक्कर तों फड़फड़ांदा ओ सिधा मेरे ऊपर ते मैं पतीले विच जा गिरेया. दो दिन मैं चल नि पाया....तुसी दस्सो मैं कि धूप पावां ओनु.” चन्द्रा ठहाके मार-मार कर लोट-पोट हो जाता है और खामा को खाने पर चलने के लिए कहता है. गलियारे से हॅाल की और जाते हुए भी चन्द्रा के ठहाके कम नहीं हो रहे थे.
            
           राणा जी की बातें खत्म होने पर खामा सिंह, चंद्रा से उसके साथ हुई घटना के बारे में पूछता है. चंद्रा उसे उस घटना की आप-बीती सुना देता है. अब चंद्रा, खामा सिंह से लिल्लीपुट जैसी शांत जगह पर लुटेरों के होने की बात पूछता है. जिसपर खामा सिंह उसे बताता है कि राजा के दादा ने बहुत पहले लिल्लीपुट की सेना कम करने का फैसला लिया था जिस वजह से लिल्लीपुट की नौसेना को भी कम कर दिया गया. लेकिन तब के नौसैनिकों के एक गुट ने इसका विरोध करते हुए अपना ही एक अलग गुट बना डाला और तब से समुद्री लुटेरे महल का विरोध करते आ रहे हैं. खामा सिंह, चंद्रा को बताता है कि लिल्लीपुट के लिए विरोधियों का होना कोई नई बात नही है. लिल्लीपुट में समुद्री लुटेरों और जंगलियों को छोड़कर और भी कई विरोधी हैं जिनका पता चंद्रा को धीरे-धीरे चलता जाएगा.
           तभी चंद्रा को जंगल में देखे उस आधे जले बौने की याद आती है. वो खामा सिंह से उस बारे में पूछता है. खामा, चंद्रा को बताता है कि उसने ‘मसाण’ नाम की भटकती आत्मा को देखा होगा. जो जंगल में उन पेड़ों के झुर्मुटों के बीच ही बादलों की बिजली गिरने की वजह से जिंदा ही जल गया था. इस तरह से जले हुए इंसान की आत्मा को ‘मसाण’ कहा जाता है. कहा जाता है उस बौने के साथ घटी घटना का कारण राजा पर करवाया गया हमला था जिसमें राजा तो बाल-बाल बच गया था लेकिन उसका अंगरक्षक जिंदा जल गया था. तब से राजा ने अपने साथ अंगरक्षक रखने बंद कर दिए थे.
           चंद्रा के पूछने पर कि लिल्लीपुट जैसी प्यारी जगह पर इस तरह की घिनौनी वारदात किसने अंजाम दी होगी, खामा अपनी बात पलटते हुए चंद्रा को देर रात जंगल की और ना जाने की सलाह दे डालता है. साथ ही वो चंद्रा को जंगल में भटक रही और कई आत्माओं का वास होने की बात बताता है. जैसे ‘ब्ला’ जो अपने छोटे बच्चे को खो चुकी मां की आत्मा है, जो अपने बच्चे को खोने के दुःख में जंगल में चिल्लाती हुई भटकती रहती है. खामा बताता है कि ‘छेड्डा’ नाम का एक भूत भी पूरे लिलीपुट में भटकता रहता है जो अचानक आवाजें करके या रूप बदलकर लोगों को डराता फिरता है. खामा, चंद्रा को हॉल तक छोडकर वहां से चला जाता है.
शाम को छे बजे के करीब राणा जी थके-फटे हाल, मिटटी-पत्तों में लिपटा हुआ खामा को बताता है कि सभी जानवर रसोई में पहुंचा दिए गए है.
“देख भाई, शैतानी न करीं, कैह दिता. आज शिकैत हो के रहू.” खामा, राणा जी को धमकाता है.
“भाया! म्हारे को होर काम नि रह गयो है के, जे मैं शैतानी करता फिरूं. और उस ‘बाहरी’ णे तन्ने स्पेसल दावत बनाणे दी के जरूरत पड़ गई. ज्यादा लाड़ प्यार ना दो उस बाहरी णे. आज भी उस की वजह से म्हारे पायलट साहब मरते-मरते बचे से. देखना एक दिन सबणे मरवाएगो ओ. जा.......अंदर जा भाया, डोंजा खान और घोंजा राम थारा रसोई मां इंतज़ार करें से.” कहकर राणा जी पैर पटकता हुआ वहां से चला जाता है.
           राणा जी की नफरत भरी बातों को सुन-पचाकर खामा सिंह भी रसोई की और बढ़ जाता है. कुछ ही देर में रसोई से बर्तन गिरने और खामा के चिल्लाने की आवाजें आने लगती है.
“ओ! जिन्दे जानवर फड़ ले आया.......फड़ इनुं....ओ फड़ ओए.” राणा जी ने लगता है फिर से अपनी चाल चल दी थी.
        रात को दस्त्र-खां सज गया था. राजकुमार, राजा, सेनापति, चंद्रा, जादूज सभी खाने का इंतेज़ार कर रहे थे. सभी हंस खेल रहे थे. तभी डोंजा खान और घोंजा राम खाने की ट्रोलियाँ लाते हैं. खाने की सजावट देख राजा, खामा सिंह की तारीफ़ करता है. सेनापती राणा जी, डोंजा खान को खाना डालने के लिए कहता है. खाना शुरू होता है और एक-एक करके सभी पकवान परोसे जाते हैं. कोफ्ते, पनीर, भुर्जियां, मीट, मिठाइयां सभी कुछ. इसी बीच सेनापति अपनी करनी की वजह से कुछ भी खाने से कतरा रहा था. उसे अपने खाने में किसी गड़बड़ी की आशंका तो पक्का थी. राजा उसे

खाना शुरू करने का आदेश देता है. सेनापति के मना करने पर राजा, घोंजा राम को सेनापति को खाना परोसने के लिए कहता है. खाना परोसा जाता है और सेनापति डरते-डरते खाना खत्म करता है.
           अब मीठे की बारी थी. तो बड़े-बड़े बंद प्यालों में खीर लाई जाती है जो सभी को परोस दी जाती है. लेकिन सेनापति के लिए एक प्याला कम था. राजा, राणा जी के लिए भी मंगवाने का आदेश देता है. सो एक और बंद प्याला लाकर राणा जी के सामने रख दिया जाता है. डोंजा खान जैसे ही उसका बड़ा सा गोल ढक्कन उठाता है वहां से एक जंगली मुर्गा फड़फड़ाता हुआ राणा जी के मुंह से टकराता जाता है. बस फिर क्या था हॉल हंसी के ठहाकों से गूंज उठता है. उधर राजा उस फड़फड़ाहट से डरकर बेहोश हो गया था. जिसे पानी के छींटे मारकर होश में लाया जाता है.
           अब राणा जी और खामा सिंह दोनों ही राजा के सामने खड़े थे. साथ में चंद्रा और दोनों सैनिक भी मौजूद थे. राजा द्वारा इसका कारण पूछने पर खामा सिंह उसे राणा जी की हरकत के बारे में बताता है. राजा सेनापति को आगे से जानवरों को जीवित ना लाकर, उन्हें यह कहकर बेहोश करके खामा को सोंपने का आदेश देता है कि, ‘जीव हत्या पाप है’. चन्द्रा, चुप-चाप राजा के मुर्खता भरे आदेशों को सुन रहा था.
           शिकार की चर्चा होने की वजह से राजा को अपनी जवानी के समय में शिकार के दिन याद आ जाते हैं. राजा अपने शिकार के किससे सुनाने लग जाता है. वो जंगल में शेर के शिकार की डींगे हांकता है और उनसे हाथापाई होने के बावजूद उनके शिकार करने की शेखी बघारता है. कांपते हाथों से शिकार की कहानी बयां करते हुए राजा को देख ये तो जाहिर हो ही रहा था कि राजा ने कितने शेर मारे होंगे. चंद्रा द्वारा शिकारों की गिनती पूछने पर, पहले तो राजा बीस शेरों को मारने की बात करता है. फिर बीस से पच्चास शेर मारने की डींग हांकता है. ये आंकड़ा बढ़कर पचास से सौ पहुंच जाता है. राजा की इन डींगो को सुन रहा खामा सिंह इसपर चुटकी लेते हुए कहता है, “इसी बात पर शेर अर्ज किया है..” राजा शेर का नाम सुनते ही बेहोश होकर वहीं लुढ़क जाता है. हॅाल फिर से ठहाकों से भर जाता है.
           अगले दिन इतवार होने के कारण चन्द्रा लिल्लीपुट में ही रुक जाता है. सुबह चंद्रा लिल्लीपुट की अपनी सैर के लिए तैयार हो रहा था की उसका ध्यान कमरे में गिरी किसी चीज़ की तरफ जाता है. देखने पर उसे पिछले कल वाला वही छोटा बच्चा दिखता है जिसके बालों में अभी भी कुछ राख लगी थी. आज वो डरा हुआ नहीं लग रहा था. चंद्रा उसे कुछ खाने को देता है और उसके बालों की राख झाड़ते हुए, उसका नाम पूछता है. बच्चा अपना नाम ‘पहला’ बताता है. चंद्रा को नाम कुछ अजीब लगता है. बच्चा उससे घुल मिल गया था और बातें करने लगा था.
           अब चंद्रा बच्चे से उसके घर के बारे में पूछता है तो बच्चा बताता है कि उसके घर का रास्ते आग की जगह से नीचे खदानों में है. जहां उसके जैसे और भी बच्चे और बड़े रहते हैं. चंद्रा इसे बचपन की कल्पना समझकर अनसुनी कर देता है. चंद्रा के उसके माता-पिता का नाम पूछने पर वो पिता का ‘इक्की’ और माता का नाम ‘पहली’ बताता है. नहाने को जाने के लिए चंद्रा अपनी कमीज़ उतारता है तो उसका बढ़ा हुआ पेट देख बच्चा हैरत से इतने बड़े पेट को हाथ लगाकर पूछता है कि वो क्या चीज़ है. चंद्रा मजाक में उसके पुठों पर धीरे से चमाट मारते हुए कहता है, “ये है.” इतना सुन बच्चा पर्दे के पीछे भाग जाता है और चंद्रा नहाने बाथरूम चला जाता है. नहाकर बाहर आने पर बच्चा जा चुका था. कौन था, कहां से था, हर बार बालों पर राख, इसी उधेड़-बुन में चंद्रा अपने कमरे से निकलकर महल की मुख्य सीढ़ियों तक आ जाता है.
                      आज उसे सुपर्णा के साथ नांव की सैर करने जाना था. महल से अकेले ही निकलकर वो जा पहुंचता है गांव से गुजरने वाली नहर तक. जहां सुपर्णा उसका इंतज़ार कर रही थी. अब वो दोनों नांव के आने का इंतज़ार करने लगते हैं. दोनों ही नहर के किनारे चल रही ठंडी हवा का आनंद उठाते हुए लिल्लीपुट और एकदूसर के घर की बातें पूछने लगते हैं. कुछ ही समय हुआ था कि सुपर्णा के चेहरे से रंग जैसे उस बहने वाली ठंडी हवा के साथ ही उड़ने लगा था. उसने दूर

से ही ‘बलवा’ नाम के उस पहलवान को आते देख लिया था जो उसका भाई था. चूंकि बलवा, चंद्रा को अपनी दुनिया में पसंद ही नहीं करता था तो उसे अपनी बहन के साथ देखकर तो बलवा कोई हंगामा खड़ा कर सकता था. तभी सुपर्णा को नांव आती दिखाई देती है. सुपर्णा, चंद्रा को नांव में जाकर लेट जाने को कहती है. वो काफी डरी हुई लग रही थी सो चंद्रा उसकी बात मानकर नांव में जाकर लेट जाता है. चूंकि नाविक ‘नवी’ सुपर्णा को अपनी छोटी बहन की तरह चाहता था सो वो चंद्रा को अपनी नांव में लिटाकर नांव को किनारे लगा देता है और खुद वहां बैठकर बलवा के जाने का इंतज़ार करने लगता है.
           बलवा के नजदीक पहुंचने पर सुपर्णा देखती है कि उसके हाथ में एक मोटा डंडा था और वो लंगड़ाकर चल रहा था. अब सुपर्णा का डर और भी अधिक बढ़ जाता है. लेकिन सुपर्णा के पूछने पर बलवा बताता है कि स्टेशन से घर आते हुए उसे रास्ते में एक भेड़ मिली थी. बहुत ढूंढने पर भी जब उसका कोई रिश्तेदार नहीं मिला तो उसने उस भेड़ को घर ले जाने की सोची. उसने भेड़ उठाई ही थी कि वहां ‘गद्दु’ गडरिया आ धमका और उसकी भेड़ चुराए जाने का शोर मचाने लगा. भेड़ की कोई निशानी ना बता पाने और सारी कहानी बता देने पर भी जब वो नहीं माना तो बलवा ने भी भेड़ देने से साफ़ मना कर दिया.
           तब उस चालाक गडरिये ने एक समाधान सुझाया कि भेड़ किसकी है इसका हल वो एक कहावत से करेंगे. और वो कहावत थी ‘जिसकी लाठी उसी की भैंस’. आगे समाधान बताते हुए उस गडरिये ने बताया था कि वो दोनों ही बारी-बारी एक दूसरे के दोनों पुट्ठों पर एक-एक लाठी की मार देंगे. लाठी की हर मार के बाद जो उठकर खड़ा हो जाएगा, भेड़ उसी की हो जाएगी. अब बलवा ने भी चालाक बनते हुए इस फैसले को ये सोचकर मान लिया था कि उस गडरिये की मार को तो वो झेल जाएगा. लेकिन उसके लठ की एक ही मार उस गडरिये के दोनों पुट्ठों को हिलाकर रख देगी. गडरिये की ये शर्त कि पहला प्रहार वो करेगा, बलवा अपनी ताकत के गरूर में मान गया था.
           अब पहले वार को सहने की बारी थी सो बलवा इसके लिए आधा झुककर तैयार हो गया था. गडरिया अपने दोनों हाथों को जितना ऊपर तक हो सकता था ले गया था और पूरी ताकत के साथ उसके दाहिने पुट्ठे पर लट्ठ दे मारी थी. मार बलवा की उम्मीद से ज्यादा जोर की पड़ी थी. उसके पुट्ठे लट्ठ की मार के धक्के से बाईं और हो गए थे और चेहरा लाल पड़ गया था. अब बलवा को सीधे खड़े होना था. उस समय दर्द को अपने पुट्ठों से नीचे भेजते हुए बलवा सीधा खड़ा हो गया था और अपने लाल पड़े चेहरे पर हाथ फेरते हुए उसने बड़े ही अकड़ भरे लहजे में गडरिये को दूसरा प्रहार करने के लिए कहा था. इस बार झुके हुए बलवा के दूसरे पुट्ठे पर ‘गद्दु’ ने उछलकर लट्ठ मारी थी ताकि वो गिर ही जाए. लेकिन बलवा गिरता नहीं और खामोश, उसी झुकी अवस्था में थोड़ी देर के लिए पड़ा रहता है.
           ‘इस गडरिये को तो मैं मार ही डालूँगा’, सोचकर बलवा खड़ा होने की कोशिश करता है तो उसकी कमर में एक तेज झनझनाहट होती है. फिर भी हिम्मत कर वो खड़ा हो जाता है. खड़ा होते हुए उसे ऐसा एहसास हुआ था मानो उसका पुट्ठा हिल गया है. धीरे-धीरे अकड़ गए पुठों के सहारे वो गडरिये की और मुड़ता है तो क्या देखता है कि गडरिया भेड़ को उठाकर वहां से भाग रहा था. ‘ओए! रुक....अब मेरी बारी है.’, ‘अब मेरी बारी है.’ चिल्लाता हुआ बलवा भी उस गडरिये के पीछे-पीछे लंगड़ाने लगा था. लेकिन घायल पुट्ठे उसे भागने की इजाजत नहीं दे रहे थे. अपनी ये ‘दर्द भरी’ कहानी सुनाते हुए बलवा धीरे-धीरे अपने पुट्ठों की मालिश कर रहा था.
           नांव में लेटा हुआ चंद्रा अपनी हंसी रोक नहीं पाता है और मुंह दबाकर हंसने लगता है. नाविक भी अपनी हंसी रोकने की कोशिश कर ही रहा था कि बलवा, चंद्रा की हंसी सुन लेता है. इसे वो नाविक ‘नवी’ की हंसी समझकर उसे नांव से नीचे खींच लेता है और उसी लट्ठ से ‘नवी’ के पुट्ठों की पिटाई करने लगता है.
“बचाओ.....बचाओ! बलवा भैया हम नहीं हंसे थे, हम नहीं हंसे थे...आाााां...” नवी जोर से चिल्लाने लगता है. अब

सुपर्णा बीच-बचाव करती हुई बलवा को पकड़कर अस्पताल की और ले जाती है.
           दोनों के जाने के बाद चंद्रा जोर-जोर से हंसते हुए नांव से बाहर आ जाता है. ‘नवी’ अपनी पिटाई का जिम्मेवार चंद्रा को ठहराता है. चंद्रा उसे अस्पताल चल इलाज़ करवाने की बात कहता है तो ‘नवी’ मना कर देता है.
“उस सांड से पिटने जाएं. वो भी वहीं गया है.” कहते हुए नवी लंगड़ाता हुआ अपनी नांव में बैठकर वहां से चला जाता है.
           उधर बलवा, सुपर्णा के साथ अस्पताल पहुंचता है. डॉक्टर ड्रॅाक से जांच करवाने और एक्स-रे करवाने के बाद पता चलता है कि पहलवान और मजबूत बलवा के पुट्ठों के जोड़ों की हड्डी हल्की सी खिसक गई थी. डॉक्टर उसे फिर से खिसकाकर अपनी जगह पर लाने की तैयारियां करता है. बलवा को एक लम्बी मेज पर लिटा दिया जाता है. डॉक्टर और नर्स एक तस्वीर लेकर कमरे में आते हैं और बलवा से दर्द आदि के बारे में बातें पूछने लगते हैं. डॉक्टर बात करता हुआ अचानक ही एक डरावनी तस्वीर बलवा के सामने ले आता है.
“डॉक्टर साहब ये क्या मजाक है आप इलाज़ कर रहे हैं या मुझे हॉरर मूवी दिखा रहे हैं.” बलवा कहते हुए मुंह बनाता है.
“नर्स पहला, सिंपल फार्मूला फ़ैल हो गया. अगला स्टेप की थैयारी खरो.” डॉक्टर धीरे से नर्स के कानों में कहता है.
           नर्स एक जलता हुआ पटाखा लाकर चुपके से बलवेन की मेज के नीचे रख देती है. उसके फटने पर जोर का धमाका होता है जिससे घबराकर बलवेन नीचे गिरते-गिरते बचता है. डॉक्टर उसे सम्भाल लेता है. अब बलवेन, डॉक्टर पर इस बात से गुस्सा होता है कि उसके साथ ये सब क्या किया जा रहा था. जिसका जवाब डॉक्टर जबरदस्ती की मुस्कान के साथ, बड़े ही साधारण तरीके से ये कहते हुए देता है, “दीवाली है. मुबारक हो.” डॉक्टर का ये प्लान भी फेल हो चुका था.
           अब डॉक्टर नर्स को इशारों ही इशारों में कुछ लाने के लिए कहता है. अब डॉक्टर के हाथों में वो बड़ा सा हथौड़ा था जिसे वो बलवा के पीछे से ऊपर उठाता है. उसका इरादा इससे बलवा के सिर पर चोट करके उसे बेहोश करने का था. लेकिन बलवा पीछे मुड़कर देखता है कि आखिर डॉक्टर कर क्या रहा है. डॉक्टर एकदम से हथौड़े को छिपा लेता है. ऐसी कई कोशिशें नाकाम रहने के बाद डॉक्टर थक हार कर नर्स को बेहोशी का इंजेक्शन लगाने के लिए कहता है. कुछ ही देर में बलवा को पूरा कमरा और दोनों कर्मचारी घूमते हुए और रबर की तरह खिंचते हुए से दिखने लगते हैं. बलवा डॉक्टर को आस्तीन से पकड़कर पूछता है कि उसने उसके साथ क्या किया था. डॉक्टर इसे इंजेक्शन का असर बताकर अपनी आस्तीन छुड़ाने की कोशिश करता है लेकिन छुड़ा नहीं पाता. बेहोश हो रहे पहलवान में अभी भी काफी दम बाकी था. डॉक्टर की आस्तीन पकड़े बलवा को एहसास होता है कि डॉक्टर उससे दूर जा रहा है.
“आप कहां...भाग रहे हो डॉक्टर..मुझे इस...हालत में छोड़कर.” बलवा अपनी पकड़ और भी मजबूर करने की कोशिश करता है और डॉक्टर को अपने पास खींचने लगता है.
“अरे! हम कहीं नहीं जा रहा आपको केवल एहसास हो रहा है. नर्स स्टेप ‘थ्री’....” कहते हुए डॉक्टर, नर्स से अपना हथौड़ा मांगता है और उसके एक ही वार से पहलवान ढेर हो जाता है.
           कुछ देर के बाद बेहोश बलवा को बाहर लाया जाता है ओर एक बिस्तर पर लिटा दिया जाता है. अब उसका जौड़ शायद ठीक हो चुका था. बेचारी अकेली सुपर्णा चिंता में उसके पास बैठी रहती है कि तभी चंद्रा उसके पास आ जाता है. दोनों उठकर अस्पताल से बाहर आ जाते हैं.
“आपकी वजह से बेचारे ‘नवी’ भईया को मार पड़ गई. वो बहुत नाराज़ होंगे.” सुपर्णा चिंता करते हुए कहती है.

“नाराज़ होने के लिए उनके पास समय ही कहां होगा. वो बेचारे तो अपने पुट्ठों की मालिश करवा रहे होंगे.” चंद्रा हंसते हुए कहता है.
“आपके भाई का क्या हाल है. बैठने लायक हैं या नहीं.” कहते हुए चंद्रा हंसने लगता है.
“आप हमारे भईया का मजाक मत उड़ाइए. मालूम है कितने कष्ट में हैं वो?.” सुपर्णा, चंद्रा को प्यार से डांट लगाती है.
“अच्छा बाबा! लेकिन यहां एक कहावत और बन गई है, ‘किसी की लाठी, किसी की भेड़’.” कहते हुए चंद्रा फिर से हंसने लगता है. अब सुपर्णा भी मुस्कुराए बिना नहीं रह पाती.
           बातें करते-करते वो दोनों अस्पताल से थोड़ा आगे चले आए थे. दीवाली के आने से पहले ही बच्चे पटाखे फोड़ना शुरू कर चुके थे. वहां बच्चों को खेलता देख सुपर्णा जब बच्चों के प्रति अपने लगाव की बात चंद्रा से करती है तो चंद्रा को महल में मिले उस बच्चे की याद आ जाती है. कुछ अधिक जानकारी मिलने पर वो चंद्रा से उस बच्चे का नाम पूछती है तो चंद्रा थोड़ी देर सोचने के बाद बच्चे का नाम ‘पहला’ बताता है.
“वो आया था? बड़ा ही शैतान है. उन खन्दकों से पुरे लिल्लीपुट की खाख छानता फिरता है. समझाने के बाद भी...”
           अब सुपर्णा, चंद्रा को लिल्लीपुट के खनिकों के बारे में बताती है कि कैसे सालों पहले लिल्लीपुट में खनिकों की एक अलग बस्ती हुआ करती थी. जो खन्दकों से ‘नगीनों’ को खोदकर निकालते थे और उन्हें बाज़ार में बेचते थे. बताते हैं कि राजा के ‘रादा सिंह’ नाम के दादा ने उनसे ये अधिकार छीन लिया और ये बस्ती बाद में तबाह हो गई. ‘नगीना’ बहुत ही महंगा और काम का रत्न है जिसका जादुई उपयोग भी होता है और अलग-अलग रंगों, आकारों में होता है. अब ज्यादातर ‘नगीने’ महल में ही है. लेकिन वो चंद्रा को इस बात को राज़ रखने की कसम देती है. चंद्रा जब सुपर्णा से खनिकों से मिलवाने की बात करता है तो वो कुछ देर तक सोचने के बाद उसे इस काम के लिए दिन में आने के लिए कहती है क्योंकि अब शाम घिर आई थी और उन्हें जंगल से होकर जाना पड़ना था.
           फिर बातें करते-करते दोनों अस्पताल वापिस पहुंच जाते हैं. सुपर्णा यहां से ये कहकर गांव की और चली जाती है कि बलवा के होश में आने से पहले उसे उसकी मां को भी अस्पताल बुलवाना होगा. चंद्रा से विदा लेकर सुपर्णा गांव की और चली जाती है. लेकिन बीच-बीच में वो पीछे मुड़-मुड़कर देखना भी नहीं भूल रही थी. चंद्रा भी उसे रुककर जाते देख सोचता रहता है कि सुपर्णा का उसके साथ यूं खुले में घूमना, यूं इतना घुल मिल जाना, इन सब का क्या मतलब हो सकता था. तभी पीछे से कोई उसका हाथ पकड़ लेता है. पकड़ मजबूत थी. देखने पर पता चलता है कि वो बलवा था. उसकी बेहोशी टूट चुकी थी और शायद उसने दोनों को साथ घूमते हुए देख लिया था. वो चंद्रा को सुपर्णा से ना मिलने और दूर रहने की धमकी देता है. उसकी धमकीयां सुनकर चंद्रा महल की और बढ़ जाता है.
           शाही बाग़ में ‘माल्लो’ माली अभी भी पौधों से अपना प्यार जता रहा था. महल के प्रांगण में उसे सेनापति राणा जी मिलता है. वो भी चंद्रा को लिल्लीपुट में ज्यादा ना घूमने की धमकी देता है और चला जाता है. कुल मिलाकर चंद्रा को लिल्लीपुट में मिलाजुला अनुभव हो रहा था. एक तरफ मोहित कर देने वाला लिल्लीपुट शहर, गांव, प्रकृति और उसके बौने निवासियों का दृश्य तो दूसरी तरफ उन्ही निवासियों का उसके प्रति नफरत भरा रवैया. लिल्लीपुट में उसे इतनी धमकियां मिल चुकी थीं कि उसे इन सब बातों की आदत सी पड़ गई थी. आज वो इस बोनी दुनिया के आगे खुद को बौना महसूस कर रहा था. ना जाने वो चुप क्यों था, प्रतिक्रिया करने पर निकाले जाने के डर से या लिल्लीपुट में हुए अपनी पहली रात के अनुभव से. लेकिन उसे आज ये एहसास हो गया था कि किस तरह उसकी अपनी दुनिया में बौनों के साथ भी यही सब होता है और वे भी किसी न किसी डर के कारण कुछ भी प्रतिक्रिया कर पाने में असमर्थ रहते हैं.
             

           खैर उस रात चंद्रा जंगल के अपने पिछले अनुभव के कारण महल ही रुक जाने का फैसला लेता है. थका होने की वजह से उसे झट से नींद भी पड़ जाती है. सुबह जब उसकी आंख खुलती है तो देखता है कि वही बच्चा उसके पेट की नाभि को देख रहा था. उसके सिर के बालों पर आज भी राख लगी हुई थी.
“आप, यहां शे निकालते हो?” बच्चा हैरानी से देखते हुए चंद्रा की नाभि में उंगली डाल रहा था.
“शमझ गया! आपका आगे और मेला पीछे.” बच्चा वहां रखे शीशे में अपने पुठों को पीछे मुड़कर देखते हुए कहता है.
           ये सुन चंद्रा को हंसी आती है और वो उसे मजाकिया अंदाज़ में वहां से भागने के लिए कहता है. लेकिन बच्चा उससे मिठाई मांगता है. चंद्रा से मिठाई पाकर बच्चा, चंद्रा को साथ चलने के लिए पूछता है. उत्सुकता होने के बावजूद, ऑफिस जाने के लिए हो रही देरी के कारण चंद्रा उसे फिर कभी चलने की बात कहकर उसे वहां से भगा देता है. तैयार होकर महल से विदा लेकर वो समुद्र के रास्ते अपनी दुनिया लोट आता है.
           बीच-बीच में चंद्रा लिल्लीपुट आता तो रहता है लेकिन सुपर्णा के साथ ज्यादा मिल नहीं पाता. वो तो बस एक-दो घंटों के लिए ही लिल्लीपुट में प्रवेश करता था. ना आ पाने की वजह से उसे वो दिन खाली-खाली लगता था. लिल्लीपुट में आना तो उसके लिए जैसे किसी मनोरंजन पार्क में आने जैसा हो गया था जहां वो अपने प्यारे व छोटे दोस्तों से मिल सकता था. शनिवार आ जाता है. अगले दिन ‘दिवाली’ का सुंदर दिन था. परसी आंटी की घर की सफाई में मदद करने के बाद चंद्रा फिर से लिल्लीपुट पहुंच जाता है, अपना एक और लम्बा दिन बिताने के लिए. पूरा लिल्लीपुट दिवाली में अपनी ही छटा बिखेर रहा था. हर कोई दिवाली की अपनी तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगा था. चंद्रा बाकी सब कुछ छोड़कर सुपर्णा से मिलता है और उससे अगले दिन खनिकों से मिलवाने का वचन लेता है.
           अगली सुबह बाज़ार दिवाली के सामान से सजा पड़ा था. बौने भी सामान लेने के लिए बाज़ार में आने लगे थे. बच्चों के आकर्षण का केंद्र तो पटाखों और मिठाइयों की दुकानें थीं. लेकिन बाकि के दुकानदार भी अपनी-अपनी हांक लगा रहे थे. सभी लोग अपना-अपना सामान खरीद रहे थे, कोई कपड़े, कोई जूते, कोई अपने लिए घड़ा, खरीद रहा था तो कोई लकड़ी का सामान. कोई चाट खा रहा था तो कोई वड़ा-पाव. कोई अपने लिए मिठाई पैक करवा रहा था. कुछ लोग उनकी हांकों को अनसुनी कर अपनी राह पर चले जा रहे थे तो कुछ लोग उनकी हांकें सुन उनकी और खिंचे चले आ रहे थे:
जूते वाला, “सेल-सेल-सेल पैसे का है ये खेल, कम में महंगा माल, भेड़िये की हो या शेर की खाल.”
‘गद्दा राम’ कपड़ों वाला, “रंगीन डिजाईन, हर साइज़ के कट, बिक ना जाएं, उठा ले फटा-फट”
सब्जी वाला सब्जो, “सब्जो की सब्जी...घिया, तरकारी. हरी ताज़ी है सब्जी हमारी”
आइसी आइसक्रीम वाला, “वैनिला चोकलेट स्ट्रॉबेरी या मैंगो फ्लेवर में कौन या कप में”
कुम्हार कुम्भ, “मिटटी का है ये घड़ा, ठंडक दे जब पानी से हो भरा.”
           अब चंद्रा, सुपर्णा के साथ जंगल की और चल देता है. वे इस बात का भी ध्यान रख रहे थे कि कोई उनका पीछा ना कर रहा हो. वैसे भी दोनों अपनी जोड़ी की वजह से लिल्लीपुट में प्रसिद्ध हो चुके थे. दोनों जंगल के पास पहुंच जाते हैं और अंधेरे जंगल की और चल देते हैं. दिन में जंगल की अपनी ही छटा थी. पेड़ों से आती हल्की रोशनी अंधेरे को चीरती हुई सी लगती थी. अनेकों जंगली फूल, धूप-छाँव में बहुत ही प्यारे लग रहे थे. पक्षी अपने-अपने गीत गाकर जैसे दोनों का स्वागत कर रहे थे. जंगली जानवर तो आवाज़ करके गायब हो जाते थे. अब दोनों एक छोटे से मैदान के

पास पहुंचते हैं जो जंगल की जमीन से थोड़ा ऊंचा था. दोनों छिपकर ऊपर चढ़ते हैं. सुपर्णा मानो किसी चीज़ के ऊपर मिलने की उम्मीद कर रही थी जो ऊपर नही थी. अब सुपर्णा, चंद्रा को एक तरफ बनी मध्य आकार की गुफा दिखाकर उस तरफ दोड़ लगाने का इशारा करती है. ऊपर-नीचे पथरीले मैदान पर दोनों एकसाथ भागते हैं. तभी सुपर्णा किसी ढेर से टकराने की वजह से गिर पड़ती है. चंद्रा उसे उठाने के लिए जैसे ही झुकता है तो क्या देखता है कि वहां अलग-अलग तरह की हडियां पड़ी हुई थीं. मछलियों और जानवरों की एक साथ, एक ही ढेर में. अब चंद्रा को कुछ अंदाजा हो जाता है कि वो क्यों भाग रहे थे. दोनों फिर से दोड़ लगा देते हैं और गुफा के अंधेरे में खो जाते हैं.
           गुफा के बाहरी और तो सूरज का उजाला था लेकिन अंदर घुसते हुए उन्हें अपनी आंखों पर जोर देना पड़ रहा था. चंद्रा को तो बीच-बीच में और ज्यादा झुकना भी पड़ रहा था. लेफ्ट-राईट, लेफ्ट-राईट अंदर की और अधिक गहरा जाते हुए उसका सीधा खड़े रह पाना भी मुश्किल हो रहा था. अब उसे कुछ आवाजें सुनाई देने लगती हैं जो किसी धातु के पत्थर पर टकराने से होती है. एक और मोड़ और अब उसे रोशनियां दिखाई देने लग जाती है. यह एक बड़ा सा कुदरती हॅाल जैसा था जहां दस से बारह बौने अजीब से मैले, नोकदार कपड़ों और तिरछी नुकीली टोपीयों में चट्टानों को खोद रहे थे. तभी एक तेज़ और तीखी आवाज़ आती है, : “मिंल गयां, मिंल गयां....अरें नहीं......यें तों शींशां हैं” एक बौना इतनी जो से चिल्लाया था जैसे उसे हीरा मिल गया था जो बाद में शीशा निकला हो. लेकिन वो बौना जो भी था अपनी नाक से बात कर रहा था.
“तेरी कीस्मत में तो शीशा ही लिखा है, सत्ती.” एक और बौना दूर से चिल्लाता हुआ खिल्ली उड़ाता है.
“औंऱ तुम्हारें हीरें. उन्हीं कों सजानां अपनें गलें में.” पहले वाला बौना कहता है.
“अच्छा अब दोनों बातें कम और काम ज्यादा करो.” एक और बौना उन पर गुस्सा करता है.
           तभी सभी की नजर सुपर्णा पर पड़ती है. सभी अपना काम छोड़ सुपर्णा से मिलने आ जाते हैं. सुपर्णा को देख सभी बड़े ही खुश थे और उसे दिवाली की शुभकामनाएं भी दे रहे थे. लेकिन एक लम्बे कद के इंसान को सामने खड़ा देख सभी बौने खनिक एकदम से अलग-अलग गुफाओं में भाग जाते हैं और सब गुफाओं में अंधेरा छा जाता है. सुपर्णा चींखकर उन्हें रुकने के लिए कहती है लेकिन उसकी कोई भी नहीं सुनता. अब सुपर्णा खुद उन अँधेरी गुफाओं में से एक में जाती है और कुछ देर के बाद उस अँधेरी गुफा में से उजाले के पीछे-पीछे एक बौने खनिक के साथ बाहर आती है. वो बौना चंद्रा को देखकर मानो कांप रहा था और उसे डर से देखते हुए दूसरी गुफा में घुस जाता है. कुछ देर के बाद वो एक और बौने के साथ बाहर आता है. उसी तरह सभी बौने खनिक एक बार फिर से उस बड़े से हॅाल में इकट्ठे हो जाते हैं. सभी डरते हुए टकटकी लगाए चंद्रा की और देखे जा रहे थे मानो नजर फेरते ही चंद्रा उनके ऊपर उछलने वाला था.
“कौन है ये और तुम्हारे साथ क्या कर रहा है.” एक तंदरुस्त बौना अपनी भारी आवाज़ में सुपर्णा से पूछता है.
“तुम्हे इंसानों से दूर रहना चाहिए.” दूसरा बौना कहता है. उसका गला जैसे बैठा हुआ था.
“य-य-ये....य-य-यह-यहां क-क-कै-कैसे...प-प-पहु-पहुंचा?” तीसरा बौना हकलाते हुए पूछता है
“तुम लेकर आईं इसे?” एक छरहरा बौना इतनी तेजी से पूछता है कि चंद्रा को सुनाई भी नही देता.
“इसे यहां नही लाना चाहिए था तुम्हे.” इस मोटे-ताजे बौने ने ये इतने आलस में और धीरे बोला था कि उससे कछुआ और ‘स्लोथ मंकी’ भी शर्मा जाता.

“सुपर्णां तुमनें यें क्यां कंर डालां. अंब यें हमारें लियें खतरां बंन जांएगां.” सत्ती नाक से कहता है. उसकी नाक से आती आवाज़ से चन्द्रा को इतनी खीज हो रही थी कि वो उसकी नाक ही तोड़ डालना चाहता था.
           सभी खनिक बौने एकसाथ सवाल पूछ डालते हैं. सुपर्णा उन सब को शांत करती है और चन्द्रा के लिल्लीपुट में आने तक की सारी कहानी उन्हें बता देती है. चन्द्रा की कहानी सुनने के बाद सभी खनिकों का डर कुछ हद तक चला जाता है. अब यहां-वहां की बातें करने के बाद चंद्रा उन सब से इस तरह अंधेरी खन्दकों में रहने का कारण पूछता है. 
“उस कमीने शाही खानदान की वजह से”, “उस राजा के दादा की वजह से”, “उस कमीने जादुगर वजीर के कारण”, “ल-लु-लुटेरे... ह-है..स-स-सब के स-सब.” सभी खनिक बौने एक साथ ही बोलना शुरू कर देते हैं. तभी चंद्रा सभी को चुप होने के लिए कहता है. अब वो भारी आवाज़ वाले बौने को बताने के लिए कहता है जो ना अटकता था, ना तेज बोलता था, ना सुस्त बोलता था, ना उसका गला बैठा था और ना ही वो नाक से बात करता था.
           अब वो बौना बताना शुरू करता है, ”ये तब की बात है जब आज के राजा का दादा, ‘रादा सिंह लिल्लीया’ शाशन में था. हम भी दिन के उजाले में रहते थे, खुले में धूप का आनंद उठाते थे, नहाते थे, खेलते थे. तुम बाहर जिस मैदान से अंदर घुसे वहीँ पर हमारे पुरखों की बस्ती हुआ करती थी लकड़ियों के लठों से बनी एक खुशहाल बस्ती थी वो. हमारे पुरखे कमरतोड़ मेहनत करने के बाद तीन-चार महीनों में एक ही नगीना खोज पाते थे. वरना तो अक्सर हमारे हाथों नीलम, हीरों जैसे चमकीले पत्थर लगते रहते हैं. मिले ‘नगीने’ को बाज़ार भाव में बेच कर हमारी पूरी बस्ती का गुजर-बसर आराम से तीन से चार महीनों तक हो जाता था. हमारी दुनिया में ‘नगीना’ बहुत ही कीमती वस्तु है. तो राजा के दादा के वजीर की काली नजर हमारी खन्दकों पर पड़ी.
           उस लालची जादूगर ने राजा के कान भरना शुरू कर दिए और उस मुर्ख गधे राजा ने भी उसकी बातों में आकर ‘नगीने’ को शाही सम्पत्ति घोषित कर दिया जिसे ना अब महल के सिवा किसी द्वारा खरीदा जा सकता था और ना ही बेचा जा सकता था. महल की इस मुफ्तखोरी के कारण हमारे पूर्वज तो भूखे ही मर जाते. हमारे पूर्वजों ने राजा से बातचीत करने के लिए एक विरोध-जुलूस निकाला. जिसे उस कमीने-लालची वजीर ने रास्ते में ही तोड़-मरोड़ कर ध्वस्त कर दिया. बहुत से खनिक बंधी बना लिये गए. बस्ती में जब विरोध की आग भड़की तो सभी ने इसका कड़ा विरोध करने का फैसला किया. लेकिन इससे पहले कि हमारे पूर्वज कुछ कर पाते उस वजीर ने शाही सेनाओं के साथ हमारी बस्ती में आग लगवा दी. बड़ा ही डरावना मंजर रहा होगा वो. बड़े-बूढ़े-बच्चे सभी इस लालच की चपेट में आ गए होंगे. कुछ पूर्वजों ने बच्चों के साथ इन्ही खन्दकों में शरण ले ली और तब से उनके वंशज इसी छिपी दुनिया में हैं.” इसके बाद सभी कुछ देर खामोश रहते हैं.
“बाद में राजा के पिता ‘रंर्ध्रेन सिंह लिल्लीया’ ने, जो उस घटना के समय पैंतीस साल का राजकुंवर था, इस घटना से आहत हो लिल्लीपुट की सैन्य शक्ति को कम कर दिया और लालची वजीरों की जमात ही मिटा दी इस दुनिया से. ‘नगीना’ अब राष्ट्रिय सम्पत्ति है शाही नहीं. अब इन नियम-कायदों के हमारे लिए कोई मायने नहीं है. वैसे तुम इंसान भी तो कम लालची नहीं होते हो.” भारी आवाज़ वाला बौना चंद्रा को ताना कसते हुए कहता है.
           चंद्रा मुस्कुरा कर रह जाता है और बात को पलटने की कोशिश करता है, “अरे हमने पूरी कहानी तो सुन ली लेकिन अभी तक सभी ने अपने नाम तो बताए नहीं. मैं तुम....आप लोगों को किस नाम से पुकारूं?”
           इस पर सभी बौने अपना-अपना नाम बताना शुरू करते हैं, भारी आवाज़ वाला बौना अपना नाम ‘इक्की’, बैठे गले वाला बौना ‘दुक्की’, हकलाने वाला अपना नाम ‘तिक्की’ बताते बताते ‘ति..’ पर ही अटक जाता है जिसे जल्दी कहने वाला बौना पूरा कर अपना नाम ‘चोक्की’ बताता है, सुस्ती से बात करने वाला बौना अपना नाम ‘पंजी’ तो नाक से

बतियाने वाला बौना अपना नाम जल्दी से ‘सत्ती’ बताकर बात खत्म करने की कोशिश करता है. लेकिन चंद्रा इस बात को पकड़ते हुए पूछ ही डालता है: “तो ‘छक्की’ किधर गया, वो नजर नहीं आ रहा?”
           ये सुनकर तो जैसे सत्ती के पेट में मरोड़ ही उठा हो. उसका मुंह एकदम से गुस्से में लाल पड़ जाता है. सुपर्णा भी मुंह दबाकर धीरे से हंसने लगती है. अब चंद्रा उनसे उनकी आजीविका के बारे में पूछता है तो इक्की बताता है कि वो सादे कपड़ों में नगीना बेचते हैं और जरूरत का सामान ले आते हैं. कभी-कभार धूप सेंकने के लिए हम जंगल में चले जाते हैं. ‘दुक्की’ बताता है कि ‘इक्की’ तो एक बार सुपर्णा के भाई स्टेशन मास्टर ‘बलवा’ से लिल्लीपुट के राष्ट्रीय समारौह में कुश्ती भी लड़ आया था. सभी खनिक भी वहीं मोजूद थे. सुपर्णा ने खनिकों से शर्त लगाई थी कि अगर ‘बलवा’ जीतेगा तो सभी खनिक उसे पार्टी देंगे और अगर ‘बलवा’ हारेगा तो वो सब खनिकों को पार्टी देगी. उस दिन ‘इक्की’, ‘बलवा’ से हार गया और अभी तक वो ही सबसे पार्टी लेती आ रही थी. इस पर सभी हंस पड़ते हैं.
           उनसे, उनके जल स्त्रोत के बारे में पूछने पर सभी चंद्रा को एक और गुफा की और ले जाते हैं. थोड़ी दूर तक चलते रहने के बाद चंद्रा को पानी की कलकलाहट सुनाई देने लगती है. सामने एक और बड़ा लेकिन पहले से छोटा हॅाल था. इसमें एक तरफ एक प्यारा सा छोटा तालाब बना हुआ था. ऊपर गुफा की छत की दरारों से पानी नीचे एक चमकती धार में बह रहा था जिसके साथ ही रौशनी अंदर बिखर रही थी. पानी की उस धार में से गुजरती हुई रौशनी इस तरह से दिख रही थी मानो कई सितारे उस धार में से होते हुए बह रहे हों. तालाब के दोनों और सफेद, पीले, भूरे, काले रंग के मशरूम उगे हुए थे. गुफा के अंदर का यह नजारा प्यारा था. तालाब में बहुत से बच्चे नहा रहे थे और आपस में खेल रहे थे. उनमें वो महल वाला बच्चा भी था. जो चंद्रा को देखकर खुश तो होता है लेकिन उसे चुप रहने का इशारा भी कर देता है. शायद वो नहीं चाहता था कि किसी को उसके गुफाओं में इस तरह से घूमने का पता चले.
           अब चंद्रा सबसे पानी के स्त्रोत के बारे में पूछता है पर सभी उसे चुप रहने के लिए कहते हैं. उनके अनुसार पानी के चलते रहने का मतलब था कि ‘‘वो’ अभी अपने घर पर ही है और कौन जाने अभी उनपर उसकी नजर हो.’ लेकिन कोन? चंद्रा का दिमाग फिर से उलझ जाता है. एक और राज, आखिर कौन है जिससे सभी बौने इतना डरते हैं. कोई लम्बा तगड़ा राक्षश तो नहीं जो उन्हें तंग करता हो. चंद्रा खामोश खड़ा रहता है. सुपर्णा बच्चों के साथ खेल रही थी. ‘सत्ती’ चंद्रा के पास आकर सुपर्णा का बच्चों के प्रति लगाव की बात करता है. चंद्रा को उसे देखते ही फिर से अपना सवाल याद आ जाता है:
“मुझे तुम...आप सभी ने अभी तक ये नही बताया कि छक्की कौन है?”
           बस फिर क्या था, सत्ती अपनी बाहें पीछे करता हुआ चंद्रा के ऊपर छलांग लगाने ही वाला था कि उसे बाकी सब बौने खनिक पकड़ लेते हैं. “छोंड़ दों मुझें...मैं इसें बतांतां हूं, किंधंर हैं छंक्कीं. तूं हैं छंक्की....तेंरी सांस हैं....छंक्कीं....तेंरां सांलां हैं छंक्कीं. तेंरां पूंरां.....म-म-म-” इससे पहले कि सत्ती कुछ बोल पाता, ‘तिक्की’ उसका मुंह बंद कर देता है. सत्ती हाथ पांव मारता रहता है और सभी उसे पकड़े रहते हैं. सभी बच्चे खेलना बंद कर देते हैं और सुपर्णा चंद्रा के पास आ जाती है. चंद्रा उससे सत्ती के इस व्यवहार का कारण पूछता है. सुपर्णा उसे बताती है कि इन सभी खनिकों के नाम इनकी पैदाइश के हिसाब से रखे गए थे. सत्ती का छटा नम्बर था. सभी ने उसे बहुत चिढ़ाया तो उसने अपना नाम ‘सत्ती’ रख लिया. वो काफी गुस्सा हो जाता है अगर कोई ‘छक्की’ का नाम भी ले तो. अब चंद्रा छक्की....मतलब ‘सत्ती’ से माफ़ी मांगता है. लेकिन वो उन सब से एक और सवाल पूछता है कि पूरे लिल्लीपुट में तो सभी एक-दूसरे को इज्जत देकर बुलाते हैं. जो उसे यहां देखने को नहीं मिला.
        


अब इस तनावपूर्ण माहोल को बदलने और चंद्रा के सवाल का जवाब देने के लिए दुक्की अपने बैठे गले में एक छोटा सा गाना शुरू करता है:
                     हम है डेढ़ सियाने, किसी की हम क्यों मानें.
                        दुनिया से निराले, रहते इस अंधियारे.

 


           सभी इस छोटे से गाने को नाच-गाकर, तालाब में बच्चों के साथ उछलकूद मचाते हुए, दिवाली की रौशनी और पटाखों के धमाकों के साथ पूरा करते हैं. सभी बड़े ही खुश दिख रहे थे. ख़ास तोर पर सुपर्णा जिसने बच्चों के साथ गुनगुनाकर से इस गाने का भरपूर आनंद उठाया था. अब सुपर्णा की घर वापसी का समय हो चला था. सभी खनिक दोनों को खन्दकों के रास्ते महल तक छोड़ने का फैसला लेते हैं जहां से निकल पाना चंद्रा के लिए काफी मुश्किल भरा था. महल के प्रांगण से सुपर्णा को जाता देख चंद्रा बड़ा ही खुश था. तभी वो बगीचे के फव्वारे के पास राणा जी को सुपर्णा को रोककर उससे बातें करता दिखाई देता है. कुछ मिनट चली इस बातचीत में सुपर्णा वहां से निकल जाने की कोशिश करती हुई दिखाई देती है. लेकिन राणा जी अपने छोटे से घोड़े पर उसके इर्द-गिर्द चक्कर काटता रहता है. फिर सुपर्णा वहां से निकलकर जल्दी-जल्दी गांव की और निकल जाती है.
           चंद्रा इस उधेड़बुन में महल में चला जाता है कि राणा, सुपर्णा से ऐसा बर्ताव क्यों कर रहा होगा. खैर रात को दिवाली पूरी धूम-धाम से मनाई जाती है. हर जगह जल रहे दियों और पटाखों की रौशनी से पूरा लिल्लीपुट जैसे नहा रहा था. महल में लगभग हर कोई आमंत्रित था. हर साल की ही तरह राजा के पटाखा फोड़ने से शुरू होने वाले इस पर्व की शुरुआत के लिए एक बड़ा ‘बम’ रखा गया था. डोंजा खान इसकी पहरेदारी कर रहा था. राजा कुछ झिझक रहा था. सो वो बम को भीड़ से थोड़ा दूर रखने के लिए कहता है ताकि वो उसके फटने से पहले वहां से भाग पाता. लेकिन भीड़ के शोर के कारण सही ढंग से ना सुन पाने की वजह से राणा जी, राजा को बार-बार पूछ रहा था.
“तुम्हारे साथ अपना सिर फोड़ने से अच्छा मैं खु........” ...धड़ामम्मम... राजा अपनी बात पूरी भी नही कर पाया था कि तेज धमाके के साथ बम फट जाता है. इस अचानक हुए धमाके से राजा बेहोश हो जाता है. अब सभी बम की रखवाली कर रहे डोंजा खान को घूरने लगते हैं.
“महाराज ही तो बोला कि फोड़ दूं......” धुएं से निकलते हुए डोंजा खान ने ये बात बड़ी ही मासूमियत से कही थी.
“गधेड़ो देख थारे कारण राजा की हो गई, वो...’डैश...डैश’, ‘नोने पौं’!” 
           राज को होश में लाया जाता है. होश में आते ही वो सीधे ही अपने कमरे में भाग खड़ा होता है. सुपर्णा भी अपने भाई बलवेन के साथ वहां मौजूद अपनी सहेलियों और बच्चों के साथ दिवाली का भरपूर मजा ले रही थी. चंद्रा को पूरा महौल बड़ा ही मनभावना लग रहा था. लेकिन बेचारे राजा की हालत खराब थी. जैसे ही कोई तेज पटाखा फटता, वो उछल पड़ता. राजा अपने तकिये के नीचे सिर रखकर चुपचाप बिस्तर में दुबकने में ही भलाई समझता है.
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MONTH’5व’ DECEMBER
चोरों पे मोर
एक बैंक डकैती
                        दिसम्बर के महीने में ठंड का माहौल हो जाता है. चलिए चलते हैं जंगल की और जहां सर्दी के मौसम में भी भिन्न-भिन्न प्रकार की कुदरती आभाएँ देखने को मिलती हैं. लेकिन जंगल से सावधान रहने की भी जरूरत है. शाम का वक्त है और इसमें कुछ एसी चीज़ें भी मिल जाती है जो आपकी सेहत के लिए कतई ठीक नहीं हो सकतीं.
           देखते हैं आज हमें लिल्लीपुट के जंगलों में क्या मिलता है, लुभावना या डरावना. वैसे तो लिल्लीपुट के जंगलों में कई प्रकार के जानवरों के साथ साथ दानव भी रहता है, जिसे किसी की भी मौजूदगी पसंद नहीं. उससे थोड़ी दूरी पर पेड़ों पर जंगलियों की बसी बस्ती भी है जो हमेशा महल के खिलाफ रहते हैं. कहा जाता है, उन्ही जंगलों में ऊपर की चौटी पर उसका वास भी है जिसके बारे में सोचकर भी हर लिल्लीपुट निवासी के कपड़े गीले हो जाते हैं. कहते हैं उसके सिर पर बालों की जगह भयानक सांप हैं. किसने देखा, कुछ दिखेगा भी तो बताने के लिए होश में भी नहीं रह पाएंगे. हां, हमारे इसी जंगल में दो नमूने भी रहते हैं. उन्हें चोर कहें या लुटेरे, एक ही बात है. किसी काम को वे सही ढंग से अंजाम दे पाते तो नहीं, नाम से क्या होगा. चलिए उन्ही नमूनों के पास चलते हैं.
           वे दोनों अपने ठिकाने में ठंड की वजह से दुबके हुए हैं जो कि एक विशाल पेड़ की कोठर में है. जब वे जेल में नहीं होते, तो यहीं है सोते. इस बात को सभी हैं जानते. एक का नाम ‘इल्ला’, जो ‘इलाहबादी’ जीवन शैली का है और दूसरा ‘बिहा’, जो बिहार से नाता रखता है. इन दोनों के बचपन के नाम भी हैं ‘इल्ला’ का ‘चिटकू’ और ‘बिहा’ का ‘मिटकु’. सभी ‘लिल्ली’ निवासी उन्हें इन्ही नामों से पुकारना पसंद करते हैं. हम भी यही नाम लेंगे, उनका. आज वो दोनों कुछ आपसी चर्चा कर रहे हैं. आईये सुनते हैं:
“अमां मियां काफी दिन बीत गए, कुछ भी नहीं किये हम. अब तो खाना भी उठाकर खाना पड़ रिया है.” चिटकु पान चबाते हुए मिटकु से कहता है.
“भईया का करें, लिल्लीपुट मां अब हमका बहूत लोग जानने लग गए हैं. फिलिम इश्टार जो बन गए हैं. ऐ, भयिया! काहे न ई सब चोरी चकारी छोड़ हम कोन्हो लम्बा हाथ मारें.” मिटकु उत्सुकता से मुंह की भाप छोड़ते हुए कहता है.
“मियां, छोटा हाथ तो ढंग से मार नहीं पाते, लम्बा किस मुंह से मारें. हवलदार क्या सारा माल परोस कर देगा. और वो लम्बू! लिल्लीपुट का रक्षक बना फिरता है, उससे कैसे भाग पाओगे. तुम दस चलोगे, तो वो दो...पकड़े जाएंगे.” चिटकु पान की पीक थूकते हुए कहता है.
“अरे, हम सभी तैयारी कर लिया हूं. हम बैंक मां डाका मारेंगे. उस बैंक मां एक हेई तो कर्मचारी है. बैंक का दरभज्जा बंद....और ऊ ससुरा मैनेजरवा...उका हम बांध लेई. फिर सारा माल हमार और पिच्छे के दरभज्जा से फुर्र्रर. ई..हम..ऊ फिलिम मां देखा. तुम घबराओ नाही हम हूं ना.” मिटकु सांत्वना देते हुए, अपने ठंडे पड़े हाथों को आपस में रगड़ते हुए कहता है.
कुछ जिझक के साथ चिटकु मान जाता है और दोनों इस ख़ुशी में अपनी लाइन दोहराते हैं:                             “जब भी छूटें....हम लूटें. काम के हैं पक्के, हम है चौर उचक्के.”

           अगले दिन चंद्रा पांच दिन पहले हुए अपने ताजा-तरीन एक्सीडेंट के बाद अपनी टूटी कमर के साथ ऑफिस में कुछ काम कर रहा था. उसका HOD ‘मिस्टर ‘होड़’ उसके पास आता है और उससे उसकी फ़ील्ड प्रोग्रेस और एक्सीडेंट के बारे में चर्चा करता है. कुछ देर तक चली इस बात-चित के बाद HOD वहां से चला जाता है. अब बाकी के दिन अपना काम निपटाते हुए चंद्रा, रेश्ना को ताके बिना नहीं रह पा रहा था. रेश्ना भी उसी अंदाज़ में उसकी और मुस्कुराकर देखती और फिर अपना काम करने लग जाती. चंद्रा चुपके से रेश्ना को एक मैसेज भेजता है, जिसमें लिखा था: “चिची, भपा खाओगे.” मैसेज पढ़कर रेश्ना, चंद्रा की और देखकर मुस्कुराते हुए मैसेज का रिप्लाई लिखने लगती है.
“वो क्या होता है?” रेश्ना ने मैसेज कर पूछा था.
“मटन और चावल, अपनी पहाड़ी में कहते हैं. आज परसी आंटी ने बना कर दिया था.” चंद्रा फिर से रिप्लाई करता है.
“छी, चुप करो सर. मांसाहारी कहीं के.” रेश्ना रिप्लाई करती है. चंद्रा ये जानते हुए भी कि रेश्ना नोन-वेज है, जान बूझकर उसे चिढ़ाता है.
“रहने दो तो फिर, घासाहारी कहीं के. गाय की तरह साग-सब्जी ही चबाते रहो. अच्छा तो कभी आपके लिए पनीर की भुर्जी लाऊंगा. लेकिन ध्यान से कौन जाने वो पनीर की होगी या अंडे की.” चंद्रा उसे फिर से चिढ़ाता है. रेश्ना इस बार मैसेज पढ़ कोई भी रिप्लाई नहीं करती और अपना काम करने लगती है.
           शाम को ऑफिस के बाद चंद्रा, रेश्ना के जाने से पहले पास की मशहूर बेकरी जाकर अपने और रेश्ना के लिए बहुत से ‘बिस्कुट’ और ‘पैन केक’ ले आता है और बंद लिफाफा उसे दे देता है. रेश्ना थोड़ा जिझकने के बाद वो सामान ले लेती है. चंद्रा रात का खाना खा रहा था कि उसे रेश्ना का मैसेज आता है:
“सर इतना सारा सामान क्यों और कहां से लाए आप?” रेश्ना ने पूछा था.
“मैडम जी मैं भी जॉब करता हूं. मेरी टूटी कमर की कमाई है ये. कहीं से चौरी कर नहीं लाया.” चंद्रा भी चिढ़ाने के लिए मैसेज कर देता है. उसके बाद रेश्ना कोई भी रिप्लाई नहीं करती.
           रात सोते समय चंद्रा को रेश्ना का सपना पड़ता है जिसमें वो उसे ऑफिस में चिढ़ा रही थी. चंद्रा, रेश्ना से मन ही मन प्रेम करने लगा था. लेकिन अपने प्यार का इज़हार नहीं कर पा रहा था. हर दिन उसे चोरी-चोरी देखने और उससे बात करने के बहाने ढूंढने के सिवा वो कुछ भी ठोस कदम नहीं उठा पाता था. चंद्रा, रेश्ना से आई ढीली-ढाली प्रतिक्रिया से ही खुश हो जाता था और शायद मन ही मन ये मान बैठा था कि रेश्ना भी उसे पसंद करती थी. अब ये तो भगवान ही जानता था कि रेश्ना के मन में क्या था या खुद रेश्ना. चंद्रा के इस पागलपन में अब इस बात की कमी रह गई थी कि उसे एक महीने से रेश्ना के सपने भी पड़ने लगे थे. इस बात का खुलेपन से इज़हार ना करते हुए चंद्रा रेश्ना से मजाक करता था कि रेश्ना की पड़ोस से कोई डायन उसके सपनों में आ उसे तंग करती है. अब सुबह उठकर चंद्रा अपने देखे हुए सपने के बारे में रेश्ना को मेसेज करता है:
“मैडम जी, है क्या? आज फिर से आपकी डायन आई थी. समझा दीजिये उसे कि मुझे तंग ना करे या तो मुझे कोई ऐसा मन्त्र बताइए जिससे वो डायन मुझसे दूर रहे.” चंद्रा मजाक करते हुए लिखता है.
“ॐ नमः शिवायः..” रेश्ना ने थोड़ी देर के बाद रिप्लाई किया था.
“ॐ नमः शिवायः, डायन को भगाएं...” चंद्रा झट से रिप्लाई कर मजाक करता है. लेकिन रेश्ना की और से फिर कोई रिप्लाई नहीं आता.
            
           लिल्लीपुट कॉलोनी में भी आज का दिन हर दिन की तरह ही खुशनुमा था. देखने में ‘लिल्ली’ कॉलोनी पूरे लिल्लीपुट की ही तरह आकर्षक रूप-रंग की थी. बीच में एक आकर्षक फव्वारा और उसके आस-पास छोटा बागीचा, ‘लिल्ली’ वासियों के रहने के लिए एक आदर्श माहौल तैयार करते थे. कॉलोनी में एक इमारत सीधे खड़े ‘क्रेश’ हुए हवाई जहाज़ की तरह थी जिसकी नाक जमीन में धंसी हुई थी और पूंछ वाला हिस्सा आसमान की और था. एक इमारत जो रेल के डिब्बे जैसी दिख रही थी, हवाई जहाज़ की ही तरह खड़ी थी. एक इमारत खड़ी बस जसी दिख रही थी. इन सभी वाहनों जैसी दिखने वाली इमारतों की सवारियों वाले हिस्सों की खिडकियां हर मंजिल के अंतराल पर बनी हुई थीं. रात में इन खिड़कियों में जलने वाली बिजलियाँ, इनके ही रूप वाले असली वाहनों में जलने वाली बिजलियों जैसी ही दिखती थीं.
           कॉलोनी में हर क्षेत्र के बौने रहते थे. सबमें आपस में नौक-झोंक होने के बावजूद भी सभी आपस में भाई-चारे के साथ रहना ही पसंद करते थे. क्रिसमस के माहौल की वजह से कॉलोनी में रहना वाला हर ‘लिल्ली’ निवासी, अपने दिन की शुरुआत अच्छे मूड से कर रहा था. जैसे एक पहाड़ी मूल का बौना, ‘मनेंद्र’ अपनी मंजिल की बालकनी में खड़ा होकर सुबह की ताज़ी हवा का सूंघकर आनंद ले रहा था. पहाड़ी मूल का होने की वजह से इस बौने ने अपना कमरा भी सबसे ऊपर की मंजिल में ही लिया था. उसकी पंजाबी मूल के एक बौने, ‘पनेंद्र’, से खट्टी-मीठी मुठभेड़ होती रहती थी. मैदानी इलाके का होने की वजह से ‘पनेंद्र’ ने अपना कमरा सबसे नीचे की मंजिल में ही लिया था. उसकी पत्नी पहाड़ी मूल की थी और ‘मनेंद्र’ की पंजाबी मूल की. तभी नीचे से गुजरता हुआ ‘पनेंद्र’, मनेंद्र को हवा सूंघते हुए देख लेता है.
“ओ. पहाड़ी इन्नी जोर से ना सूंघो कि कोई उड़ती मक्खी अपना रास्ता ही भटक जाए.” पनेंद्र, मजाक करता है.
“आप मैदानी इलाके वालों को क्या पता कि ताज़ी ठंडी हवा का मजा ही कुछ अलग होता है.” मनेंद्र भी मजाक का जवाब मजाक से ही देता है.
“ओ, मैदानी....मैदानी कि करदे हो, असी वी पहाड़ां ते फतेह पाई होई है.” पनेंद्र का इशारा अपनी पहाड़ी मूल की बीवी की तरफ था.
“तो हमने भी मैदान मार लिया हैं जी.” मनेंद्र भी अपना जवाब उसी अंदाज़ में देता है जिससे वहां खड़े सभी लोग हंसने लगते हैं.
           इसी तरह की कई छुट-पुट नोंक-झोंक ‘लिल्ली’ कॉलोनी में अक्सर होती रहती थीं जिनका अंत हंसी की फुहारों के साथ ही होता था. हर कोई दूसरे की किसी खास बात का मजाक उड़ाता भी था और खुद भी मजाक बनता था. जैसे- मोटा-पतले का, लम्बा बौना सबसे छोटे बौने का, काला-गौरे का मजाक उड़ाता था और खुद भी मजाक बनता था. लेकिन आज सभी कॉलोनी वासी अपनी नोंक-झोंक की जगह हर साल की तरह कॉलोनी को क्रिसमस संध्या के लिए तैयार करने में अधिक व्यस्त थे. ये कार्यक्रम ‘लिल्ली थिएटर’ में धूम-धाम से होना था. इसमें लिल्लीपुट के हर निवासी के साथ-साथ पूरी शाही जनसंख्या की भी उपस्थिति होनी थी. प्रेसिडेंट से ‘लिल्ली थिएटर’ में कार्यक्रम करने सम्बन्धी मीटिंग करने के बाद कॉलोनी के सदस्य अपनी-अपनी पीठ पर प्रेसिडेंट के पार्टी स्टीकर को भी चिपकवा लेते हैं.
           शाम को, किसी संगीत की लहरों और धुनों के नीचे जोड़कर रखे गए संगीत वाद्नों जैसा दिखने वाला, ‘लिल्ली’ थिएटर खचा-खच भरा था. ‘लिल्ली थिएटर’ क्रिसमस संध्या के उपलक्ष्य पर क्रिसमस की ‘थीम’ पर सजाया गया था. राजा से लेकर जादूज तक, सभी थिएटर पहुंच जाते हैं. उनके बाद प्रेसिडेंट का काफिला हमेशा की ही तरह लोगों को धकेलता हुआ थिएटर पहुंच जाता है. अंदर संगीत वाद्नों जैसी दिखने वाली कुर्सियों और किसी तबले जैसे दिखने वाले बहुत बड़े स्टेज पर मेजबान सभी महानुभावों को आमंत्रित कर रहे थे. कार्यक्रम की शुरुआत ‘सैंटा क्लॉज़’ बने ‘जादूज’ द्वारा कई जादुई करतब दिखाने और बच्चों में जादुई टोफियां बांटने से होती है. उसके बाद ‘लिल्लीपुट के मशहूर बैंड

‘लिल्लीयंस’ की धुनें सब का मन मोह लेती हैं.
           उस दिन शाम को चिटकु और मिटकु दोनों चोर अच्छे कपड़ों में भेस बदलकर बैंक पहुंच जाते हैं. बैंक को भी क्रिसमस की संध्या पर सजाया गया था. इस समय बैंक में सिर्फ मैनेजर पीसा बाबू ही होता था. बैंक में अंग्रेजी के अक्षर ‘एल’ और ‘एस’ जैसे मुड़े हुए नोटों जैसी दिखने वाली कुर्सियां और सिक्कों जैसे दिखने वाले गोल मेज लगे हुए थे. उस दिन मैनेजर ने डॉलर के साइन वाली शर्ट डाली हुई थी जिसपर रूपये के नोट की जेब लगी हुई थी. मैनेजर साहब भी आज बैंक जल्दी बंद करके 'लिल्ली’ थिएटर पहुंच जाना चाहते थे. लेकिन उनकी खिदमत में आज कोई और ही ड्रामा पेश होने वाला था. चिटकु, बैंक मैनेजर से बाथरूम के लिए पूछता है:
“मियां..मैनेजर साहब. ‘सुसु’ ‘रूम’ किधर होता?” चिटकु अपने जहिलाना अंदाज़ में पूछता है जिसे मैनेजर समझ जाता है.
“अरे..कहां का मैनेजर. कभी किशी मानेजर को अपने ऑफिश का टॉयलेट शाफ़ करते देखा है. आगे शे लेफ्ट....” मैनेजर चिटकु से चिढ़ते हुए कहता है.
           चिटकु अंदर चला जाता है. अब मिटकु मैनेजर से अकाउंट खोलने के बारे में पूछताछ करने लगता है, यहां अकाउंट कितने में खुल जाता है, कौन-कौन खोल सकता है, क्या चोरों के अकाउन्ट्स भी खोलते हैं आप, क्या अकाउंट के लिए पैसे ही देने पड़ते हैं या कपड़े-लत्ते से भी खोल सकते हैं, अकाउंट. वो भी तो पैसों से ही आते हैं. ऐसे कई ऊट-पटांग सवाल जिनसे चिढ़कर मैनेजर उसे बैठ जाने के लिए कहता है. कुछ देर के बाद मिटकु भी चिटकु के पास बाथरूम में चला जाता है और अंदर जाकर अचानक ही शोर मचाने लगता है:
“अरे कोई बचाओ, हमार साथी बेहोस हुई गवा है. कोई कुछ तो करे.” हल्ला करते हुए मिटकु बहुत उछलकूद करने लगता है. अपनी इस हरकत को एकदम असली दिखाने के चक्कर में मिटकु ‘ओवर एक्टिंग’ कर रहा था. शोर सुन मैनेजर बाथरूम में भागते हुए आता है. अंदर आकर मैनेजर देखता है कि दोनों ही अच्छे-खासे खड़े थे और उनके हाथों में डंडे थे. फिर क्या था, दे-दनादन...दे-दनादन, मैनेजर नीचे गिर जाता है और दोनों चोर उसे बांध देते हैं.
“उड़ी बाबा! तुम कि कोरती, तुम कि कोरती. एषा ना कोरो, हमको जाने दो” मैनेजर चिल्लाते जा रहा था और दोनों ही उसे बांधकर बाथरूम में बंद कर देते हैं.
           अब दोनों लॉकर की और लपकते हैं. चिटकु, मिटकु से लॉकर की चाबी मांगता है. तो मिटकु उसके पास चाबी न होने की बात कहता है. इस पर चिटकु, मिटकु पर नाराज़ होते हुए कहता है:
“मियां, क्या तुम बिना चाबी ताला अपने दांतों से खोलते. तुम बोलते....तुम पूरी तैयारी के साथ होते मियां. अब जो माल कोन्टर में होता उसी को उठाता और भागता.” चिटकु गुस्सा होकर कहता है.
“ऐ! भईया फिर उही छोटा हाथ. सबर करा हो, चाबी इहां ही...ऊ मैनेजरवा के पास होगी.” कहते हुए मिटकु के दिमाग की एकाएक ही बत्ती जल उठती है.
           दोनों ही मैनेजर के पास पहुंचकर चाबी के बारे में पूछते हैं तो वो उन्हें बताने से मना कर देता है. इस पर मिटकु उससे बलपूर्वक उगलवाने के लिए उस पर डंडे का एक कड़ा प्रहार करता है जिससे मैनेजर बेसुध हो जाता है. इस पर चिटकु उसे फिर डांट लगाता है. चिटकु उससे एकबार फिर से काउंटर कैश लेकर भाग जाने की बात कहता है. मगर मिटकु आया मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहता था. वो खुद काउंटर पर जाकर चाबियाँ ढूंडने लगता है. अब चिटकु की चिंता और भी बढ़ जाती है की अब वो चाबी का पता कैसे लगाएंगे. समय टिक-टॅाक, टिक-टॅाक कर रहा था. दोनों के चेहरों पर पसीना बाढ़ की तरह बह रहा था और हाथों में भूकंप मचा था कि तभी बाहर कुछ गाड़ियों के रुकने

की आवाजें आती है. सुन, दोंनो ठहर जाते हैं.
           बाहर पांच व्यक्ति आपस में बातें करते हुए बैंक में घुसते हैं. कौन हैं वो आदमी जो बेचारे इस समय बैंक में जा रहे थे. वैसे तो उन चोरों से किसी को भी खतरे की कुछ ख़ास आशंका नहीं होती थी. पर आज वे दोनों ही अपने पुरे शबाब पर थे. बेचारे मैनेजर बाबू से ही पूछ लीजिये. कुछ ही समय बीता था कि बाहर पुलिस की गाड़ी का सायरन भी बजने लगता है जिसमें से ‘पुलिस-पुलिस’ की आवाजें सुनाई दे रही थीं. यही तो ख़ास है लिल्लीपुट में. पुलिस की गाड़ी तो है ही पुलिस की टोपी जैसी छत, और घूरती आंखों जैसी हेडलाइट्स के नीचे रौबीली मुछों की शक्लों सूरत वाली. और अब ये सायरन भी ‘पुलिस-पुलिस’ चिल्ला रहा है. अब अंदर दोनों चोरों की सांसें थम जातीं है. दोनों ही खिड़की से झांकते हैं तो बाहर मेजर की पलटन और सेनापति राणा जी अपने घोड़े पर सवार अपने सैनिकों के साथ घेरा डाले हुए थे. मेजर चोरों को बाहर झांकते हुए देख लेता है.
“एई शाला! ये तो चिटकु और मिटकु का आक्रमण है. इन दोनों के लिए तो हामरा राणा जी ही काफी है. क्यों राणा जी.” मेजर, राणा जी पर चुटकी लेते हुए कहता है.
“हां..हां इठे भासते तोोोो...म्हारो ‘बजाज’ ही घणो है भायो.” राणा जी हकलाते हुए शेखी बघारता है.
“ऐ गधा! यो तो माल भी नि ढो सके हैं. चोरों को खाख धरेगा. देख साईं कहीं अंदर जाकर ऐ चोरों का माल ही ना ढोने लाग जावे.”  हवलदार हवा सिंह भी चुटकी लेता है. इस पर सभी ठहाका मारकर हंसने लगते हैं. सूबेदार और सैनिक तो जमीन पर लोटपोट ही होने लगते हैं.
“जा म्हारो बजाज, उण चोरों णे अपणी ‘डैश...डैश’ में धर के लाणा, ‘बगलों में’” राणा जी, चिढ़ कर अपने घोड़े को बैंक की तरफ दोड़ा देता है.
           घोड़ा बैंक की और दोड़ पड़ता है और छाए सन्नाटे में घोड़े की थाप के बीच सब बड़ी ही उत्सुकता के साथ उसे देखने लगते हैं कि अब वो क्या और कैसे करेगा. जैसे ही घोड़ा बैंक के दरवाजे के पास पहुंचता है दरवाजा अपने आप ही खुल जाता है. इस पर घोड़ा एकदम से भिन्ना जाता है और धूल का गुब्बार उड़ाता हुआ एक टर्न ले कर भाग जाता है. बस फिर क्या था सन्नाटे में हंसी के ठहाके गूंज उठते हैं. राणा जी, अपनी तलवार और धूल के गुब्बार के साथ खड़ा रह जाता है.
“’डैश...डैश’ नठी गयो. ‘कमबख्त’” राणा जी अपने बालों से गिरती हुई धुल के बीच कहता है.
तभी वहां झाड़ू लगाते हुए ‘सैंफु’ आ जाता है. राणा जी के चेहरे पर लगी हुई मिट्टी को देख सैंफु अपने पोछे से उसके चेहरे की सफाई करने लगता है. जिससे चिढ़कर राणा जी उसे लातें मारते हुए भगा देता है.
“मियां बहुत हंस लिए तुम. अब सीधे-सीधे हम लोगां को जाने दो नहीं तो हम मैनेजर के साथां सभी लोगां की बकरी बना देंगे.” तभी अंदर से चिटकु की आवाज़ आती है.
“साब. बकरी खाए बड़े दिन हो गए....बनने दो.” इस पर सूबेदार मेजर से मजाक कर कहता है.
“शुअर खाए भी बड़ा दिन हो गया है.....शुअर का बच्चा..! चुप-चाप अपना पोजीशन शम्भालो, वरना तुम्हारा श्वाईन फलू बना देगा.” मेजर उसे डांट लगाता है.
तभी घटना से अनजान सब्जी वाला सब्जो, वहां अपनी सब्जियों की हांक लगाता हुआ गुजरता है:

“ली लेयो.... सिंडी की भिंडी, सड़ेला है करेला, मत हो लोभी खा ले गोभी, मिक्स कर खाया आ..हा बड़ा मजा आया.” वहां पर खड़े सभी एकदम सब्जी वाले की और देखने लगते हैं. सब्जो, डर के ठहर जाता है.
           बेचारा सब्जो, उसे राणा जी के सैनिक पकड़ लेते हैं और उसे जबरदस्ती बैंक की और भेजने लगते हैं. सब्जो बेचारा डर कर उनसे उसे वहां ना भेजने की प्रार्थना करता है. पर जब सेनापति अपनी तलवार और फौजी अपनी बंदूकें उसकी और निकालते हैं तो वो धीरे-धीरे बैंक की और जाने लगता है. तभी रेहड़ी के ऊपर से घिये के ढेर से एक घिया लुड़क जाता है और बीचे में से मेजर गोम्पा बहादुर का सिर दिखाई देता है. मेजर एकदम से पालक के बंडल को अपने सिर पर रख लेता है. बैंक का दरवाजा खुलता है और सब्जो अपनी सब्जियों के साथ अंदर चला जाता है. उनको गए कुछ ही देर हुई थी कि बैंक की खिड़कीयों के शीशों पर सब्जियां बारी-बारी से गिरने लगती है.
“एई शाला!....छोड़ेगा नाई....एई...!” अंदर उड़ती हुई सब्जियों के बीच मेजर के चिल्लाने की आवाजें आने लगती हैं. 
“ये गधेड़ा सब्जियों से लड़ रहा है के.” सेनापति, हवा सिंह की और देख पूछता है. फिर सब कुछ शांत हो जाता है.
“अरै! बड़ी देर हो गई सै. अंदर चलना पड़े है.” हवा सिंह सेनापति से पूछता है. लेकिन सेनापति, मेजर का सिग्नल ना आने की बात करता है.
“अब के, ओ इन उड़ती सब्जियों की ‘मिक्स वेज’ बणाकर सिग्नल भेज्जेगा तन्ने” चिढ़कर कहते हुए हवा सिंह बैंक की और चल पड़ता है. बाकी सब भी उसके पीछे चल देते हैं.
           आगे हवा सिंह और उसके पीछे सभी बैंक में घुसने लगते हैं. जैसे ही जोशीला हवा सिंह सीढ़ियों पर पांव रखता है कुछ उसके माथे से टकराकर उसके हाथ में गिरता है. हवा सिंह को वो एक बम्ब जैसा लगता है. फिर क्या था सभी बम्ब-बम्ब चिल्लाते हुए पीछे भाग जाते हैं. लेकिन बम्ब अभी भी हवा सिंह के हाथों में था और वो सन्न सा अपनी मुठी को दबाए दरवाजे पर ही खड़ा था.
“या अल्लाह......” डर कर हवा सिंह जोर से चिल्लाता है.
“ऐ गधेड़ो! बम्ब देखि के अपणा धर्म भुली गयो. फैंक इसणे” राणा जी उसे डांटते हुए कहता है.
           हवा सिंह, बम्ब को फैंक देता है जो सीधा डोंजा खान के हाथों में गिरता है. बस अब बम्ब का एक दूसरे को ट्रांसफर शुरू हो जाता है. पहले ‘डोंजा खान’ से घोंजा राम और फिर सूबेदार से सिपाही और फिर दोबारा ‘डोंजा खान’ के हाथ में पहुंच जाता है. अब वक्त बीत चुका है, सोचकर ‘डोंजा खान’ बम्ब को बिना देखे घोंजा राम के मुंह में डाल देता है, आधा अंदर-आधा बाहर. और खुद अपने अंगूठों से अपने कानों और उंगलियों से आंखों को ढक लेता है. कुछ पल बीत जाते हैं पर कुछ भी नहीं होता. घोंजा राम ध्यान से देखता है तो वो एक बैंगन निकलता है. घोंजा राम उसे दांतों से काटकर थूक देता है. तभी बैंक के अंदर से मिटकु उनकी हंसी उड़ाता है, “बेबकूफ.” अगले ही पल, एक और बम्ब जैसी कोई चीज़ घोंजा राम के हाथों में गिरती है. चिढ़ा हुआ घोंजा राम उसे अपने दांतों से काटकर अंदर की और फैंकते हुए कहता है:
“ये लो आधा तुम्ही खा.....” ‘...धड़ामम्म्म....’ कि तभी उसके उठे हाथों में बम्ब फट जाता है. धुँआ छटता है तो सन्न सा घोंजा राम टाँगे फैलाकर, कालिख मे लिप्टा, नीछे गिरा हुआ दिखता है. डोंजा खान उसे उठाता है पर वो फिर से गिर जाता है.

                  
           रात घिर आई थी, अंदर दोनों चोर परेशान थे कि पुलिस को इतनी जल्दी पता कैसे चला. वे दोनों मैनेजर से चाबियों के बारे में पूछने के लिए उसके पास बाथरूम में जाते हैं. मैनेजर अभी तक बेहोश पड़ा था. तभी दोनों चोरों को मैनेजर की बगल में सीधे हाथ में मोबाइल दिखता है. मिटकु उसे चुराने की बात करता है तो चिटकु का माथा ठनकता है और वो मैनेजर को एक जोर की लात मारता है. मैनेजर जोर से चींख पड़ता है. फिर क्या था बाहर मैनेजर की चींखें ही सुनाई देती है:
“उड़ी..बाबा....मार डाला....बोच्चाऔ....कोई तो बोच्चाऔ”  बाहर सभी मैनेजर की चींखें सुनते हैं.
“ऐ कबूतर बाज कबसे बण गए.” हवा सिंह, राणा जी को देख कहता है. राणा जी अपने कंधे उचकाकर मुंह बना देता है.
           तभी बैंक का दरवाज़ा खुलता है और सब्जी वाला सब्जो अपने ठेले पर बची हुई बिखरी सब्जियों के साथ रोंन्दी आवाज़ में बाहर आता है: “खा गए..भिंडी, ना छोड़ा करेला. होकर लोभी खा गए गोभी. पैसे मांगे....मार भगाया.” सभी उसके पास जाते हैं और अंदर क्या घटा, इस बारे पूछते हैं. सब्जो उन्हें बताता है:
“अंदर का मुझे कुछ भी याद है तो सिर्फ ये की में बंधा पड़ा हूं और मेजर साहब कच्छे में खाना बना रहे हैं.”
“अब वो क्या कर रहे है.” सभी एक साथ पूछते हैं.
“बर्तन साफ़ कर रहे हैं.” सब्जो ढीला सा जवाब देता है. जिसे सुनकर सभी हैरानी से एकदूसरे का मुंह ताकने लगते हैं.
“इन्हें क्या हुआ.” सब्जो की नज़र बम्ब फटने से झूलते हुए घोंजा राम की और जाती है.
           अब सभी फैसला लेते हैं कि जो भी हो अब आर या पार करना ही पड़ेगा. तो सभी एकसाथ बैंक की और बड़े ही जोश में चिल्लाते हुए दोड़ने लगते हैं. धाड़ से दरवाजा खोलते हुए सभी अंदर दाखिल हो जाते हैं और अंदर क्या देखते हैं कि चिटकु और मिटकु बंधे पड़े हैं और मेजर साहब बर्तन साफ़ कर रहे हैं.
“मेजर...के भांडे घिस रिया है.” हवलदार, मेजर के पीछे से जाकर उसे पूछता है. तो मेजर चौंककर उठ खड़ा होता है.
“शभी चला गया?” मेजर इधर-उधर ताकते हुए पूछता है.
“कोन चले गयो. चोर तो इधर बंधो पड़ो है, पीसो गायब है और तू भांडे क्यों मांजे है भाया?” राणा जी हैरानी से देखता हुआ पूछता है.
           मेजर सभी को चौंका देने वाली बात बताता है कि असली हमला उन दो चोरों ने नही बल्कि अलग लुटेरों ने किया था. वो गिनती में पांच थे और सारा पैसा भी वही उड़ा ले गए. ये दोनों चोर तो उनके इशारों पर ही नाच रहे थे और जब उनका काम पूरा हुआ तो वो लुटेरे इन्हें बांधकर पीछे के दरवाज़े से चलते बने. अब सारा मामला सब की समझ में आया कि दोनों चोर खतरनाक लुटेरे केसे बन गए थे. अब चिटकु और मिटकु को खोलकर कब्जे में ले लिया जाता है और लिल्लीपुट का पैसा वापिस लाने की एक योजना तैयार की जाती है.
           उसी रात दूर जंगल में आग जली हुई थी. वे सभी पांच लुटेरे अपनी लूट का जश्न मना रहे थे. चिटकु भागता हुआ उनके पास पहुंचता है और उनसे उसे पुलिस से बचा लेने की विनती करता है. सभी उस पर शक करते हुए उसे पकड़ लेते हैं. एक लुटेरा उसके पीछे-पीछे पुलिस के आ जाने की बात करता है, तो एक उनकी लूट के पीछे उस चोर के पड़े होने की बात करता है, तो कोई कहता है कि वो पुलिस का मुखबिर भी हो सकता है. इस पर उनमें से एक जो उनका सरदार लग रहा था, चिटकु से उसकी बात पर विश्वास करने का कारण मांगता है. तो चिटकु उन्हें बताता है कि

वो खुद तो चालाकी से छूटकर भाग आया लेकिन उसका साथी अभी भी पुलिस की गिरफ्त में है. वो उनसे उसे छुड़ाने की विनती करता है.
           सरदार, चिटकु से उसकी मदद किये जाने की वजह पूछता है तो चोर उनसे रात को पुलिस चौकी में एक बड़ा खजाना आने की बात कहता है, जो कल महल के लिए भेज दिया जाएगा. वहीं उसका साथी भी बंद है. इससे एक ही वार में दो शिकार भी हो जाएंगे. वह सरदार से जंगलियों के कबीले के प्रतीक चिन्ह के थाने में होने की बात कहता है जिस पर कीमती नगीना जड़ा हुआ है. यह सुन सरदार की आंखें चौंधिया जाती हैं और वो चोर की पड़ताल के बाद पुलिस थाने पर हमले की बात मान जाता है. रात को लुटेरों का एक गुप्तचर थाने में छिपकर ये पता लगाने जाता है कि चिटकु की बात में कितनी सच्चाई है. वो मिटकु को सलाखों के पीछे और शहर में चिटकु के ‘वांटेड’ के पोस्टर लगे देखता है.                                                             
           सलाखों में बंद मिटकु, सलाखों को पकड़े अंधेरे की और मुंह किये खड़ा था कि तभी, ‘...टन्न...’, सलाखों पर किसी चीज़ के टकराने की आवाज़ होती है. मिटकु चौंककर सलाखों से दूर हटकर खड़ा हो जाता है. फिर कुछ पलों के बाद उसे लगता है मानो उसके पास से कोई गुजर रहा हो. मिटकु डरकर हवा सिंह को आवाज़ देने ही वाला था कि झाड़ियों में कुछ आवाज़ होती है. चिटकु, झाड़ियों के पीछे से निकलकर सलाखों के पास पहुंच जाता है. सलाखों के अंदर से मिटकु कोई प्रतिक्रिया ना देता हुआ चिटकु की और बड़ी ही गम्भीर मुस्कुराहट के साथ देखने लगता है.
“क्या हुआ अभी तक अंदर हो. कोई भी नहीं आया.” चिटकु अपनी चमक भरी नजरों से देखते हुए पूछता है. लेकिन मिटकु का कोई जवाब ना पाकर, चिटकु उसके पास आकर अंधेरे में चमकती अपनी बड़ी-बड़ी आंखों के साथ उसे घूरने लगता है.
“ओह! आप...” चिटकु एकदम पीछे हटकर सफेद पड़ने लगता है और बदलते-बदलते एक सफेद रंग की भुताहा आकृति में बदल जाता है. उस नाटे कद के भूत की लम्बी सफेद ढाढ़ी उसके सफेद चमकते रूप में मुश्किल से ही दिख रही थी. इसके बाद वो भूत एकाएक ही वहां से बिजली के बुझने की तरह गायब हो जाता है.
           बस फिर क्या था, मिटकु सलाखों में उछल-कूद मचाकर ‘भूत..भूत....छेड्डा...छेड्डा’ चिल्लाता हुआ सभी पहरेदारों को जगा देता है. अब जंगलियों का गुप्तचर वहां से निकल जाने में ही भलाई समझता है और जंगल पहुंच सारा किस्सा सरदार को सुना देता है. अब समय ना गंवाते हुए लुटेरे रात को थाने पर चुपके से धावा बोल देते हैं. वहां थाने के बाहर घोंजा राम और ‘डोंजा खान’ पहरा दे रहे थे. मिटकु सलाखों के अंदर ही बैठा हुआ था. वे पैहरा दे रहे थे या खड़े-खड़े सो रहे थे कुछ साफ़ दिखाई नहीं दे रहा था. तभी दोनों के सिरों पर पत्थरों वाले तीर आकर लगते हैं और दोनों ही एक दूसरे के ऊपर लुढ़क जाते हैं.
           पत्थर वाले तीर...? इसका मतलब समझाते हैं आप? कहीं उनको तो प्रतीक चिन्ह के थाने में होने की बात पता नही चल गई. लेकिन कैसे? लुटेरों से? या फिर आज लुटेरों और जंगलियों के बीच ‘लिल्ली’ थाने में कुछ बड़ा हंगामा होने जा रहा था. अब तीन नकाब पोश बौने जेल के पास पहुंचते हैं. सलाखों में बंद मिटकु उनसे उसे बाहर निकालने के लिए कहता है. लेकिन उसकी अनदेखी कर वो बौने अंदर की और बढ़ जाते हैं. अंदर हवलदार अपनी कुर्सी पर बाहर की और पीठ करके सोया था. उसके खर्राटों की आवाज़ दूर तक सुनाई दे रही थी. एक तीर हवा सिंह के सिर पर भी लगता है. उसकी बेहोशी और नींद के बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता यदि उसके खर्राटे अचानक ही बंद नहीं हो गए होते. अब एक और बौना अपने एक और साथी के साथ थाने में घुसता है.
“जाट ने पकड़ ली खाट, उठाओ मूर्ती फटा-फाट.” वो सरदार था जो बड़ी ही सजगता के साथ हवा सिंह को जांचता है.

“सरदार फटा-फट होता है.” सरदार का सेक्रेट्री ‘सम्भु’ सरदार की गलती सुधारते हुए कहता है.
“तू मेरी गलती मत निकाल, उठा मूर्ती और भाग निकल” सरदार, सम्भु को हल्की सी चमाट लगाता है.
“सरदार जमा नही.” वो लुटेरा फिर से टोकता है.
“तू आया है चुराने, कि जमाने.” गुस्साया सरदार उसे एक लात मारते हुए कहता है.
“मूर्ती है कहां, देख लिया यहां-वहां.” एक और जंगली इधर-उधर देखते हुए सरदार से पूछता है.
           सभी जंगली थाने में पागलों की तरह मूर्ती ढूंडने लगते हैं. थक हार कर वे स्लाखों में बंद मिटकु से मूर्ती के बारे में पूछते हैं तो वो चुप खड़ा रहता है. अब सरदार का पारा चढ़ जाता है और बेहोश हवा सिंह की और लपकता है.
“मूर्ती है कहां, जानो तो बूझो. उड़ गई हवा में, हवा से पूछो.” सरदार, बेहोश हवलदार को घूरते हुए उसे कॉलर से पकड़कर मूर्ती के बारे में पूछने लगता है.
           सरदार ने बेहोश हवा सिंह से अपनी पूछताछ शुरू की ही थी कि अचानक ही हवा सिंह खुद ही हवा हो जाता है. उसका पूरा शरीर रेत के कणों में बदलकर बिखर जाता है और सरदार के हाथों में रेत ही रह जाती है.
“थी हमको ये, कोशिश फंसाने की इनकी, है निय्यत खराब जमाने में जिनकी...” स्तिथि को भांपते हुए सरदार स्लांखों में बंद मिटकु की और दांतों को भींचते हुए मुड़ता है.
           उसका चेहरा जैसे ही मिटकु के पास आकर रुकता है वो देखता है कि मुस्कुरा रहे मिटकु की धीरे-धीरे दाढ़ी निकलने लगी थी और चेहरे पर हल्की-हल्की झुर्रियां आने लगीं थीं. उसका लिबास भी बदल जाता है और वहां खड़ा मिटकु, जादूगर में बदल जाता है.
“चेहरे पे चेहरा, चेहरे पे दाढ़ी, पड़े चोरों पे मौर, बन गए अनाड़ी.” सरदार रोंदा सा अपनी कविता बोलता है.
“मतलब?” सम्भु आंखें फाड़-फाड़कर पूछता है.
“भागो....” सरदार चिल्लाता है, सुनते ही सभी जंगली थाणे से बाहर भागने लगते हैं.                            
           जैसे ही सभी पांचों जंगली बाहर पहुंचते हैं, एक बवंडर जमीन की धूल से धीरे-धीरे बनता हुआ उठता है और उन सभी जंगलियों को अपने अंदर समाने लगता है. वो बवंडर कुछ देर तक यहां-वहां घूमता रहता है और सभी जंगलियों के चिल्लाने की आवाजें सुनाई देने लगती हैं.
“मिला ना सोना मिली ना चांदी. घूमती है दुनिया रोको ये आंधी.” सरदार अभी भी गाना गाने से बाज नहीं आ रहा था.
           तभी वो बवंडर सलाखों की और जाता है और सलाखों के बीच हल्का सा अटककर, अंदर-बाहर होने के बाद सलाखों में पहुंचकर शांत होने लगता है. सभी जंगली नीचे जमीन पर बैठे हुए, कुछ देर तक बवंडर की तरह घूमते हैं और फिर चक्कर खाकर लेट जाते हैं. अब जादुगर जादूज सलाखों के सामने आता है.
“लिल्ली नगर की बात निराली, कहो थी आंधी या हवा सुहानी.” जाते-जाते जादुगर भी एक पंक्ति सुना ही डालता है.
“हां जी इंस्पेक्टर साब, दोन्नो धर लिए हैं आप टेंशन ना करो मैं हूं ना.” तभी हवा सिंह वहां अपने इंस्पेक्टर से हर बार की ही तरह फ़ोन पर बात करता हुआ आता है.

“जादूज जी, मुबारक हो. मन्ने फेर से रेत में बदलो तो, बड़ा मज्जा आवे सै.” ख़ुशी से भरा हवा सिंह जादूज को बधाई देते हुए कहता है.
“’हवा’, जो चली ‘हवा’ तो हो जाओगे ‘हवा’.” इस पर जदुज उसे डराते हुए कहता है.
           अगले दिन उन पकड़े गए जंगलियो और उनके सरदार के बदले में ‘लिल्ली’ बैंक का सारा पैसा वापिस कर लिया जाता है. मिटकु तो सलाखों में बंद था लेकिन चिटकु का अभी तक कोई भी पता नहीं चल पाया था. कहीं वो भाग तो नहीं गया था? राणा जी और हवा सिंह, मिटकु को इस बात के लिए ताने कसे जा रहे थे कि उसका दोस्त उसे अकेले छोड़कर भाग गया था. इस मौके पर जादूज और राजा भी वहां आ पहुंचते हैं.
“बोहोत मारा, मार-मार के शुजा डाला.” बैंक मैनेजर अपने पुठों की मालिश करता हुआ कहता है.
“इस से जादा के सुजेंगे थारे ‘स्टूल’. पहले के कम सूजे थे?” राणा जी, मैनेजर की चुटकी लेते हुए कहता है तो मैनेजर मुंह सिकोड़ कर फिर से अपनी मालिश करने लगता है.
“वैसे जादूज जी, जे भी हो. मेजर साब ने बैंक में काम भोत ही चोख्खो कियो है, भांडे मांज के” हवा सिंह, मेजर बहादुर गोम्पा की और देखते हुए उसका मजाक उड़ाता है. इस पर सभी बंद हंसी से हंसने लगते हैं.
“नाम है बहादुर गोम्पा’. पूरा करूं जो काम है शोम्पा.” मेजर हवा सिंह को घूरते हुए रौबीले अंदाज़ में कहता है.
“भांडे मांजन कााा...” राणा जी, बड़े ही अंदाज़ में चुटकी लेते हुए अपना मुंह फेर लेता है.
“जैसा हुआ अच्छा हुआ, काम सबका सच्चा हुआ. घड़ी थी संकट की बस इतनी मात्र, ‘सब’ बचा बने हमें, बधाई के पात्र.” राजा अपने ही अंदाज़ में सबको बधाई देता है.
“महाराज, इन सभी का कार्य तो श्रेष्ठ रहा ही है, किन्तु इन दोनों के बिना शायद ये किस्सा सुलझ भी ना पाता.” जादूज सलाखों में बंद चोर की और इशारा कर कहता है.
“....किस्से से याद आया जादूज जी, ये दोनों पहले तीन हुआ करें से. चिटकु, मिटकु और इटकु. पहले तीनों का घनी मुश्किल से गुजारा हुआ करे से. इक दिन तीनों जंगल में निकले और ‘तीन माईनस एक, दो’ रह गए. इणका ऐ किस्सा पुरे लिल्लीपुट में बड़ा ही सुणा और सुणाया जावे है. इणसे ही पूछते हैं...बताओ रे, माहराज भी सुणना चाहें हैं थारा, ‘तीन माईनस एक, दो’.” राणा जी, मिटकु की और घूर कर देखते हुए कहता है. लेकिन मिटकु कुछ भी ना कहते हुए मुंह बनाकर, अपने हाथ बगलों में दबाकर खड़ा रहता है.
“सुणते कम हो के, सुनाओ या फेर मैं सुरु होऊं.” हवा सिंह अपना डंडा सलाखों पर जौर से मारते हुए कहता है. जिसपर मिटकु रौंदा सा होकर एक कविता सुनानी शुरू करता है:
           “चिटकु, मिटकु, इटकु थे, तीन यार. रहते इकट्ठे करते प्यार.
            इक दिन जंगल करने गए शिकार.
            चिटकु ने मारी ‘चिरैया’, मिटकु ले आया ‘गौरेया’,
            तो इटकु ने पकड़ी ‘मेंढक’. शर्माकर हाथों से लिया ढक.
            बारी थी शिकार पकाने की, भून आग में उसे खाने की.
           
            रखी जो मेंढक आग पर, पिघली मक्खन सी ‘सेंक’ पर.
            अब चिरैया और ततईया को आग पर रख, हुआ इंतज़ार कि जाएं वो पक.
            किया शिकार, खाया शिकार, जाना था जंगल के उस पार.
            मिली थी रास्ते में उनको सवारी, थे दो गधे और इक भैंस ‘प्यारी’.
            इटकु ने जताया हक, है भैंस हमारी. चले तीन यार, हो गधे और भैंस पर सवार
            सामने आई जो खाई इक गहरी, निकल गए गधे पर भैंस जा ठहरी.
            दोस्तों ने बुलाया अब आने भी दो, फिसली जो भैंस, रह गए ‘तीन माईनस एक, दो’”
            कविता के अंत का ‘दो’ शब्द सभी एक साथ जोश में कहते हैं और जोर-जोर से हंसने लगते हैं. तभी डोंजा खान और कुछ ‘लिल्ली’ निवासी बेहोश पड़े चिटकु को उठाकर वहां लाते हैं.
“सेनापति जी ये हमको जंगल के वर्जित किनारे पर पड़ा मिला.” डोंजा खान कहता है.
“कोन सा वर्जित किनारा..?” राणा जी पूछता है.
“तालाब के नजदीक वाला, जहां वो.......” कहते हुए डोंजा खान अचानक ही रुक जाता है.
“तब तो ए गयों. ले भाई थारा दोस्त. ले जी भर इसे देख. इब हो गया तीन माईनस दो.......एक.” हवा सिंह के कहते ही वहां फिर से हंसी के ठहाके गूंजने लगते हैं.
           जादूज उसे जांचता है और फिर चमत्कार दिखाते हुए उसे होश में ले आता है. चिटकु की यादाश्त जा चुकी थी और उसे पिछले कुछ दिनों घटी घटनाओं के बारे में कुछ भी याद नहीं था. आप गलत मत समझिएगा ‘इटकु’ के खाई में गिरने से उसकी मौत नहीं हुई थी. वो अपने दोस्तों का साथ छोड़कर कहीं चला गया था और पीछे छोड़ गया था एक मशहूर किस्सा. यही तो ख़ास बात है लिल्लीपुट की, जहां खुशियाँ, गमों पर हावी हुए बिना नहीं रह पातीं.
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pg no 56

 

MONTH’सिx’ JANUARY

दानव या मानव
                         शुक्रवार के दिन करीब छे बजे होंगे लिल्लीपुट का समंदर शांत दिख रहा था. सफेद समंदरी पक्षी समंद्र से अपना भोजन चुन्न रहे थे. तभी समंद्र के पानी में से एक आकृति उभरती है और चंद्रा उसमें से बाहर निकलता है. आज उसने शनिवार का भी इंतज़ार नहीं किया. जल्दी से अपने बैग से कपड़े निकालकर अपने ‘डाइविंग सूट’ को उतारते हुए वो तैयार हो जाता है.
           जंगल की और बढ़ते हुए वो लिल्लीपुट जाने को बड़ा ही बेताब दिख रहा था. जंगल कुछ काला पड़ने लगा था. शाम के समय जानवरों के स्वर इतने अच्छे नहीं लग रहे थे. झाड़ियों में सरसराहटें भी तेज हो रही थीं. नाले में पानी की कल-कलाहट किसी के होने का भ्रम पैदा कर रही थी. लोमड़ियों की हुंकारों के बीच चंद्रा को एक चींख सुनाई देती है....आ..आ..आं..आं..आंााााा.. ‘गीदड़ होगी शायद’, सोचकर, चंद्रा तेज कदमों से चलने लगता है. कि तभी ...ई.ई.ई.ई.ई..ई..ऊ..ऊ.ऊ.ऊूूूूू.. ‘ये तो लोमड़ी नहीं हो सकती’, सोचकर चंद्रा उस आवाज़ की और देखता है. जंगल की शाम की हल्की सी रौशनी में सामने लम्बे बालों वाली, बौने कद की, सफेद साढ़ी पहनी एक औरत दिखाई देती है. उसे देख, चंद्रा फिर से ठहर जाता है.
“क्या पागल औरत है. इसने तो डरा ही दिया था.” सोचकर चन्द्रा आगे बढ़ जाता है.
           थोड़ा और आगे बढ़ने के बाद चंद्रा को झाड़ियों से सरसराहट फिर से सुनाई देती है. वो पागल औरत आखिर इन झाड़ियों में कर क्या रही है, सोचकर चंद्रा झाड़ियों को हटाता है तो वहां वही बड़े पक्षी आपस में खेलते हुए से दिखते हैं. चंद्रा उनका कुछ देर तक दीदार करते रहने के बाद आगे बढ़ जाता है. अब अंधेरा हो चुका था. लिल्लीपुट गेट के बड़ी-बड़ी मुछों वाले उन बौने पहरेदारों की घूरती आंखों को पार कर चंद्रा सीधा ही महल की और चल पड़ता है. लिल्ली नहर के पास उसे डोंजा खान और घोंजा राम मिलते हैं.
“फिर आ गए स्वागत है. आज कुछ ज्यादा जल्दी और थोड़ी देर..नहीं कर दिया तुम.” घोंजा राम चंद्रा के शुक्रवार के दिन अंधेरे में पहुंचने की बात पर हल्का सा ताना मारता है.
“ओ! कोची देर आए दुरुस्त आये आज हमारा जन्मदिन है. चलो आपको खाना खिलाता है.” डोंजा खान, घोंजा राम को कोहनी मारते हुए कहता है.
“जन्मदिन मुबारक हो. तो आज दावत रखी है आपने. कुछ ख़ास बनाया होगा.” चंद्रा मुस्कुराकर कहता है.
“गधे के अंडे बनाएगा खाएगा. तुमको पचने वाला नहीं.” घोंजा राम फिर से ताना मारता है.
“ओए कोची! हम अपना जन्मदिन नही मनाता ओए. तुम आ जाना फिर देखते हैं क्या पकता है. गधे के अंडे या गधे का दिमाग” डोंजा खान बात काटते हुए घोंजा राम को घूरता है.
           चंद्रा रात को उनके घर आने का वायदा दे वहां से चला जाता है. घोंजा राम, डोंजा खान को इस बात को पहले न बताने के लिए डांटता है:
“बता देना चाहिए था आपको पहले कि आज हुए थे अपनी बहन से पहले.” घोंजा खान कहता है.

“ओ! नई कोची ओए. आपको मालूम है हम नहीं मनाता अपना जन्मदिन-वन्मदिन.” डोंजा खान जवाब देता है.
“नहीं हम आज मनाएंगे आपका जन्मदिन. आज हम दो दोस्त साथ-साथ मनाएंगे ये शाम.”
           घोंजा राम के जिद करने पर डोंजा खान मान जाता है. दोनों ही इसे कुछ बढ़िया पकाकर मनाने का फैसला लेते हैं. अंधेरा घिर आया था सो दोनों ही जल्दी से बाज़ार से पनीर और कुछ गोश्त खरीद कर ले आते हैं. दोनों ही शाम की इस दावत के लिए तैयारी करने में जुट जाते हैं. गोश्त, पनीर, प्याज, टमाटर, लहसुन, अदरक, आदि काट-छील लेने के बाद वे खमीर वाली पूरीयाँ तलने का फैसला लेते हैं. सो घोंजा राम, डोंजा खान को आटा गूंधने को कहता है. डोंजा खान जैसे ही अपने आटे के बड़े से मर्तबान का ढक्कन खोलता है, उसे देखता ही रह जाता है. घोंजा राम उसे हो रही देरी के लिए डांटते हुए खुद मर्तबान में झांकता है तो थोड़ी देर के लिए खुद भी देखता ही रह जाता है. मर्तबान में नाम का ही आटा बचा हुआ था. उसमे भी कुछ कीड़े जन्मदिन की दावत पहले से ही लूट रहे थे. अब दोनों की शक्लें बैठ जाती है. आटा छानने पर भी वो पूरा पड़ने वाला नहीं था. घोंजा राम डोंजा को डांटता है कि उसे अपने खाने की चीजों का ख्याल रखना चाहिए:
“आप क्या साला नॉन-वेज चपातियां खाते हो जो इन्हें पाल रखा है.” घोंजा राम, डोंजा खान को डांटते हुए कहता है.
“हम आपको पहले ही बोला था कि हम नहीं मनाएगा अपना जन्मदिन.” डोंजा भी चिढ़ कर बोलता है.
“कोई बात नहीं हम दोनों चावल के साथ ही खा लेंगे अपनी दावत.” घोंजा राम सांत्वना देते हुए कहता है.
           तो दोनों चावलों को साफ़ कर पनीर और गोश्त को पकाने की तैयारी करने लगते हैं. घोंजा राम के तेल मांगने पर डोंजा खान फिर से तेल की बोतल उठाकर एक जगह ही जम जाता है. घोंजा राम अपने हाथों में पकड़ी हुई मसालों की डिबिया को खोलता है तो वो भी उसे देखकर वैसे ही जम जाता है. दोनों के हाथों में खाली बर्तन थे. इनके अंदर ना तो तेल था और ना ही मसाले. अपनी दावत का मजा किर-किरा न होने देने के लिए दोनों ही जल्दी से बाज़ार की और भागते हैं. लेकिन बाज़ार में सन्नाटा था. सभी दुकानें ठप थीं. अब दोनों की शकले देखने वाली थीं. लेकिन हार न मानते हुए घोंजा राम, डोंजा खान को अपने कमरे ले जाता है. वहां के हालात भी कुछ अच्छे नहीं थे. वहां भी उन्हें कुछ मसालों के सिवा कुछ नहीं मिलता. अब पनीर और गोश्त को जाया तो नही होने दिया जा सकता था. कुछ देर की दिमागी कसरत के बाद घोंजा राम सामान उधार मांग लेने की बात कहता है. डोंजा खान के थोड़े से विरोध के बाद दोनों ही इस बात पर राज़ी हो जाते हैं.
           लेकिन उधार मांगा किससे जाए. सो सोचते-सोचते दोनों ही सेनापति के घर से गुजरते हैं. जो बाहर से किसी घोड़े की काठी सा दिख रहा था. अब सेनापति के घर का दरवाजा खटखटाया जाता है. सेनापति राणा जी बाहर निकलता है और दोनों से वहां आने का कारण पूछता है. घोंजा राम उसे सारा माजरा समझाकर उससे आटा उधार मांगता है. राणा जी झट से तीन जनों के हिसाब से एक कीलो आटा निकालकर दे देता है. राणा जी को दस बजे की दावत का न्योता देकर दोनों वहां से चले आते हैं. अब तेल का इंतज़ाम करना ही बाकी रह गया था. दोनों को स्टेशन मास्टर बलवेन कुछ सामान के साथ घर की और जाता दिखाई देता है. बलवेन भी घर के लिए राशन लेकर जा रहा था जिसमे तेल की बोतलें भी थीं. उसे भी दावत का न्योता देकर दोनों उससे तेल की एक बोतल उधार मांग लेते हैं. दोनों ही मेजर साहब के घर के बाहर से गुजरते हैं तो वहां से उन्हें कुछ मसाले उधार मिल जाते हैं.
           अब सामान पूरा हो चुका था. दोनों ही झट से दावत बनाने की तैयारियों में जुट जाते हैं. पनीर और गोश्त अच्छा पका था और अच्छी खुशबू भो छोड़ रहा था. बहुत सी भाग-दोड़ करने के बाद दोनों को अच्छी खासी भूख भी लग आई थी. साढ़े नौ बज चुके थे और अभी पूरियां तलनी भी बाकी थीं. कुछ देर तक साथ-साथ पूरियां तलने के बाद घोंजा

राम को भूख कुछ ज्यादा ही सताने लगती है. सो वो डोंजा खान को उसे कुछ पूरियां बनाकर खिलाने के लिए कहता है. डोंजा खान पहले दावत शुरू होने देने की बात कहता है तो घोंजा राम अधिक भूखा होने की वजह से थोड़ा सा खा लेने की जिद करता है. घोंजा राम खुद ही अपने लिए कुछ गोश्त और पनीर के साथ उन बनी हुई कुछ पूरियों को चट करना शुरू कर देता है. बेचारा डोंजा खान बनाए जा रहा था और घोंजा राम खाए जा रहा था. ‘डोंजा’ बनाता जा रहा था, ‘घोंजा’ खाता जा रहा था. इस तरह से घोंजा राम को पता ही नहीं चलता कि वो कितनी पूरियां चट कर जाता है.
           अब डोंजा खान को भी बहुत भूख लग चुकी थी. तो अब वो कुछ खा लेने के बारे में सोचता है. डोंजा खान भी शुरू हो ही जाता है. अब की बार घोंजा राम बनाता जा रहा था और डोंजा खान खाता जा रहा था. ‘घोंजा’ बनाता जा रहा था, ‘डोंजा’ खाता जा रहा था. इस तरह से डोंजा खान को भी इस बात का पता नहीं चलता कि उसने कितनी पूरियां चट कर ली थीं. अब दोनों की भूख शांत हो चुकी थी और दोनों ही खा-खाकर, अधमरे से फर्श पर बिफरे पड़े थे. घड़ी की सूई दस बजने की और इशारा कर रही थी. दावत का समय आ चुका था. भरपेट खा लेने के बाद दोनों को अच्छी नींद आने लगी थी कि तभी दरवाजे पर धड़...धड़...धड़ खटखटाने की आवाजें आने लगती है.
“खान दरवाजा खोल, कोई है.” घोंजा राम सोते हुए कहता है.
“वो आ गए...!” नींद से जागकर दोनों ही उछल पड़ते हैं.
“वो सभी आ गए हैं. देख कितनी पूरियां बनी हैं.” घोंजा राम, डोंजा खान से पूछता है.
“एक भी नहीं और सारा का सारा आटा भी खत्म कर डाला हमने ओए!” डोंजा खान गुंथे आटे का खाली बर्तन दिखाता है.
“चावल तो है ना उसी से काम चला लेते हैं.” घोंजा धीरे से कहता है.
“खिलाएगा किसके साथ गधे की टांग के साथ.” डोंजा खान खाली पड़े बर्तनों को दिखाते हुए कहता है.
           अब दोनों की नींदें उड़ गईं थीं. एक तो उनका सेनापति था जिससे वो उधार मांग कर लाए थे और उसे दावत पर भी बुला आए थे. खाना तो वे दोनों ही चट कर चुके थे. सो भूखे-खूंसठ सेनापति को क्या खिलाते. दूसरी और फौजी मेजर था जो अब बिना खाने के उनसे परेड करवाने वाला था. तो तीसरी और था वो पहलवान स्टेशन मास्टर बलवा, जिससे वो तेल उधार मांग कर लाये थे. वो तो उन्हें धोबी पछाड़ लगा-लगाकर उनकी अच्छी धुलाई करने वाला था. अब दोनों ही यहां-वहां उछलकूद करने लगते हैं कि इस मुसीबत से पीछा कैसे छुडाया जाए. दरवाजे की खटखटाहट बढ़ती जा रही थी और साथ ही बाहर से आने वाली पुकारें भी, जो दरवाजा खोलने के लिए कह रहीं थीं. कि तभी घोंजा राम को आटे का वो बड़ा मर्तबान दिखाई देता है. धड़ाक.... से दरवाजा खुल जाता है और तीनों आमंत्रित मेहमान चिल्लाते हुए अंदर घुस आते हैं.     
“कठे मर गए दोनों, म्हारे को बुलाकर खुद गायब हो गए.” खाली कमरा देख राणा जी गुस्से में कहता है.
“शाला....हमको दावत पे बुल्लाता है और खुद दरवाजा बंद कर भाग जाता है. शोड़ेगा नहीं.” मेजर भी गुस्से में था.
“अरे हमसे तेल मांगकर कहा कि रात को दावत पर आ जाना और इधर खुद खाना साफ़ करके दोनों गायब हो गए हैं.” स्टेशन मास्टर खाली बर्तनों को उठाकर कहता है.
           तीनों मेहमान गुस्से में थे कि दावत पर बुलाकर दोनों मेजबान गायब थे और बर्तनों से खाना भी. सबको लग रहा था कि दोनों ने उन्हें बेवकूफ बनाया है. तीनो उन दोनों को सबक सिखाने के इरादे से वहीं रुक कर उनका इंतज़ार करने का फैसला लेते हैं.

“ये तीनो तो यहीं पसर गए. अब क्या करें? बाहर निकले तो ये बहुत मारेंगे.” मर्तबान में छिपा हुआ घोंजा राम फुसफुसाता है. डोंजा खान भी उसी के साथ चिपका हुआ था. मर्तबान थोड़ा ऊपर एक अटारी पर रखा हुआ था और इतना बड़ा था कि दोनों उसमें समा सकें.
“ओए! आपको मना किया था लेकिन आप कहां सुनता है हमारी....अब पड़ा रहो इस डब्बे में.” डोंजा भी फुसफुसाता हुआ गुस्सा करता है.
           दोनों काफी देर तक मर्तबान में पड़े रहते हैं. अब तीनो मेहमान इंतज़ार करते-करते उबने लगे थे. तो सभी, दोनों से अगले दिन निपटने की बातें करने लगते हैं.
“बिड़ू, लगता है अपने पेट में कुछ गड़बड़ हो रएली है. गैस है शायद.” घोंजा राम पेट पकड़ते हुए फुसफुसाता है.
“ओए! आपने बहुत खा लिया है ओए! अभी खामोशी से पड़े रहो नहीं तो ये तीनो आपका गैस एक ही मिनट में बाहर निकाल देगा.” ‘डोंजा खान’ उसे फुसफुसाते हुए डांटता है.
“नहीं रुक सकता. मामला संगीन है. कुछ तो करना ही पड़ेगा. तुम नाक पकड़ो अपनी....” घोंजा, डोंजा से कहता है.
“ओए! धीरे छोड़ना. आवाज़ ना आये नहीं तो ये तीनों इसी गैस में आग लगाकर रोटी बनाकर खाएगा आज.” डोंजा खान, घोंजा राम को अपनी आवाज़ दबाने के लिए कहता है.
‘पींीीीीी......’ घोंजा राम धीरे से आवाज करता हुआ अपनी गैस छोड़ देता है. कुछ देर तक बदबू से परेशान रहने के बाद डोंजा खान के पेट में भी गड़बड़ होने लगती है.
“ओए कोची! हमारा पेट भी खराब हो गया है, ओए. हमे भी कुछ करना पड़ेगा.” डोंजा फुसफुसाता है.
“धीरे से, हमारी तरह.” घोंजा राम उसे सलाह देता है.
डोंजा खान भी घोंजा राम की तरह धीरे से गैस छोड़ने की कोशिश करता है लेकिन:
           ‘पींीीीीी’......’पडोंोंों’.........’’धड़ाााााममम’..... डोंजा खान गैस का बहाव रोक नहीं पाता और तेज आवाज कर देता है. जिससे बोखलाकर घोंजा खान अपना संतुलन खो देता है और मर्तबान तेज आवाज के साथ अटारी से फर्श पर आ गिरता है. जिससे डरकर तीनों मेहमान ‘भूत-भूत’ कहते हुए वहां से भाग जाते हैं. फर्श पर दोनों टूटे मर्तबान के साथ पसरे पड़े थे और इस बात से हैरान कि तीनों किससे डरकर भागे थे. तभी चंद्रा वहां आ जाता है. सारा किस्सा जानकर चंद्रा खूब हंसता है. डोंजा खान का जन्मदिन खराब न हो इसलिए चंद्रा दोनों को खामा की रसोई में ले जाता है और उनका किस्सा बताता है. अब सेनापति के बेवकूफ बन वहां से भागने पर खामा खूब मजे लेता है. खामा के पास बहुत से व्यंजन बचे हुए थे. जिनका सभी भरपूर मजा लेते हैं और उन दोनों की आप-बीती सुनते हुए हंसते रहते हैं.
           अगले दिन सुबह उठकर चंद्रा फिर से बालकनी से आती उन घंटियों की टनटनाहटों की और आकर्षित होता है और फैसला करता है कि आज उन घंटियों तक पहुंचकर ही रहेगा. शहर के बीचों-बीच एक छत पर झंडा लहरा रहा था. जल्दी से तैयार होकर वह उन घंटियों की और चल पड़ता है. जल्द ही एक बेहद ही कलात्मक मन्दिर उसके सामने था. मन्दिर एक खुले मैदान और फूलों की सुंदर क्यारिओं के बीच बना हुआ था. मन्दिर का कोई मुख्य प्रवेश दुआर नहीं था. कई बौने मन्दिर में आ-जा रहे थे और कई बाहर फूलों की क्यारिओं के बीच टहल रहे थे. चंद्रा अपने सामने के प्रवेश द्वार से अंदर जाने लगता है जो कि हूबहू ‘अक्षरधाम’ मन्दिर जैसा बना हुआ था. तभी उसे मन्दिर के प्रवेश के

बगल में एक और लाइन लगी हुई दिखाई देती है जिसमें से बहुत से बौने अंदर बाहर आ-जा रहे थे. शायद दूसरा दरवाजा होगा सोच चंद्रा मन्दिर के अंदर चला जाता है.
           मन्दिर के अंदर एक बड़ा सा रोशन हॉल था. सामने एक आदम कद से ऊँची शिव की त्रिशूलधारी प्रतिमा बनी हुई थी. ये प्रतिमा किसी उथले तालाब के बीच खड़ी हुई दिखाई दे रही थी. लेकिन चंद्रा को ऐसा लग रहा था कि शिव प्रतिमा की बगल में और भी कुछ प्रतिमाएं थीं. हॉल का एक चक्कर लगाकर चंद्रा को सारा माजरा समझ आ जाता है. मन्दिर का कोई भी मुख्य प्रवेश दुआर ना था. मन्दिर के चारों और कई प्रवेश दुआर बने हुए थे. चंद्रा को उस बड़े से हॉल में हर बड़े दरवाजे से लोग अंदर आते-जाते दिख रहे थे. दीवारों पर कई धर्मों की देव प्रतिमाएं और नक्काशियां बनी हुई थीं. हॉल के बीचों-बीच हर धर्मों के प्रतीक या प्रतिमाएं बनी हुई थीं जो एक गोलाकार उथले तालाब के बीचों-बीच एक गोल दायरे में अपने-अपने दरवाजे की और मुंह करके खड़ी हुई थीं. सभी प्रतिमाओं के ऊपर बीच में एक नगीने जैसा घूमता हुआ बड़ा पत्थर, चमकते हुए पूरे हॉल को रोशन कर रहा था. चंद्रा इस पथर पर पड़ने वाली रौशनी को ढूंढने लगता है जो इसे इस तरह चमका रही थी. तभी उसके सिर पर गुलाब की कुछ पंखुड़ियां गिरती है. सामने पुजारी दिखने वाला एक बौना था.
“हरी.ॐ..श्री वाहे गुरु..गॉड..खुदा सबका भला करें.” पुजारी जैसे एक मिश्रित मंत्र पड़ता है.
           पुजारी अजीब हुलिया बनाए हुए था. सिर चोटी लिए गंजा था लेकिन दाढ़ी बढ़ी हुई थी. कानों में घंटियों जैसी बालियाँ टंगी थीं. लम्बे चोगे पर बहुत से धर्मों के प्रतीकों के लॉकेट बांधे हुए थे और बगल में एक लम्बी तलवार लटकाई हुई थी. वो सभी धर्मों का मिश्रित पूजक लग रहा था. पूजा करते हुए वो बीच-बीच में अपने शरीर को खुजा भी रहा था.
“देख हैरानी हो रही है? जब अल्ला, ईश, राम, रहीम सब हैं एक, तो पुजारी क्यों नहीं. ये लिल्लीपुट है, हैरानी से दोस्ती कर लो. ये लो प्रशाद.” कह पुजारी, चंद्रा को सभी धर्मों के प्रशाद का मिश्रित रूप देकर फिर से खुजाने लगता है. चंद्रा अपनी जेब से सौ का नोट निकालकर शिव प्रतिमा के आगे अर्पित करता है.
“ये यहां नहीं चलते. वैसे भी इन्हें तुम्हारे रुपयों की आवश्यकता नहीं है.” कह पुजारी रुपयों को चंद्रा के हाथों पर पटकने के जैसी हरकत करता है जैसे उसे रूपये न मिल पाने का बुरा लगा हो.
           हॉल से बाहर आकर चंद्रा सभी प्रवेश दुआरों को देखता है. इसाई मत का प्रवेश दुआर ‘वैटिकन सिटी’ के  ‘कैथोलिक चर्च’ जैसा बना हुआ था तो ‘इस्लाम’ मत का दुआर ‘मस्जिद अल हरम’, मक्का जैसा रूप लिए था. सिख मत का दरवाजा स्वर्ण मन्दिर जैसा दिख रहा था. बोध धर्म का प्रवेश द्वार ‘बोध गया’ जैसा, ‘पारसी’ धर्म का गुजरात के ‘उद्वाड़ा’ मंदिर जैसा, तो जैन मत का प्रवेश द्वार राजस्थान के ‘रणकपुर मन्दिर’ जैसा रूप लिए था. इस सर्वधर्म मन्दिर के ऊपर एक ‘त्रिशूलाकार’ झंडा लगा हुआ था जिसके डमरू के नीचे सभी धर्मों के प्रतीक बने हुए थे. कुछ देर तक इस सर्वधर्म मन्दिर को देखने के बाद चंद्रा वहां से चलने लगता है. बाहर उसे सुपर्णा अपने भाई बलवेन और बूढ़ी मां के साथ मन्दिर की लाइन में लगी दिखती है. सुपर्णा तो चंद्रा को देख हल्की मुस्कान बिखेर रही थी लेकिन बलवेन की आंखें उसे काटने को दोड़ रही थीं. चंद्रा, बिना सुपर्णा से बात किये ही वहां से बाहर आने लगता है. तभी उसे राजा भ्योस सिंह का रथ आता दिखाई देता है. साथ में डोंजा खान, घोंजा राम, सेनापति राणा जी और जादूगर जादूज भी था.
“तो सैर हो रही है. भई, हम भी साथ देते, जो दो कदम खुद भर लेते.” राजा, चंद्रा से बात करता है.
           चंद्रा, राजा से मन्दिर की तारीफ़ किये बिना नहीं रह पता. बात करते हुए राजा एकाएक ही मन्दिर में लगी लोगों की लाइन की तरफ पागलों सा दोड़ता हुआ जाता है. राजा वहां लाइन में खड़ी एक बूढ़ी सी दिखने वाली औरत को

रानी कहकर बुलाता है. बूढ़ी औरत के पलटने पर राजा का पगला सा चेहरा उदास हो जाता है और बिना बात किये वो मन्दिर के अंदर चला जाता है. तभी चंद्रा देखता है कि उसी लाइन में लगी सुपर्णा की मां ने जैसे खुद को किसी चीज़ से छिपाया हो. चंद्रा, जादूज से राजा के इस बर्ताव का कारण पूछता है. जादूज उसे बताता है कि महारानी पच्चीस साल पहले राजा से हुए किसी झगड़े के कारण महल छोड़कर चली गई थीं. तब वो गर्ब्वती थीं. बहुत ढूंढने पर भी अब तक उनकी स्थिति का पता नहीं चल पाया है. अब तो उनकी पच्चीस साल की एक बच्ची भी होगी. राजा जैसे ही किसी औरत को देखता है जो थोड़ी बहुत भी रानी की तरह दिखती हो, इसी तरह की हरकत करने लगता है. तभी वहां स्टेशन मास्टर बलवेन आ जाता है. वो जादूज को प्रणाम कर वो चंद्रा को ऐसे अनदेखा कर देता है मानो वो वहां हो ही नही.
“आज का दिन बहुत शुभ है. महाराज और आप भी पधारे देव दर्शन के लिए.” बलवेन बड़ी ही विनम्रता से कहता है.
“हां आज घूमने का मन कर रहा था. सोचा मन्दिर ही हो लिया जाए. आप बताईए माता ठीक हैं और सुपर्णा कहां है?” जादूज उसी गम्भीरता से पूछता है.
“आई है ना. कल हमने भी सुपर्णा और मां के साथ ट्रेन का सफर करने का मन बनाया है. क्यों नहीं आप भी साथ चलते, आनंद आएगा. ट्रेन सफर में अच्छे नजारे देखने को मिलते हैं और साथ ही ट्रेन में खाना भी अच्छा मिलता है.” बलवेन चुटकी लेते हुए कहता है. तब तक सुपर्णा भी वहां पहुंच जाती है.
“अरे नहीं हम थोड़े व्यस्त हैं. क्यों नहीं आप चंद्रा जी को साथ ले जाते. शाही मेहमान को घुमाना चाहिए क्यों..क्या कहते हो.” जादूज ने यह बात जैसे आदेश भरे लहजे में कही हो.
           बलवेन कुछ कहना तो चाहता था लेकिन कह ना पाया था. बस हल्के से चंद्रा को घूर रहा था. सुपर्णा तो मन ही मन मुस्कुराने लगी थी. जैसे वो तो यही चाहती थी. विदा लेकर दोनों वहां से चल पड़ते हैं.
“दर्शनाभिलाशी, वो घोर विनाशी. नाम सुपर्णा, ना मुकरना. साधारण सी लड़की, रहती है गांव में, माता रानी की छाँव में.” साधू भेषधारी भविष वहां आ पहुंचा था. वो बलवेन और सुपर्णा की और देखते हुए अपना दंड आकाश की और उठाता है.
“क्या कहा. समझ नहीं आया.” अपने कर्मंडल से घूंट पीते हुए भविष से बलवेन विनम्रता से पूछता है.
“ना जाना उस और, न थामे तेरी डोर. उस रास्ते ना कुछ पाएगा, बस...तुझे रुलाएगा.” साधू आंखें फाड़-फाड़कर दोनों को बारी-बारी से देखता है. सुपर्णा कुछ सहम जाती है तो बलवेन वहां से निकलने की सोचता है.
“अंत निकट है, कटनी टिकट है.” भविष दोनों को जाते हुए कहता है.
भविष का बर्ताव कुछ पागलों जैसा लग रहा था. अब वो चंद्रा और जादूज के सामने आ खड़ा होता है:
“आईए..भविष जी क्या भविष्यवाणी सुना दी आपने उन्हें जो दोनों भाग गए?” जादूज हंसते हुए भविष से पूछता है.
“है सत हमेशा कड़वा. देता कुबुद्दी को लड़वा. जो समझा, है पार. ना समझा, है किस्मत तार-तार.” भविष पागलों की तरह गर्दन हिला-हिलाकर जवाब देता है.
“है बात तो सत. उलझे है अब तक, मारी है मत.” दोनों ही जैसे किसी खूफ़िया संदेशों में बातें कर रहे थे. जो चंद्रा के पल्ले नहीं पड़ रही थी.
“हमारे मेहमान के लिए तो कुछ भविष्यवाणी कर दीजिये, भविष जी. उनका भाग्य क्या कहता है?” जादूज के चेहरे पर वही मुस्कुराहट थी.

“घूमने जा रहे हो. जंगल में रहता है वो, तुमसा दिखता है जो. देखना.....दानव है या मानव?” भविष अपना सिर पीछे करते हुआ कहता है. फिर अपने कर्मंडल में पानी को घूरते रहने के बाद फिर से बोल पड़ता है.
“इस संसार में आया है. विनाश साथ लाया है. परिस्थिति है विकट, अंत है....निकट” भविष आंखें फाड़-फाड़कर चंद्रा की और देखता रहता है. “निकट..निकट” भविष के कंधे पर बैठा तोता ‘टोतु’ पंख फड़फड़ाते हुए भविष के बोलने की नकल करता है.
           चंद्रा को भविष का ये पागलों सा बर्ताव पसंद नहीं आया था. सो वो भविष की बात को लगभग अनसुनी करता हुआ वहां से चलने के लिए कहता है.
“इग्नोरैन्टा ऐटिटयुडा. टाइम वेस्टा........अंत निकट है, कटनी टिकट है” कहता हुआ भविष पागलों की तरह झूमता हुआ वहां से चला जाता है. उसका तोता भी उसे दोहराकर उसका साथ दे रहा था.
“कौन है ये पागल?” चंद्रा कुछ चिढ़ भरे अंदाज़ में पूछता है.
“पागल ना समझना इन्हें. बड़े ही विद्वान् हैं ये. इनकी कही एक-एक बात सच साबित होती है. बस अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद से ऐसे हो गए हैं.” जादूज बड़ी ही विनम्रता से जवाब देता है.
           चंद्रा के पूछने पर जादूज बताता है कि भविष पहले भविष्यवक्ता हुआ करता था. उसकी अनेकों भविष्यवाणीयाँ घटित होती रहती हैं. चंद्रा के आने की भविष्यवाणी भी भविष ने ही की थी. एक दिन अपनी पत्नी से हुए झगड़े में उसके मुंह से अपने आप ही कुछ बोल निकल गए थे, ‘इतना मुझे सताएगी तू, हफ्ते में मर जाएगी तू.’ अपने ही मुंह से अपनी गर्भवती पत्नी की मोत की भविष्यवाणी कर दी थी भविष ने. इस भविष्यवाणी से भविष को गहरा सदमा पहुंचा था. अब वो अपनी पत्नी की सेवा में दिन रात लगा रहता. उसने किसी से भी बात तक करना बंद कर दिया था. उसे अपने मुंह से फिर से किसी अनर्थ निकल जाने का डर सताता रहता था. आखिर हफ्ता गुजर गया लेकिन उसकी पत्नी को कुछ नहीं हुआ. इस ख़ुशी में उसकी ख़ुशी और भी बढ़ गई थी जब उसकी पत्नी एक बच्चे को जन्म देने वाली थी. अस्पताल में भविष अपने बच्चे के आने की ख़ुशी में सब कुछ भूल चुका था, जिसे याद दिलाया अस्पताल में हुई उसकी पत्नी की आकस्मिक मृत्यु ने जो बच्चे के साथ ही इस दुनिया से चल बसी थी.
           भविष की भविष्यवाणी एक बार फिर सच साबित हुई थी, खुद उसके लिए. जिसने ना सिर्फ एक जिन्दगी ली थी बल्कि उसके मासूम बच्चे को भी ना छोड़ा था. तभी से भविष विरागी सा हो गया था. भविष की इस दास्तान को सुनकर अब चंद्रा को उससे हमदर्दी हो रही थी.
“अगर उसकी भविष्यवाणी सच साबित होती है तो उसके कहना का क्या मतलब है कि अंत निकट है? वो तो सब को कहते फिरते हैं. अब किसका अंत करेंगे ये भविष?” चंद्रा बड़ी ही हैरानी से पूछता है. जादूज कुछ न कहते हुए आह भरकर आसमान की और देखने लगता है.
“हरी ॐ..श्री वाहे गुरु...गॉड...खुदा सबका भला करें.” कहता हुआ पुजारी राजा, राणा जी और दोनों सैनिकों के साथ बाहर आता है. वो अभी भी खुजा रहा था.
“आईए पुजारी जी. आप जल्दी बाहर आ गए हमने तो देव दर्शन किये ही नहीं.” जादूज कहता है.
“अरे, जादूज जी वो क्या है ना, आज हमें...किसी के घर अनुष्ठान कर भोजन ग्रहण करने जाना है. आप दर्शन कीजिये, भगवन कहां भागे जा रहे है. और हां लौह्ड़ी की शुभकामनाएं” पुजारी खुजाते हुए हंसने लगता है जिससे उसका सोने का

एक दांत चमक उठता है. तभी पास ही खड़ा डोंजा खान पुजारी के हाथ से उसका थैला खीँच लेता है.
“अब इस हरकत का क्या मतलब हुआ डोंजा खान.” पुजारी हैरान हो पूछता है.
“आप ही तो बोला कि लो.” डोंजा खान बड़ी ही मासूमियत से कहता है.
“मैने लो नहीं लौह्ड़ी कहा था, मूर्ख. अच्छा अब मैं अगर तुम्हे बसंत-पंचमी की बधाई........आआाााााा” अभी पुजारी अपनी बात पूरी कर भी नहीं पाया था कि एक जोरदार मुक्का उसके हंसते हुए मुंह पर पड़ता है.
“ओए! अब ये ना कहना कि आप ‘पंच-मी’ नहीं बोला था.” कहते हुए डोंजा खान वहां से चला जाता है.
“आप भी कहां डोंजा खान के चक्कर में फंस गए. लेकिन आपकी खुजाने की आदत गई नहीं अभी तक. कुछ लेते क्यों नहीं.” राजा चुटकी लेता हुआ पुजारी का हिला हुआ जबड़ा जांचता है.
“अरे बहुत इलाज़ करवाया लेकिन कमबख्त...आह...जाती ही नहीं और ऊपर से जादूज जी अजीब से कड़वे काढ़े पीने को दे देते हैं. कोई चमत्कार तो दिखाइये जादूज जी जिससे ये जड़ से ही उखड़ जाए.” पुजारी खुजाते हुए जादूज से कहता है.
“देखिएगा खुजारी.....मतलब पुजारी जी...कहीं खुजली की जगह आपकी ही जड़ें न उखड़ जाएं. अभी देखा ना अपने, डोंजा खान ने आपकी कैसे ‘डैश..डैश’ हटा दी, ‘खुजली’” राणा जी चुटकी लेते हुए कहता है. सभी ठहाका मारकर हंसने लगते हैं और खुजारी.....मतलब पुजारी वहां से पैर पटकता हुआ चला जाता है.
           अब वहां से चलने का समय आ गया था. राजा अपने रथ में बैठ जाता है और चंद्रा अपनी ग्यारह नम्बर की गाड़ी पकड़कर महल की और चल पड़ता है. तभी उसे एक आवाज़ सुनाई देती है:
“भीख के नाम पर कुछ दे दे.” ‘घसीटू’ बिखारी चांदी सा चमकने वाला कटोरा लिए खुद को घसीट-घसीटकर लोगों से भीख मांग रहा था.
“भीख के नाम पर कुछ दे दे.” वो भिखारी चंद्रा की पैंट खीँचने लगता है. चंद्रा उसे बड़ी हैरानी से देखने लगता है.
“अरे देते क्यों नहीं.” भिखारी चिढ़ते हुए फिर से कहता है. चंद्रा अपने पर्स से पैसे निकालने लगता है.
“लिल्लीपुट में भिखारी? कैसे?” चंद्रा हैरानी से पूछते हुए दस का नोट आगे करता है.
“क्या है ये धूर्त? समझा है मुर्ख.” नोट देख भिखारी चिढ़ते हुए अपने हाथ पीछे खींच लेता है.
“अरे क्या कम हैं और चाहिए.” चंद्रा पूछता है.
“ये चलते नहीं यहां, खड़े हो जहां. अब तक नहीं ‘मिली’, जिसे कहते हैं ‘लिल्ली’.” बिखारी चंद्रा को दस का नोट वापिस करते हुए कहता है.
“नहीं मुझे यहां कुछ भी खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती. नाम क्या है तुम...आपका? जवाब नहीं दिया आपने. लिल्लीपुट में भीख मांगे की जरूरत कैसे पड़ गई?” चंद्रा अपना सवाल दोहराता है.
“अरे, शाही मेहमान हो. घसीटू बुलाते हैं सब हमें. ये हमारा पुश्तैनी धंदा था. हमारे पूरखों के पुरखे पहले भीख ही तो मांगते थे. तब उन्हें कोई काम भी तो नहीं मिलता था तुम्हारी दुनिया में. हमे भीख मांगते देख बड़े खुश होते थे आपकी दुनिया वाले. वैसे हमे भीख मांगने की जरूरत नहीं है. आप क्या सोचते हो हम क्या चल नहीं सकते? सौ मीटर की दोड़

पूरे सौलह मिनटों में पूरी कर लेते हैं हम. ये तो हम अपने पुरखों की याद में शौकिया भीख मांगते हैं. ये कटोरा शुध चांदी का है. ये चटाई पूरे सात सौ “लिल्ली” और ये पैंट एक हजार ‘लिल्ली’ की है. ये कुरता यूं ही नहीं फट गया हमने पुरे पांच सो देकर फटवाया है दर्जी से. इस फेशिअल और हेयर स्टाइल के पुरे पांच सौ देते हैं हम. अच्छा अब टाइम खोटी न करो. भीख के नाम पर कोई तो दे दो बाबा.” कहता हुआ भीखो वहां से चला जाता है.
           अब चंद्रा भी वहां से चलने में ही भलाई समझता है इससे पहले कि कोई और उसके रास्ते में आ जाता. रात का खाना खा लेने के बाद चंद्रा अगले दिन की सैर के लिए अच्छी नींद लेने के लिए महल के अपने कमरे में चला जाता है. अगली सुबह मौसम साफ़ तो न था लेकिन आसमान में बिना जल बादलों की सफेदी छाई हुई थी. सो चंद्रा ट्रेन सफर के लिए झट से तैयार हो कर नौ बजे स्टेशन की और रुख करता है. रेलवे स्टेशन पर मेले जैसा माहौल लग रहा था. हर कोई अलग-अलग तरह के रंग-बिरंगे कपड़े पहनकर आया था और काफी खुश लग रहा था. शायद हर रविवार के दिन ‘लिल्ली’ निवासी इस ट्रेन यात्रा का आनंद उठाते थे. रेलवे स्टेशन की वो छोटी सी बिल्डिंग किसी रेल इंजन जैसी ही लग रही थी. सामने से पटरियों के कुछ जोड़े बिछे हुए थे. देखने पर वे कुछ ज्यादा चौड़े नहीं लग रहे थे.
           वहां सुपर्णा अपनी मां और भाई बलवेन के साथ मोजूद थी. साधारण साड़ी में सुपर्णा की मां एक सुलझी हुई बूढ़ी औरत लग रही थी. तभी स्टेशन प्लेटफार्म के सामने सीटी बजाती हुई एक ट्रेन धीरे से आकर रूकती है. वो ट्रेन, मेलों में बच्चो को सैर कराने वाली ट्रेन से ज्यादा बड़ी नहीं लग रही थी. उसकी छत की ऊंचाई चंद्रा के सिर से ऊंची नही थी. चंद्र शायद ही उसमे फिट हो पाता. अगर किसी तरह हो भी जाता तो ये सैर उसके लिए सैर से ज्यादा सजा बन जाती. तभी डोंजा खान, घोंजा राम और राणा जी चंद्रा के पास आकर रुकते हैं.
“के लम्बू, कैसी लागी म्हारी ट्रेन. छोटी पड़े है थारे वास्ते. के करें सांढों के वास्ते ना है म्हारी दुनिया.” राणा जी मुंह चिढ़ाकर हंसते हुए कहता है.
“ओ! कोची आप फ़िक्र ना करो, ओए! आपके लिए एक स्पेशल डब्बा जोड़ दिया है. खुली छत से नजारों का मज़ा ही कुछ और है.” डोंजा खान कहते हुए चंद्रा को इंजन के पीछे बंधे डिब्बे के पास ले जाता है जिसे किसी ओपन कार जैसा सजाया हुआ था.
“हां. थारे जैसे बैलों के वास्ते ऐ माल डिब्बा ही मिल पाया है. जिसे स्टेशन मास्टर ने अपणॆ हाथों से सजाया है.” राणा जी फिर से ताना मारता है. चंद्रा को अब राणा जी पर गुस्सा आ रहा था. बेइज्जती सहन करने की भी कोई हद होती है. और राणा जी उस हद को पार करवा रहा था. चंद्रा का मन कर रहा था कि वो राणा जी को ट्रेन के इंजन के सामने बांधकर ट्रेन को फूल स्पीड पर चलाए.
“अरे सेनापति जी आप के लिए भी यहीं सीट लगा दी गई है. हम सभी इसी डब्बे में सफर करेंगे.” राणा जी का चेहरा देखने वाला था जब घोंजा राम चुटकी लेते हुए कहता है.
           तभी स्टेशन मास्टर बलवा भी वहां आ जाता है. सुपर्णा और अपनी बूढ़ी मां को उसी डिब्बे में चढ़ाने के बाद वो ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर फिर से ट्रेन में चढ़ जाता है. चंद्रा अपने प्रिय राणा जी के साथ आगे की सीटों पर, उनके पीछे बलवेन, सुपर्णा और उनकी मां और सबसे अंत में डोंजा और घोंजा बैठे हुए थे. राणा जी चंद्रा को तिरछी नजरों से ऐसे घूरे जा रहा था जैसे उसे खा जाने की ख्वाहिश रखता हो. ट्रेन ..कूं..कूं.. करती हुई हल्की रफ्तार पकड़ चुकी थी. लिल्लीपुट के शहर का नजारा दिखाती और लिल्लीपुट की नहरों और दीवारों को लांघती, फिर पीछे छोड़ती हुई ट्रेन जंगल की और रवाना हो जाती है. ट्रेन धीमी चल रही थी ताकि नजारों का आनंद उठाया जा सके. जंगल की हरियाली का लुत्फ़ उठाते हुए और आपस में बातें करते हुए सभी बड़े ही खुश नजर आ रहे थे.

           सुबह का नाश्ता करते-करते ट्रेन, जंगल को पार करती हुई पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने लगी थी. ऊपर से लिल्लीपुट शहर का नजारा कहानियों के किसी शहर जैसा लग रहा था. जंगल के पेड़ों के ऊपर फैली धुंध के बीच-बीच में से उभरती हुई ‘लिल्ली’ इमारतों की छतें किसी ‘परीलोक’ जैसा अनुभव करवा रही थीं. तीनों सर्पाकार बहती हुई नहरें इस दृश्य को और भी परालौकिक बनाए दे रही थीं. पास से गुजरती हुई नदी, नालों, पहाड़ों की गोद से गिरते झरनों, धुंध से ढके पहाड़ों के दृश्य मोहित कर देने वाले थे. पहाड़ों से पूरा लिल्लीपुट शहर शानदार लग रहा था. अब ट्रेन पहाड़ों पर बने एक छोटे से मैदान के पास आकर रुक जाती है. सभी वहां उतरकर कुछ देर तक टहलने लगते हैं. तभी चंद्रा को दूर लिल्लीपुट की बगल की पहाड़ी की चोटी पर पेड़ों के बीच कुछ टोपियाँ दिखाई देती है. उस चोटी की और इशारा कर चंद्रा, घोंजा राम से पूछता है.
“उस तरफ ना ही देखिये तो अच्छा है. कौन जाने वो हमें देख रहे हों.” घोंजा राम कहकर वहां से अपना मुंह ही फेर लेता है.
“लो ये भी आ गए.” मुंह फेरते ही घोंजा को आसमान में कुछ दिखाई देता है.
           चंद्रा के देखने पर उसे एक बड़ा सा पक्षी असमान में उड़ता हुआ उनकी और आता दिखाई देता है. आज के सफेद असमान में उसे साफ़-साफ़ देख पाना थोड़ा मुश्किल हो रहा था. क्या ये वही पक्षी था जिसे उसने जंगल में देखा था. लेकिन जैसे-जैसे पक्षी पास आता जा रहा था वो और बड़ा होता जा रहा था. हैरानी की बात तो ये थी कि उस बड़ी चिड़िया को देखकर बच्चे डर नहीं रहे थे. वे सभी तो ख़ुशी से चिल्लाते हुए पक्षी को देखकर उछल-कूद करने लगे थे. अब पक्षी पंख फड़फड़ाता हुआ उनके ऊपर से गुजरने वाला था.
           लेकिन ये कोई पक्षी नहीं था. पक्षी जैसे पंखों वाली कोई उड़ने वाली चीज थी. किसी पक्षी जैसे ढाँचे पर इसके पंख पारदर्शी शीट से बनाए हुए थे जो हूबहू किसी पंछी की तरह ही फड़फड़ा रहे थे. ‘...फड़..फड़..फड़..फड़...’ भारी आवाज करते हुए और तेज हवा ऊपर फैंकता हुआ वो मशीनी पक्षी सभी के सिर के ऊपर से निकल जाता है. सभी बच्चे जैसे उस पक्षी में बैठने के लिए पागल हुए जा रहे थे और जितनी जोर से चिल्ला सकते थे, चिल्लाए जा रहे थे. अब क्या इस पक्षी की सैर करवाई जाएगी? सोचते हुए चंद्रा उसे जंगल के ऊपर मंडराते हुए देखता रहता है. लेकिन जंगल में पड़ी उन टोपियों के थोड़ा पीछे से ही वो पक्षी मुड़कर वहां से दूर चला जाता है. उसके वहां से चले जाने पर सभी बच्चे खामोश हो जाते हैं.
           चंद्रा के पूछने पर डोंजा खान उसे बताता है कि वो ‘साईं’ नाम का साइंटिस्ट था जिसे इस तरह के अजीबों-गरीब प्रयोग करने में महारत प्राप्त थी. इससे पहले कि कुछ और बात हो पाती स्टेशन मास्टर बलवेन की सीटी बज पड़ती है. शायद वापसी का समय हो चला था. सभी ट्रेन में फिर से चढ़ जाते हैं. अब तक बादलों की सफेदी, कुछ काली पड़नी शुरू हो चुकी थी. अपनी ‘कूक’ के साथ ट्रेन पहाड़ की ढलानों को उतरना शुरुर कर देती है. ढलान खत्म होते-होते बूंदा-बांदी शुरू हो चुकी थी. अब चंद्रा वाला खुला डब्बा कैनोपी ओढ़ चुका था. इस पूरे सफर में सुपर्णा का पूरा ध्यान चंद्रा पर ही टिका हुआ था. चंद्रा के हंसने के साथ-साथ वो भी मुस्कुरा देती थी जैसे चंद्रा उसी के साथ हंस रहा हो. अब शायद खाने का समय हो चला था क्योंकि मेजों पर खाने की प्लेटें रखी जा रही थीं. अलग-अलग पकवान सजे हुए थे. सभी खाने की तैयारी करते हुए अपनी-अपनी प्लेटें भर लेते हैं.
“खा ले भाया खा ले. पण याद रखणा...’मुफत की रोटी और बैल को बोटी दोणों णा पचे है’.” राणा जी फिर से ताना मारता है.
कि तभी ’.......चर्र्र्रर्रर्ररींींींीं........’ और ट्रेन के अंदर का सारा माहोल उथल-पुथल भरा हो जाता है.

ट्रेन एकाएक ही रुक गई थी. सभी एकदूसरे के ऊपर गिरे हुए थे. राणा जी की हालत तो और भी ज्यादा खराब थी. उसके ऊपर सारी प्लेटें और खाना गिरा हुआ था. ना जाने उसके मुंह में थोड़ी सी तरी और कबाब का एक टुकड़ा कैसे चला गया था जिसे वो वहीं पड़े-पड़े चबा रहा था. चबाते हुए तरी उसके मुंह से धीरे-धीरे बाहर रिस रही थी. अब सभी सम्भलते हैं और गिरे राणा जी को उठाया जाता है. सभी हैरान थे कि हुआ क्या था? स्टेशन मास्टर बलवेन कारण जानने के लिए इंजन रूम की और दोड़ लगाता है. ड्राईवर से पूछने पर बलवेन को इसका कारण पता चलता है.
           आगे ट्रैक पर एक लोमड़ी जैसा जानवर गिरा हुआ था. उसे देखते ही सभी यात्री शेर..शेर..चिल्लाने लगते हैं. वो जानवर अपनी गर्दन को एक बार मरोड़ते हुए उठाता है और फिर पसर जाता है. उसकी आधी पीठ पर से लेकर पूरे पिछले हिस्से तक शेर के जैसी काली धारियाँ बनी हुई थीं. थोड़ी देर तक उसे हैरानी से देखने के बाद चंद्रा को याद आता है कि उसने इस जानवर को कहीं देखा हुआ है, लेकिन कहां? तभी वहां ट्रेन के धक्के से भन्नाया हुआ राणा जी वहां आता है. वो मसाला लगे हुए किसी तन्दूरी मुर्गे से कम नहीं लग रहा था. चंद्रा को बदला लेने का मौका मिल गया था जिसे वो हाथ से जाने नहीं देना चाहता था.
“राणा जी, खा लिया खाना जी.” चंद्रा चिढ़ाने वाले अंदाज़ में कहता है जिससे गम्भीरता से भरा माहोल हंसी के ठहाकों में बदल जाता है. इस बेइज्जती को राणा जी सह नही पता और पलटवार करता है.
“देख लम्बू, एक तो हालत खराब है, ऊपर से दिमाग खराब ना कर.” राणा जी गुस्से में कहता है.
“अरे प्रताप जी, क्यों भड़क रहे हो? सच ही तो कह रहा है ये लम्बू. हम सभी का खाना तो आपने ही खा लिया.” बलवेन भी चुटकी लेते हुए कहता है.
“अरे, प्रताप नहीं....भ्रताप! महान महाराणा प्रताप सिंह जी के बजीर का पोता, बहूराणा राणा भ्रताप.” राणा जी कहते हुए अपने कानों को पकड़ने बाद छाती फुलाता है.
“अरे साहब पहले ये तो सोचिए इस शेर को जंगल से इस पटरी तक उछालकर फैंका किसने होगा?” ट्रेन ड्राईवर पूछता है.
“क्या? इसको उठाकर फैंका! अपने देखा ओए! आप जानता है ये काम कौन कर सकता है.” डोंजा खान के कहने में हैरानी और डर के मिले जुले भाव थे.
           इतना कहने की देर थी कि जंगल की और से झाड़ियों के टूटने की आवाजें आने लगती है. ये आवाजें उनके पास और पास आती जा रही थीं. तभी पेड़ों में से कुछ कम ऊंचाई के हिरन और वे बड़े पक्षी निकलकर ट्रेन की और भागते हैं. तभी पेड़ों के पीछे से किसी के गुर्राने की आवाज़ आती है जो किसी कारण वहीं ठहर जाती है. इस गुर्राहट को शायद सभी पहचानते थे जिस वजह से सभी अपनी जगह पर जैसे जम से गए थे और कांप रहे थे. चंद्रा के पास डरने की कोई वजह नहीं थी सो वो आने वाले आश्चर्य का इंतज़ार कर रहा था. तभी एक और हिरन पेड़ों से बाहर की और भागता है. उसके निकलते ही एक पेड़ की डाली टूटती है और एक भयावह जंगली सा दिखने वाला दानव बाहर निकलता है. वो हिरन के पीछे था. हिरन सीधा खड़ी ट्रेन के डिब्बों के बीच में से होता हुआ भाग निकलता है. बदहवाश सा दोड़ता वो दानव ट्रेन से टकरा जाता है.
           वो ‘नौ’ फीट का भारी-भरकम दानव बड़ा भयानक लग रहा था. बरसों से ना धोए हुए अपने मैले मुंह, खुरदुरे उलझे लम्बे बाल, मोटी भद्दी भोहें, मोटे पीले दांत, छाती पर लम्बे बाल, मोटे मुड़े-तुडे नाख़ून, हाथ में जानवर की लम्बी जांघ की हड्डी, कमर में लम्बी हड्डियों से बना घाघरा सा बाँधा था. ट्रेन से टकराने की वजह से उसका शिकार भाग निकला था. गुस्से में वो दानव अपनी पीली पड़ी आंखों से बाहर खड़े मेहमानों को घूरने लगता है. बहुत से बौने उस

दानव को देखकर चिल्लाते-शोर मचाते हुए जंगल की और भाग जाते हैं. न जाने क्यों, गुर्राते हुए वो दानव ट्रेन पर क्कर मारनी शुरू कर देता है. जिससे उस छोटी ट्रेन के कुछ डिब्बे पटरियों से उतरकर पलट जाते हैं. अब वो दानव वहां बचे हुए बौनों की और पलटता है. बौनों में खलबली मच जाती है. धक्का-मुक्की के बीच किसी को कुछ पता नहीं चल रहा था कि कौन कहां है. चंद्रा के लिए ये सब बड़ा हैरान कर देने वाला था. वो कोई दानव नहीं था. वो तो जाय्गैंटिस्म नाम की बिमारी से ग्रस्त एक लम्बा तगड़ा आदमी था जो यहां के मेहनती शिकार भरे माहोल में फलफूल रहा था. हां, चार फीट तक लम्बे उन बौनों के लिए तो वो एक दानव ही था. उसका रूप भी किसी दानव से कम नहीं लग रहा था.
           वो बिना देखे ही सभी बौनों को उठा-उठाकर पटकने लगता है. अब बचा था तो सिर्फ चंद्रा. कुछ देर तक उसे घूरते रहने के बाद दानव चंद्रा की और दोड़ लगा देता है. एक ही टक्कर से चंद्रा किसी गेंद की तरह लुढ़ककर जमीन पर ढेर हो जाता है. कुछ देर की बदहवासी के बाद चंद्रा उठ खड़ा होता है. नजारा किसी युद्ध क्षेत्र में पड़े हुए सिपाहियों जैसा लग रहा था. बौने यहां-वहां पड़े कर्राह रहे थे. अब धीरे-धीरे सभी इकठे होने लगते हैं. सभी अटकलें लगा रहे थे कि दैत्य किस और गया होगा. कोई कह रहा था कि वो शहर की और गया होगा, तो कोई कह रहा था कि वो गांव की और गया होगा. तभी फिर से बलवेन की चींख पुकार सुनाई देती है. सभी उसके पास पहुंचकर उसके चिल्लाने का कारण पूछते हैं तो वो सुपर्णा के ना मिल पाने की बात करता है. अब सभी उसकी खोज में जुट जाते हैं लेकिन उन्हें सुपर्णा नहीं मिल पाती.
           अब जंगल मे गहरे तक ढूंढने का फैसला लिया जाता है. घने जंगल में हर दिन के शोर की जगह ख़ामोशी छाई हुई थी. जंगल में सुपर्णा को ढूंढती आवाज़ों के बीच चंद्रा को सुपर्णा एक गिरे हुए पेड़ के तने की बगल में बेसुध पड़ी दिखाई देती है. चंद्रा उसे अपनी बाहों में उठाकर जंगल से बाहर ले आता है. बलवेन अपनी बहन को चंद्रा की बा हों में इस हालत में देखकर पगला जाता है. गुस्साया बलवेन दोड़कर चंद्रा के पास पहुंचता है ओर सुपर्णा को नीचे रखने के लिए कहता है. सुपर्णा को होश में लाया जाता है और उससे उसकी बेहोशी का कारण पूछा जाता है. सुपर्णा बताती है कि जब दानव ‘जायत’ उसके पीछे पड़ा था वो जंगल की और भाग गई थी. जायत से लगे धक्के से वो इस पेड़ के पास आ गिरी थी. सुपर्णा को छुटपुट खरोंचें आई हुई थीं. पेड़ों के टूटने की दिशा से ये अंदाजा लगाया जा सकता था कि ‘जायत’ का गुस्सा अब गांव पर टूटने वाला था.
           अब बलवेन और सुपर्णा को अपने घर और ग्रामीणों की चिंता सताने लगी थी. गांव पहुंचकर वे क्या देखते हैं कि कई झोंपड़े टूटे पड़े थे. पूरा गांव बिखरा हुआ लग रहा था. बहुत से बौने ग्रामीण इस तबाही पर बिलख रहे थे. पूछने पर पता चलता है कि दानव शहर की और गया था. शहर की और भागकर सभी देखते हैं कि लिल्लीपुट शहर के टूटे हुए मुख्य गेट के पास दानव पसरा पड़ा था. पास ही जादूज खड़ा था जो पास खड़े लिल्ली निवासियों को बेहोश पड़े गेट के दोनों पहरेदारों को अस्पताल ले जाने के निर्देश दे रहा था. अब दानव को फिर से उसकी गुफा वाले जंगल की और छोड़ दिया जाता है. वापिस महल में चंद्रा जादूज से जायत के बारे में पूछता है. जादूज बताता है:
“जब इस दुनिया को छिपाया गया, जायत जैसे कई लम्बे और तगड़े क्बीलियाई लोग इस दुनिया के दायरे में आ गए थे. इस बात से अनजान सभी लिल्ली निवासी तब तक खुश थे जब तक वे दानव भी हमारी उपस्थिति से अनजान थे. एक दिन भूले भटके वे मर्यान्तक नाम के बजीर से टकरा गए और हमारी दुनिया उनके सामने आ गई.  संसाधनों के लिए चली सालों की लड़ाई के बाद लिल्लीपुट और उन दानवों में समझौता हुआ और वे सभी अब इस दुनिया से दूर हैं. चूंकी उन दानवों को लिल्लीपुट में लाने और दूर रखने का काम भी वजीर मर्यान्तक ने ही किया था, मर्यान्तक की मृत्यु का कारण भी वही दानव बने थे. करीब तीस साल पहले ना जाने कौन इस ‘जायत’ को इसके बचपन में लिल्लीपुट के मुख्य द्वार पर रख गया था. तब तक किसी को भी यह मालूम ना था कि यह छोटा सा बच्चा एक दानव बन जाएगा. इसकी उम्र के बढ़ने के साथ ही इसका असली रूप सामने आता गया.”

           “पांच साल की उम्र में ही ‘जायत’ सभी को चोट पहुँचाने लगा था. दस साल का होते-होते वो लिल्लीपुट के लिए एक दैत्य बन चुका था. बाद में इसे इसके गुफा वाले स्थान पर एक झोंपड़ी बनाकर छोड़ दिया गया. हर बार गुस्से में वो अपनी झोंपड़ी तोड़ दिया करता था. हद तो तब होने लगी जब उसे खाना पहुँचाने वालों के ऊपर भी हमले होने लगे. अब वो आत्मनिर्भर है और अपना ख्याल खुद रख लेता है. वो जब कभी भी गुस्से में होता है, लिल्लीपुट पर धावा बोल देता है. अब उसके पास कोई भी नहीं जाता.” जादूज के चेहरे पर ‘जायत’ के लिए सांत्वना के भाव थे.
“तो आपने उसे भी क्यों नहीं बाकियों की तरह निकाल दिया? अब वे सभी दानव कहां है..” चंद्रा उत्सुकता के साथ पूछता है. उसके सामने इस दुनिया का हर दिन कोई न कोई राज़ खुल रहा था.
“उस छोटे से बच्चे को हम कहां भगा सकते थे. तब वो दस साल का ही तो था. और वैसे भी अब वो सोया हुआ है, किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता.........और, यार तुम सवाल बड़े पूछते हो.” जादूज थोड़ी सी चुटकी लेता है.
“जादूज जी, खाना तैयार है. आ जाओ जी.” खामा सिंह चंद्रा के कमरे का दरवाजा खोलते हुए कहता है. आज उसने एक प्लेट में रखे हुए फलों जैसी टोपी पहनी हुई थी.


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pg no 67

 

 


MONTH’7वेन’ FEBRUARY
वार्शिकोतस्व
जंगलियों का गौरव
                        आशिकों के माह, ‘फरवरी’ में ‘रोज डे’ की धूम मची हुई थी. अपने ऑफिस में बैठा चंद्रा भी रेश्ना को किसी तरह से ‘रोज डे’ पर ‘विश’ करना चाहता था. साथ ही उसे यह भी आस थी कि शायद रेश्ना खुद ही उसे ‘विश’ कर दे. इसी वजह से वो बीच-बीच में रेश्ना की और देखे भी जा रहा था. लेकिन रेश्ना को तो जैसे इस बात की कोई प्रवाह ही न थी. तभी रेश्ना के मोबाइल में चंद्रा का एक मैसेज आता है.
“मैडम जी, सुना आज ‘रोज डे’ है. ‘डे’ तो हर ‘रोज’ ही आता है तो फिर आज क्या ख़ास बात है. बेवकूफ हो आप लोग.” रेश्ना मैसेज पढ़ कर अपने मोबाइल में कुछ लिखने लगती है. “सर मैने थोड़े ही न कहा, आपको. आप हो बेवकूफ.” चंद्रा मेसेज पढ़कर मुस्कुराने लगता है.
              एक दिन चंद्रा ऑफिस के लिए तैयार हो रहा था. हल्का होने, दांत घिसाई, शरीर धुलाई और फिर कपड़े औढ़ने के बाद वो शीशे के आगे कंघी करने लगता है. कि शीशे पर कुछ बारीक लिखा हुआ आता है, “थोड़ा पीछे हटकर खड़े हो.” चंद्रा उस लिखावट को नजदीक से पढ़ने की कोशिश करने लगता है कि आखिर संदेश क्या आया है. लिल्लीपुट से आया कोई भी संदेश चंद्रा को इसी तरह मिलता था. तभी पलक झपकते ही शीशे से कुछ निकलता है और ...धड़ाम्म.., चंद्रा नीचे गिर जाता है और घोंजा राम उसकी छाती के ऊपर बैठा हुआ होता है.
“ये कौन सा तरीका है टपकने का, आवाज़ ही लगा देते तो मैं हट जाता.” तो घोंजा राम उसे शीशे पर लिखी चेतावनी के बारे में कहता है.
“इतने छोटे अक्षर पड़ने में टाइम लगता है.” चंद्रा कहता है.
“वही तो नही ‘अपना’ के पास......और अब आपके लिए क्या हम फॉण्ट साइज़ सिलेक्ट करेगा कि किसमें लिखना है.” घोंजा राम मुंह बनाते हुए कहता है.
           चंद्रा, घोंजा राम को अपने ऊपर से उठाते हुए उसके आने का कारण पूछता है. घोंजा राम उसे एक पट्टिका पकड़ाते हुए कहता है, “ये लो खुद पढ़़ लेना. पर आना ना भूलना...मजा आयेगा.” कहता हुआ घोंजा राम फिर से शीशे में छलांग लगा देता है. तो चंद्रा उस पट्टिका को खोलकर उसे पढ़ने लगता है:
             प्यारे चंद्रा! आपको बड़े ही हर्षोल्लास के साथ सूचित किया जा रहा है, कि प्रत्येक वर्ष
                   की भांती इस वर्ष भी लिल्लीपुट का वार्षिक उत्सव मनाया जा रहा है. इसमें बहुत से
                  रंगा-रंग कार्यक्रमों के साथ-साथ पुरूस्कार वितरण और लिल्ली खेलों का आयोजन भी
                  किया जाएगा. अच्छे खासे मनोरंजन के बीच आपकी उपस्थिति आवश्यक रहेगी.
                  अतः आपसे निवेदन है कि आप सपरिवार पधारने का कष्ट ना करके हर पल की
                                भाँती अकेले आकर इस वार्षिकोत्सव का आनंद उठाएं.   .’राजमहल’.                                                                                                                                                                                                         
                                                                                            
           चंद्रा इस संदेश को पढ़कर अपना ब्रेकफास्ट खत्म करता है और अपने काम पर निकल जाता है. अब चंद्रा के सिर पर ‘वैलेंटाइन’ का बहूत सवार था. रेश्ना से तो उसे किसी फल की उम्मीद कतई ना थी सो ऑफिस में काम करते हुए वो रेश्ना को फिर से एक मैसेज करता है.
“सुना आज ‘वैलेंटाइन डे’ है.....बेवकूफ लोग..! इतने ‘वेले’ ‘टाइम’ नहीं होते हमारे पास.” यहां ‘वेले’ से मतलब ‘फ़ालतु’ से है. रेश्ना मैसेज पढ़ती है और कोई भी प्रतिक्रिया ना करती हुई अपना काम करने लगती है.
           रेश्ना के रिप्लाई का इंतज़ार करते-करते सुबह के दस बज जाते हैं लेकिन कोई भी रिप्लाई नहीं आता. सो, चंद्रा और नकिल ऑफिस के काम से कुछ समय निकाल कर सुबह की चाय का लुत्फ़ उठाने बाज़ार चले आते हैं. चाय पीने के बाद वे ऑफिस का रुख करने ही वाले थे कि नकिल को कुछ दिखता है और वो ठहर जाता है. उसकी निगाहें दूर खड़ी दो लड़कियों को घूर रही थीं. नकिल का हर दिन का ड्रामा जान चंद्रा उस और ध्यान नहीं देता. लेकिन जब नकिल कुछ ज्यादा ही एकटक नजरों से उन लड़कियों को घूरता रहता है तो वो उससे पूछ ही डालता है:
“अबे क्या देख रहा है. तेरी तृप्ति कभी होती भी है.” चंद्रा उसे हल्की सी डांट लगाते हुए कहता है.
“अबे तूने पहचाना कि नहीं? वो वही लड़की है.” नकिल बड़ी ही उत्सुकता के साथ देखते हुए बोलता है.
“कौन लड़की?” चंद्रा खीजते हुए पूछता है.
“साले...तेरी भाभी....आ मेरे साथ, बताता हूं.” नकिल, चंद्रा का हाथ खींचते हुए उसे सड़क पार खड़ी उन दो लड़कियों की और ले जाता है.
           अब दोनों ही उन लड़कियों के सामने खड़े थे. लेकिन उन लड़कियों का उनकी और कोई भी ध्यान नहीं था. लेकिन जब नकिल बड़ी ही बेशर्मी के साथ उन्हें एकटक देखता रहता है तो उनमें से एक पूछ ही डालती है.
“व्हाट? कुछ चाहिए? कपड़े तो अच्छे पहन रखे हैं. फिर ये भिखारियों की तरह चेहरा क्यों देखे जा रहे हो?” लम्बे बालों वाली लड़की ताना मारते हुए कहती है.
“शायद मैडम आपने हमें पहचाना नहीं. गर पहचान गईं तो आपको अपने कहे पे पछतावा होगा.” नकिल बड़े ही अंदाज़ में कहता है.
“मिस्टर बहुत हुआ. आप यहां से खुद जाते हैं कि भगाए जाना चाहते हैं.” छोटे बालों वाली लड़की गुस्से में कहती है.
“वाओ.वाओ.वाओ आप तो भड़क ही गईं. शायद आपको मजाक ज्यादा पसंद नहीं. चलिए एक सवाल का जवाब दीजिये. गर सही बता दिया तो इनाम हम आपको नहीं, आप हमे देंगी, एक-एक कप कॉफ़ी.” नकिल बड़ी ही खुश मिजाजी के साथ कहता है. चंद्रा एक तरफ खड़ा होकर सब कुछ सुन-देख रहा था लेकिन उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि आखिर नकिल कहना क्या चाह रहा था. शायद लड़कियां पटाने की शुरुआत इसी से होती होगी, सोच वो देखता रहता है.
“मिस्टर ,’whoever you are’, एक सवाल मैं भी तुमसे पूछती हूं. पुलिस की मार खाना पसंद करोगे या भीड़ के हाथों पिटना?” छोटे बालों वाली गुस्सैल लड़की उंगली उठाकर कहते हुई गरजती है जिससे चंद्रा डर कर नकिल को वहां से चलने के लिए चूंटी काटता है. लेकिन नकिल भी सीधे मुंह मानने वाला नहीं था.
“क्या ये मिर्चें खा कर आई हैं. अच्छा आप ही बताइए. शर्त लगाता हूं, इसके बाद हमें सच में कॉफ़ी पिलएंगी आपकी ये घायल शेर..नी......सहेली.” नकिल लम्बे बालों वाली लड़की से बात करते हुए दूसरी लड़की को ताना मारते हुए कहता है.

“आपको याद होगा कि आपकी इन प्यारी सहेली की डूबती नईया को पार किसने लगाया था?” नकिल फिर से पहेली बुझाता है. जिसपर गुस्सैल लड़की वहां से जाने के लिए मुड़ती है लेकिन पहली वाली उसे खीँच लेती है और नकिल की बात का मतलब पूछने लगती है.
“मतलब यह है कि लगभग सात महीने पहले आपकी यही सहेली समंद्र में तैरने गई थीं कि आत्महत्या करने, नहीं....मेरा मतलब......हमें सही से मालूम नहीं है न.” नकिल के चेहरे पर कमीनी मुस्कुराहट थी जैसे उसने कोई दांव खेल दिया हो. जो भी हो ये बात सुनकर दोनों लड़कियों के जैसे कान खड़े हो गए थे.
“आपको ये सब कैसे पता?” लम्बे बालों वाली लड़की पूछती है.
“जैसे भी पता हो, तुम दोनों वहां थे, क्यों थे, क्या कर रहे थे इससे हमें कुछ लेना देना नहीं. नासरीन चल यहां से..” गुस्सैल लड़की लम्बे बालों वाली लडकी को नाम से पुकारते हुए वहां से खींचने लगती है.
“अगर हम ये कहें कि आपकी जान बचा रहे थे तब भी...” अब तो नकिल के चेहरे पर सिक्सर मारने के जैसे भाव थे. जिसे सुनकर दोनों लड़कियां ठहर जाती हैं.
“आप....” नासरीन नाम की लड़की दोनों की और उंगली उठाकर कुछ कहने लगती है.
“हांजी हम...हम ही हैं जिनकी बदोलत आपकी ये शेरनी..सहेली आज यूं खड़े होकर हमें धमका रहीं हैं.” नकिल फिर से अपने अंदाज़ में कहता है.
“अरे आप नहीं....आपके दोस्त...अच्छा तो आप हैं सर, जिन्होंने समय रहते ‘संयूरी’ की जान बचा ली थी. वरना ना जाने क्या हो जाता. हम सब तो बहुत डर गईं थीं. ‘you were right mr.’ कॉफ़ी तो बनती है. क्यों संयूरी?” इतना कहते ही नासरीन नाम की लड़की संयूरी नाम की अपनी गुस्सैल सहेली को खींचकर कॉफ़ी पिलाने के लिए ले जाती है.
           कैफेटेरिया में चली एक लम्बी बातचीत के बाद सभी आपस में घुल-मिल जाते हैं. संयूरी नाम की लड़की हैदराबाद के किसी मय्यर रेड्डी नाम के जाने-माने फिल्म प्रोडयूसर की अकेली बेटी थी जो मुंबई में आकर बस गया था और बॉलीवुड में अपनी शुरुआत करना चाहता था. संयूरी की मां उसकी अठारह साल की उमर में ही चल बसी थी. नासरीन, संयूरी से दसवीं क्लास में मिली थी. उसके पिता संयूरी के पिता के पी.ए. थे. दोनों सहेलियां आपस में बहनों की तरह रहती थीं. नासरीन एक खुले मिजाज़ की, गौरे रंग वाली सुंदर लड़की थी. तो संयूरी कंधों तक छोटे बालों वाली, सुनहरे पके रंग की प्यारी और खूबसूरत गुस्सैल परी थी. एक घंटे तक चली लम्बी बातचीत के बाद सभी वहां से जाने और फिर से मिलने का वायदा लेकर चलने को तैयार हो जाते हैं.
“अच्छा तो संयूरी जी, जाते-जाते आप अपने ‘सेवियर’ से कुछ कहना नहीं चाहतीं, ‘जैसे कि थैंक्स’.” नकिल फिर से चुटकी लेता है.
“आपकी मुझे उस वक्त टच करने की हिम्मत कैसे हुई? अगर मैं होश में होती तो आपको दिन में तारे दिखा देती.” संयूरी भी अपने अंदाज़ में मजाक का जवाब मजाक से देती है.
“अगर हिम्मत ना हुई होती तो आप ये सब कहने के लिए यहां नहीं होतीं.” चंद्रा भी बड़ी ही सौम्यता से जवाब देता है. जिससे सभी कुछ पल के लिए हंसने लगते हैं और संयूरी भी अपनी प्यारी मुस्कुराहट बिखेर देती है. उसकी मुस्कुराहट उसके गुस्सैल चेहरे को ‘बैलेंस’ कर देती है. हालांकि चंद्रा को संयूरी गुस्से में ज्यादा प्यारी लग रही थी.
                 सभी कैफेटेरिया से बाहर निकलकर अपने-अपने रास्ते होने लगते हैं. संयूरी गाड़ी ना आने पर गुस्सा हो
  
रही थी और ऑटो करके निकलने की बात कर रही थी. इतने में कैफेटेरिया से एक वेटर एक छोटा सा पर्स लेकर चंद्रा और नकिल के पास आता है जो उसे उनकी टेबल पर मिला था. खोलकर देखने पर उसमें से संयूरी का ड्राइविंग लाइसेंस, तीन हजार रूपए और क्रेडिट कार्ड मिलते हैं. बहुत आवाजें लगाने पर भी दोनों सहेलियों तक उनकी आवाजें नहीं पहुंचतीं और वो एक ऑटो में बैठ जाती हैं.
                         अब नकिल इसे चंद्रा के लिए एक अच्छा मौका जान उसे दोड़कर पर्स लौटा देने की बात कहता है. चंद्रा भी ना जाने क्यों नकिल की बात मानकर ऑटो के पीछे दोड़ लगा देता है. लेकिन ऑटो बहुत आगे निकल चुका था और चंद्रा के बढ़े हुए पेट के आगे मजबूर टांगें उससे अब और ना भागने की मिन्नतें कर रही थीं. थका हुआ चंद्रा अपने घुटनों पर हाथों को रखकर बीच सड़क पर ही अपनी फूली हुई सांसों के थमने का इंतज़ार करने लगता है. तभी उसे पीछे से आती एक तेज आवाज़ सुनाई देती है, ‘.....च्र्रर्र्र्रर्रर्रर्ररर्र्री.....’ चंद्रा उस आवाज़ को सुनकर हांफते हुए पीछे की और मुड़ता है तो उसे अपनी और एक काली कार दन-दनाती हुई आती दिखाई देती है. चंद्रा सहजता से ही थोड़ी सी छलांग लगा देता है और सीधे ही ‘..धक्क..’ की आवाज़ के साथ कार के शीशे से जा टकराता है.
              टक्कर शायद जोर की थी जो चंद्रा को पता ही नहीं चला कि कब वो अस्पताल के बिस्तर पर जा पहुंचा था. जब आंख खुली तो सामने एक पचास साल का आदमी बैठा था. अच्छे सूट-बूट में बैठा वो जैसे चंद्रा के होश में आने का ही इंतज़ार कर रहा था. उसके साथ लगभग उसी की उम्र का एक और आदमी खड़ा था जिसने अपने हाथ में एक मोबाइल और एक पर्स पकड़ा हुआ था.
“शुक्र है तुम्हे होश आ गई. वैसे तो डॉक्टर ने कहा कि डरने वाली कोई बात नही है. लेकिन डर तो लगता ही है जब आपकी गाड़ी के नीचे कोई आ जाए तो.” कुर्सी पर बैठा हुआ सख्श बड़े ही आराम से बात कर रहा था.
“एक छोटा सा पर्स था मेरे हाथ में...” चंद्रा उठकर बैठते हुए कहता है.
“हां, मैं नहीं जानता कि वो तुम्हारे पास कैसे आया लेकिन उसके मालिक को यहां बुला लिया गया है.” कि तभी धड़ाक से दरवाजा खुलता है और संयूरी अंदर दाखिल होती है.
“पापा आपके ड्राईवर का ये दूसरा एक्सीडेंट है. आप उसे चलता करेंगे या मैं उसे चलना सिंखाऊं.” संयूरी कमरे में जैसे  फायरिंग करती हुई दाखिल हुई थी. बिस्तर पर पड़े चंद्रा को देखकर वो फिर से फायरिंग करना शुरू कर देती है.
“मिस्टर आप..!? तुम्हे मेरा पर्स मिला था तो मेरे पीछे दोड़ लगाने की जरूरत क्या थी? उसमें मेरा लाइसेंस था घर पर भी तो भिजवा सकते थे. अगर तुम्हे कुछ हो जाता तो मेरे पापा कितनी बड़ी मुसीबत में फंस सकते थे, जानते हो तुम. पर्स ही था किसी की जान तो नहीं थी उसमें जो तुम अपनी जान खतरे में डाल दोगे......” संयूरी लगातार बोले जा रही थी और चंद्रा का मन कर रहा था कि वो उसे बिस्तर में लपेटकर खिड़की से बाहर फेंक दे. लेकिन बेचारा मुस्कुराने के सिवा कुछ भी नहीं कर पा रहा था. फिर ना जाने वो अपने हैदराबादी लहजे में कुछ बोलकर वहां से चली जाती है.
“अच्छा तो आप हैं जिन्होंने मेरी बेटी को नई जिन्दगी दी थी. भई, हम आपके कर्जदार हैं. और हां मेरी बेटी के बर्ताव के लिए मैं आपसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांगता हूं. बिना मां की बच्चियां अपने पिता के प्यार में बिगड़ जाती हैं. उसके सिवा मेरा कोई है भी नहीं, सो उसे नाराज़ करने की हिम्मत भी नही कर पाता. जाते-जाते वो तुम्हे डिनर पर आने का न्यौता दे गई है और मुझे तुम्हारे बिना घर ना आने की धमकी भी. अब ना, ना करना वरना मुझे भी अपने साथ सुला लेना कहीं.” ‘मय्यर’ साहब हल्के से हंसते हुए कहते हैं.
           कुछ देर के बाद नकिल वहां पहुंच जाता है और आधे घंटे में चंद्रा को छुटी दे दी जाती है. शाम को चंद्रा,

परसी आंटी के पास पहुंचकर उन्हें कुछ नहीं बताता और उन्हें मय्यर रेड्डी से मिलने की एक झूठी कहानी बता देता है. परसी आंटी भी चंद्रा को एक अजीब बात बताती है कि उसका HOD उससे मिलने घर पर आया था और बहुत देर तक उसके कमरे में उसका इंतज़ार करता रहा था. इस बात को अनदेखा कर चंद्रा, परसी आंटी से परमीशन लेकर रेड्डी परिवार के पास पहुंच जाता है. साथ में नकिल भी था. घर के आकार और बाहर खड़ी गाड़ियों को देखकर नकिल फिर से चंद्रा को सलाह दिए बिना नहीं रह पाता:
“बेटा, नकिल बाबा की है यही सलाह, ना कर देर, यहां रिश्ता ले बना.” सुनकर चंद्रा, नकिल को मुंह बंद रखने की सलाह देता है और दोनों दोस्त अंदर चले जाते हैं.
           घर में रेड्डी परिवार व नासरीन और उसके पिता भी मौजूद थे. उनकी अच्छी-खासी मेहमान-नवाजी की जाती है और देर रात तक जान-पहचान बनाई जाती है.
           अगले दिन शाम को ऑफिस की छुटी के समय चंद्रा और नकिल बाहर खड़े थे. रेश्ना भी फ़ोन पर कुछ फुसफुसाते हुए वहां आ पहुंचती है. दोनों को देख वो फिर से अपना फ़ोन झट से नीचे कर लेती है. उनसे बात करके वो वहां से आगे निकल जाती है. थोड़ी दूरी पर वो फिर से फ़ोन पर बात करने लगती है. नकिल चलने के लिए कहता है तो चंद्रा कुछ सामान लेने की बात कहके वहीं रुक जाता है. नकिल के जाने के बाद चंद्रा एकदम से रेश्ना के पीछे चल पड़ता है. रेश्ना आगे के ‘बस स्टॉप’ से बस लेती है. बस ‘साकिनाका’ ‘मेट्रो स्टेशन’ के बाहर पर आकर रूकती है. चंद्रा उससे दूर बाइक खड़ी करके इंतज़ार करने लगता है. कुछ देर के बाद वहां एक लम्बी, काली कार आकर रूकती है और रेश्ना उसमें बैठकर चली जाती है. उस शाम चंद्रा ‘जिम’ भी नहीं जाता और सीधा समंद्र किनारे पहुंच जाता है. समंद्र की हिचकोले खाती लहरों की आवाजें उसे कुछ सुकून दे रही थीं.
           अगले दिन चंद्रा के एकाएक हुए खराब मूड के बारे में बार-बार पूछने पर भी चंद्रा, ‘नकिल’ को कुछ भी नहीं बताता. फ़ील्ड से लौटकर ऑफिस में हर बार की तरह चंद्रा, रेश्ना के पास डाटा लिखवाने नहीं रुकता, बस थोड़ा सा समझाकर वापिस अपनी मेज पर आ जाता है. आज ऑफिस में चंद्रा कंप्यूटर पर काम करती रेश्ना की और उस तरह से बार-बार नहीं देख रहा था. बस बीच-बीच में देख लेता था, जैसे उसकी आदत नहीं छूट रही हो. रेश्ना भी उसे बीच में देख मुस्कुरा देती थी लेकिन आज उसे चंद्रा की आंखों में वो सौम्यता नहीं दिख रही थी जो आमतौर पर होती थी. लंच पर भी चंद्रा ज्यादा बात नहीं करता है.
अगली सुबह चंद्रा को लिल्लीपुट के वार्षिकोत्सव जाना था. अपने टूटे मन को सहारा देने का चंद्रा के पास अब एकमात्र ही सहारा बचा था, सो चंद्रा पांच बजे से ही लिल्लीपुट जाने की तैयारियां करने लगता है- नहाता है, खाता है और जल्दी से उसी चट्टानी किनारे से पानी में छलांग लगा देता है. आज कोई भी कंघी करते वक्त उसके ऊपर छलांग नहीं लगाता.
           लिल्लीपुट में आज का दिन बड़ा ही लुभावना था- मौसम साफ़ था, पक्षी आसमान में खेल रहे थे और सभी जंगली जानवर एकदुसरे का पीछा करते हुए खुले जंगल में चर रहे थे. आज तो पेड़-पौधे भी लहलहाकर आज के खुशनुमे मौसम का जैसे सुबूत पेश कर रहे थे. पूरे लिल्लीपुट को सजाने की तैयारियां अपने अंतिम दोर पर थीं. लिल्लीपुट की हर इमारत को रंगों और फूलों से सजाया गया था, सिर्फ थाने को छोड़कर. वहां अभी भी रंगाई का काम चल रहा था. ‘पैन्टर’ नाम का वो बौना पेंटर थाने की रंगाई को अंतिम रूप देने में लगा था. उसकी हिंदी भाषा में हाथ कुछ तंग था. वो अपना काम पूरा करने में मग्न था कि तभी हवा सिंह अपनी लाठी को सलाखों पर मारते हुए पैन्टर के पास आ धमकता है.
“ऐ...रंगीले अपणे हाथां ने जल्दी हिला. टैम हो रिया है.” हवा सिंह अपनी अकड़ भरी स्टाइल में कहता है.

“क्या बोलती थुम?” ना समझने के कारण पैन्टर, हवा सिंह को अपनी बात दोहराने को कहता है. लेकिन पैन्टर की कमजोरी के चलते, उसके ‘थुम’ कहते ही हवा सिंह के ऊपर थूक गिर पड़ता है. जिससे हवा सिंह चिढ़ जाता है.
“अबे थूक भरी, रंगोली की दुकाण. अपणा पेंट भी के अपणे थूक से ही गीला करे है तू? और ये ‘बोलती’ के होवे से? म्हारा ‘सेक्स’ किस भासते चेंज करे है. हिंदी भासा की ‘कमजोरी’.” हवा सिंह अपने मुंह पर लगे थूक को साफ़ करते हुए उसे घूरता है.
“व्हाट?” पैन्टर फिर से पूछता है.
“अबे काहे का ‘वट’? काम पे जा ‘डट’. देखा है, ‘लट्ठ’.” हवा सिंह अपनी लाठी पैन्टर की सीढ़ियों पर पीटते हुए कहता है.
           इससे पहले कि उन दोनों के बीच और बात हो पाती, वहां प्रेसिडेंट की कार आकर रूकती है. उसके पीछे-पीछे उसके बॉडी गार्ड्स की कार लेफ्ट-राईट करती हुई सीधी पैन्टर की सीढ़ी से जा टकराती है. काम करता हुआ पैन्टर ‘धड़ाम’ से नीचे जा गिरता है. हवा सिंह उसके रंगों वाले डब्बे के नीचे आने से बाल-बाल बचता है. नीचे गिरे पेंटर को उठाया जाता है. प्रेसिडेंट के पूछने पर हवा सिंह काम के कुछ मिनटों में ही पूरा हो जाने की बात करता है. इसके बाद प्रेसिडेंट, हवा सिंह और पैन्टर की पीठ पर, अपनी मुहर, पार्टी स्टीकर चिपकाकर अपनी कार में बैठ जाता है. प्रेसिडेंट के दोनों नमूने बॉडी गार्ड्स हवा सिंह के पास खड़े होकर उसकी और एक-टक देखने लगते हैं.
“ए भाई, मन्ने अभी तक समझ ना आवे कि तुम दोन्नों ये आधा-अधूरा चस्मा क्यों पहने हो? आधा काला, आधा सफेद. के तुम दोनों की एक-एक आंख खराब है, कि पत्थर की बणे है?” हवा सिंह दोनों बॉडी गार्ड्स से पूछता है.
           उसके पूछने पर एक बॉडी गार्ड उसे बताता है कि काले चश्में का उपयोग अपनी चौकस निगाहों को लोगों की नजरों से बचाने के लिए किया जाता है. वो बताता है कि उन दोनों में एक खासियत है कि वो दोनों एक समय में अपनी एक ही आंख को घुमा सकते हैं. जिससे देखने वालों को उनपर शक भी नहीं होता कि वो अभी किसी को ढूंढ भी रहे हैं या एकटक ही देखे जा रहे हैं. हवा सिंह के उन्हें शक भरी निगाहों से देखने पर दोनों ही अपने-अपने चश्में उतार देते हैं और हवा सिंह को अपनी खासियत से रूबरू करवाते हैं. दोनों की दाहिनी आंख तो घूम रही थी लेकिन बाईं आंख स्थिर थी. अब हवा सिंह अपने ओंठों को सिकोड़ता रहता है और प्रेसिडेंट का काफिला डगमगाता हुआ वहां से चला जाता है.
           उधर चंद्रा नदी से निकलकर लिल्लीपुट शहर जाने वाले रास्ते पर चल पड़ा था. एक ऊपर उठे हुए रास्ते पर उसे एक पौधे का ऊपरी सिरा नजर आता है. पत्तियों के बीच में फूल और उन पर मंडराती तितलियाँ,....अच्छा दृश्य है, सोचकर चंद्रा आगे बढ़ जाता है. उस उभार से गुजरते हुए उसे ध्यान आता है कि जो पौधा उसने देखा था वो अब वहां नहीं था. उसे आश्चर्य तो होता है लेकिन......’ये लिल्लीपुट है, यहां कुछ भी हो सकता है, कौरी कल्पना....’ सोचकर वो आगे बढ़ जाता है.
           थोड़ी दूरी पर उसे फिर से वही पौधा अब चलता हुआ सा दिखाई देता है. अब वह सारी बात समझ जाता है और तेज कदमों से उस पौधे के पास पहुंच जाता है. वो ‘काष्ट’ था जो अपने उसी हिलते हुए अकड़न भरे अंदाज़ में चल रहा था और हकलाता-अटकता हुआ कुछ बुदबुदा भी रहा था- “समारों.....पर......हमला”. वो सचमुच के एक पेड़ का छोटा सा बच्चा दिख रहा था. पेड़ के तने की तरह उसकी छाल थी और उसमें से टहनियों की तरह निकली दो बाजुएं थीं जिनपर फूल-पत्तियां उगी हुई थीं. उसके छिले हुए तने की तरह दिखने वाले सिर में भी फूलों और पत्तियों का गुलदस्ता सा बना हुआ था. उसकी, जैसे लकड़ी में तराशी गईं आंखें, धीरे-धीरे हिल रही थीं और ओंठ भी धीरे से कुछ बड़बड़ा रहे थे. 

           चंद्रा ने उसके बारे में जादूज से सुन रखा था. वो एक अहानिकारक छोटा पेड़ था जिसे पूरे लिल्लीपुट में घूमने की आजादी थी. जादूज ने उसे यह भी बताया था कि कैसे काष्ठ, जंगली पेड़ों के शैतानी हमले में गिर पड़े एक पेड़ के बीज की उपज था. कैसे किसी ने अपनी काली शक्तियों से, जादूज के जंगली पेड़ों पर किये जा रहे उसके प्रयोगों पर काबू पा, पेड़ों को जीवित कर लिल्लीपुट पर हमला करने के लिए भेज दिया था. जिसे जादूज ने विफल कर उन पेड़ों को या तो नष्ट कर दिया था या फिर उन्हें वापिस जंगल में फिर से ‘बो’ दिया था. उसने यह भी बताया था कि आज भी माना जाता है कि उनमें से कुछ पेड़ आज भी जिंदा है. कुछ राहगीरों के साथ घटी अपर्याशित घटनाओं के बाद रात को घने जंगल की और जाना बंद था. चंद्रा द्वारा पेड़ों का हमला करवाने वाले शक्श के बारे में पूछे जाने पर जादूज उसे फिर से टाल गया था.
           चंद्रा हिचकिचाते हुए काष्ठ के पास जाकर उससे उसका हाल-चाल पूछता है. काष्ट कोई भी जवाब नही देता तो चंद्रा उसे आज के समारौह में जाने के बारे में पूछता जिसपर काष्ट उसे चुप रहने के लिए कहता है: “चप...बलना....सिखा...हूं.” उसकी आवाज़ लकड़ी के टकराने जैसी लग रही थी जिसे समझना पड़ रहा था.
           काष्ठ हर दिन किसी की कही बातों को अक्सर दोहराता रहता था जिससे वो बोलना सीखता था. वो आज भी कुछ बड़बड़ा रहा था. लेकिन आज वो किससे सीख कर आया था? चंद्रा नजदीकी बढ़ाने के लिए उससे आज के उसके सबक के बारे में पूछता है. काष्ट फिर से वही बात बड़ाड़ाने लगता है, “समरो.....पर......हमला”. चंद्रा को कुछ भी समझ में नही आता और पूछता है कि उसने ये सब कहां से सुना था क्योंकि काष्ठ अक्सर किसी के कहे शब्दों को ही दोहराता रहता था. “पेड़..ने..” काष्ट शायद यही बोला था. चंद्रा इतना तो समझ गया था कि उसने -पेड़ में- कहा था. इसी उधेड़बुन में वो काष्ट को पीछे छोड़ता हुआ आगे निकल आता है कि अचानक उसके पांव ठिठक जाते हैं और वो ‘अबाउट टर्न’ मारता हुआ काष्ठ के पास पहुंचकर उससे उस जगह के बारे में जानने की कोशिश करने लगता है जहां उसने ये सब सुना था. बड़ी देर तक चिढ़ दिला देने वाली सिरदर्दी के बाद चंद्रा उस जगह का अंदाजा पाने में सफल हो जाता है. वो जानता था कि पेड़ों पर काष्ठ किसकी बातें सुन सकता था.
“तुम....खा...छल्ले?” जंगल की और भागते चंद्रा को देखकर काष्ट पूछता है.
“पेड़ों में” चंद्रा भागते हुए जवाब देता है.
           चंद्रा सीधा जंगल में घुसता चला जाता है. जंगल में बहते उस छोटे से नाले की कलकलाहट से दूर होते हुए वो लिल्लीपुट शहर से दूर घने जंगल में घुसता जा रहा था. इस घने जंगल में टिड्डों की आवाजें तक आनी बंद हो गई थीं. इस घने हिस्से में पेड़ बड़े-बड़े और बेलदार थे. ना जाने क्यों, पर चंद्रा को पड़ों से कुछ हिलने की आवाजें सी आ रही थीं. पीछे मुड़-मुड़कर कर देखते हुए चलते रहने के बाद चंद्रा जंगल के एक ऐसे हिस्से में पहुंच जाता है जहां पेड़ बड़े तो थे लेकिन उनका घनत्व कुछ कम था. पेड़ घने पत्तीदार थे, जो देखने पर किसी छत की तरह लग रहे थे. उनके ऊपर कुछ भी देख पाना सम्भव नहीं था.
           तभी उस शांत से लगने वाले जंगल में चिड़ियों के चह-चहाने और जानवरों की कुछ आवाजें गूंजने लगती हैं. इन आवाजों से भ्रमित चंद्रा को ये पता भी नहीं चलता कि उसकी और एक तीर लगा पत्थर आ रहा था. तीर उसके सिर पर लगता है जिससे वो लड़खड़ा जाता है. फिर कई सर्र-सर्राहटें उसे घेर लेती है. सम्भलने पर वो खुद को बहुत सी रस्सियों में बंधा हुआ पाता है जो तीरों से बंधी हुई थीं. बिना किसी देरी के वो रस्सियां चंद्रा को ऊपर पेड़ों की और खींचने लगती हैं.
कुछ ही देर में वो पत्तियों की छत में गायब हो जाता है. ऊपर एक अलग ही दुनिया बसी थी चंद्रा को
             
पेड़ों की मोटी-मोटी डालियों पर लकड़ियों से बने कई छोटे-छोटे घर दिखाई देते हैं. कई बौने, जिन्होंने कमानें पकड़ी हुई थीं, चंद्रा को रस्सियों से खीँच रहे थे. अब पेड़ों की उस बस्ती के बीच मजधार में लाकर चंद्रा को हवा में लटकने दिया जाता है. उन बौनों ने जंगलियों जैसी वेशभूषा पहनी हुई थी. लेकिन उनका बर्ताव जंगलियों जैसा बिलकुल भी नहीं लग रहा था. वे सभी एकदम शांत थे और हवा में लटके हुए चंद्रा को शान्ति के साथ देखे जा रहे थे. तभी हवा में बेल से झूलता हुआ एक तगड़ा बौना बीच मजधार लटके हुए चंद्रा की छाती पर कूद जाता है. ये बौना वेशभूषा सें सभी जंगलियों का सरदार लग रहा था. उसने सिर पर खूबसूरत फूलों और बेलों का बना एक मुकुट और कमर में सुंदर झाड़ियों से बना एक घागरा फना हुआ था. उसने अपने कंधे पर कमान लटका रखी थी और पीठ पर तीर मौर के पंख जैसे फैले हुए थे.
“कौन है अजनबी, घुस आया जो अभी-अभी? कैसे छूट गया पेड़ों से, रहते किसी की आस में कभी-कभी” सरदार गाते हुए पूछता है.
“नहीं जानते सरदार, शायद दिन की वजह से बच गया. दिन में वो कम सक्रिय रहते हैं. बस्ती के नीचे टहल रहा था. सो पकड़ लाए. देखने में ‘बाहरी’ लगता है.” दूर की टहनी पर बैठा एक बौना कहता है.
“बाहरी...हम्म, सुना है...तुम हो ख़ास, महल के हो पास. हैं, दोस्त तुम्हारे जो काम करो हमारे. है लाना कुछ ख़ास, पड़ा जो महल के पास.” सरदार गाते हुए ही बात कर रहा था.
“मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा. पहले मुझे खोल दो फिर बैठ कर बात करते हैं. मेरे जोड़ों में दर्द हो रही है.” रस्सियों से लटके हुए चंद्रा का शरीर अब दर्द करने लगा था और ऊपर से सरदार उसके ऊपर आ बैठा था.
           सरदार के इशारे पर चंद्रा को एक और खींचा जाने लगता है. एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक होते हुए कई जंगली बौने उसे एक बड़े से वृक्ष-गृह की ले जाने लगते हैं. इस सफर में चंद्रा को पेड़ों पर बसी इस अदभुद दुनिया का नजारा देखने को मिलता है. एक घर से दूसरे घर तक जाने के लिए बेलों से बुनी हुई सीढ़ियों और पुलों का जाल पूरी बस्ती में फैला हुआ था. चंद्रा अब बैठे जा सकने वाले उस बड़े से ‘ट्री’ हाउस में था. उसे कुछ हद तक खोल दिया गया था. सरदार, चन्द्रा के पास पहुंचता है और उसके आने का कारण पूछता है.
           चंद्रा, सरदार से समारौह के वक्त जंगलियों के हमला करने की बात पता होने की बात कहता है. पहले तो सरदार इस बात से इंकार करता है और चंद्रा से उसकी खबर का जरिया पूछता है. चंद्रा काष्ट को जंगलियों से खतरा होने की वजह से उसका नाम नहीं बताता. अब बार-बार पूछने पर भी जब सरदार उसे कुछ भी नही बताता तो चंद्रा उसे उनके हमले के बारे में महल को बता देने की धमकी देता है. इस पर कुछ पहरेदार चंद्रा को पकड़ने के लिए उसकी और लपकते हैं. लेकिन चंद्रा को पकड़ पाना उनके लिए इतना आसान भी तो ना था. उसके ऊपर पत्थरीले तीर छोड़े जाते हैं पर चंद्रा उन्हें अपनी बाजुओं से झटक देता है और डालियों पर छलांग लगाता हुआ जमीन पर पहुंच जाता है. तभी पीछे से जंगलियों का सरदार एक रस्सी के सहारे पेड़ों की पत्तियों की छत से लटकता हुआ चंद्रा पर चिल्लाता है:
    “जाओ, बता दो उस गधे राजा और उसके चमचों को, ले जाएंगे अपनी मूर्ती को.
     कि आज पुरूस्कारों के बीच वापिस ले कर रहेंगे, जो आया बीच हमारे, ‘धूम’ मचाकर रहेंगे.”
           चंद्रा फिर से ठिठक कर सरदार से उसकी कविता का मतलब पूछता है. सरदार उसे पुरे स्टेडियम में अपने आदमियों के पहले से ही मौजूद रहने और हर जगह बमों के फिट होने की बात बताता है. और यह भी कि सरदार खुद वहां भेस बदलकर चंद्रा को देखता रहेगा और चंद्रा के किसी भी तरह की चालाकी करने पर उसका परिणाम पुरे लिल्लीपुट को भुगतना पड़ेगा. यह कहकर सरदार ठहाका मारकर हंसने लगता है और धीरे-धीरे उसकी रस्सी ऊपर उठने

लगती है. चंद्रा बड़े ही अनमने ढंग से वहां से वापिस चला आता है. रास्ते में शहर की और जाते हुए वो इस हमले को नाकाम करने की योजना बनाता रहता है.
           अब लिल्लीपुट शहर की दीवारें सामने आ गई थीं. वो अभी भी अपनी ही उधेड़बुन में था उसे पता ही नहीं चला था कि कब उसने लिल्लीपुट का मुख्य ‘गेट’ लांघ लिया था. आज तो कहां उसे मोजमस्ती करनी थी और कहां वो चिन्तन-मनन के जाल में फंस गया था. कि तभी एक जोरदार बाजे की आवाज़ उसके कानों में पड़ती है ‘....पैंैैैै....’ चंद्रा अचानक ही उछल पड़ता है और उसकी बेहोशी टूटती है. उस बाजे का शोर कानों में पड़ने से जैसे उसका सम्मोहन टूट गया था. अब वो साइंटिस्ट की लेबोरेटरी की और चल देता है.
           अब उसे पता चल रहा था कि वो एक भव्य समारौह में आया है. रास्ते में हर इमारत पर नया रंग पुता हुआ था और खिड़की और दरवाजों पर फूलमालाएं सजी थीं. हर जगह छोटी रंगीन झिलमिलाने वाली रोशनियों की भी सजावट की गई थी जो शायद रात को रंगीन होने वाली थीं. हर चौराहे को फूल-पत्तियों, लाइटों से सजाया गया था. छोटी-छोटी ‘लिल्ली’ गाड़ियों को भी बड़े ही आकर्षक रंगों, फूलमालाओं और लाइटों से सजाया गया था. हर कोई नये कपड़ों में घूम रहा था.
           बाज़ार से गुजरते हुए चंद्रा को दुकाने भी सजी हुई मिलीं. यहां तक कि रेहड़ियों को भी नही छोड़ा गया था. कई जगहों पर आकर्षक सेल लगी हुई थीं और आज सभी दुकानदार बड़े उत्साह के साथ ग्राहकों को अपने पास बुला रहे थे. सजा-धजा तांगे वाला वहां से गुजरता है तो सब्जी वाला सब्जो उसे आवाज़ लगाता है, “तांगा चालक, खाले पालक.” तो तांगे वाला भी एक पद यात्री को कहता हुआ चला जाता है, “क्यों है अपनी टांगो से बैर, करले तांगे की सैर.” वहीं कपड़े वाला भी अपनी हांकता है, “नील, हरे, लाल हैं कपड़े अच्छे...सस्ते, आके देखो जाओगे हस्ते-हस्ते.” राशन वाला कहां पीछे रहता, “मेरी राशन की दुकान, ले जाओ सामान, बनाओ जो चाहे पकवान.” जूते वाला भी अपने जूते बेच रहा था, “मेरे जूते अच्छे दिखें, पहन के पांव ना दुखें.”
           हर कोई अपना सामान बेचने में लगा था. आज बाज़ार में बहुत भीड़ थी. होती भी क्यों ना, आज लिल्लीपुट का वार्षिकोत्सव जो था. पुरे बाज़ार को निहारते-निहारते चंद्रा साइंटिस्ट की लैब पहुंच जाता है. साइंटिस्ट की लैब बाहर से एक परमाणू जैसी दिख रही थी जो डी.एन.ए. जैसे दिखने वाले दो खम्बों पर टिकी थी. परमाणू के गोले के चारों और न्यूट्रॉन अपने-अपने अक्ष में चक्कर काट रहे थे. चंद्रा उस इमारत के अंदर जाने के लिए दरवाजे के पास पहुंचता है. दरवाजा किसी ‘डी.एन.ए.’ की जुड़ी हुई कड़ीयों के समान दिख रहा था. चंद्रा देखता है कि कुछ न्यूट्रॉन दरवाजे के सामने से चक्कर काट रहे थे. उनके चक्कर काटते रहने से चंद्रा को चोट लगने का खतरा था सो चंद्रा बाहर से साइंटिस्ट को आवाज़ लगाने लगता है.
“कौन है? अपने ‘ओस्मोसिस’ का कारण बताओ.” एक न्यूट्रॉन से, जो कि अब चमकने लगा था, आवाज़ आती है. साइंटिस्ट शायद चंद्रा के आने का कारण पूछना चाहता था. आवाज़ न्यूट्रॉन के घूमने के साथ-साथ पास और दूर हो रही थी.
“मैं हूं.....’चंद्रा’. बहुत ही जरूरी काम है. आज के समारौह और जंगलियों के बारे में.....” चंद्रा चिल्लाते हुआ कहता है.
“सीधे खड़े रहो...” फिर से वही न्यूट्रॉन गुजरते हुए चमकता है और साथ ही एक और भागता हुआ न्यूट्रॉन चमकदार रौशनी के साथ उसकी फोटो खीँच लेता है.
           इसी के साथ ही तेज फस्स-फस्साहट के साथ ही सभी न्यूट्रॉन अपने-अपने चक्कर काटना बंद कर देते हैं. ‘डी.एन.ए.’ जैसी दिखने वाली दरवाजे की वो कड़ियां एक-एक करके खुलने लगती हैं. चंद्रा ने ऐसा होते हुए पहले कहीं

नहीं देखा था. न्यूट्रॉन चंद्रा को अंदर चले जाने के लिए कहता है. साइंटिस्ट अंदर ही था और अपनी प्रयोगशाला को सज़ा रहा था. साइंटिस्ट चंद्रा का स्वागत करता है. अंदर कई तरह के विचित्र, उलझे हुए, आकर्षक उपकरण पड़े हुए थे. लम्बे, गोल, वर्गाकार, त्रिकोने हर तरह के. सभी अपनी-अपनी जगह पर टिका कर रखे हुए थे. कमरे के अंदर अजीब सी सफेद-नीली रौशनी फैली हुई थी जिसका स्त्रोत चंद्रा को कहीं से भी दिखाई नहीं दे रहा था. ऐसा लग रहा था मानो रौशनी छत से आ रही थी लेकिन किस चीज़ से? हैरानी से छत की और देखते चन्द्रा का ध्यान साइंटिस्ट की आवाज़ अपनी और खींचती है:
“कहो ‘लॉन्ग डी.एन.ए.’, क्या बिग-बैंग करने जा रहे हैं जंगली, इस बार? और इसमें हम आपकी क्या मदद कर सकते हैं?” मशरूम के गुच्छे जैसे बालों वाला, काला सूट पहने वो बूढ़ा बौना साइंटिस्ट अपनी चमकती हुई ऐनक को अपनी नाक पर उठाकर रखते हुए पूछता है. चंद्रा का ध्यान अभी भी उस चमकती हुई छत पर ही था.
“अभी तक नहीं मिला कुछ.” साइंटिस्ट अपनी ऐनक हल्की सी नीचे कर उसकी और देखता है.
“जी...क्या..क्या नहीं मिला?” चंद्रा का जैसे मोह भंग हुआ हो.
“आपने टयूब लाइट तो जलती हुई देखी होगी जिसमें भरी ज्वलनशील गैस को बिजली दिखाने से वो जल उठती है. हां, वो ‘टयूब’ ‘एयर टाइट’ तो होती है लेकिन हमारी पृथ्वी की ‘ग्रेविटी’ और चुम्बकीय शक्तियां भी तो कई कमाल कर दिखाती हैं.” साइंटिस्ट बिना सवाल के ही जवाब दिए जा रहा था.
“अच्छा अब तो बताइए क्या राज़ है जंगलियों का आपके पास?” साइंटिस्ट फिर से पूछता है.
           चंद्रा भी समय न गंवाते हुए साइंटिस्ट को सारी बात बता देता है और उससे कुछ ‘वाल्की-टॉकी’ सेट्स और ‘सटनगंस’ की मांग करता है. तभी ऊपर से एक डिब्बा गिरता है और उसमें से एक लैपटॉप और कुछ पैकेटों में मस्से के आकार के कुछ दाने बाहर आ गिरते हैं. साइंटिस्ट उन मस्से के आकार के दानों को दिखाते हुए कहता है कि इन मस्से रूपी ‘इयर पीसेस’ और ‘फोंस’ से किसी को भी शक नहीं होगा की ये क्या हैं और लैपटॉप के जरिये वो सभी जंगलियों को चुपके से देख भी सकता था. किसी पुराने धूल भरे बक्से में से पुरानी ‘सटनगंस’ निकालकर देते हुए साइंटिस्ट, चंद्रा को खुद भी सावधान रहने की सलाह देता है. अब दोनों ही सामान के साथ स्टेडियम की और चल देते हैं.
           बाहर वार्षिक ‘लिल्ली’ परेड शुरू हो चुकी थी. लिल्लीपुट शहर की सड़कों से होती हुई ये परेड ‘लिल्ली’ मैदान की और जानी थी. अजीबों-गरीब, रंग-बिरंगे कपड़ों में नाचते-गाते और अपनी प्रस्तुतियां देते हुए कई ‘लिल्ली’ निवासी उस परेड में हिस्सा ले रहे थे. सभी बहुत ही खुश नजर आ रहे थे. पीछे-पीछे कुछ झांकीयां भी चली आ रही थीं जिनमें लिल्लीपुट के इतिहास, संस्कृति और कुदरत की झलक देखने को मिल रही थी. अब दोनों भी परेड में शामिल हो जाते हैं. दोनों ही परेड से आगे निकल रहे थे ताकि वो जल्दी से जल्दी स्टेडियम पहुंच जाएं.
                      स्टेडियम पहुंचकर मैदान जाने वाली सीढ़ियों पर खड़ा होकर चंद्रा देखता है कि वहां काफी लोग आने लगे थे. प्रवेश द्वार पर ‘सूबा’ सूबेदार और ‘सीप’ सिपाही आने जाने वालों पर नजर रख रहे थे. घोंजा राम और ‘डोंजा खान’ बड़े अकड़ते हुए लोगों के पास से गुजर रहे थे, मानो ये समारौह उन्ही के लिए था. दूसरी और जो लोग खड़े थे, सेनापति उन्हें धक्का मारकर बिठा रहा था. तो मेजर साहब, चंद्रा की विपरीत दिशा में राजा के मंच पर खड़ा हो कर अपने से भी लम्बी दूरबीन से चारों तरफ नजर बनाए हुए था. चंद्रा इन सभी के पास जाकर उन्हें जंगलियों के स्टेडियम में हमला करने की बात बताता है. वो उन सभी को ‘वाल्की-टाल्की’ सेट्स देकर अपनी योजना समझाता है और किसी को कुछ ना बताने के लिए कहता है.                                                                                                                                             

           लिल्लीपुट की धुन बजने और तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ही राजा का प्रवेश होता है. उसके साथ जादूज, प्रेसिडेंट व उसकी सेक्रेटरी, राजकुमार और राजकुमारी भी थी. वे सभी मंच पर बैठ जाते हैं. अब जादुगर जादूज खड़ा होकर चंद्रा को पुकार लगाता है जो चंद्रा को इतने शोरगुल में भी किसी लाउड स्पीकर से कम नही लगती. अब चंद्रा और साइंटिस्ट तालियों की गड़गड़ाहट के बीच राजा के मंच की और चल देते हैं.
                      उन्हें एक दरवाजे पर से होते हुए एक गलियारे से निकल कर सीढ़ियां चढ़कर मंच तक जाना था. रास्ते में एक मैदान को जाते दरवाजे पर दो आदमी खड़े थे. साइंटिस्ट, चंद्रा को चूंटी काटते हुए उनकी तरफ इशारा करता है. चंद्रा को वे दोनों समान्य ही लगे, आम नए रंगबिरंगे कपड़ों में दोनों समारौह का आनंद लेने पहुंचे थे. तभी साइंटिस्ट अपने कान के पिछले हिस्से को रगड़ते हुए, चंद्रा को उनकी तरफ देखने के लिए हल्का सा इशारा करता है. चंद्रा के देखने पर दोनों के कानों के पिछले हिस्सों पर गहरे रंग में कुछ टैटू से बने थे. अब दोनों आगे बढ़कर सीढ़ियों के पास पहुंच जाते हैं. साइंटिस्ट, चंद्रा को उन निशानों द्वारा जंगलियों की पहचान करने की सलाह देता है और खुद स्टेडियम में लगे कैमरों को उस लैपटॉप से जोड़ने के लिए स्टेडियम के कण्ट्रोल रूम चला जाता है.
               चंद्रा मंच पर पहुंचता है तालियां अब कुछ धीमी पड़ गई थीं. अभी भी कई ‘लिल्ली’ निवासी चंद्रा की मौजूदगी को पसंद नहीं करते थे. कुछ प्रशंसक निवासी खड़े होकर चंद्रा का अभिवादन करते हैं जिनमें वहां मौजूद सुपर्णा भी एक थी. स्टेडियम में बज रही तालियों में उसकी ही ताली शायद सबसे जोरदार थी. वे सभी सीढ़ीनुमा मंच पर तीन कतारों में बैठे थे. सबसे आगे राजा, प्रेसिडेंट और जादूज, उनके पीछे बड़ी राजकुमारी, राजकुमार और सेक्रेट्री, और सबसे  पीछे मेजर और सेनापति बैठे हुए थे. सेनापति को चंद्रा को आगे बिठाए जाने से जलन हो रही थी. हो भी क्यों ना आखिर वो महाराणा ‘प्रताप’.... सॉरी ‘भारताप सिंह’ जी के बजीर का पौता जो ठहरा और उसे चंद्रा के पीछे बैठना पड़ रहा था.
“जवान रह गए कहां, हम हैं यहां.” राजा, चंद्रा के कंधों पर हाथ रखकर कविता भरे अंदाज़ में कहता है.
           चंद्रा हाथ जोड़कर राजा और सभी ‘लिल्ली’ निवासियों का धन्यवाद करता है और अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है. अब राजा उठता है और अपनी प्रजा को सम्बोधित करता है:
“‘लिल्ली’ की प्यारी जनता, स्वीकारो हमारा...‘यार’.” राजा शायद गलती से अधुरा शब्द कह गया था.
“प्यार....प....प.” राजा, शायद ‘प्यार’ कहना चाहता था जिसे प्रेसिडेंट धीरे से बोलकर ठीक करवाने की कोशिश करता है.
“प.......” राजा भी अपने कंधों और पैरों को उचकाते हुए नकल करता है. पर शायद नकल के लिए अक्ल की बात सही ही कही गई है.
           अब स्टेडियम में बहुत सी धीमी हंसियां सुनाई देने लगी थीं. इस पर राजा बात को घुमाता हुआ लिल्लीपुट के इतिहास, उसकी प्रजा और चंद्रा की चर्चा करता हुआ सभी का धन्यावाद करते हुए समारौह को शुरू करने का आदेश देता है. तभी आतिशबाजी शुरू हो जाती है और पहले पटाखे के फटते ही राजा चौंककर बेहोश हो जाता है.
           खूब सारी तालियों और पटाखों के बीच लिल्लीपुट के इतिहास, संस्कृति, मुख्य इमारतों की झांकीयां आनी शुरू हो जाती हैं. झांकियां एक चक्कर लगाने के बाद स्टेडियम से बाहर निकल जाती थीं. झांकीयों में कई आदम कद के बुत भी थे. राजा बड़े ही गर्व के साथ सभी बुतों का ब्यौरा चंद्रा को बयां कर रहा था जिनमें लिल्लीपुट के संस्थापकों से लेकर मौजूदा महान हस्तियों के बुत भी थे. तालियों की गड़गड़ाहट से इन बुतों की प्रसिद्धी का पता लगाया जा सकता था. तभी गम्भीर मुद्रा में खड़े, हाथों में लम्बा दंड लिए एक बुत का प्रवेश होता है. वो जादूज जैसा लिब्बास पहने लग

रहा था. उस बुत के आगे कुछ घरों के मॉडल टूटे हुए दिख रहे थे और पीछे शानदार महल का प्रतिरूप बना हुआ था. इस बुत के प्रवेश के साथ ही पुरे स्टेडियम में सन्नाटा छा जाता है. पूछने पर राजा, चंद्रा को इस झांकी का इतिहास ‘मर्यान्सव’ नाम के बजीर से जुड़ा हुआ बताता है.
           तभी ‘लिल्ली’ खेलों की निर्णायक प्रतियोगिताएं भी शुरू हो जाती हैं. दोड़ से लेकर कूद तक, हर प्रकार के खेलों के प्रतियोगी अपना बेजोड़ प्रदर्शन कर सभी का मन मोह लेते हैं. इस बार की कुश्ती प्रतियोगिता में सुपर्णा फिर से अपनी ‘पार्टी’ हार जाती है क्योंकि उसका भाई बलवेन फिर से जीत चुका था. ट्रेनों को झंडियाँ दिखाने के साथ-साथ वो कुश्ती में भी अपने झंडे गाढ़ रहा था.
           इन सभी खेलों के बीच लिल्लीपुट के एक मनोरंजक खेल ‘मुर्गबोन’ की शुरुआत होती है. इसमें छे-छे की दो टीमों में कुल बारह खिलाड़ी थे. इनमें से एक मुर्गे की पौशाक में और एक खिलाड़ी एक बड़ा सा बिना धार का भारी-भरकम खंजर लिए खड़ा था जिसने किसी कसाई के नकली खून से सने कपड़े पहने हुए थे. बाकी के चार खिलाड़ी भूरे रंग की पौशाक में एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े थे. सामने सफेद रंग में विरोधी टीम खड़ी थी. सभी प्रतियोगी, मुर्गे की आवाज़ जैसा भोंपू बजने के साथ ही मैदान के दोनों और बने पिंजरों की और चले जाते हैं. चार-चार सदस्यों को छोड़कर दोनों टीमों के ‘मुर्गे’ पिंजरों के अंदर और ‘कसाई’ विरोधी टीम के पिंजरों के बाहर जाकर बैठ जाते हैं. अब एक बार फिर से मुर्गे की बांग सुनाई देती है और स्टेडियम की दोनों और से भूरे और सफेद रंग के बीस असली हट्टे-कट्टे मुर्गे निकलकर इधर-उधर दोड़ते हुए उछल-कूद करने लगते हैं.
           सफेद रंग के चार सदस्य हाथों का घेरा बनाकर भूरे मुर्गों को अपने पिंजरों की और भगाना शुरू कर देते हैं और भूरे सदस्य सफेद मुर्गों को. उन चुस्त मुर्गों को पकड़ पाना मुश्किल और मिट्टी में रंगे जाने वाला काम था. मुर्गों और उन आठ पकड़ने वाले प्रतियोगियों की गिरती-पड़ती उछल-कूद से सारा स्टेडियम हंसी के ठहाकों से गूंज रहा था. तभी पांच मिनट के खेल के बाद एक बार फिर से मुर्गे की बांग सुनाई देती है. इसके साथ ही पिंजरे में बंद नकली ‘मुर्गा’ और ‘कसाई’ सक्रिय हो जाते हैं. नकली मुर्गे विरोधी पक्ष के पिंजरों की और भागते हैं और कसाई उनके पीछे. पिंजरे का फाटक खोलते ही सफेद नकली मुर्गा पकड़े गए भूरे मुर्गों को हवा में उछाल-उछालकर आज़ाद करने लगता है. तभी उसके पीछे मोटा कसाई वहां पहुंच जाता है और नकली मुर्गे को अपने भारी चाक़ू से मारने की कोशिश करता है. लेकिन मुर्गा वहां से भाग जाता है और कसाई उसके पीछे पड़ जाता है.
           दूसरी और भूरा मुर्गा भी पकड़े गए सफेद मुर्गों को हवा में उछाल-उछलकर आज़ाद कर रहा था कि वहां विरोधी टीम का कसाई पहुंच जाता है. थोड़ा पीछा करने के बाद कसाई लड़खड़ाए नकली भूरे मुर्गे के सिर पर अपना भारी चाकू दे मारता है जिससे नकली मुर्गे का सिर धड़ से अलग होकर गिर जाता है. अब स्टेडियम में हंसी के ठहाके और भी जोरों से गूंजने लगते हैं. बेचारा सिर कटा मुर्गा अपना सिर उठाकर अपने पिंजरे में जाकर बैठ जाता है. इसी तरह बीस मिनट तक चले इस खेल में असली मुर्गे पिंजरों में बंद किये जाते हैं और पौशाक पहने नकली मुर्गे, कसाई से बचते-बचाते, उन्हें आज़ाद करते रहते हैं. अंत में पिंजरों में कैद मुर्गों की गिनती से भूरी टीम विजेता घोषित कर दी जाती है.
     कुछ समय बाद रंगारंग कार्यक्रम शुरू हो जाता है. राजा तालियां बजाकर इन सभी का अभिवादन करता है. सभी इन कार्यक्रमों का बड़ा ही आनंद उठाते हैं, चंद्रा को छोडकर. वो इस भीड़ में लैपटॉप के जरिये जंगलियों के सरदार को ढूंडने के लिए पुरे स्टेडियम को खंगाल रहा था, जो एक मुश्किल काम था. राजा के पूछने पर चंद्रा लैपटॉप के जरिये समारौह की व्यवस्था जांचने का बहाना बना देता है. अब चंद्रा सेनापति, मेजर, सूबेदार, सिपाही, डोंजा और घोंजा राम की अपनी पूरी टीम को अपने लैपटॉप और वायरलेस के जरिये निर्देशित करता है. वो इस बात का भी ध्यान रखता है कि उसके बात करते वक्त होंठ न हिलें क्योंकि शायद भीड़ में बैठा सरदार भी उसे देख ही रहा था.

           इसी बीच स्टेडियम के बीचों बीच-एक मंच तैयार किया जाता है और मशहूर ‘ओर्केस्ट्रा’ ‘लिल्लीयंस’ अपना कार्यक्रम पेश करना शुरू कर देता है. उनके आते ही स्टेडियम तालियों और हुंकारों से गूंज उठा था. उनकी धुनें काफी लोकप्रिय और मनमोहक लग रही थीं. सभी दर्शक तो अपनी-अपनी जगहों पर नाचने लगे थे. तभी ओर्केस्ट्रा का मुख्य गायक सुपर्णा को मंच पर आने के लिए कहता है. बार-बार नाम पुकारे जाने के बाद सुपर्णा मंच पर पहुंच जाती है और अपनी मधुर आवाज़ में उस ओर्केस्ट्रा की जुगलबंदी के साथ एक खूबसूरत कार्यक्रम पेश करती है.
                                  “खुशियों से भरी ये जमीन, नहीं है किसी की कमी
                  हम हैं खुशियों भरे 
           इस मनोरंजक गाने के दौरान कई रंग-बिरंगे कपड़े पहने बौने ग्रुप डांस पेश करते हैं और पूरे स्टेडियम का माहौल एकसार खुशियों भरा हो जाता है. हर कोई गाने को साथ-साथ गुनगुनाने और साथ-साथ नाचने की कोशिश कर रहा था.
           दूसरी और कार्यक्रम देने वालों के कपड़ों में चंद्रा की टीम एक यौजना के तहत मुख्य प्रवेश दुआर की और भागती है और सीधे ही वहां सादे कपड़ों में खड़े तीन जंगलियों के पास से गुजरते हुए उनपर ‘सटनगंस’ से हमला कर देती है. बेचारे जंगलियों को समझने का मौका ही नही मिल पता और वे झटके खाते हुए नीचे गिर जाते हैं. किसी को भी इस घटना की कानों-कान खबर भी नहीं हो पाती. अब चंद्रा अपनी टीम को दो हिस्सों में बंटने और दो दिशाओं में जाने के निर्देश देता है. पहली ‘A’ टीम में सेनापति व उसके सैनिक और ‘B’ टीम में मेजर और उसके फौजी रहते हैं.
“आज विजय हमारा ही होगा, हम दुश्मनों को आटे में घुन की तरह पीश डालेगा, क्यों प्रताप जी.” मेजर सभी का होंसला बढ़ाते हुआ राणा जी से कहता है.
“प्रताप....नहीं, भ्रताप.” राणा जी अपने कानो को छूकर कहते हुए अपना सीना चौड़ा कर लेता है.
“समय नहीं है, हर्री अप” सबके कानों में चंद्रा की आवाज़ गूंजती है और सभी अपनी-अपनी दिशाओं में चले जाते हैं.
           चंद्रा लैपटॉप में जंगलियों की पहचान कर उनकी स्थिति के बारे में अपनी टीम को बताता रहता है जिससे सभी को बारी-बारी से बंदी बना लिया जाता है. लेकिन किसी को भी बमों का नामों-निशान तक नहीं मिल पाता. अब चंद्रा परेशान होने लगा था. पुरूस्कार वितरण का समय नजदीक आता जा रहा था. इसी दौरान जैसे ही कबीले की मूर्ती निकाली जानी थी, जंगलियों द्वारा आक्रमण किया जाना था. चूंकि अब सभी कबीलियाई बंदी बनाए जा चुके थे, ऐसी स्थिति में सरदार शंका कर किसी भी अनहोनी को दावत दे सकता था. अब समय आ चुका था. मंच के ऊपर पंजाबी ढोल-नगाड़ों की गोलियों सी तेज तड़तड़ाहट के बीच एक चबूतरे पर से गहरे भूरे रंग की लकड़ी की एक आदम रूप की मूर्ती निकलती है. उसका पहनावा कबीले जैसा ही था. उसने अपने हाथों में कमान पकड़ी हुई थी जिसमें तीर कसा हुआ था और तीर के बलेड की जगह पर चमकता ‘नगीना’ जड़ा हुआ था. उसकी आंखें आस्मां को घूर रही थीं जैसे उस तीर से उसी का सीना फाड़ देने का इरादा रखती हों. वो मूर्ति कला का बेजौड़ नमूना लग रही थी.
           पुरूस्कार बंटने शुरू हो जाते हैं. सभी मंच पर अपना पुरूस्कार लेने के लिए आ-जा रहे थे. सुपर्णा का नाम मंच से पुकारा जाता है. अपनी मां के थोड़े से विरोध के बाद वो मंच पर जाकर अपना पुरूस्कार लेती है और परेशान चंद्रा को देखती हुई चली जाती है. चंद्रा ने सुपर्णा और उसकी मां के बीच हुई इस छोटी सी खींचतान को देखा था लेकिन परेशानी में होने के कारण इसपर ज्यादा ध्यान नहीं दे पाया था. अब बलवेन अपना पुरुस्कार लेते हुए चंद्रा की और घूरे जा रहा था मानो वो उसे अभी कुश्ती की चुनौती देना चाहता था. लेकिन चंद्रा का ध्यान तो कहीं और व्यस्त था. इसी

बीच विजेता ‘मुर्गबोन’ टीम अपने नकली मुर्गे के साथ अपना पुरूस्कार लेने आ पहुंचती है. मुर्गे सी दिखने वाली ट्रोफी देते हुए राजा नकली मुर्गे के सिर पर एक जोर की चमाट लगाता है जिससे उसका सिर अलग होकर नीचे गिर जाता है और माहौल फिर से ठहाकों भरा हो जाता है. लेकिन चंद्रा को इस सब से कुछ भी लेना देना नहीं था वो तो अपनी ही धुन में लैपटॉप को खोजे जा रहा था.
           पुरूस्कार बंटने शुरू हो चुके थे. जंगलियों का आक्रमण ना होने की स्थिति में धमाका किसी भी वक्त हो सकता था. जंगलियों के सरदार को ढूंढ पाने में चंद्रा नाकाम रहा था. अब हजारों बौनों की जिन्दगियां खतरे में थीं. क्या इस नरसंहार को देखने के लिए ही वो इस खुशहाल दुनिया में आया था. स्टेडियम में लिल्लीपुट की अधिक्तर जनता मौजूद थी. ये स्टेडियम तो इन ‘लिल्ली’ निवासियों का शमशान और कब्रगाह दोनों ही साबित होने जा रहा था. अब चंद्रा की साँसे धीमीं-लम्बी और धड़कनें तेज हो गईं थी. वो अपनी साँसों और धड़कनों को साफ़-साफ़ सुन पा रहा था. सांय...सांय...सांय......धक..धक....धक..धक. अब वो दोनों टीमों पर लगभग चिल्ला रहा था कि कैसे भी करके बमों को ढूंडा जाए. इतने सारे लोगों की जिंदगियां दांव पर जो थीं. तभी मंच पर चंद्रा का नाम पुकारा जाता है. अपना नाम लिए जाने से चंद्रा उछल पड़ा था जैसे उसके सामने कोई बम फटा हो. राजा के नाम बार-बार पुकारे जाने और प्रेसिडेंट के पीछे से धक्का दिए जाने के बाद चंद्रा अपनी ही जगह उठ खड़ा होता है और तभी:
‘धूम्म...धड़ाम्म...धूम्म...धम्मम....ब्म्म्म...’ चंद्रा की सांसें अटक जाती है और कान सन्न रह जाते हैं. जोरदार धमाकों से पूरा स्टेडियम गूंज उठता है. उसके आगे रोशनियां नाचने लगती हैं. वो धक्क सा खड़ा रह जाता है. फिर खालीपन और कुछ नहीं. क्या अनहोनी घट चुकी थी? इतने लोगों का क्या हुआ था? चंद्रा को जैसे दिखना और सुनना ही बंद हो चुका था. तभी सन्न खड़े चंद्रा के कंधों पर किसी का हाथ पड़ता है.
“जाओ..आगे जाओ, तुम इसके हकदार हो.” प्रेसिडेंट उसे आगे धकेल रहा था.
           चंद्रा को होश आती है तो देखता है वहां तेज आतिशबाजियां हो रही थीं और लिल्लीपुट की धुन बज रही थी. यह सब उसके सम्मान में हो रहा था. चंद्रा आगे बढ़ता है और अपना परुस्कार वो मूर्ती, राजा के हाथों से पाता है. अब तो तालियों की गड़गड़ाहट और भी तेज हो जाती है और पटाखे फटते रहते हैं. सुपर्णा भी तालियां बजाकर चंद्रा के प्रति अपनी भावनाओं का इजहार करती है. सन्न और हैरान खड़े चंद्रा को कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. तालियों की आवाजें उसे तेज बारिश जैसी और बीच-बीच में फटते पटाखे बादलों की गड़गड़ाहट जैसे सुनाई दे रहे थे.
           समारौह बड़े ही हर्षोल्लास के साथ खत्म होता है और सभी दर्शक हर्षोल्लास के साथ स्टेडियम को खाली करना शुरू कर देते हैं. अभी ‘लिल्ली’ वासियों के रात का जश्न बाकी था. तभी ना जाने राजा को क्या हुआ था कि वो एकबार फिर से ‘महारानी-महारानी’ चिल्लाने लगा था. वो भीड़ की और किसी को देखते हुए इतना उतावला हुआ जा रहा था कि मंच पर से कूदने जैसी हरकत करने लगा था. सभी उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं. तभी राजा, जादूज से किसी लड़की के साथ वाली औरत को रोकने के लिए कहता है. इस पर जादूज अपने दण्ड को राजा के चेहरे के सामने से गुजारने जैसी कोई संदेहास्पद हरकत करता है जिसके बाद राजा तुरंत ही बेहोश हो जाता है. चंद्रा इस हरकत को देख लेता है. लेकिन चंद्रा का ध्यान अभी भी कहीं और ही था. चंद्रा अभी भी असमंजस में था कि आखिर हुआ क्या था. बम तो फटे ही नहीं. थोड़ी ही देर में दोनों टीमें चंद्रा के पास आ जाती है और सभी इस बारे में बात करने लगते हैं.
“इस गधेड़े ने म्हारे को उल्लू तो नहीं बनाया?” राणा जी कहता है.
“इशका कोई जरूरत नाही” मेजर राणा जी की चुटकी लेता है.
“के मतबल..” राणा जी पूछता है.

“उशी शे पूछो” मेजर बात टालते हुए चंद्रा की और इशारा करते हुए कहता है. लेकिन हम सब तो समझ गए कि उसका ‘के मतलब’ था.
           अब सभी चंद्रा के चेहरे की और देख रहे थे और चंद्रा जंगल की और मुंह करके खामौश खड़ा हुआ था. उसके दिमाग में कुछ तो चल रहा था. शाम घिरी और चंद्रा अपनी टीम के साथ जंगल की और जा रहा था.                                                                            उसके हाथों में एक थैला और साथ वे बंधक जंगली थे. कुल मिलाकर दस जंगली होंगे. जंगलों के बाहर आकर चंद्रा रुक जाता है और अपनी टीम को वापिस महल जाने के लिए कहता है. इस पर मेजर उसे अकेले जंगलियों से खतरा होने की बात कहता है.
“मेजर साहब क्या आपको लगता है कि सरदार के इन सभी साथियों के बंधा होने के बाद, अपने कुछ आध बचे साथियों के साथ वो मेरा कुछ कर पाएगा.” चंद्रा, मेजर साहब को उसकी काँखों से उठाकर अपने मुंह के सामने लाकर गम्भीरता से कहता है.
           अपने आपको इस तरह से उठा लिए जाने पर मेजर कुछ हद तक समझ जाता है कि वो किससे क्या कह रहा था और अपना सिर झुका लेता है. चंद्रा उन सब से तगड़ा था. वो तो चंद्रा ही उन सब से इतनी सौम्यता से मिलता था कि वे सब भूल ही जाते थे कि चंद्रा उन जैसा और उनकी दुनिया का है ही नहीं. अब सभी चंद्रा को बंधकों के साथ घने जंगल के मुहाने पर छोड़कर चले जाते हैं.
           चंद्रा उन बंधकों को लेकर पेड़ों की बस्ती की और चल देता है. उन घने ऊंचे पेड़ों से होते हुए चंद्रा को फिर से सर्रसर्राहटें सुनाई देती हैं. एक बंधक जंगली चंद्रा को रात के समय जंगल के इस हिस्से में पेड़ों के बीच छिपे किसी खतरे की बात कहता हुआ सभी जंगलियों को खोल देने के लिए कहता है. लेकिन चंद्रा उसकी बात ना सुनते हुए आगे बढ़ता रहता है. एक तेज सर्रसर्राहट चंद्रा को चौंका देती है. मुड़कर देखने पर वो तीन बंधकों को पेड़ों की लटकती बेलों में उलझा हुआ पाता है. बाकी के बंधक खोले जाने के लिए छटपटा रहे थे. बिना देर किये चंद्रा बाकी के सभी बंधकों को खोल देता है. अब सभी मिलकर उन तीन जंगलियों को छुड़ा लेते हैं और तेजी के साथ बस्ती की दिशा में भागते हैं. बस्ती के पेड़ों की पत्तीदार छत के नीचे पहुंचकर चंद्रा, सरदार को पुकारता है.
           इतने में उसके इर्दगिर्द पत्थरों वाले तीर रस्सियों से बंधे हुए गिरते हैं और उसे बांध लेते हैं. खुद को बंधा देख चंद्रा मुस्कुरा देता है. अगले ही पल वो सरदार के सामने एक वृक्ष-गृह में था. इससे पहले की चंद्रा कुछ पूछ पाता सरदार उसे उसके बीच में टांग अड़ाने के लिए मन भरकर कोसता है. वो उसे मूर्ती के उनकी विरासत होने की बात करता है जो ‘मर्यान्सव’ नाम के एक लालची वजीर ने उनसे बलपूर्वक छीन ली थी. अब चंद्रा उससे इसका कारण पूछता है तो सरदार बताता है कि जब राजा के दादा ‘रादा सिंह’ ने अपने बजीर के भड़काने पर ‘नगीने’ को राष्ट्रीय सम्पदा घोषित किया तो उनकी नजर उनके कबीले की भव्य मूर्ती पर भी टिक गई थी. इसके तीर पर खनिकों द्वारा उपहार में मिला एक ‘नगीना’ लगाया गया था जो बहुत ही खूबसूरत दिखता था. बस यही नगीना इस मूर्ती के गले की हड्डी बन गया.
           सरदार, चंद्रा को बताता है कि पहले उनका कबीला इन्ही जंगलों में जमीन पर बसा हुआ था. लेकिन जब मूर्ती को जब्त करने की कोशिश की गई तो तब के मुखिया ने इसका विरोध किया. लालची बजीर ने सारी बस्ती ही उजाड़ डाली. बहुत से कबीलियाई बंधक बना लिए गए. बेचारे नगीने के खोजी खनिक तो पूरी तरह से विलुप्त ही हो गए. किसी भी कबीले वासी को देखते ही बंधक बना लिया जाता था. बहुत भयावह दिन थे वे. कबीले वासियों को मजबूरन पेड़ों में शरण लेनी पड़ी और वे तब से यहीं पर है.


“अब भी डर रहता है. सैनिक कम कर राजा का पिता कहता है, इससे समस्या होगी दूर, दादा...और राजा...है दोनों बुधि से मजबूर.” सरदार यह कहता हुआ रौंदा सा हो जाता है कि आज उन्हें अपनी विरासत पाने का अच्छा मौका मिला था जिससे चंद्रा ने गोबर कर डाला. चंद्रा के दिमाग में अभी भी एक ही चीज़ मंडरा रही थी जिसकी वजह से वो लगभग अधमरा ही हो गया था “.....कि आखिर बम क्यों नहीं फटा...”
“नही था कोई बम, झूठ कहे थे हम. अपने थे सब लोग, कैसे सकते थे इस पाप को भोग.” सरदार हताश होते हुए कहता है. लेकिन वो चंद्रा का उसके साथी वापिस रिहा कर देने के लिए शुक्रिया भी अदा करता है और उसे वहां से चले जाने के लिए कहता है.
“ऐसे तो नहीं जाऊंगा.” चंद्रा खड़े होते हुए कहता है. सरदार उसे हैरानी से देखने लगता है.
           चंद्रा साथ लाए थैले में से कुछ निकालने लगता है. सरदार डरा सा उस और झांकने लगता है. जैसे ही वो चीज़ पूरी तरह से बाहर आती है, उसकी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं और भर आती हैं. जिसके लिए इतनी कुर्बानियां दे डाली गईं, अपना घर बार सब छोड़ना पड़ा, वो यही तो था. जिसके लिए वो बचपन से अपने पिता से शिक्षा लेते आया था कि वो उसके कबीले का गौरव था. आज सरदार उसे पहली बार अपने हाथों में पकड़ता है और लगभग रोने लगता है. उसके पास चंद्रा का धन्यवाद करने के लिए शब्द ही नहीं थे. चंद्रा, सरदार से महल को बक्श देने की विनती करता है और खुद भी उन्हें आश्वस्त करता है कि अब उन्हें भी पेड़ों पर रहने की जरूरत नहीं.
“रहें न रहें, उनसे दूर रहें..ये कोशिश करें. काम है उनके, पर कहते हमें. धंदा है ये गोरख, ये है हम जंगलियों का गौरव.” सरदार भी ख़ुशी से भरा हुआ मुर्ति को ऊपर आकाश की और उठाकर कहता है. जंगलियों की हुंकारें रात के सन्नाटे के बीच ‘लिल्ली’ शहर तक सुनी जा सकती थीं. लेकिन वहां खड़े चंद्रा का ध्यान, अब किसी और चीज़ की और था.
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pg no 81

 


MONTH’8ght’ MARCH
बिछड़ों का मिलन
होली के रंगों के साथ
                             वार्षिकोत्सव बीते पूरा हफ्ता बीत चुका था. लेकिन लिल्लीपुट में खुशियां जैसी की तैसी ही थीं. रेश्ना के लिए टूटे अपने मन को छोड़कर चंद्रा के मन में एक और बात थी जो उसे सताए जा रही थी. वो थी वार्षिकोत्सव के दौरान हुई राजा के बेहोश होने की घटना. हालांकि राजा की एक कमजोरी तो थी जिस कारण वो किसी भी चौंका देने वाली घटना पर एकाएक ही बेहोश हो जाया करता था. लेकिन ना जाने चंद्रा को ऐसा क्यों लग रहा था कि उस दिन राजा को जानबूझकर बेहोश किया गया था. हो सकता है चंद्रा का शक गलत हो लेकिन चंद्रा इस बात का कारण जानने को बेताब था कि जादूज ने ऐसा क्यों किया था? लेकिन क्या इस तरह से सीधे उस पर शक करना क्या सही रहेगा? यही सोच-सोचकर चंद्रा जादूज से अपना जवाब पाने में असमर्थ रहा था.
           चंद्रा हर बार की ही तरह लिल्लीपुट घूमने निकला था लिल्लीपुट आते हुए उसे सात महीने हो चुके थे लेकिन वो अभी भी लिल्लीपुट को सही ढंग से देख नहीं पाया था. गांव दर्शन के दौरान चंद्रा को एक अजीब सा दृश्य देखने को मिलता है. सेनापति राणा जी फिर से सुपर्णा के चक्कर में उसके घर के बाहर चक्कर काट रहा था. तभी सुपर्णा की मां बाहर आकर उसे डांटने लगती है:
“आप अपनी हद से आगे बढ़ रहे हैं. अपनी हैसियत में रहिये सेनापति जी. आपके लिए उचित होगा.” सुपर्णा की मां गुस्से में सेनापति राणा जी को डांटते हुए कहती है.
“अब तू म्हारे णे हैसियत दिखावेगी. एक स्टेशन मास्टर की मां होकर इतणा गुरुर कि एक सेणापति णे उसकी औकात दिखावे है. म्हारे से घणो वर थारे को कोई मिले भी ना है सोच ले बुढ़िया.” कहते हुए राणा जी सुपर्णा की मां को पीछे धक्का देते हुए अपने घोड़े को दौड़ा देता है.
           अब सुपर्णा की मां कुछ परेशान दिख रही थी. अपने घर को बंद करके वो शहर की और चल देती है. उसने एक लम्बा घूंघट ओढ़ रखा था. शहर के गेट पर उन घूरती निगाहों को पार करती हुई वो सीधे ही जा पहुंचती है जादूज के घर. चंद्रा का शक तब कुछ और जोर पकड़ लेता है जब सुपर्णा की मां जादूज के घर के दरवाजे को अपना नाम बताकर खोल लेती है. चंद्रा ये सब चुप-चाप देखता रहता है. कुछ देर के बाद घर का दरवाजा खुलता है और जादूज, सुपर्णा की मां को दरवाजे तक छोड़ने आता है. सुपर्णा की मां तेज कदमों के साथ शहर से बाहर की और चली जाती है. अब चंद्रा जादूज के सामने था.
“हमारे पास ऊपर वाले की दी काफी विद्याएं हैं जिनका उपयोग हर कोई अपने कष्ट निवारण के लिए करवाना चाहता है. इसमें कोई नई बात तो नही.” जादूज बड़ी ही सहजता से जवाब देता है.
“मैने देखा है, जो भी हुआ सुपर्णा की माता के साथ. उन्होंने सेनापति को हैसियत में रहने की नसीहत दे डाली. वो किसे और किसकी हैसियत दिखा रहीं थीं?” चंद्रा उत्सुकता के साथ पूछता है.
“गर कोई अपनी मर्यादा लांघे तो उसे अपनी सीमाओं का ज्ञान होना आवश्यक है. आप चिंता ना कीजिये आज के बाद ऐसा कभी ना होगा.” जादूज बात को टाल देने की कोशिश में लगा था, लेकिन बड़ी ही सहजता के साथ.
“आप जानते हैं मैं किस बारे में बात कर रहा हूं. मैने समारौह के दौरान भी देखा था. महारानी को देखने के धौखे में

महाराज इससे पहले तो बेहोश नहीं हुए थे. आखिर बात क्या है?” चंद्रा उत्सुकता के साथ देखते हुए पूछता है.
“कुछ राज, राज बने रहें तो ही उचित है. चलिए महल की और चलते हैं.” कहते हुए जादूज महल की और चला जाता है.
           चंद्रा इस कश-मकश को खत्म नहीं कर पा रहा था और सुपर्णा की मां से पूछने की उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी. सुपर्णा की चंद्रा के साथ नजदीकी उसे भाती जो नहीं थी.
           इसी तरह कुछ दिन और दिन बीत जाते हैं. लगभग हर शाम, एक-आध घंटों के लिए वो लिल्लीपुट में आ जाता और फिर अंधेरा घिरने से पहले वापिस चला जाता. एक दिन लिल्लीपुट महल के एक हवादार और पर्दों से ढके गलियारे में घूमते हुए चंद्रा एक बड़े से दरवाजे के सामने पहुंचता है. चंद्रा उसे खोलने की कोशिश करता है लेकिन वो जाम सा लग रहा था. बहुत सी कोशिशें करने के बाद चंद्रा, डोंजा खान और घोंजा राम के पास पहुंचकर उस दरवाजे के बारे में पूछता है. दोनों उसे उस और ना जाने की नसीहत दे डालते हैं क्योंकि वो महारानी का कमरा था जो राजा के आदेश के बाद बंद रहता था और किसी को भी अंदर जाने की इजाजत नहीं थी.
           अब चंद्रा को, सुपर्णा की मां और महल के बीच की कड़ी को ढूंढने का रास्ता मिल गया था. बहुत समय उस गलियारे में बिताने के बाद उसे ये एहसास हो जाता है कि उस कमरे में घुस पाने का और कोई भी रास्ता नहीं था. सिवा खुद राजा, रानी और जादूज के. लेकिन चंद्रा जादूज की कही बात को नजर अंदाज नहीं करना चाहता था. सो वो सीधा हमला ना कर कोई और रास्ता अपनाना चाहता था जिससे कि सांप भी मर जाता और लाठी भी नहीं टूटती. इसी उधेड़-बुन में चंद्रा अपने कमरे में इधर से उधर चक्कर काट रहा था कि उसके पास अचानक जादूज आ जाता है और अपनी मुश्किल का हल राजा के पास ढूंढने की सलाह देता है. राजा के कमरे की और जाते हुए चंद्रा को राणा जी मिलता है और पूछने पर बताता है कि राजा अभी राजकुमार के पास है.
           अब चंद्रा वापिस मुड़कर राजकुमार के पास जाने लगता है कि तभी उसे राजा के पुकारने की आवाज़ आती है. मुड़कर देखने पर वो राजा ही था जो उसकी और आ रहा था. अब दोनों राजा के कमरे की और बढ़ जाते हैं. कमरे में पहुंचकर राजा यहां-वहां की बातें शुरू कर देता है. चंद्रा शायद पहली बार राजा के कमरे में गया था. उसका कमरा बड़ा, हवादार और कलाकृतियों से सजा पड़ा था. दीवारों पर कई तस्वीरें लटकी हुई थीं. बातें करते हुए राजा एक तस्वीर की और बार-बार जा रहा था जिसमें राजा के साथ एक औरत खड़ी थी. लेकिन चंद्रा का ध्यान राजा की बातों की और ही था. कुछ देर के बाद राजा उस तस्वीर के पास जाकर खड़ा हो जाता है जिससे चंद्रा का ध्यान उस तस्वीर की और जाता है. तस्वीर को देखते ही चंद्रा के दिमाग में मानो कई बिजली की तारें दोड़ जाती हैं. चंद्रा एकाएक उठकर राजा से विदा लेकर कमरे से बाहर चला जाता है. चंद्रा के इस तरह से उठकर चले जाने पर राजा के चेहरे पर हैरानी की जगह हल्की सी मुस्कान थी.
           लिल्लीपुट में तेज सीटी मारती हवाएं चलनी शुरू हो गई थीं. अब चंद्रा एक बार फिर से जादूज के सामने था. रात के ग्यारह बजे होंगे. जादूज हैरान नहीं था. चेहरे पर वही जाने पहचाने गम्भीरता भरे भाव थे.
“बताइए! इतनी रात को क्या देख लिया आपने जो यहां आना हुआ?”
“वही जो आप मुझे नहीं दिखाना चाहते थे. आपका उन दोनों को अलग रखने के पीछे मकसद क्या है.” चंद्रा के चेहरे पर अनगिनत सवाल उमड़ रहे थे.
“हम वचनबद्ध हैं कि इसका भेद किसी को ना बताएं. उनकी इच्छा का ही पालन कर रहे हैं हम.” जादूज बड़ी ही सहजता से जवाब दे रहा था.

“एक पति-पत्नी के बीच काफी मतभेद होते हैं लेकिन इसका यह तो मतलब नहीं कि उन्हें अलग ही कर दिया जाए. एक बेटी को उसके पिता और एक बेटे को मां से दूर कर दिया जाए, उनके हक से दूर कर दिया जाए. ये कहां तक सही है?” चंद्रा का मन जादूज को दोषी ठहरा रहा था.
“हम तो केवल आज्ञा का पालन कर रहे हैं और अपने वचन के विरुद्ध नहीं जा सकते. हां!...आपसे कुछ उम्मीदें रखते हैं.” कहकर जादूज घर के अंदर चला जाता है.
           हवा अभी भी तेज बह रही थी और चंद्रा के मन में विचारों की लहरें भी. क्या और कैसे किया जाए जो राजा और रानी दोनों फिर से एक हो जाएं. बेचारी सुपर्णा को उसका पिता मिल जाए और लिल्लीपुट को उनकी महारानी. इसी उधेड़ बुन में वो महल के अपने कमरे में चला जाता है. अगले दिन चंद्रा अपनी दुनिया में जाकर ऑफिस से छुट्टी के बाद शाम को फिर से लिल्लीपुट में दाखिल हो जाता है. अब उसके दिमाग में एक ही बात चल रही थी कि कैसे ये राज खोला जाए कि सुपर्णा एक राजकुमारी है. लिल्लीपुट के अपने कमरे में लेटे-लेटे उसके मन में यही उधेड़-बुन चल रही थी कि तभी उसे पर्दों के पीछे कुछ हिलता हुआ नजर आता है. एक बार अनदेखा कर देने के बाद पर्दे जब दुबारा से हरकत करते हैं तो चंद्रा सोचता है कि कहीं खनिकों का वो छोटा बच्चा तो नहीं रात को उसके कमरे में आ गया? सोचकर वो पर्दों के पास जाकर उन्हें जैसे ही हटाता है उसे सुपर्णा की मां वहां खड़ी नजर आती है. चंद्रा डर के मारे एक झटके के साथ पीछे हट जाता है.
“डर क्यों रहे हो. तुम तो चाहते ही थे ना कि मैं तुम्हारी मुश्किल हल करूं. लो मैं आ गई.” सुपर्णा की मां बिना किसी भाव के कहती है.              
“आ..आप यहां, इतनी रात गए, कैसे?” चंद्रा के चेहरे पर हैरानी के मिले-जुले भाव थे. बात सही भी थी, सुपर्णा की मां चंद्रा के कमरे में बिना दरवाजे का इस्तेमाल किये कैसे आ सकती थी. मगर लिल्लीपुट में कुछ भी हो सकता था.
“कहां से आई, कैसे आई? इसे छोड़िये काम से मतलब रखिये बस. आपकी पहेली का हल हमारे पास है. हमारे पास क्या, हल ही हम हैं.” कहते हुए सुपर्णा की मां चलते हुए खम्बे के पीछे चली जाती है और चंद्रा उसे हैरानी से देखता रहता है.
“या हम...” हैरानी की बात थी सुपर्णा की मां जैसे ही खम्बे के पीछे से निकली थी उसकी काया पलट चुकी थी. वो अब जादूज में बदल चुकी थी.
“या हम.....” एक और खम्बे के पीछे से गुजरने पर वो जादूज से राजा के रूप में बदल चुकी थी.
“कौन हैं आप सीधे-सीधे सामने आइये वरना मैं पहरेदारों को बुला लूंगा.” डरते हुए चंद्रा चींखता है.
“’ओ’...’हो’ अपने तो हमे डरा ही दिया. लीजिये हम सामने आ ही जाते हैं. कहीं पहरे...दार ना आ जाएं” कहते हुए राजा रूपी वो भेसधारी चंद्रा की और धीरे-धीरे बढ़ने लगता है.
           उसकी काया अब धीरे-धीरे सफेद पड़ने लगती है और सफेद होते-होते पूरी तरह से सफेद हो जाती है. अब चंद्रा के सामने एक पूरी तरह से सफेद भूतिया आकृति थी. अपना परिचय देते हुए वो अपना नाम ‘भूतिया उर्फ़ छ्लेडा’ बताता है जिसे ये नाम लिल्लीपुट के निवासियों ने ही दिया था. उसे रूप बदल कर लोगों को डराना और चौंकाना बेहद पसंद था. वो बताता है कि उसकी उम्र डेढ़ सौ साल है और वह जादूज का बड़ा ही अच्छा दोस्त है. उसके ‘भूत’ बनने का कारण पूछने पर वो बताता है कि उसकी इस हालत का कारण पहाड़ी पर रहने वाली ‘संरागिनी’ नाम की एक जादूगरनी है. उसी के साथ हुई एक झड़प के दौरान उसके सर्पों के काटने से उसकी ये हालत हुई थी. चंद्रा जब भुतिया से मदद करने की विनती करता है तो पहले तो भूतिया साफ़ मना कर देता है लेकिन काफी मिन्नतें करवाने के बाद वो मान

जाता है.
           अब आधी रात बीत चुकी थी और कुछ अनचाहा राजा के कमरे में होने वाला था. उसे दरवाजे पर खटखटाहट सुनाई देती है. दरवाजा खोलने पर राजा को कोई भी दिखाई नहीं देता लेकिन गलियारे में किसी के चलने की आवाज़ सुनाई देती है. थोड़ी दूर तक पीछा करने के बाद उसे गलियारे के एक मोड़ पर रानी खड़ी दिखाई देती है. फिर क्या था, राजा रानी-रानी चिल्लाता हुआ उसके पीछे दोड़ पड़ता है. राजा, रानी का पीछा करते-करते महल से बाहर, शहर को पार करता हुआ गेट तक जा पहुंचता है. गेट खुला हुआ था और घूरने वाले दोनों पहरेदार सोए पड़े थे. अब गांव को जाने वाली पगडंडी से होते हुए, राजा सीधा ही पहुंच जाता है स्टेशन मास्टर बलवेन उर्फ़ बलवा के घर, यानी सुपर्णा के घर, यानी रानी के घर. अब रानी घर का दरवाजा खोलकर अंदर चली जाती है और दरवाजा बंद हो जाता है.
           अब राजा पगला सा जाता है और जोर-जोर से दरवाजा पीटने लगता है. शोर सुनके बलवेन दरवाजा खोलता है और सामने खड़े शख्श को देख कर हैरान रह जाता है. राजा बलवेन को धक्का देकर घर के अंदर घुस जाता है और रानी का नाम लेकर पागलों की तरह चिल्लाने लगता है. शोर सुनकर रानी और सुपर्णा कमरे से बाहर आ जाती हैं और राजा को इस तरह सामने पाकर हैरान रह जाती हैं. बस अब क्या था राजा रानी को गले लगा लेता है और जोर-जोर से रोने लगता है. रानी, राजा को झटका देकर खुद को छुड़ाती है और कमरे के अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लेती है. अब सामने हैरान-परेशान बलवेन और सुपर्णा खड़े थे.
“ये यहां कब से हैं.” राजा पागलों की तरह बलवेन से पूछता है. लेकिन बल्वेन किसी अपराधी की तरह अपना सिर झुकाकर चुपचाप खड़ा रहता है.
“हमारी ही नाक के नीचे हमारी जिन्दगी छिपी हुई थी और हम पागलों की तरह उन्हें यहां-वहां ढूंढ रहे थे. ना जाने कितना तड़पे हैं हम अपनी रानी के लिए और तुमने इन्हें यहां छिपा रखा था.” राजा पागलों की तरह कभी सुपर्णा के आगे जाता तो कभी बलवेन के सामने आकर बात कर रहा था.
“हमे क्षमा करें माहराज पर हम महारानी को दिए वचन से बंधे हुए थे जिसकी अवहेलना करना हमारे सामर्थ्य में नहीं था.” बलवेन सिर झुकाकर धीरे से कहता है.
“कौन सी महारानी, कौन सा वचन भईया और महाराज मां के बारे में क्या कह रहे हैं.” सुपर्णा परेशान सी चिल्लाती हुई बलवेन को झंझोड़कर पूछती है.
“मां..? आप हमारी बेटी हैं. महारानी की पुत्री...” कहते हुए राजा सुपर्णा को लपककर अपने सीने से लगा लेता है.
           सुपर्णा खुद को राजा से अलग करती है तो राजा सुपर्णा को तीस साल पहले उसके और रानी के बीच ‘आयाम अतीन्द्रिय’ यज्ञ के कारण हुए एक झगड़े की बात बताता है. जिसकी वजह से रानी महल छौड़कर कहीं चली गई थी. तब वो गर्भवती भी थी. बलवेन के हामी भरने पर ही सुपर्णा राजा की बात का विश्वास करती है और अपनी मां को कमरे से बाहर आने के लिए कहती है. बहुत मनाने के बाद ही रानी बाहर आती है. अब सब शान्ति से बैठकर घंटों तक बात करते रहते हैं जिससे माहौल कुछ शांत हो जाता है.
           तब तक राजा के शोर से पूरे गांव को ये खबर मिल चुकी थी कि राजा आधी रात को गांव आया था और गांव से होती हुई ये खबर महल तक जा पहुंची थी. बलवेन के घर के बाहर लोगों का जमावड़ा लग चुका था और महल के पहरेदार, सेनापति, राजकुमार, राजकुमारी और जादूज भी वहां पहुंच चुके थे. सुबह हो चली थी और रानी लाख मिन्नतें करने के बाद भी महल चलने को तैयार नहीं थी. राजा भी रानी के बिना वहां से हटने को तैयार नहीं था. बाद

में राजा इन शर्तों के साथ जाने को तैयार हो जाता है कि रानी समय-समय पर महल आती रहेगी और सुपर्णा को महल आने-जाने से नहीं रोकेगी. उस दिन पूरे लिल्लीपुट में जश्न का माहौल रहता है और महल में हर एक लिल्ली निवासी के लिए शाही दावत का इंतज़ाम किया जाता है.
           इस जश्न के माहौल में चार लोग सबसे ज्यादा खुश हुए होंगे. पहले तो खुद राजा जिसका परिवार अब पूरा हो चुका था, दुसरे राजकुमार और राजकुमारी जिन्हें अपनी मां वापिस मिल गई थी, तीसरी सुपर्णा जिसे अपना पिता और राजकुमारी बनने का सुखद एहसास मिला था और चौथा वो जिसे केवल इन सब की ख़ुशी का एहसास ही बहुत था, खुद चंद्रा जिसकी कोशिशों से ही ये सब मुमकिन हो पाया था. और हां, भूतिया को कैसे बुलाया जा सकता है?
           जश्न का माहॉल अगले दिन भी नहीं थमता. यह दिन एक सुहाना मौसम लिए था. छुटपुट बादल और नील आस्मां में चिड़ियों की विभिन्न प्रकार की त्रिकोनी, गोलाकार, विमानाकार, बादलों को भेदती उड़ानें देखने को मिल रही थीं. महल के सबसे ऊपर वाले खुले हिस्से में पतंगबाजी की प्रतियोगिता आयोजित की गई थी. दो अलग-अलग छतों पर आदमी और औरतें अलग-अलग पतंगें उड़ा रहे थे और एक-दूसरे की पतंगें काट रहे थे. राजा, जादूज, मेजर साहब, प्रेसिडेंट, साइंटिस्ट, बलवेन और डरा सहमा सेनापति एक कोने से अपनी पतंग उड़ा रहा था. आज सेनापति राणा जी की पतंग सुपर्णा की पतंग से कोसों मील दूर उड़ रही थी. रात को हुए खुलासे के बाद से वो महारानी और सुपर्णा के करीब जाने से भी डर रहा था. आज डोंजा खान और घोंजा राम भी कूद-कूद कर पतंगों को हवा में उछाल रहे थे. घोंजा राम एक बार फिर से डोंजा खान से ‘बसंत-पंचमी’ कहने की वजह से मुक्का खा चुका था.
           दूसरी और औरतों वाली छत पर नई नवेली राजकुमारी बनी सुपर्णा को यह दिन बड़ा ही लुभावना लग रहा था. वो भी अपनी पतंग के साथ इस दिन का भरपूर आनंद ले रही थी. उसके साथ बड़ी राजकुमारी ‘सुवन्या’, महारानी, कई लड़कियां और कई औरतें भी थीं. कई बच्चे भी औरतों की टोली में शामिल थे. चंद्रा को पतंग उड़ानि कुछ ख़ास तो आती नहीं थी लेकिन अपने भटके मन को व्यस्त रखने के लिए वो भी अपनी पतंग को हवा में हिचकोले खिलवा रहा था. माहौल काफी खुशनुमा था.
           तभी चंद्रा के ऊपर एक पतंग आकर गिरती है. ‘आप बड़े अच्छे हैं.’ पतंग पर लिखा था. पढ़कर चंद्रा पतंग की डोर के सहारे पतंग के मालिक को ढूंढता है. वो सुपर्णा की पतंग थी. निशाना एकदम सही लगा था, वो संदेश चंद्रा के लिए ही था. इसका सुबूत सुपर्णा की झुकी मुस्कुराती हुई निगाहें दे रही थीं. अब हैरान परेशान चंद्रा पतंग को पकड़कर फिर से हवा में उछाल देता है. चंद्रा के पीछे खड़ा राजा ये सब देख चुका था और पतंग पर लिखे संदेश को भी पढ़ चुका था. काफी समय तक पतंगबाजी होती रही जिसका अंत बाकी बची कुछ पतंगों के साथ हुआ जिनमें सुपर्णा की भी एक थी. रात को आयोजित विशेष भोज के बाद राजा, चंद्रा को अपने कमरे में बुलाता है और चंद्रा से एक सवाल पूछता है:
“आप सुपर्णा को कब से जानते हैं?” राजा ने बड़ी ही गम्भीरता के साथ सवाल पूछा था.
“जब से लिल्लीपुट में आया हूं. भोली-भाली सी लड़की है. आप पहले से जानते थे, उसे?” चंद्रा सहजता से जवाब देता है.
“हमारी दुनिया इतनी भी बड़ी नहीं कि किसी को पहचानने में मुश्किल हो. हमारी इस छोटी सी दुनिया में जब भी कुछ अप्रयाश्चित घटता है तो हमें उसकी खबर रखनी पड़ती है.” राजा के बोलने में गम्भीरता थी.
“आपका इशारा किस और है?” चंद्रा पूछता है.
“आपके और सुपर्णा की और. देखिए अगर आप उस भोली-भाली बच्ची के लिए कोई भी अनचाही सोच रखते हैं तो आपको अभी से अपने विचार बदलने होंगे. हम आपके कई एहसानों के शुक्रगुजार हैं. आपके लिल्लीपुट में आगमन के

विरोध के बाद भी हमने आपको इस दुनिया में जगह दी. अतः आपसे किसी कुआचार्ण की उम्मीद नहीं रखते.” राजा अभी भी गम्भीर ही था जैसे चंद्रा ने कोई जुर्म कर दिया हो.
“देखिये अगर आप मेरे सुपर्णा के साथ किसी भी सम्बन्ध होने की बात कह रहे हैं तो आप निश्चिन्त रहिये. मैं उसे एक अच्छे दोस्त की हैसियत से ही मिलता हूं.” चंद्रा ज्वाब देते हुए राजा के करीब आ जाता है.
“उचित भी यही रहेगा. देखिये हमें गलत न लीजिएगा. हम आपमें कोई कमी नहीं निकाल रहे. हमे शायद आप जैसा वर अपनी बच्ची के लिए मिलेगा भी नहीं. लेकिन आप भी जानते हैं यदि आप दोनों इस रिश्ते को आगे बढ़ाते भी हैं तो वो शारीरिक तौर पर अप्राकृतिक और अप्रासांगिक होगा जिसका परिणाम दोनों को जीवन भर भौगना होगा. अतः उचित ही होगा कि आप भी सुपर्णा की इस बात को समझने में मदद करें. लोहे को गर्माहट के साथ ही ढाल दिया जाना चाहिए अन्यथा वो टूट जाने की कगार तक पहुंच जाता है. आशा है आप उस भोली-भाली बच्ची की मदद करेंगे.” राजा भावुक होकर कहता है.      
“आप बेफिक्र रहिये, इस दुनिया को आंच आने से पहले मैं आगे रहूंगा.” चंद्रा, राजा को आश्वस्त करते हुए वहां से चला जाता है.    
  चंद्रा जैसे ही महल के मुख्य प्रांगण में पहुंचता है उसे डोंजा खान सुपर्णा का संदेश देता है कि वो शाही ‘लिल्ली’ बाग़ वाले हिस्से में नहर के किनारे पर उसका इंतज़ार कर रही है. अब शायद चंद्रा के पास राजा को दिए अपने वचन को पूरा करने का इससे अच्छा मौका नहीं हो सकता था. चंद्रा जल्दी से वहां पहुंचकर अपना काम जल्द से जल्द खत्म कर लेना चाहता था. नहर के किनारे छोटी राजकुमारी सुपर्णा अपनी सुंदर वेशभूषा के साथ, सजी हुई नांव पर उसका इंतज़ार कर रही थी. चंद्रा, सुपर्णा से बात करने की कोशिश करता है सुपर्णा उसका हाथ पकड़कर उसे नांव में चढ़ा लेती है. नाविक नांव चला देता है और लोक गीत गाता हुआ नांव खेदना शुरू कर देता है. इससे पहले कि चंद्रा कुछ बोल पाता, सुपर्णा पहले ही उससे अपनी पौशाक के बारे में पूछने लगती है. वो चंद्रा की तारीफ करती हुई उसका धन्यावाद भी करती है. जादूज से उसे सब मालूम हो चुका था कि चंद्रा के प्रयासों से ही ये सब सम्भव हो पाया था.
           आज सुपर्णा इतनी खुश नजर आ रही थी कि ढेर साड़ी बातें कर रही थी. अब चंद्रा उससे बात करने में डर रहा था कि कैसे उस भोली-भली लड़की का दिल दुखाया जाए. अब सुपर्णा, चंद्रा का धन्यावाद करने के लिए एक सुंदर फूलों का गुलदस्ता उसके आगे कर देती है. चंद्रा उसे एक तरफ रखकर फिर से बोलने लगता है. लेकिन इससे पहले कि वो कुछ बोल पाता, सुपर्णा एक कैमरा निकालकर नाविक ‘नवी’ के हाथों में देकर उसे दोनों की फोटो खींचने के लिए कहती है. इससे पहले कि ‘नवी’ कोई भी तस्वीर खीँच पाता चंद्रा उससे कैमरा खींचकर उसे नांव किनारे लगाने के लिए कहता है. सुपर्णा के कारण पूछने पर चंद्रा कोई भी जवाब नहीं देता और नवी को कड़े शब्दों में नांव को किनारे ले जाने के लिए फिर से कहता है. नांव के किनारे पर पहुंचते ही चंद्रा नांव से बाहर निकलकर थोड़ा दूर जा खड़ा होता है. सुपर्णा भी उसके पीछे-पीछे आ जाती है और उससे उसके इस तरह के बर्ताव का कारण पूछती है.
“अगर आपको मेरे बर्ताव का पता नहीं चल रहा तो मुझे भी कुछ भी समझ नहीं आ रहा कि आप ये सब क्यों कर रही हैं. मुझे गुलदस्ता देना और फिर मेरे साथ फोटो खिंचवाना. माना कि आप एक शाही घराने से सम्बन्ध रखती हैं लेकिन इसका ये जरा भी मतलब नहीं कि आप कुछ भी सोचे-समझे और करें. अगर आपके मन में कोई भी इच्छाएं हैं तो उन्हें अभी से दबा दें क्योंकि जो भी आपके मन में है वो सम्भव नहीं हो सकता, कतई नहीं. अब क्या मैं अपनी आने वाली पीढ़ी को भी आप लोगों जैसा बना लूं. आपकी मन की पूरी नहीं होगी तो ज्यादा से ज्यादा क्या हो जाएगा? मेरा यहां आना ही बंद होगा ना. मुझे जरूरत भी नहीं आप लोगों के बीच अपना समय बर्बाद करने की.” कहकर चंद्रा एकदम वहां से पैदल ही चला जाता है और पीछे छोड़ जाता है आंसुओं से भरी सुपर्णा को.
            
           सुपर्णा के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला था. उसकी सारी ख़ुशी खाख हो चुकी थी. वो भोली राजकुमारी तो नए सपनों के साथ आई थी, जिन्हें चंद्रा ने बेरहमी के साथ तोड़ डाला था. तो चंद्रा भी कहां खुश था? उसे ये करना ही था. उस भोली लड़की के बेहतर भविष्य के लिए. तभी तो जाते-जाते उसकी आंखें भी नम थीं ना जाने क्यों? एक सच्चा दोस्त खो देने के एहसास से या किसी प्यारी आत्मा को दुखी करने के एहसास से. सुपर्णा नांव में बैठकर नम आंखों के साथ इसी सदमे में महल की और जाने लगती है. नांव पर अपनी आँखों से छलकते आंसुओं को रोक पाने तक की होश नहीं रह गई थी सुपर्ण को, लेकिन शायद मन में यही बोल घूंज रहे होंगे:
                    “दिल हिल्दा है मेरा राख विचों, खुद रुल गी नि मैं खाख विचों.
                     कल्ली सी रह गी कल्ली मैं, बनी दुनिया दी झुट्ठी साख विचों.
               दस केडी सी मजबूरी तेरी, जे रिस लाए आंसू तैं, प्यार दी भुखी आख विचों.”
           दूसरी और चंद्रा पहुंच जाता है जादूज के पास. वो जादूज को सब कुछ बता देता है और सुपर्णा की भलाई के लिए कुछ समय तक लिल्लीपुट से दूर रहने का फैसला करता है. चंद्रा, जादूज से विनती करता है कि मुसीबत की किसी भी घड़ी में वो उसे अवश्य बुलवा ले. जादूज से विदाई लेकर वो किसी से मिले बिना ही लिल्लीपुट से भी विदा ले लेता है. उस दिन सुपर्णा भूखी-प्यासी रहती है और किसी से बात भी नहीं कर पाती.
                         उस दिन को बीते कुछ दिन हो गए थे, अब चंद्रा भी अपना बुरा समय उसकी नई दोस्त बनी ‘घायल शेरनी’ उर्फ़ ‘संयूरी’ के साथ गुजार रहा था. होली का दिन था तो सुबह दोनों समंदरी किनारे की हवाओं, रेत, पानी और ‘फास्ट फ़ूड’ का मजा लेते हुए अपना अच्छा वक्त गुजार रहे थे. ‘बीच’ पर रंगों में लिपटी अनेकों टोलियां यहां-वहां गा-बजा रही थीं. लेकीन चंद्रा का मन अभी भी लिल्लीपुट में ही अटका हुआ था. लिल्लीपुट से दूर रहने के गम से ज्यादा बुरा उसे उस प्यारी सी गुड़िया, सुपर्णा का दिल दुखाने का लग रहा था. शायद सुपर्णा के साथ अपने रिश्ते को चंद्रा ने कभी भी इस नजरिये से देखा ही ना था. सुपर्णा की खूबसूरती का लौहा तो उसने माना था लेकिन प्रकृति के नियम कहीं पर बहुत कड़े साबित हो जाते हैं. शायद, चंद्रा का दिमाग भी उन्ही दायरों में रहना चाहता था.
“तुम होली नहीं खेलते क्या? मुझे तो बेहद पसंद है, रंगों में डूब जाओ और भूल जाओ कि तुम्हारे सामने कोन है.” संयूरी बड़े ही आनंदित होकर कह रही थी.
“ना....‘नाइन्थ’ क्लास के बाद छोड़ दिया ये सब गंदा होने वाला काम. शक्लें राक्षशों सी हो जाती हैं.” चंद्रा चिढ़ते हुए कहता है.
“गंदगी तुम्हारे दिमाग में है मिस्टर चंद्रा. अब खेतों में जाने पर हम गंदे हो जाएंगे, ये समझें या फिर एक किसान की तरह मिटटी की खुशबु का एहसास करें, ये आपके सोचने पर निर्भर करता है, मिस्टर ‘डर्टी माइंड’.” संयूरी के मुंह से ये प्रवचन सुन चंद्रा को बड़ी हैरानी हुई थी.
“बातें तो अच्छी कर लेती हैं, आप मिस रेड्डी. लेकिन एक किसान की जगह किसी मीटिंग पर जाने वाला ‘बाबू’ अगर खेतों में घुस जाएगा तो उसके कपड़े तो मीटिंग के लिए गंदे होंगे ही ना.” चंद्रा भी झट से पलट जवाब दे देता है. 
“बहस में तुमसे जीतने का इरादा नहीं रखती मैं. हां तुम्हारी गंदी सोच बदलने का इरादा जरुर है, मिस्टर चंद्रा!” संयूरी ने आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा था.
“भूल जाओ अगर तुम्हारे दिमाग में वो चल रहा है तो.” चंद्रा कहते हुए आगे निकल जाता है.
           तभी उसके सिर के पीछे कुछ आकर लगता है. वो एक रेत का बना हुआ गोला था. जिसे संयूरी ने मस्ती के लिए बनाकर चंद्रा की और फैंका था. चंद्रा अपने सिर से रेत झाड़कर तेज कदमों से वहां से खिसकने की सोचता है कि एक और गोला उसकी पीठ पर आकर लगता है.
“ये क्या है मिस रेड्डी दिमाग खराब हो गया है क्या. ये रेत है बर्फ नहीं.” चंद्रा ने पहली बार संयूरी को डांटने की हिम्मत की थी.
             
           तभी एक और गोला सीधा उसके मुंह पर आकर लगता है और बिखर कर उसके गले, छाती में हर जगह रेत ही रेत भर देता है. अब इसका जवाब क्या दिया जाए चंद्रा ये सोचते हुए अपने कपड़ों को झाड़ते हुए आगे निकलने लगता है. तभी ना जाने क्यों, गुस्से में भिन-भिनाती हुई संयूरी तेज कदमों के साथ चंद्रा का पीछा करने लगती है.
“मिस्टर चंद्रा तुम अपने आप को समझते क्या हो? किसी की ‘फीलिंग्स’ की तुम्हें जरा सी भी कद्र नहीं है. मैं यहां तुम्हारे साथ ‘एन्जॉय’ करना चाहती हूं और तुम टोटली इग्नोर किये जा रहे हो.” कहती हुई संयूरी चंद्रा के नजदीक पहुंचकर दोनों हाथों में भरी हुई रेत चंद्रा के बालों और कपड़ों के बीच डाल देती है.
           अब चंद्रा के बस से बाहर हो गई थी. अपने सभी दुखों को भुलाकर वो जंगलियों सी हुई अपनी हालत के साथ संयूरी के पीछे दोड़ लगा देता है. संयूरी भी खेल-खेल में उससे बचने के लिए भाग खड़ी होती है. अपने भारी पेट के बावजूद चंद्रा उसे पकड़ने में सफल हो जाता है और उठाकर उसे सीधे ही समंद्र के पानी में डाल देता है. अब अपना बदला पूरा करने के लिए वो किनारे पर पड़ी रेत को भर-भर कर उसके ऊपर डालने लगता है. अब संयूरी चिल्लाना शुरू कर देती है. लेकिन चंद्रा रुकता नहीं और रेत डालता ही जाता है. अब संयूरी का सिर्फ सिर ही दिख रहा था और बाकी का शरीर रेत से लबालब ढका था. संयूरी के मुंह तक में रेत घुस गई थी. उनके चारों और रंगों में डूबी प्रेमी जोड़ों की भीड़ जमा हो गई थी जो तालियां बजा-बजाकर इस घटना का भरपूर आनंद ले रहे थे.
           चंद्रा, संयूरी से कुछ हटकर खड़ा हो जाता है और संयूरी को उठाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाता है. संयूरी अपने मुंह से रेत को थूकती हुई उठ खड़ी होती है और बिना चेतावनी के ही चंद्रा के पीछे दोड़ लगा देती है. वो गुस्से में लग रही थी. ‘शुरुआत तुमने ही की थी’ कहता हुआ चंद्रा भागता रहता है. संयूरी पास पहुंचकर चंद्रा की पीठ पर छलांग लगा देती है और उसके बालों को खींचना शुरू कर देती है. ये सब देखकर वहां खड़ी भीड़ और भी ज्यादा उत्साहित हो उठी थी और अब और ज्यादा तालियां और सीटियाँ बजाने लगी थी. चंद्रा पीठ पर सवार संयूरी को लेकर समंद्र के पानी में छलांग लगा देता है जिससे दोनों की रेत धुल जाती है. दोनों ही पानी से निकलकर बीच से बाहर जाने लगते हैं तो क्या देखते हैं कि उनका ये रेतीला खेल वहां खड़ी जोड़ियों में भी शुरू हो गया था. सभी एक दूसरे के ऊपर रेत के गोले फैंक रहे थे. चंद्रा को उसके मकान पर उतारते हुए संयूरी उससे रूखे स्वर में कहती है.
“बारह बजे घर पर....” संयूरी, चंद्रा की और न देखते हुए कहती है. चंद्रा कोई जवाब न देकर कार से उतरने लगता है.
“सोच लेना......” संयूरी धमकी भरे लहजे में फिर से कहती है, जिसका जवाब चंद्रा उसे प्यार से घूरते हुए देता है.
           उधर लिल्लीपुट में, होली के खुशनुमें माहौल के बीच ‘लिल्ली’ बाज़ार सजा हुआ था. होली खेलने के लिए बनीं छोटी-बड़ी टोलियां आपस में खेलते हुए राहगीरों को भी रंग लगा रही थीं. रंगबिरंगे रंगों में रंगे उनके कपड़े और चेहरे छोटे कद के ‘लिल्ली’ निवासियों के रूप-रंग को और भी अधिक प्यारा बना रहे थे. वहीं हवलदार हवा सिंह भी सब्जी वाले सब्जो से कुछ खरीद रहा था.
“ली लेयो.....सिंडी की भिंडी, सड़ेला है करेला, मत हो लोभी खा ले गोभी, मिक्स कर खाया आ..हा बड़ा मजा आया.” सब्जो हवा सिंह को हांक लगाता है और सलूट मारकर पूछता है, “क्या लोगे साब.”
“केल्ला खिला मन्ने.” हवा सिंह अकड़ते हुए कहता है.
“केला...मुफ्त का मेला” सब्जो आह भरता हुआ बुदबुदाता है.
“के, कहा?” हवा सिंह आंखें दिखाते हुए पूछता है.

“अ-अ-म-मोटा वाला लीजिये” सब्जो बात पलटते हुए केले को छीलकर हवा सिंह की और करता है. हवा सिंह भी ‘..आम-म्म-म्म-अम-म्म..’ करता हुआ केले को गटक लेता है.
“ये केला, अभी इसके गले में ही अटक जाए तो मैं अपने पीने के पानी का लोटा ही गिरा दूँ.” मन ही मन सब्जो जैसे दुआ मांगता है.
”फफूंद लगी तरकारी सी सकल ना बणा. कोई ना, थारे पीस्से तन्ने...!? ओए...म्हारा पर्स..?” सब्जो के चिढ़े हुए मुंह को देखकर हवा सिंह अपनी पैंट की पीछे वाली जेब में जैसे ही हाथ डालता है, हवा सिंह का पर्स कहीं हवा हो जाता है. इस पर हवा सिंह सब्जो पर बरस पड़ता है और पर्स के बारे में पूछता है. तो सब्जो उसके पीछे से चिटकु और मिटकु के गुजरने की बात कहता है.
“किब्ब..?” हवा सिंह अपनी मोटी-मोटी भौहें और लम्बी मूछों को सिकोड़कर पूछता है.
“जब आप केला गटक रहे थे.” सब्जो इत्मीनान से कहता है जैसे सोच रहा था...’पैसा वसूल’.
“पैल्ले क्यों नि बताया उल्लू के पट्ठे!” हवा सिंह, हवा में उछलते हुए कहता है.
“पट्ठे नि जी बट्ठे....हैं मेरे पास. आपको पर्स की क्या जरूरत, माई बाप.” सब्जो मक्खन लगाते हुए चिढ़ाता है.
“मसखरी करे है” कहकर हवा सिंह सब्जो के कंधे पर ‘पटाक’ से डंडा मारकर चोरो़ं के पीछे भागता है.
           “चोर-चोर...पकड़ो” चिल्लाता हुआ हवा सिंह दोनों चोरों के पीछे भागता है. चोरों के कानों में जैसे ही ये शोर पड़ता है वे समझ जाते हैं कि ये शोर उन्ही के लिए है और वे सरपट भागने लगते हैं. एक सड़क से दूसरी, एक गली से दूसरी, गाड़ियों-लोगों के बीच से भागते हुए वे शहर से बाहर की और भागने लगते हैं. हवा सिंह भी हांफता हुआ उनके पीछे लगा रहता है.
“अमां-मियां....ये ठुल्ला.....तो पीछा ही नहीं छोड़ रिया.....अब क्या हमें घर तक छोड़ने आएगा ये?” चिटकु हांफते हुए कहता है.
“हमका का मालूम था कि ई ससुरा ‘फ्लेविकोल’ का मजबूत जोड़ साबित होई है. अब ई से पीछा कयसे छुडाएं.” मिटकु भागते हुए कहता है”
           तभी उन्हें एक बड़ी टोली आपस में रंग लगाकर नाचते हुए दिखती है. दोनों उसी में घुस जाते हैं. हवा सिंह भी सबके चेहरे पकड़-पकड़कर देखते हुए उन्हें ढूंढने लगता है. लेकिन इतने सारे रंग लगे बौनों के बीच उन्हें ढूंढ पाना मुश्किल हो रहा था. तभी चिटकु को एक तरकीब सूझती है. वो रंग लगाने वालों के पास जाता है और उनके लिफ़ाफ़े में से रंग निकालकर उन्हें लगाता है. बदले में वो बौना भी चिटकु के मुंह पर ढेर सारा रंग लगा देता है जिससे अब उसे पहचान पाना लगभग नामुमकिन हो जाता है. मिटकु भी वैसा ही करता है.
           अब दोनों हवा सिंह के पास से गुजर जाते हैं लेकिन वो उन्हें पहचान नहीं पाता. कि तभी हवा सिंह के ऊपर कई सारे रंगों के गुब्बारे आ गिरते हैं जिससे उसकी वर्दी खाखी की जगह किसी डिज़ाइनर सूट में बदल जाती है. अब हवा सिंह गुस्सा जाता है और होली खेलते हुए बौनों को पकड़-पकड़कर लातें और घूंसे मारने लगता है. तभी उसके ऊपर रंगों से भरी एक बाल्टी फैंक दी जाती है जिससे उसकी वर्दी का रंग एक बार फिर से बदल जाता है, ऊपर कुछ और, नीचे कुछ और और चेहरा लाल. जो उसके गुस्साए चेहरे पर फिट बैठ रहा था.

“पहचान कोन?” तभी लाल चेहरे वाले हवा सिंह के पीछे से आकर कोई उसकी आंखों को बंद करके पूछता है. गुस्साया हवा सिंह पास पड़े एक रंग भरे गुब्बारे को पकड़कर अपने पीछे खड़े उस बौने के चेहरे पर दे मारता है जिससे उसका पूरा चेहरा काला पड़ जाता है.
“नहीं पहचान सके हूं” हवा सिंह पीछे मुड़ते हुए, गुस्से में ओंठों को दबाते हुए कहता है. वो राणा जी था जिसे हवा सिंह अभी भी पहचान नहीं पा रहा था.
“आज होली है. गुस्सा थूक दो हवा सिंह.” राणा जी भी हंसते हुए कहता है.
“’थू’...ले थूक दिया...इब्ब?” हवा सिंह राणा जी के चेहरे पर थूक देता है. वो अभी भी उसे पहचान नहीं पाया था.
“सेणापति के मुंह पे थूके हैं. देख ये राणा कैसे तुझपे ‘मूते’ है.” अब नजारा बदल चुका था. हवा सिंह आगे-आगे भाग रहा था और राणा जी हवा सिंह के ऊपर पेशाब करने के चक्कर में उसके पीछे-पीछे.
होली के दिन का ये नजारा कुल मिलाकर खुशियों भरा था, केवल सुपर्णा को छोड़. होली के दिन भी वो किसी से कुछ ख़ास बात नहीं कर रही थी. महल के रंगीन माहौल के बीच भी वो किसी बेरंग तस्वीर की तरह बैठी हुई थी.
           उधर साढ़े बारह बज रहे थे ओर चंद्रा के मोबाइल पर संयूरी की कॉल्स पर कॉल्स आ रही थीं जिन्हें चंद्रा ‘इग्नोर’ कर रहा था. वो शायद रंगों में रंगना नहीं चाहता था. लेकिन वो संयूरी की धमकी का मतलब भी अच्छे ढंग से जानता था. सो तैयार होकर वो उसके घर जाने के लिए जैसे ही गेट के पास पहुंचता है, उसे सामने संयूरी कार में बैठी हुई दिखाई देती है. वो उसे लेने के लिए उसके पास आ धमकी थी और उसे घूरे जा रही थी. जैसे उसे खा जाना चाहती थी. चंद्रा चुप-चाप कार में बैठ जाता है और कोई बात नहीं करता. संयूरी एकाएक ही चंद्रा को उंगली दिखाते हुए उसकी और लपकती है:
“मिस्टर चंद्रा....अगर आगे से मेरी ‘कॉल पिक्क’ नहीं की तो देख लेना.” अपनी और आती उंगली को देख चंद्रा एकदम से पीछे हट जाता है. चंद्रा की यह हरकत संयूरी का सारा गुस्सा ठंडा कर देती है. अपनी ऊँगली को मुट्ठी में वापिस भींचते हुए संयूरी गाड़ी स्टार्ट कर देती है.
    दोनों संयूरी के घर पहुंच जाते हैं. वहां पहले से ही होली का माहौल बना हुआ था. संयूरी की बहुत सी सहेलियां अनेकों रंगों में लिपटी हुई थीं और भारी-भरकम साउंड सिस्टम पर नाच रही थीं. दोनों जैसे ही वहां पहुंचते हैं, उनका स्वागत रंगों की जेट फुहारों से नहलाकर किया जाता है. बस उसके बात फिर वही हुआ जो चंद्रा नहीं चाहता था. लेकिन इस सब के बीच चंद्रा लिल्लीपुट के गम को भूल जरुर गया था, कुछ समय तक ही सही!
             उधर लिल्लीपुट में दोनों चोर थके-हारे और प्यासे भागते हुए जंगल में एक खुली जगह में आकर ठहर जाते हैं. दोनों ही झुककर अपने हाथों से घुटनों को पकड़कर हांफने लगते हैं. दोनों कुछ पलों के बाद जैसे ही अपनी गर्दन ऊपर करते हैं, एक बेहद ही खूबसूरत तालाब अपने सामने पाते हैं. प्यास तो लगी थी, सो दोनों ही पानी पीने लग जाते हैं.
           दूसरी और वो दोनों चोर एक जादुई शीशे के गोले में पानी पीते हुए दिखाई दे रहे थे और उस गोले से कुछ उंगलियाँ बड़ी ही तरतीब के साथ टकरा रही थीं.
“एक तुम ही गधे नहीं हो यहां, जरा इन दोनों को देखो.” एक गूंजती हुई, फुसफुसाती रहस्मयी आवाज़ बोलती है.
“ये चोर हैं हमारे तलाब पर. आप कहें तो इन्हें सबक सिखाऊँ.” एक आकृति उस गोले में देखते हुए कहती है.

“नहीं...इनके लिए मैने कुछ तैयार कर रखा है.” वही रहस्मयी आवाज़, कहीं से आ रही कुछ फुंफकारों के बीच कहती है.
           उधर दोनों चोर पानी पीकर अब कुछ राहत की सांस लेते हैं. मिटकु, चिटकु से हवा सिंह के बारे में पूछता है. इससे पहले की चिटकु कुछ जवाब दे पाता उसे कुछ दूरी पर एक छोटी सी झाड़ के पास कुछ चमकता हुआ दिखाई देता है. वो धीरे-धीरे आगे बढ़ता है और एकदम चींख पड़ता है. चिटकु को वहां एक सोने का सिक्का पड़ा हुआ देखता है.
“ई, ईहां कयसे पड़ा होगा” मिटकु कुछ शक करते हुए पूछता है.
“मियां...आम ना खाओ गुटलियाँ गिनो....” ताना मारने के अंदाज में कहते हुए चिटकु सिक्का अपनी जेब में डाल लेता है.
“एकठो ओउर....” तभी मिटकु एक और सिक्के को देख चींख पड़ता है. चिटकु उसे भी उठा लेता है.
           तभी उन्हें ऊपर जाती हुई सीढ़ियां दिखाई देती हैं. सीढ़ियों की तली पर जाकर दोनों खड़े हो जाते हैं और ऊपर की और देखने लगते हैं. सीढ़ियां लम्बी और छोटी-छोटी थीं जो ऊपर जाकर आस्मान में जैसे खो जाती थीं.
“चढ़ें का......?” ऊपर देखते हुए मिटकु पूछता है
“पहले कौन, मियां?” चिटकु सीढ़ियों को देखते हुए हैरानी से पूछता है. फिर कुछ सोचकर वो खुद ही सीढ़ियां चढ़ने लगता है. पीछे-पीछे मिटकु भी आ जाता है.
“जिसने भी सिक्के गिराए हैं....वो ऊपर ही गया होगा. और.... कौन जाने उसके पास और भी कितने हों?” चिटकु की हांफती आवाज़ में लालच साफ़-साफ़ झलक रहा था.
           ऊपर पहुंचकर उन्हें दिखाई देती है एक छायादार हवेली जिसके ऊपर छायादार कुछ भी नही था. उसके सामने एक सीधी खड़ी त्रिकोने सिरे वाली मीनार थी जिसमें से एक खिड़की बाहर की और झांक रही थी. मीनार के दोनों और त्रिकोनी छतें थीं जो पीछे की खिड़कीदार छोटी मीनारों को ढक रही थीं. सभी मीनारों की छतें जादूगरों वाली त्रिकोनी टोपीयों जैसी थीं. सामने एक बड़ा सा काला दरवाजा था. जो ..चर्र्र्रर्र्र्र.. की आवाज़ करता हुआ थोड़ा सा खुल जाता है.                   दोनों चोर डर जाते हैं और पीछे को ठिठक जाते हैं.
“क-कौन है बाहर. अंदर आओ.” अंदर से कांपती हुई एक बूढ़ी आवाज़ आती है?
           उस बूढ़ी सी आवाज़ को सुनकर वे डर जाते हैं और वहां से भागने में ही भलाई समझते हैं. लेकिन वो जैसे ही पीछे मुड़ते हैं उन्हें अचानक ही अपने सामने एक भयावह चेहरा दिखाई देता है. वो झुकि हुई कमर वाला, हाथों में लाठी थामे एक बूढ़ा बौना था जो किसी पोटली को पकड़े हुए था. वो बूढ़ा अपना नाम ‘कूब’ बताता है और खुद को इस हवेली की मालकिन का इकलौता वफादार नौकर बताता है. उसकी पीठ पर एक मौटा कूबड़ था और चेहरे पर लम्बी नाक के साथ कई छोटे-बड़े दाने उभरे थे. सिर के उखड़े हुए बालों के साथ वो कोई आकर्षक बौना नहीं दिख रहा था.
           दोनों चोर उस कूबड़ वाले आदमी को देखकर थोड़ा सा डर जाते हैं. लेकिन कूब इतनी सहजता से चोरों के साथ बात करता है कि दोनों का डर ही मर जाता है. कूब चोरों से, उसकी सीढ़ियां चढ़ने में मदद करने के लिए कहता है. दोनों ही उसके साथ अंदर चले जाते हैं और उस पोटली में से गिरे एक और सिक्के को भी उठा लेते हैं. पोटली के बारे में पूछने पर कूब उन्हें बताता है कि इसमें सोने के सिक्के हैं जो उसे उसकी मालकीन ने दिए हैं. बस उसका थोड़ा सा काम करो और वो खुश तो आप खुश. दोनों थोड़ी झिझक के साथ उसके पीछे चल देते हैं. उस अंधेरे हॉल की सीढ़ियां चढ़कर वे एक गलियारे से होकर बहुत से दरवाजों में से एक में घुस जाते हैं.
             
                       वहां एक बूढ़ी दिखने वाली औरत उनका इंतज़ार कर रही थी. बेचारे चोर जानते नहीं थे कि वो कहां जा रहे थे. अंदर वो बूढ़ी बड़े ही सौम्य अंदाज़ में दोनों का स्वागत करती है. वो देखते हैं कि एक साठ साल की चालाक सी दिखने वाली औरत घुमावदार पैरों वाली कुसी पर झूल रही थी जिसने अपने सिर पर स्कार्फ जैसा कुछ बांध रखा था. वो चोरों को बैठने के लिए कहकर, कूब को उन्हें कुछ लाकर पीने को देने के लिए कहती है. कूब उनके लिए शरबत लाता है जिसके लिए जादूगरनी उसे दो सोने के सिक्के देती है. अब चोरों की आंखें चमक उठती है. क्यों न यहां कुछ हाथ साफ़ किया जाए.
           अब जादूगरनी कूब से किसी भरोसेमंद आदमी से एक किताब मंगवाने के लिए कहती है. कूब उन दोनों चोरों की तरफ इशारा करता है. दोनों भी इनाम मिलने की आशा में इस काम के लिए हामी भर देते हैं. जादूगरनी उन्हें जादुगर जादूज के घर से एक बिना लिखी, बोलने वाली पुस्तक लाने के लिए कहती है. जिसपर दोनों चोर कुछ थम से जाते हैं और उस महिला पर शक करने लगते हैं. आखिर किसे, किसी जादुगर की पुस्तक चाहिए होगी और ये काम भी तो आसान ना था. लेकिन कूब अपनी चिकनी चुपड़ी बातों और भारी इनाम के लालच का सपना दिखाकर उन्हें इस काम को करने के लिए तैयार कर लेता है. अब उन्हें आवाज़ बदलने वाले शरबत और उस किताब के हुलिए के साथ शहर की और भेज दिया जाता है ताकि वो कोई गलत किताब न उठा लाएं.
            रास्ते में मिटकु का गला सूख रहा था तो वो चिटकु से आवाज़ बदलने वाला शरबत मांगता है. चिटकु  शरबत को काम के लिए बचा कर रखने की बात कहता है तो मिटकु जिद कर थोड़ा सा घूंट इस उम्मीद में पी लेता है कि वो मीठा होगा और गले को भी तर कर देगा.
“आ..ऐ...थू.. ई कऐसा सरबत है. तुम ही पीना ईका.” मिटकु का मुंह करेला खाए जैसा हो जाता है. बेचारा मिटकु बोतल का ढक्कन बंद करके चुप-चाप शहर की और चल देता है.
           उधर लिल्लीपुट शहर में दोनों चोर कुछ समय बाद जादूगर के घर के बाहर पहुंच जाते हैं जो महल से कोई दो सौ मीटर की दुरी पर एकांत में था. पता करने के बाद कि जादुगर घर के अंदर ही है, दोनों जादूज के बाहर निकलने का इंतज़ार करने लगते हैं. थोड़ी देर के बाद वो क्या देखते हैं कि जादूज घर के बाहर से आ रहा है. उसे बाहर से आता देख दोनों हैरान रह जाते हैं. दरवाजे पर खड़ा हो कर जादूज अकेले में कुछ बात करता है और अंदर चला जाता है. “पागल कहीं का” चिटकु बुदबुदाता है. अब दोनों को घंटों बाहर छिपकर उसके घर से चले जाने का इन्तजार करना पड़ता है. इस बीच जादूज से मिलने बहुत से लोग आते रहते हैं. कुछ अकेले, कुछ बूढ़ों और बचों के साथ और कुछ पागलों सी हरकतें करने वाले लोगों को भी पकड़ कर उसके घर लाया जाता है. शाम घिर आती है और दोनों इंतज़ार करते-करते वहीं पेड़ के सहारे लुढ़क जाते हैं. कुछ अंधेरा हो गया था कि तभी सोए हुए चिटकु के कान पर एक जोर से चमाट पड़ती है ‘...चट्टाक...’ “अ-आ-आह” चिटकु चिल्लाता है.
                      चिटकु के चिल्ला कर उठने से मिटकु की भी नींद खुल जाती है. चिटकु इस चमाट के लिए मिटकु को दोषी ठहराकर उससे छुटपुट हाथा-पाई करता है कि उसे जगाने के लिए चमाट मारने की क्या जरूरत थी. हाथा-पाई के बीच मिटकु, जादूज को अपने घर से निकलते हुए देखता है. दोनों ही पेड़ के पीछे सरक लेते हैं. दोनों जादूज को महल की और जाते हुए देखते हैं. अब समय था, जादूज के थोड़े समय तक आंखों से ओझल रहने के बाद दोनों उसके घर के दरवाजे तक पहुंच जाते हैं. वो पहली बार इतने करीब से उसके घर को देख रहे थे. दरवाजा एक जोड़ी कानों के रूप में था जिसके ऊपर एक मुंह बना हुआ था. कुछ पल निहारते रहने के बाद दोनों उसे खोलने के काम में लग जाते हैं. पहले उसे बीच में से पकड़कर खोलने की कोशिश की जाती है. फिर उसे दोनों कानों के पर्णों से पकड़कर खींचा जाता है. तभी ‘आऊच’ दरवाजे में से आवाज़ आती है. दोनों कुछ कदम पीछे हट जाते हैं. फिर मन का वहम समझ कर फिर से कोशिश

करते हुए कानों के छेदों में हाथ डालते हैं कि शायद कोई चाबी छिपाई होगी.
“ऐ! उंगली मत करो..सीधे से अपना नाम बताओ.” अब दोनों ने रुकना ही बेहतर समझा.
“क-को-कौन है?” मिटकु डर से हकलाता है.
“इतनी देर से मुझे खीँच रहे हो, उंगली कर रहे हो, पहले तुम बताओ कौन हो.” आवाज़ उन दोनों होंठो के हिलने से आ रही थी.
“ई दरवज्जा बोलत है” मिटकु हैरान होता है.
“हमें अंदर कुछ काम है मियां, अंदर जाने दो.” चिटकु समय ना गंवाते हुए कहता है.
“पहले नाम बताओ. और हां! हमारा नाम मियां नहीं, ‘दरवा’ है...नाम बताओ”, दरवाजा कढ़क कर बोलता है.
“हमारा नाम चिटकु और इसका मिटकु. अब खुलो...” चिटकु चापलूसी के साथ कहता है.
“तुम दोनों अंदर नहीं जा सकते. मालिक के बिना तो बिलकुल नही.”, दरवाजा सख्ती से कहता है.
“अरे भईया. काहे नाही..दिन मां तो तुम सभेई को जाने देई रहे थे. अरे..हमका काहे नाही.” मिटकु मोर्चा सम्भालता है.                                                                                                                                    
           दरवाजा उन्हें बताता है कि बिना जादूज के घर में केवल वही आ सकते हैं जिनके नाम उसे जादूज ने बताए थे. और वे दोनों उस लिस्ट में थे जो अंदर नहीं आ सकते थे. अब दोनों अपनी मंदबुधि का उपयोग करते हुए दरवाजे को ठगने का उपाए सोचने लगते हैं. जिनमें से एक चिटकु बिना सोचे समझे ही पढ़ डालता है.
“जादूज नाम है मियां. अब जाने दो...” चिटकु कहता है. दरवाजे के कान हिलते हैं और होंठ सिकुड़ जाते हैं. पर दरवाजा हिलता तक नहीं. फिर क्या, दोनों ‘राजा’ से लेकर लिल्लीपुट के ‘रंक’ तक का नाम पढ़ लेते हैं पर दरवाजा हिलता तक नहीं.
“कईसे खोलें तोका. किसका नाम बतियाएं तोसे.” मिटकु झल्लाता है.
“नाम से ना काम, जिसका काम उसी को साजे, जिसका नाम उसी पे बाजे.” दरवाजा जवाब देता है.
“छोड़ा हो भईया..कोन्हो दूजा रस्ता होए है.” मोटी बुधि वाला मिटकु कहता है.
           दोनों दरवाजे को छोड़ खिड़की को खोलने की कोशिश करने में जुट जाते हैं. कुछ देर की कोशिश के बाद वो आधी खुलकर सीधे ही दोनों की उंगलियों पर जा गिरती है, जैसे खिड़की ने ऐसा जानबूझकर किया हो. अब वे उसे तोड़ने की सोचकर एक बड़ा हथौड़ा लाकर उस पर दे मारते हैं. हथौड़ा उछलकर उन्ही के ऊपर आ गिरता है. अब खिड़की का प्रयास छोड़ वे चिमनी की और रुख करते हैं और चिटकु पहले चिमनी के रास्ते अंदर की और छलांग लगा देता है. जैसे ही वो चिमनी की आग जलाने वाली जगह पर ‘धप’ से गिरता है वहां अचानक ही आग जल उठती है और चिटकु उसी रास्ते ‘बैक गियर’ डालता हुआ बाहर निकल जाता है.
           थक हार कर वे अपने थैले में से एक जादुई गोला निकालते हैं और उसमें बूढ़ी औरत से घर में घुसने का रास्ता पूछते हैं. पहले तो वो बूढ़ी उनपर बरस पड़ती है फिर उन्हें वो आवाज़ का शरबत इस्तेमाल करने के लिए कहती है. अपने गुस्से को जादुई गोले में आग की ज्वालाओं की तरह दिखाकर वो गायब हो जाती है. गोला इतना गर्म हो जाता है कि चिटकु के हाथों से छुट जाता है. अब निर्णय इस बात का लेना था कि वो कड़वा शरबत पियेगा कौन? मिटकु मुंह

फेर कर खड़ा हो जाता है तो चिटकु नाक बंद कर उसे गटक लेता है. कुछ भद्दी आवाजें निकाने के बाद चिटकु खामोश हो जाता है. मिटकु अभी भी मुंह फेरकर खड़ा था.
“तुम दोनों यहां” ये तो जादूज की आवाज़ थी. मिटकु उछलकर मुड़ता है और पीछे देखता है कि चिटकु हंसी के मारे लोट-पॉट हो रहा था. उसकी हंसी की आवाज़ एकदम जादूज जैसी ही लग रही थी.
“मालिक क्या बात है, आप इतना हंस क्यों रहे है.” तभी दरवाजा बोल पड़ता है.
           अब चिटकु अपने ओंठों को गोल करते हुए और आंखों को झपकते हुए दरवाजे के पास खड़ा हो जाता है. दोनों ही चोर अंदर घुस आते हैं. अंदर एक बड़ा सा कमरा था जहां कुर्सियां, मेज वगैरह लगे हुए थे. लेकिन वहां किताबों जैसा कुछ भी नहीं था. साथ वाले कमरे में उन्हें एक छोटा सा पुस्तकालय मिलता है. किताबें बहुत सारी थीं और और दोनों ठहरे मुर्ख, कोन सी देखि जाए? कहीं देखते-देखते कोई जादू ना चल जाए या जादूज ही न आ जाए. ये सोचते हुए उन्हें एक मोटी सी, एक तरफ से खुरदुरे और काले जिल्द वाली, तो दूसरी तरफ सपाट सफेद जिल्द चढ़ी किताब दिखती है.
“एही होगी” मिटकु फुसफुसाता है.
“तुमको कैएसे पता, मियां?” चिटकु पूछता है.
“तो जदुगरनिये से ही पूछी लो. ओ बताई दे है, तुमका...” मिटकु तिरछी नजरों से देखते हुए हंसता है.
“तुम पूछो”, चिटकु जादुई गोले को मिटकु के हाथों पर गिराता है. मिटकु जलने के डर से हाथ पीछे खीँच लेता है. ‘ठक’ से गोला लकड़ी के फर्श पर जा गिरता है.
“कौन है.....?” एक भारी आवाज़ आती है और बड़ी सी खिड़की के पास वाली आराम कुर्सी हिलने लगती है.
“ह-हम हैं.” डरा हुआ चिटकु हकलाता है.
“ओ! आप मालिक आइये बैठिये.” हिलती कुर्सी से आवाज आती है.
“हम काले जादू और जीवों की उत्पत्ति के बारे में किताब देख रहे हैं. मिल नहीं रही” चिटकु, कहता है.
“ऊपर से पहली कतार सबसे बाएं. मालिक.” कुर्सी से आवाज़ आती है. चिटकु बताई जगह से वो किताब उतार लेता है.
“काल दर्पण” किताब में से रौबीली आवाज़ आती है, जैसे किताब को ओंठ मिल गए हों.
चिटकु के हाथ कांप जाते हैं. लेकिन हिम्मत कर वो अगला पेज पलट डालता है. किताब को फिर से होंठ लग जाते हैं:
                 “चेतावनी! है ये किताब बड़ी खराब, गर न लगे अच्छे बुरे का हिसाब.
                        महान खोजों की संरचना है, दूर रहो गर बचना है.
                भूत, प्रेत, दैत्य, चुडेल...मीलेंगे आसानी से, सुनना मुझे सावधानी से.”
“पहला अध्याय: रूप परिवर्तन.” चिटकु के कुछ पन्ने आगे पलटते ही किताब फिर से बोल पड़ती है.
           कुछ लाइनों को पढ़ने के बाद किताब एक मन्त्र बोलती है, “गज्कर्नी” सुनते ही दोनों के कान हाथियों की
             
तरह बड़े और भारी हो जाते हैं जिससे दोनों ही फर्श पर गिर पड़ते हैं. मुश्किल से उठकर फिर से पेज बदले जाते हैं तो किताब भी बोलती जाती है और चोरों के रूप परिवर्तन का चक्र भी चलता रहता है, कभी नाक लम्बी तो कभी जीभ बड़ी, कभी बाल सफाचट, तो कभी नाक से बालों के गुच्छे बाहर. दोनों ये सोचकर पुस्तक बंद कर देते हैं कि कहीं भूत-प्रेत ही न निकल आएं. चिटकु थककर कुर्सी पर बैठ जाता है. कि अचानक कुर्सी उसे उछालकर फर्श पर ओंधे मुंह पटक देती है.
“कौन हो तुम” कुर्सी पूछती है.
“तुम्हारा मालिक जादूज” चिटकु कहता है.
“नहीं हो सकते” कुर्सी गरजती है, वो शायद स्पर्श महसूस कर जादूज को पहचानती थी.
“क्या तुम मेरी आवाज़ को नहीं पहचानती...अम्म..” चिटकु उठकर कहते हुए ठहर जाता है. उसकी आवाज़ बदल चुकी थी. शरबत का असर खत्म हो चुका था. अब भागने में ही भलाई थी, लेकिन कैसे. कि तभी कुर्सी के पीछे की खिड़की खुलती है और दोनों ही फर्श पर बिछी कालीन द्वारा घर से बाहर पटक दिए जाते हैं.
“हाए...मार डाला.”, “हमरी कमरवा..” दोनों चींखते हुए बाहर जा गिरते हैं.
           किताब अभी भी चिटकु के पास ही थी. कुछ देर मिट्टी पर पड़े रहने के बाद दोनों चोर उठकर हवेली की और किसी बड़े इनाम की उम्मीद में चल देते हैं. देरी के बाद भी दोनों ने ये साबित तो कर ही दिया था कि दोनों ही काम के हैं. जब दोनों अपना इनाम मांगते हैं तो उन्हें दूसरा काम बता दिया जाता है. और ये काम था, महल जाकर राजा को काबू करने का. दोनों के शरीर पर तो जैसे मकड़ियां नाचने लगी थीं. दोनों इधर से उधर उछलते हुए लगातार बोलते ही जा रहे थे.
“तुम्हारा तो दिमाग हिल गया है, महल न जाओ शोचाल्या हो आओ. क्या अपनी बाजुओं को अपनी टांगों के बीच दबाकर हल्का होने जैसे आसान काम है ये मियां..” चिटकु अपने कहे अनुसार पोजीशन बनाते हुए कहता है.
“अँधेरी सी कोठरिया मां बैठकर तुम्हार दीमाग मां भी अंधेर हुई गवा है का. महल जाए हमार जूती और हम जाएं अपने घर...” कूब उन्हें शांत रखने की बड़ी कोशिशें कर रहा था पर वे तो जैसे चिड़ियाघर के जानवरों की तरह बस चैं-चैं करते जा रहे थे. अब बूढ़ी के सब्र का ‘डैम’ जैसे टूट ही गया था.
“चुप करो, बात सुनो..” वो बूढ़ी फुफकारते हुए उनकी तरफ बढ़ती है और नजदीक पहुंचकर अपने सिर पर पहना स्कार्फ हटा लेती है.
           कूब अभी भी चिल्लाए जा रहा था लेकिन कमरे में चोरों सी खामोशी छा गई थी. सबको खामोश देख कूब एकदम चुप होते हुए बगलें झांकने लगता है. दोनों चोरों के सामने एक भयावह दृश्य था. आज दोनों वो देख रहे थे जो उन्होंने सिर्फ सुना ही था. जादूगरनी उनके सामने अपनी काली आंखों और बालों की जगह लहराते हुए साँपों के साथ उनके ऊपर चढ़ी हुई थी. उसके सर्प हवा में इधर से उधर, आपस मे उलझते हुए, दोनों चोरों की तरफ अपने टपकते जहर वाले फन फैलाए लहरा रहे थे. उसकी भौहों पर भी दो सर्पों जैसी आकृतियां थीं जो एक दूसरे की और फन खोले हुए थे. कुल मिलाकर एक डरावना दृश्य था वो.
“ज-ज-जा-जड़-जादुगरनीर्ईईई.ी.ी.ी.ी.”, मिटकु जितना जोर से हो सकता था, चिल्लाता है.
           चिटकु की तो जैसे बोलती ही बंध गई थी. अब उन्हें मालूम हो रहा थे कि वे किस के लिए काम कर रहे थे. अब जादूगरनी बोलती जा रही थी और वे दोनों कांपते हुए सुनते जा रहे थे. वो उन्हें डराने धमकाने के बाद उन्हें इस

काम के लिए मजबूर कर लेती है. उन्हें आवाज़ और रूप परिवर्तन के लिए शरबत दी जाती है और कोई भी चलाकी करने पर उन पर ‘काल दर्पण’ में से कोई जादू छोड़ देने की धमकी के साथ, उन्हें महल रवाना कर दिया जाता है.         अब शाम हो गई थी. आखिर दोनों जादूगरनी के चंगुल में कैसे फंस गए. उन्होंने जादूगरनी का नाम तो सुना था पर उसे और उसकी हवेली को कभी देखा नही था. दोनों उदासी में कई बार ख़ामोशी से एक दूसरे की तरफ देखते हैं लेकिन फिर सिर नीचे कर आगे बढ़ते रहते हैं. रास्ते में दोनों इसी बात पर विचार कर रहे थे कि इस झंझट से कैसे बचा जाए. लेकिन जादूगरनी से कहीं भी छिपने की उम्मीद उन्हें कतई नहीं थी. इसी उधेड़ बुन में दोनों महल के बगीचे से होते हुए महल के बाहर पहुंच जाते हैं. वहां डोंजा खान और घोंजा राम पहरा दे रहे थे. उन्हें देख चोर छिप जाते हैं और अंदर जाने के बारे में योजना बनाने लगते हैं.
“रूप बदलना होगा.” चिटकु कहता है.
“किसका?” मिटकु पूछता है.
“मैं मेजर और तुम सूबेदार के बारे में सोचो.” चिटकु कुछ सोचकर कहता है.
           इतना कहकर दोनों ही अपने-अपने पेय निकाल लेते हैं. उन्हें करना यह था कि वो जिस भी शक्श में अपना परिवर्तन चाहते थे, उन्हें शरबत पीने के बाद उसके बारे में सोचना था. चिटकु, मेजर में बदल जाता है और मिटकु, ‘सूबा’ सूबेदार में. इसके बाद दोनों ही गेट के पास पहुंचते हैं. उन्हें देखकर डोंजा खान और घोंजा राम उनका हाल-चाल पूछते हैं और उनके महल में आने का कारण पूछते हैं. सूबेदार बना मिटकु राजा से मिलने की बात कहता है, लेकिन वो जल्द ही बोलना बंद कर देता है क्योंकि उसकी आवाज़ ‘सिपा’ सिपाही जैसी निकल रही थी. इस पर डोंजा खान उसका गला खराब होने की बात कहता हुआ उसे शक की निगाह से देखने लगता है.
“एई शाला! अबाउट टर्न! जल्दी चलो, मियां!” बात को सम्भालने के चक्कर में चिटकु खुद गलती कर बैठता है. लेकिन इसे अनसुना कर डोंजा खान और घोंजा राम पीछे की तरफ मुड़ जाते हैं.
           गलती कहां हुई थी, सोचते हुए चिटकु और मिटकु महल के अंदर चले जाते हैं. शायद मिटकु ने सूबेदार और सिपाही को अपने दिमाग में घुमाते हुए शरबत पिया था. अंदर वे राजा के कक्ष की और जाने वाले गलियारे की और मुड़ जाते हैं. बीच रास्ते में उन्हें सेनापति राणा जी मिलते हैं. तो चिटकु, मिटकु को चुप रहने की सलाह देता हुआ राणा जी को सलाम कहता है:
“शलाम राणा प्रताप जी. कैशा है.” चिटकु मेजर बहादुर गोम्पा के लहजे की नकल करता है.
“’प्रताप’ नही ‘भ्रताप’, भोत घनो भायो, कैसे आयो.” कहते हुए राणा जी अपने कान पकड़कर, सीना चौड़ा कर लेता है.
“माहराज शे मिलने.” मेजर बना चिटकु कहता है.
“ऐ इतणा चुप काहे है भाया. थारे मुंह णे के भौंरा काटे है”. राणा जी हंसते हुए पूछता है.
           राणा जी के कहते ही मिटकु जैसे ही अपना मुंह खोलता है तो उसमें से एक भंवरा भिन्न-भिन्नाता हुआ बाहर उड़ जाता है. ये देख राणा जी ठहाका मारता हुआ वहां से चला जाता है. चिटकु हैरानी से मिटकु की और देखता है जैसे मिटकु से भंवरे का राज़ पूछ रहा हो. मिटकु भी अपने कंधे उचकाकर मना कर देता है. इसी उलझन में दोनों राजा के कक्ष की और बढ़ जाते हैं. अब राजा के कक्ष के बाहर पहुंचकर दोनों कक्ष में राजा को ना पाकर उसे ढूंढने के लिए एक गोल गलियारे की तरफ अलग-अलग चले जाते हैं. दोनों ही अपने परिवर्तन के लिए शरबत पी लेते हैं. तभी जादूज

बने चिटकु को, राजा एक बड़ी सी खिड़की के पास खड़ा पाता है. उसका चेहरा चमक उठता है. अब बस उस ठिंगने और तोंद वाले दाढ़ीदार बूढ़े को दबोचना भर ही था. कि तभी राजा उसे देख लेता है.
“ओह! जादूज जी, अच्छा हुआ जो आप आ गए जरा रुकिये मैं आपको कुछ दिखाना चाहता हूं.” कहते हुए राजा गोल गलियारे की दूसरी तरफ मुड़ कर अपने कक्ष से कुछ लाने के लिए चल पड़ता है. तभी जादूज उसे अपने आगे से आता हुआ दिखाई देता है.
“आप तो अभी वहां...” उसे देख राजा ठहर जाता है.
           तभी पीछे से एक और जादूज आ जाता है जो कि जादूज के भेस में चिटकु था. जो राजा को दबोचने के लिए उसके पीछे-पीछे चला आया था. रूप परिवर्तन में एक और गड़बड़. राजा दो-दो जादूज को देखकर चिल्लाकर उछलकर पड़ता है.....’आ’.... दोनों चोर भी अपनी इस गलती को देखकर चौंक जाते हैं और एकसाथ चिल्ला पड़ते हैं.....’आ’..,..’आ’... अब समय गंवाने का समय ही न था, दोनों ही राजा पर उछल पड़ते हैं. राजा अपने कमरे की और दोड़ लगाता है. दोनों ही उसे उसके कमरे में घेर लेते हैं और उसे हाथों और टांगो से पकड़ लेते हैं. राजा चिल्लाने लगता है. तभी राजा को पकड़े हुए दोनों चोरों के हाथ अपने आप ही खुलने लगते हैं और दोनों हवा में उठ जाते हैं. जादूगर जादूज वहां पहुंच चुका था. कुछ देर हवा में लटके रहने के बाद दोनों चोर ‘धम’ से फर्श पर गिर जाते हैं और साथ ही उनका रूप भी बदल जाता है.
“भगवान का शुक्र है जो आप समय रहते पहुंच गए नहीं तो जाने क्या हो जाता.” राजा हांफता है.
“कौन जाने क्या होता है, कोई पाता है कोई खोता है. भंवरा, चमाट वाही पाता है.” जादूज चोरों की और आंख मारते हुए कहता है. ‘भंवरा और चमाट’, जादूगर के कहे इन शब्दों से कुछ शंका नही होती आपको.
खैर, दोनों चोरों को बंदी बना लिया जाता है. वहां हवेली में जादूगरनी जितना चिल्ला और उछल-कूद कर सकती थी, वो करती है और हर बार की ही तरह अपने जादू से कूब के दर्द भरे ‘कूब’ को और ऊंचा उठा देती है. बेचारे कूब को उसकी सेवा का दर्दभरा फल हर नाकामयाबी पर जरुर मिलता था, कारण चाहे कुछ भी हो.
           उधर रात घिर आई थी. संयूरी के घर पर रात को होली की दावत पर चंद्रा बिना संयूरी के कॉल के ही पहुंच चुका था. दावत के बाद सभी सोने के लिए चले जाते हैं. चंद्रा और संयूरी के पिता मय्यर साहब को छोड़कर. उनके बीच कई बातें चलती रहती हैं. संयूरी के नामकरण के बारे में पूछने पर मय्यर रेड्डी बताते हैं कि संयूरी की मां को ‘मंयुरी’ नाम पसंद था और उन्हें ‘संजोगिता’. बाद में दोनों के मेल से ‘संयूरी’ नाम सामने आया.
“आज संयूरी ने बताया कि उसने कैसे तुम्हारे साथ बीच पर समय गुजारा.” मय्यर रेड्डी, चंद्रा की और मुस्कुराहट के साथ देखते हुए कहते हैं.
“वो...मैं माफ़ी चाहता हूं कि मुझे उसके साथ ऐसा बर्ताव करना पड़ा. आगे से ऐसा नहीं होगा.” चंद्रा के चेहरे पर शर्म के भाव देखे जा सकते थे.
“अरे नहीं. अलबत्ता, मुझे तो ख़ुशी है कि आखिरकार संयूरी ने किसी लड़के को अपनाया तो सही. नहीं तो संयूरी ने इससे पहले लड़कों के साथ झगड़े ही किये हैं. लेकिन हां, मैं उसकी और से उसके बर्ताव के लिए तुमसे माफ़ी मांगता हूं. और न चाहते हुए भी उसका साथ देने के लिए, बेटा थैंक्स! उसकी मां के बाद वो इतनी खुश पहले कभी नजर नहीं आई जितनी वो आजकल रहती है. हो सके तो उसे बर्दाश्त करना सीख लो. वैसे उसे बदलने की कोशिश तो करेंगे ही हम दोनों.” कहते हुए मय्यर रेड्डी की आंखें ख़ुशी के कारण नम हो रही थीं.

“बर्दाश्त...! अंकल उसे बदलना होगा, थोड़ा हम बदलेंगे और थोड़ा वो...” चंद्रा, मय्यर रेड्डी का हाथ पकड़ते हुए उसे ढांढस बंधाता है.
           कुछ दिन और बीत जाते हैं और लिल्लीपुट के थाने में बंद दोनों चोर थाने से निकल भागते हैं और हवेली पहुंच जाते हैं. वहां वे अपने काम का इनाम बहुत सारे नगीने मांगते हैं. शांत जादूगरनी उन्हें सबक सिखाने के लिए शक्ति और ताकत से भरपूर एक शरबत पीने के लिए देती है. जिससे वे सब कुछ कर सकते थे और पा सकते थे. वे जादूगरनी के डर के कारण उसे वहां नही पीते. रात को अपने कोठर में मिटकु उठकर चुपके से लालच में वो शरबत पी लेता है और ख़ामोशी से सो जाता है, जैसे कुछ हुआ ही ना हो. मिटकु जब सुबह उठता है तो उसे बहुत तेज दर्द हो रहा था. चिटकु उसे उसकी इस हरकत के लिए खूब डांट लगाता है. मिटकु अपना सारा दिन पूरे बदन के भयंकर दर्द में काट देता है. अगले दिन जब चिटकु उठता है तो चींख पड़ता है. वो क्या देखता है कि कोठर के अंदर मिटकु का सिर्फ विशाल सिर ही था और बाकी धड़ कोठर से बाहर निकला हुआ था जो कि लगभग नौ फीट का होगा.
           अब चिटकु, मिटकु को चिल्लाते हुआ उठाता है. मिटकु जैसे ही उठता है उसका सिर कोठर की छत से टकरा जाता है. अब दोनों समझ गए थे कि जादूगरनी का ‘शक्ति’ से क्या मतलब था. बस फिर क्या था मिटकु शक्ति में मग्न पुरे जंगल का चक्कर लगाने लगता है और मूर्खों की तरह जानवरों को डराता फिरता है. बेचारा चिटकु उसे सारा दिन ढूंडता ही रहता है. वो जहां भी जाता है मिटकु के छोड़े हुए निशान उसे मिलते रहते हैं, जैसे- बिलखता कुम्हार और उसके फूटे हुए मटके, बढ़ई का टूटा हुआ लकड़ी का सामान, किसान के उजड़े खेत, सब्जी वाले की ओंधे मुंह पड़ी रेहड़ी जिसपर से सब्जियां गायब थीं. मिटकु द्वारा तोड़ी हुई पेड़ों की टहनियों का पीछा करता हुआ चिटकु लिल्लीपुट के दैत्य ‘जायत’ की गुफा वाली पत्थरीली चोटी पर पहुंच जाता है.
           वहां उसे गुर्राने और दहाड़ने जैसी आवाज़ें सुनाई दे रहीं थीं. कहीं दैत्य ने उसे पकड़ तो नहीं लिए था, अब वो उसके दो टुकड़े करने ही वाला होगा सोचते हुए चिटकु की चिंता बढ़ जाती है. डरते-डरते वो उन चट्टानी किनारों पर चढ़ता है और देखता है कि दैत्य और दैत्य बना मिटकु दोनों आपस में उलझे हुए थे. एक-दूसरे को धकेलते हुए, उठाकर पटकते हुए, टांगे-बाल-दांत खींचते हुए वे जैसे एक-दूसरे के खून के प्यासे हुए जा रहे थे. जब से दैत्य ने मिटकु को तंग किया था, मिटकु उससे बदला लेने के लिए तड़प रहा था. वो हर दिन चिटकु से दैत्य से बदला लेने की बात करता रहता था. तभी दैत्य उछलता और धूल उड़ाता हुआ चिटकु के पास आकर गिरता है. चिटकु आगे आकर मिटकु को समझाने की कोशिश करता है कि शरबत का असर खत्म होने वाला होता ही होगा. लेकिन मदमस्त मिटकु उसकी एक भी नही सुनता और दैत्य को जमीन से उठाने के लिए उसे उसकी बगलों से पकड़ लेता है. कि तभी पलक झपकते ही दैत्य बना मिटकु, चिटकु की आंखों से ओझल हो जाता है.
           हैरान चिटकु दैत्य की और देखता है, मिटकु फिर से अपने छोटे बौने आकार में वापिस आ गया था. मिटकु, दैत्य की छाती पर इस तरह से टांगें और बाहें फैलाए पसरा था मानो कोई बच्चा अपनी मां की छाती से चिपका हुआ हो. अब इससे पहले कि दैत्य उठकर उन दोनों के आकार को और भी छोटा करता, चिटकु पसरे हुए मिटकु को दैत्य की छाती पर से उठाता है और दोनों ही भागने की कोशिश करते हैं. दैत्य उठ खड़ा होता है और उन दोनों के पीछे भागता है. दोनों अपनी जान बचाने के लिए जितनी हो सकती थी तेज दोड़ लगा देते हैं. लेकिन दैत्य जल्दी ही उनके पास पहुंच जाता है और उन्हें पीछे से एक कसकर लात मारता है. दोनों ही फुटबॉल की तरह पेड़ों की टहनियां तोड़ते हुए कहीं गायब हो जाते हैं.
           रात को दैत्य से डरकर यहां-वहां भटकते रहने के बाद दोनों जब आधी रात को जंगल में अपने कोठर के पास पहुंचते हैं तो ये देखकर परेशान हो जाते हैं कि दैत्य ने उनका कोठर वाला पेड़ जड़ों से ही उखाड़ फैंका था. तभी

बारिश शुरू हो जाती है. अब बेचारे दोनों ही चोर उस भिगा देने वाली बारिश में बिना किसी छत के आपस में दुबककर बैठे रहते हैं. उन्हें कुछ और समझ आया हो न हो पर उन्हें ये जरुर समझ आ गया था कि एक पागल जादुगरनी के चंगुल में फंसना कितना नुसानदेह हो सकता है.
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MONTH’9ne’ APRIL
राजकुमारी का अपहरण

                              अपने चल रहे बुरे दिनों में संयूरी, चंद्रा के लिए ख़ुशी का लम्हा बन कर आई थी. लेकिन उसकी यह ख़ुशी ऑफिस में पहुंचते ही गुल हो जाती थी. रेश्ना का पीछा करने के बाद से चंद्रा का ऑफिस में बर्ताव कुछ बदल गया था. रेश्ना के लिए तो वो बिलकुल ही बदल चुका था. वो ना तो उससे ज्यादा बात करता था और ना ज्यादा मजाक. अब वो आदत से मजबूर उसे देखता तो था लेकिन उसे पता लगे दिए बिना. अब रेश्ना भी उसकी तरफ नजरें चुराकर देखती थी मानो उसे समझ आ गया था कि चंद्रा ऐसा क्यों कर रहा था.
           वैसे भी रेश्ना कुछ सीमित खुलेपन वाली लड़की थी. वो सब के सामने किसी से भी ज्यादा खुलकर बात नहीं करती थी. बस चंद्रा के उस पर किये एहसानों की वजह से उसके हद से ज्यादा किये मजाक सह लेती थी. जैसे उसका ‘रोज डे’ वाला मजाक. अब दिनों के ‘रोज-रोज’ आने वाला मजाक तो ठीक है लेकिन किसी लड़की को आप अगर ‘बेवकूफ’ कहेंगे तो वो आपको क्या ‘धूप’ डालेगी. इसे छोड़ दीजिये, जब सभी प्रेमी जोड़े ‘वैलेंटाइन डे’ के दिन अपने प्यार का इज़हार करते हैं तब भी तो चंद्रा ने रेश्ना की और कोई संजीदा रुख नहीं अपनाया था. अब ऐसे में कोई क्या मतलब निकाल सकता था. एक दिन तो चंद्रा ने किसी बात पर रेश्ना को इंजेक्शन किसी जानवर की तरह घोंपकर लगाने का मजाक कर डाला था. उस दिन तो रेश्ना ने मुस्कुराते हुए उसे ‘बतमीज़’ कहकर इग्नोर कर दिया था. लेकिन शायद ऐसे ही कई मजाक रेश्ना को उससे दूर ले गए थे. बहुत दिन हो चले थे, जब नकिल से चंद्रा का बदला बर्ताव सहा नहीं जाता तो वो उससे इसका कारण पूछ ही डालता है.
“यार वो जिस ढंग से मेरे साथ बात करती थी, उससे कभी नहीं लगा कि वो किसी के साथ है और मैं गधा समझता रहा कि....” चंद्रा का मन टूट गया था और भावुक हो रहा था.
“तुझे कब से समझाता था पर तू सुने तो. बस अंधा आशिक बना हुआ उसका कष्ट हरता बना हुआ था. क्या जरूरत थी अपना इतना समय उसके पीछे बर्बाद करने की. देख वैसे भी तुझे लड़कियों की समझ नहीं है. बेटा उन्हें पटाने के लिए उनका सचा आशिक बनकर दिखाना पड़ता है चाहे तेरा प्यार झूठा ही हो. तेरी तरह नहीं कि हंसी मजाक कर लिया और समझ लिया कि पट गई लड़की. वैसे भी तेरा मजाक उसके साथ कुछ ज्यादा ही हो जाता है. यार लड़की को प्यार के साथ पकड़ना चाहिए. जैसे किसी कांटेदार गुलाब को पकड़ा जाता है. खूबसूरती निहारनी है तो हल्के से पकड़ो. नहीं तो कांटे चींखें निकलवा देते हैं और गुलाब हाथ से छूट जाता है.” नकिल चंद्रा को समझाता है.
“यार मानता हूं कि मैं कुछ ज्यादा ही मजाक कर दिया करता था जो उसे पसंद ना आता होगा. लेकिन क्या उसे मेरी मदद और मेरा उसके पीछे समय बर्बाद करना नहीं दिखा.” चंद्रा रुआंसा सा हो गया था.
“यार लड़कियां होती ही किसी तितली की तरह हैं. प्यार से हाथ बढ़ाओगे तो बैठेंगी नहीं तो उड़कर कहीं और. और तूने कभी उससे बात भी की? बस मन ही मन उसका आशिक बना फिरता रहा.” नकिल भी कुछ उदास सा हो जाता है.
“देख अब मूड खराब ना कर. अब तो मेरी ट्रीट बनती है.” नकिल माहौल बदलने की कोशिश करता है.
दोपहर को ऑफिस में लंच के बाद नकिल चंद्रा के पास आकर गप्पे मारने लगता है.
“अबे, तेरी मैडम तेरे बारे में पूछ रही थी.” नकिल आंख मारते हुए कहता है.

“क्या कह रही थी...वो.” चंद्रा आंखें ऊपर करते हुए पूछता है.
“वो तेरे बदले हुए बर्ताव के बारे में पूछ रही थी. तू आजकल उसे ज्यादा घास जो नहीं डालता है. शायद उसे बुरा लग रहा होगा.” नकिल कमीनी मुस्कुराहट लिए कह रहा था.
“तो तूने क्या बताया?” चंद्रा उत्सुकता से पूछता है.
“कह दिया कि तेरी गर्ल फ्रेंड तुझे छोड़ कर चली गई. सो तू दुखी रहता है.” नकिल हल्की हंसी के साथ कहता है.
“अबे साले, तू दोस्त है कि.....क्या कहा उसने” चंद्रा आंखें निकालकर नकिल की और देखता है.
“तेरी किस्मत को रो रही थी. उसे बड़ा अफ़सोस हो रहा था....प्यार जो करती है तुझसे” नकिल आह भरते हुए कहता है.
“मेरी तो किस्मत सच में ही खराब है. एक तो झटके पे झटके और ऊपर से तुझ जैसा दोस्त. यार वैसे उसे भी मैं दोष नहीं देता. उसके बड़े-बड़े ख़्वाब, मुझ जैसा छोटा नौकरीधारी कहां पूरे कर पाता. तू ठीक ही कहता है, मैने....अगर उसे अपने मन की बात पहले बता दी होती तो शायद वो अपनी इच्छाओं पर काबू पा लेती. तू ठीक ही कहता है मुझे लड़कियों की समझ नहीं है. एक इसे नहीं समझ पाया और दूसरी वो थी..................”
“बस कर बिना पारो के देवदास. तू ऐसा देवदास है जिसकी पारो उसकी कभी थीं ही नहीं.” नकिल चंद्रा की बात बीच में ही टोकते हुए कहता है.
“यार तू खुद बता, किसी अनजान लड़की का तुझे फ़ोन आता है और तू बिना देखे, परखे, जाने उससे प्यार कर बैठता है. अब ऐसी लड़की तुझे धूप डालेगी क्या? उसने तेरा इस्तेमाल किया और फिर एक दिन नए बकरे के साथ चलती बनी. अब बस कर मेरा भी मूड खराब मत कर नहीं तो मैं रेश्ना को सब बता दूंगा कि तेरी गर्ल फ्रेंड कौन थी.” नकिल आंखें तिरछी कर रेश्ना की और उंगली दिखाते हुए कहता है. तभी उसे चंद्रा की मेज पर वो लॉकेट पड़ा हुआ मिलता है.
“वा...यार, इतनी प्यारी चीज़ तेरे पास कैसे. ठहर.....कहीं तूने ये रेश्ना को देने के लिए तो नहीं.....? ठहर, मैं अभी भेजता हूं उसे तेरे पास. इसे देख शायद उसका इरादा बदल जाए, तेरे लिए.” नकिल हल्की हंसी के साथ वहां से चला जाता है.
शाम की छुट्टी के वक्त रेश्ना ऑफिस से जाते हुए चंद्रा की तरफ सहानुभूति के भाव लिए देखती है.
           दूसरी और लिल्लीपुट में भी बहुत दिन बीत गए थे. अपने साथ हुए चंद्रा के बर्ताव से दुखी सुपर्णा अपना ध्यान बांटने के लिए लिल्लीपुट की कुदरत निहारने का फैसला लेती है. उसकी बड़ी बहन भी सुपर्णा के साथ चलने का फैसला लेती है. दोनों के लिए रथ तैयार करवाते हुए राणा जी सुपर्णा से नजरें चुराने की कोशिश कर रहा था. साथ में दोनों सिपाही डोंजा खान और घोंजा राम भी जा रहे थे. डोंजा खान सारथि बना हुआ था. राणा जी, डोंजा खान को रथ आराम से चलाने का सुझाव देता है जिसे डोंजा खान चल पड़ने का आदेश समझकर रथ दौड़ा देता है. उस समय राणा जी का एक पांव रथ के ऊपर ही था, सो राणा जी रथ के साथ फंसकर कुछ दूर तक घसीटता हुआ चला जाता है. रथ के रुकने पर डोंजा खान को खरी-खरी सुनाने के बाद राणा जी अपने पुट्ठों को पकड़कर महल की और चला जाता है. सुपर्णा शायद मन ही मन हंस पड़ी होगी लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे.
           रथ लिल्लीपुट की प्यारी और शांत नहर के किनारे-किनारे, कुदरत में डूबे हुए एक खुबसूरत पर छोटे से एक तालाब के पास जा पहुंचता है. उसमें कमल के पत्तों के जैसे पत्ते तैर रहे थे और पानी एकदम साफ था. उस तालाब में एक अजीब सा बड़ा पेड़ खड़ा था जिसके तने के चारों और मोटी-मोटी बेलें लिपटी हुई थीं. उन बेलों की दरारों के बीच में से कई जगहों पर पानी की मोटी-मोटी फुहारें छूट रही थीं. पेड़ के सबसे नीचे सुंदर पीले और लाल फूल थे जो काँटों से

ढके हुए थे और उसके ऊपर रंग-बिरंगे फूलों का मेला सा लगा हुआ था जिनके चारों और कोई भी काँटा नजर नहीं आ रहा था. बहुत ही आश्चर्यजनक और मनोरम दृश्य था वो. इतने सालों में सुपर्णा उस हैरान कर देने वाली सुंदर जगह पर पहले कभी भी नहीं आई थी. कुदरत की खूबसूरती निहारते-निहारते वो सब शायद जंगल के प्रतिबंधित हिस्से की और चले आए थे.
           तभी वहां दोनों बहनों को ऊपर की ओर जाती सीढ़ियां दिखाई देती हैं. हर परिस्थिति से अनजान दोनों मदहोश सी सीढ़ियां चढ़ने लगती हैं. सिपाही उन्हें जैसे ही रोकने की कोशिश करते हैं, वैसे ही हवेली का दरवाजा खुल जाता है और धुएं के बीच में से एक बौनी काया बाहर निकलती है जो किसी औरत की लग रही थी. सिपाहियों के जिस्मों से तो जैसे सांप लिपट गए हों. हलकी सी कंपकंपाहट के साथ हलक से केवल ‘अ..अ..अ’ की आवाज ही आ रही थी. स्तिथि का आभास होते ही दोनों राजकुमारीयां मुड़कर भागने की कोशिश करती हैं लेकिन जादूगरनी उनका हाथ थामते हुए बड़ी ही सौम्यता के साथ दोनों की आंखों में अपनी आंखें डाल देती है. दोनों जादूगरनी को स्तब्ध सी खड़ी देखने लगती हैं. घोंजा राम मौके पे चौका लगाने की सोचता है और कुमारी को खींचने के लिए जैसे ही अपना हाथ बढ़ाता है, वैसे ही जादूगरनी भयानक ढंग से चिल्लाती हुई अपनी काली आंखों के साथ उसकी और लपक पड़ती है और उसके सिर के नाग रूपी बाल उसे डस लेते हैं. तो दूसरा सिपाही भी उसकी इस भयावता से बच नहीं पाता. घोंजा राम उसी वक्त बेहोश होकर लुढ़क जाता है और डोंजा खान दर्द में कर्राहने लगता है.
           लिल्लीपुट में चंद्रा की अनुपस्थिति से सिर्फ एक ही शख्श आनंदित हो सकता था, हमारे सेनापति राणा जी. राणा जी अपने आदर्श, महान राजपूत राजा महाराणा प्रताप की फोटो की पूजा कर, अपने माथे पर तिलक लगाकर, पूरी राजस्थानी आन-बान और शान के साथ अपने घोड़े पर सवार सरपट दौड़े जा रहा था. रास्ते में उसे हमारे पुजारी जी ‘हरी.ॐ..श्री वाहे गुरु..गॉड..खुदा सबका भला करें’ का जाप करते हुए कहीं जाते हुए दिखाई देते हैं. राणा जी रुककर पुजारी से पूछता है कि वो कहां जा रहा था. पूजारी उसे बताता है कि उसे गद्दु गडरिये ने पुजारी के पांव छूने की अपनी मन्नत पूरी करने के लिए आमंत्रित किया था. पुजारी भी राणा जी को अपने संग चलने का न्यौता देता है. भूख तो लगी थी, सोचकर की पुजारियों के भोजन में काफी पकवान खाने को मिलते हैं और काफी आवभगत भी होती है, राणा जी, पुजारी के साथ चलने को तैयार हो जाता है. अब दोनों ही लिल्लीपुट शहर के बाहर गांव को लांघते हुए एक पहाड़ी पर चढ़ने लगते हैं. चूंकि वहां तक घोड़ा नहीं पहुंच सकता था सो उस थका देनी वाली चढ़ाई को चढ़ने में उन दोनों के पसीने छूट रहे थे. अब राणा जी को अफ़सोस होता है कि वो आवभगत की लालच में क्यों आया था.
           मार डाल देने वाली चढ़ाई चढ़ने के बाद वो दोनों एक घर के सामने आकर रूक जाते हैं. घर के बाहर दो कुत्ते बाहर पड़े हुए खाने पर मुंह मार रहे थे. मैले कुचैले कपड़े पहने गद्दु गडरिये उनका स्वागत करता है और घर के अंदर बैठा देता है. बैठाने के बाद गद्दु गडरिया दोनों से अपनी भेड़ों के मिलने की बात पूछता है. दोनों मेहमान उसकी भेड़ें ना मिलने की बात कहकर अनुष्ठान क्रिया आरम्भ करने के लिए कहते हैं. अनुष्ठान से पुजारी का मतलब शायद भौजन से रहा होगा क्योंकि इतनी चढ़ाई चढ़ने के बाद उसके पेट से ना जाने कैसी-कैसी आवाजें आ रही थीं. राणा जी भी इसी इंतज़ार में था कि कब उनकी पूजा खत्म हो और उसे स्वादिष्ट भौजन खाने को मिले. वैसे उस मेजबान बौने की हालत देखकर लग तो नहीं रहा था कि उसके उन गंदे हाथों से कुछ भी अच्छा बना होगा. खैर जैसा भी बना होगा अब बस मिल जाए.                                                                          
           इतने में गद्दु दो बड़ी थालियों को ले आता है और धूप जलाकर दोनों के सामने रख देता है. शायद खाना रखने के बाद पूजा आरम्भ होगी, सोचकर राणा जी देखता रहता है. फिर गद्दु गडरिया एक पानी का लौटा लाकर उन थालियों में दोनों मेहमानों के पैर धोता है जिससे पुजारी खुश होकर उसे बड़े आशीर्वाद देता है. पांव धोने के बाद वो बौना दोनों को हाथ पंखे से हवा देने लगता है. ठंडी हवा का स्पर्श पाकर दोनों के शरीर में कुछ प्राण जागृत हो जाते हैं. बहुत

देर तक हवा खाते रहने के बाद पुजारी भूख विवश होकर बोल ही पड़ता है:
“भक्त अब कुछ प्रसाद भी तो ग्रहण करवाओ.” कहते हुए भूखे पुजारी के मुंह से चटखारा लेने की आवाज़ सी आती है.          
“माफ़ कीजिएगा पुजारी जी. मैने आपसे कहा था, मेरी मन्नत यही थी कि मैं किसी सिद्ध ज्ञानी के पांव छूकर अपने सात दिनों का व्रत आरम्भ करूंगा और तब तक अपने घर का चूल्हा नहीं जलाऊंगा. ये सब मैं अपनी खोई भेड़ों को पाने के लिए कर रहा हूं. आशीर्वाद दें.” ‘गद्दु गडरिया’ बड़े ही आदर भाव से दोनों के आगे सिर झुककर प्रणाम करता है.
           ये सुनकर तो दोनों के दिमाग की जैसे धुनें ही बिगड़ जाती हैं. उन्हें चक्कर आने लगे थे. इतनी चढ़ाई चढ़ाने के बाद उन्हें पानी पिलाकर और पांव धोकर छोड़ दिया गया था. पुजारी ने अपना आपा खोकर उस बेचारे ‘गद्दु गडरिये’ को ना जाने क्या-क्या श्राप दे डाले थे. राणा जी ने तो खुद से भी लम्बी अपनी तलवार ही निकाल ली थी जिससे डरकर वो बौना घर से ही भाग गया था.
           दोपहर के तीन बजे होंगे. थके हारे भूखे, प्यासे दोनों वहां से वापिस चलने की सोचते हैं. तभी पुजारी को कुछ दूर एक झौंपड़ी दिखाई देती है. पानी पीने की इतनी ख्वाहिश सता रही थी कि दोनों वहां जाने को तैयार हो जाते है. वहां पहुंचकर उन्हें अंदर बैठी एक बुढ़िया और एक बूढ़ा बौना दिखाई देते हैं. दोनों की दुःख भरी कहानी सुनकर दोनों बूढ़ों को बड़ा ही दुःख होता है. दोनों बूढ़े उन्हें बैठकर खाना-खाने के लिए आमंत्रित करते हैं. लेकिन उनके घर में पड़े गंदे-जूठे बर्तनों के ऊपर मंडराती मक्खीयों को देखकर दोनों की भूख और प्यास मर जाती है और दोनों ही वहां से खिसक लेते हैं. अब राणा जी इस सबके लिए पुजारी को दोष दे रहा था. कि तभी पुजारी को फिर से एक और झोंपड़ी दिखाई देती है. पहले तो दोनों वहां तक जाने की मेहनत करने से झिझकते हैं. फिर अपनी हालत पर तरस खाकर दोनों वहां पहुंच जाते हैं.
           उस झोंपड़ी के बाहर खड़े कुत्तों को देखकर पहले तो दोनों ये सोचने लगते हैं कि कहीं वो फिर से गद्दु गडरिये के घर तो नहीं जा पहुंचे थे. अगर वो अंदर हुआ तो वो दोनों उसे पक्का मार देने वाले थे. उनकी ये हालत उसी की देन जो थी. गुस्से में अंदर घुसते ही उन्हें एक बूढ़ी बौनी खाना बनाते हुए दिखाई देती है. अब दोनों की हालत पर तरस खाकर वो उन दोनों को खाना खाने के लिए बैठने को कहती है. बूढ़ी की बातें समझने में दोनों को थोड़ी मुश्किल हो रही थी क्योंकि उसे शायद अपनी बोली के अलावा और भाषा नहीं आती थी. इससे पहले वो आगे बढ़ते दोनों उस बूढ़ी के बर्तनों की और देखते हैं. बर्तन साफ़ और नए जैसे लग रहे थे जिन्हें देखकर दोनों बड़े ही खुश होते हैं, इतने कष्ट झेलने के बाद अब खाना जो मिलने वाला था. लेकिन दोनों को इतना पसीना पड़ रहा था कि वे उस बूढ़ी से हाथ-मुंह धोनें के लिए पानी मांगते हैं. लेकिन पानी की किल्लत की वजह से वो बूढ़ी सिर्फ पीने के लिए ही पानी को बचाकर रखने की बात करती है. अपनी भूखी आत्मा की शान्ति कर लेने के बाद दोनों थोड़ी देर आराम करने लगते हैं.
           अब चलने की बारी थी लेकिन जाने से पहले दोनों ही उस बूढ़ी बौनी के मेहनती होने की तारीफ करते हैं कि कैसे अकेली होते हुए भी उसने अपने घर को साफ़ बनाकर रखा हुआ था. जबकि सामने वाले घर में दो लोग होते हुए भी जूठे बर्तनों में खाना खाते थे जिसका जवाब वो बूढ़ी इस तरह से देती है:
“तां...उन्हा कुत्ते नि हूने ना पालूरे.” उस बुढ़िया ने अपनी भाषा में कुछ कहा था, जो ना तो राणा जी की समझ में आया था और ना ही जिसे सुनकर पुजारी जी की चुटिया में ही कोई हरकत हुई थी. दोनों ही बस उस बुढ़िया का मुंह ताके जा रहे थे. वो बूढ़ी बौनी समझ जाती है कि उसकी कही बात उन दोनों के पल्ले नहीं पड़ी थी. तो वो टूटे लहजे में उन्हें समझाने की कोशिश करने लगती है:
“पानी...नि. पांज किलोमीटर दूर. कुत्ते...साफ़.” बुढ़िया कहते हुए उन्हें घर के बाहर ले जाती है और उन दोनों को वो

पालतु कुत्ते दिखाती है जो कि बाहर रखे हुए बर्तनों को चाट रहे थे. जिससे बर्तन बहुत हद तक साफ़ हो रहे थे.
           अब राणा जी और पुजारी की समझ में बुढ़िया की बातें आने लगी थीं कि बुढ़िया क्या कहना चाहती थी. पहले उन दोनों बूढ़ों के घर कुत्ते नहीं दिखे थे. सो उनके बर्तन चाटकर साफ़ करने वाला कोई ना था. लेकिन इस बुढ़िया के पालतू कुत्तों की जीभ से चाटकर साफ़ किये हुए बर्तनों में वो दोनों अभी खाना का चुके थे. अब दोनों ही उल्टियां मारे बिना कहां रहने वाले थे. पुजारी जी तो अपने मुंह में उंगलियाँ डाल-डालकर सारा खाना निकाल देने को उतारू हुए जा रहे थे. ना जाने क्या हुआ कि पुजारी नीचे पड़ी अपनी उल्टी को खंगालने लग जाता है. पुजारी को थोड़ी देर तक ऐसा करते देख राणा जी चिढ़कर पुजारी से इस हरकत के पीछे का कारण पूछता है. बौखलाया हुआ पुजारी, राणा जी को उल्टी में उसका सोने का दांत गिर जाने की बात बताता है और राणा जी से दांत को ढूंढने में मदद करने के लिए कहता है. तभी पुजारी को उसका सोने का दांत मिल जाता है जिसपर उल्टी के दाने चिपके हुए थे. उस दांत को देखकर राणा जी अपने आप पर काबू नहीं रख पता और पुजारी के हाथ पर ही उल्टी कर देता है जिससे पुजारी का दांत फिर से उल्टी में कहीं खो जाता है.
                    उधर चंद्रा भी लिल्लीपुट से अपने वनवास के दौरान, संयूरी के साथ अपना खाली समय बिताकर लिल्लीपुट से अपना ध्यान भली प्रकार से हटा लेता था. अब दोनों ही दोस्ती के अपने रिश्ते से आगे बढ़ चुके थे. लिल्लीपुट छोड़ने के बाद से इस रिश्ते को तो जैसे पंख लग गए थे. दोनों ही एकदूसरे के बिना एक दिन भी नहीं रह पाते थे. गर चंद्रा किसी वजह से संयूरी से मिल नहीं पाता था तो संयूरी खुद ही कार लेकर उसके पास आ धमकती थी. परसी आंटी भी उनके इस रिश्ते से अच्छी तरह से परिचित थी और संयूरी को कुछ हद तक पसंद करने भी लगी थी, बस उसके गुस्से को छोड़कर.
           आज भी वो गुस्से में डूबी हुई चंद्रा के ऑफिस आ धमकी थी और दूर खड़ी चंद्रा की और एकटक देखे जा रही थी. चंद्रा भी सुबह से उसे इग्नोर किये जा रहा था और उसकी कॉल्स का कोई भी जवाब नहीं दे रहा था. दरअसल संयूरी ने आज दोपहर को चंद्रा के साथ ‘एम्यूजमेंट पार्क’ और ‘जू’ घूमने का मन बनाया था. ‘जू’ घूमने तक तो ठीक था लेकिन एम्यूजमेंट पार्क्स की ‘राइड्स’, सोचकर ही चंद्रा को चक्कर आने लगते थे. लेकिन संयूरी का इरादा भी पक्का था. अब चंद्रा भी बिना कुछ कहे और प्रतिक्रिया किये ऑफिस से बाहर निकल जाता है. जैसे उसे, कुछ कहने पर संयूरी के हंगामा करने का डर था.
           बाहर निकलकर संयूरी पहले तो चंद्रा को फ़ोन ना उठाने के लिए झाड़ लगाती है और फिर उसे चुप-चाप ‘एम्यूजमेंट पार्क’ चलने के लिए कहती है. लेकिन चंद्रा भी ‘एम्यूजमेंट पार्क’ चलने के लिए साफ़-साफ़ मना कर देता है. बार-बार कहने पर भी जब चंद्रा अपना फैसला नहीं बदलता है तो संयूरी उसके आगे एक शर्त रख देती है कि अगर चंद्रा ‘एम्यूजमेंट पार्क’ नहीं जाना चाहता है तो उसे संयूरी के साथ ‘सिनेमा थिएटर’ में चल रही एक ‘रोमांटिक’ मूवी देखने के लिए चलना होगा.
“वो तो कभी नहीं हो सकता. तुम चाहती हो कि मैं अपनी जिन्दगी के दो से तीन घंटे दो बेवकूफों को एक-दूसरे के पीछे नाचते-गाते, रोते-बिलखते देखने के लिए बर्बाद कर दूं.....भूल जाओ!” चंद्रा ने ये बात बड़े ही कड़े शब्दों में कही थीं, जैसे इसका कोई असर होने वाला हो. लेकिन संयूरी की बड़ी होती आंखें उसे अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर देती हैं.
“एम्यूजमेंट पार्क................लेकिन वहां मैं किसी भी राइड पर चढ़ने वाला नहीं. तुम चाहो तो अपनी आंखें अभी से और बड़ी कर सकती हो.” शायद चंद्रा को एक ‘रोमांटिक मूवी’ देखने से ज्यादा आसान काम, ‘एम्यूजमेंट पार्क’ जाना लगा था.
कुछ समय बाद दोनों ही एक प्रसिद्ध ‘एम्यूजमेंट पार्क’ में थे. संयूरी और चंद्रा पहले तो‘एम्यूजमेंट पार्क’ में
         
घूमते-फिरते, खाते-पीते हुए अपना काफी अच्छा वक्त गुजारते हैं. लेकिन आखिर में वो पल भी आ ही जाता है जिसका इंतज़ार चंद्रा को बिलकुल भी न था. संयूरी, चंद्रा को खींचकर ‘रोलर कोस्टर’ ‘राइड’ की टिकट लाइन की और ले जाती है. संयूरी के लाख मिन्नतें करने पर भी जब चंद्रा टिकट लाइन में लगने से मना कर देता है तो संयूरी खुद ही टिकट लाइन में लग जाती है.
           टिकट हासिल करने के बाद संयूरी, चंद्रा को चलकर ‘राइड’ में बैठने के लिए कहती है. लेकिन चंद्रा ‘राइड’ में बैठने से साफ़ इंकार कर देता है. कोई चारा न देख संयूरी लाइन में खड़े एक सुंदर नौजवान की और जाकर उसे अपने साथ ‘राइड’ में चलने के लिए आमंत्रित करती है. संयूरी के इस अमंत्रण को वो नौजवान मना नहीं कर पाता और लाइन से निकलकर संयूरी के साथ ‘राइड’ की और चल पड़ता है. राइड की और जाते हुए संयूरी, चंद्रा को घूरकर देख रही थी. लेकिन चंद्रा ऐसी प्रतिक्रिया देता है जैसे उसे इसकी कोई प्रवाह ही न हो.
अब संयूरी उस नौजवान के साथ ‘राइड’ के पास पहुंच चुकी थी. दोनों ही ‘राइड’ में बैठने के लिये अंदर जाने लगते हैं कि चंद्रा एकाएक पीछे से आकर संयूरी की साथ वाली सीट पर बैठ जाता है.
“ये सीट बुक है. इसपर मैं बैठने वाला था.” वो नौजवान कुछ चिढ़ते हुए कहता है जिसकी चंद्रा कोई भी प्रतिक्रिया न देते हुए दूसरी और देखने लगता है.
“सॉरी! ‘हाउस फुल..’” हल्की सी मुस्कुराहट के साथ संयूरी कहती है.
           वो बेचारा नौजवान खुद को ठगा सा महसूस करता हुआ ‘रोलर कोस्टर’ को अपने से दूर जाते हुए देखता रहता है. चंद्रा अभी भी गुस्से में दूसरी और देखे जा रहा था लेकिन संयूरी के चेहरे पर जीत की मुस्कान थी. अब ‘राइड’ गति पकड़ना शुरू करती है और जल्द ही अपनी अधिकतम गति पर पहुंच जाती है. अब चंद्रा का दिल घबराने लगा था. यूं तो चंद्रा को तेज रफ्तार से कोई गुरेज नहीं था लेकिन ऊपर-नीचे हिचकोले खाता और एकाएक पलट जाने वाला ‘रोलर कोस्टर’ उसके होश उड़ाए दे रहा था. लेकिन चंद्रा का हाथ थामे संयूरी इस पल का भरपूर मजा ले रही थी, चींख रही थी, हंस रही थी. ‘राइड’ के खत्म होते-होते चंद्रा की हालत पस्त हो चुकी थी. खुद को सम्भालते हुए चंद्रा ‘रोलर कोस्टर’ से बाहर निकल जाता है. चकराए हुए चंद्रा को संयूरी कुछ दूरी पर लाकर एक कुर्सी पर बैठा देती है और खुद भी उसकी बगल वाली कुर्सी में बैठ जाती है. संयूरी, चंद्रा के माथे पर हाथ रखकर उससे उसकी हालत के बारे में पूछती है तो चंद्रा उसे बताता है कि उसका सिर चकरा रहा है.
           अपना मुंह रुमाल से दबाए हुए चंद्रा अपनी उल्टी को रोकने की भरपूर कोशिश कर रहा था. संयूरी, चंद्रा को पहाड़ों के टेढ़े-मेढ़े रास्तों के आदि होने की डींगें मारने के लिए चिढ़ाती है. इससे पहले कि चंद्रा कुछ जवाब दे पाता, उसकी कुर्सी को एकएक ही झटका लगता है और वो एक ही झटके के साथ आकाश की और उछाल दिया जाता है जिस वजह से चंद्रा के मुंह से उल्टी की एक मोटी फुहार छूट पड़ती है. वो ‘स्लिंग शॉट’ नाम की नब्बे मीटर ऊंची एक ‘राइड’ पर था जो हू-बहू गुलेल की तरह थी. दो ऊंचे-ऊंचे टावरों के बीच कुर्सियों की दोनों और गुलेल जैसी खिंचने वाली तारें बंधी हुई थीं. ऊपर पहुंचकर ‘राइड’ फिर से नीचे गिरने लगती है. अब ‘राइड’ जतनी जल्दी हो सकता था, ऊपर-नीचे हिचकोले खाने लगती है. उल्टियां मारता हुआ चंद्रा इस बात से हैरान था कि उसके साथ ये सब क्या हो रहा था. दरअसल संयूरी ने जानबुझकर उसे इस ‘राइड’ पर बिठा दिया था और ‘राइड’ के ऑपरेटर्स ने उसे जल्दी से कुर्सी के साथ बांध भी दिया था. राइड के खत्म होते-होते चंद्रा का चेहरा अजीब सा रंगीन हो चुका था. वो जितनी जल्दी हो सकता था दोड़कर एक कोने में पहुंचकर बाकि बचा खाना भी बाहर निकाल देता है.
  बस, अब चंद्रा बिना कुछ कहे ही ‘एम्यूजमेंट पार्क’ से बाहर निकल जाता है. संयूरी भी उसके पीछे-पीछे

बाहर आ जाती है. संयूरी अभी भी चंद्रा को चिढ़ा रही थी. उसकी हंसी ही नहीं रुक रही थी.
“तुम्हारी इस हरकत का बदला मैं आााााा.........” चंद्रा अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाता कि उसे फिर से उल्टी आ जाती है जो सीधी संयूरी की कार के शीशे पर गिरती है.
           अब थोड़ी देर के लिए संयूरी की हंसी थम जाती है. वो चुपचाप कार में बैठ जाती है और शीशे को साफ़ करने के लिए गाड़ी के ‘वाईपर’ को चला देती है जिससे शीशे पर गिरी हुई उल्टी पूरे शीशे पर फ़ैल जाती है. अब रास्ता देख पाना भी मुश्किल हो रहा था तो संयूरी अपनी पानी की बोतल से पानी कार के शीशे पर उढ़ेलती है जिससे शीशे का कुछ हिस्सा साफ़ हो जाता है. फिर कार धुलवाकर संयूरी, चंद्रा के मकान का रास्ता पकड़ लेती है. बीच रास्ते में संयूरी फिर से चंद्रा को हंसते हुए चिढ़ाने लगती है. इससे पहले कि चंद्रा अपना गुस्सा संयूरी पर उतार पाता उसे फिर से उल्टी आ जाती है. पेट तो पहले से ही खाली हो चुका था सो चंद्रा बाकी का अपना सफर उब्काईयां मारते हुए जाता है और संयूरी पूरे रास्ते ठहाके मारकर हंसती रहती है.
उस दिन का ये सफर संयूरी के लिए हंसी भरा तो चंद्रा के लिए आफत भरा साबित होता है.
           दूसरी और जादूगरनी की हवेली में बंधक बड़ी राजकुमारी सुवन्या पिंजरे से आजादी के लिए कुछ ज्यादा ही छटपटा रही थी. बूढ़ी जादूगरनी अपने काम में व्यस्त थी कि तभी बड़ी राजकुमारी डरते हुए उससे एक सवाल पूछती है:
“क्या आपके यह सभी बाल सर्पों से बने हैं?” जादूगरनी चुप रहते हुए अपना काम करती रहती है.
“क्या आप इन सभी को दूध पिलाती हो. क्या ये सांप आपको नहीं काटते” सुवन्या फिर से अपना सवाल दोहराती है.
“चुप रहो लड़की अगर खैरियत चाहती हो तो. ‘मालकिन’ की दयालुता की परीक्षा न लो. ‘मालकिन’ क्या आप जानती हैं कि ये लड़कीयां कौन हैं?” जादूगरनी का नौकर ‘कूब’ जादूगरनी से पूछता है. जिसका उसे कोई भी उत्तर नहीं मिलता.
“अगर ये जानती होतीं तो..तो एक राजकुमारी को इस तरह से बंधी कतेई नही बनातीं.” बड़ी राजकुमारी सुवन्या ने अपनी अकड़ न छोड़ते हुए यह बात डरते हुए दोनों को डराने के लिए कही थी, जिसे सुनते ही कूब और जादूगरनी के क्रोध से भरे चेहरे एक दूसरे को देखते हुए मुस्कुराने लगे थे.
“कूब हमने तो सोचा था कि कुछ शाही मेहमान आए हैं, पर यहां तो राजघराणा ही खुद चलकर गरीबों की कुटिया पधारा है. हां, राजकुमारी ये सभी सर्प असली है. ये मुझे नही काटते एक सामने वाले बेवकूफ ने ये जुर्रत की थी और बेचारा अपना एक दांत गंवा बैठा.” जादूगरनी फर्श पर मानो फिसलती सी पिंजरे की और बढ़ती हुई कहती है. उसकी आवाज़ एक रहस्य लिए हुए थी. गहरी फुसफुसाती हुई आवाज़ मानो गूंज रही थी. उसकी आवाज़ सुनकर राजकुमारीयों के शरीर में कंपकपी छूट जाती है.
“इन सब के पास अपना एक ख़ास जहर है कोई बेहोश करता है, तो कोई याददाश्त भुला देता है. इनमें से किसी पर भी मेरा बस नहीं चलता. जिसे चाहे जब चाहे काट लेते हैं और इन्हें दूध की नहीं किसी और चीज़ की प्यास है....” कहते ही जादूगरनी दोनों राजकुमारीयों की और अपनी पूरी तरह से काली आंखों और सिर के गुस्सैल, लहराते सर्पों के साथ लपकत पड़ती है, जिनमें वो एक दांत वाला सर्प भी था.
           हवेली के बाहर घोंजा राम बेसुध पड़ा था और डोंजा खान की बाजुओं को छोड़कर पूरा शरीर पत्थर में बदल चुका था. डोंजा खान अपनी बाजुओं के सहारे अपने शरीर को शहर की और घसीट रहा था कि रास्ते में उसे मेजर साहब अपनी पलटन के साथ मिलता है जो बिना देखे-समझे ही बोल पड़ता है:

”शाबाश! जांबाज, क्रोलिंग प्रैक्टिश करते रहो युद्ध में काम आएगा”. तभी उसकी नज़र ‘डोंजा खान’ के पत्थर के शरीर पर पड़ती है जिसे देख मेजर चौंक जाता है.
“एई शाला! माना हम हमेशा कहता रहता है, एक शिपाही को अपना शरीर पत्थर की तरह शख्त बनाना चाइए. पर तुम तो खुद ही पत्थर बन गया, माजरा क्या है?” मेजर हैरानी के साथ डोंजा खान को देखते हुए पूछता है.
           ‘डोंजा खान’ मेजर को पूरा वाक्या बता देता है. मेजर और उसकी पलटन डोंजा खान और घोंजा राम को शाही जादुगर के पास ले जाते हैं. जादुगर फिर से उन दोनों सिपाहियों की काया पलट कर देता है. उसके बाद मेजर, जादुगर और सभी सिपाही जादूगरनी की हवेली की और चल देते हैं. जादुगर को छोड़ सभी डर रहे थे कि न जाने अब क्या होगा कि रास्ते में घोंजा राम को एक औरत की परछाईं दिखाई देती है. घोंजा राम डर के मारे ‘डोंजा खान’ से चिपक जाता है और चींख लगा देता है “ज-ज-ज-जा-जा-जदुगरनीईईईई....” जिससे सभी चौंककर उस परछाईं की और देखते हैं. जादुगर परछाईं को पहचान लेता है जो कि राजकुमारीयों की थी.
           सभी कुमारीयों के पास पहुंच कर उन्हें अगवाह किये जाने के बारे में पूछते हैं. तभी दोनों राजकुमारीयों की आंखों पर से काली सी छाया अचानक ही गुजर जाती है जिसे कोई भी नहीं देख पाता. दोनों स्तब्ध सी खड़ी अचानक ही जीवंत हो उठती हैं. शाही सिपाही उनसे जादूगरनी के बारे में पूछते हैं तो बड़ी राजकुमारी हंसते हुए कहती है:
“हम-हम तो पूर्णतया स्वस्थ और अछूते हैं. किसी जादूगरनी की क्या मजाल जो हमें हाथ भी लगा जाए. जब आप दोनों बेहोश हुए तो हम दोनों भाग निकलीं और पेड़ों में छिप गईं. जादूगरनी भी थक हार कर चली गई तो हम वापिस महल की और आने लगे और आप सभी मिल गए.” सभी ने भगवान् का धन्यवाद् किया और महल की और चल पड़े. तभी जादुगर, मेजर की और मुड़ता है:
“इन पेड़ों में छिपने लायक ऐसा क्या है जो वो कुमारीयों को ढूंड नही पाई” जादूज की बातों में रहस्य छिपा था.
“मतलब?” मेजर पूछता है. इस पर जादुगर खामोश हो जाता है और सभी महल को चले जाते हैं.
           महल पहुंच कर सभी राजकुमारीयों को महाराज से मिलने के लिए कहते हैं लेकिन दोनों कुमारीयां थके होने की बात कह कर अपने-अपने कमरों में आराम करने चली जाती हैं. इस पर जादुगर फिर से स्तब्ध सा जाती राजकुमारीयों को देखता रहता है. कुछ ही देर में राजकुमारी सुपर्णा अपने कमरे से निकलकर दोनों सिपाहियों के पास जाती है और उन्हें साथ चलने को कहती है.
“बीड़ू अपुन तो डर रऐला है, पहले भी कुमारी के साथ गए थे तो याद है क्या हुआ था.” घोंजा राम डरते हुए डोंजा खान के कान में फुसफुसाता है.
“ओए! जो भी हो जाए, जादूगरनी की हवेली तो कतेई नही जाएंगा. उन्हे जाना है तो जाएं.” डोंजा खान कहता है और दोनों कुमारी के साथ चल देते हैं.
           कुछ समय बीत जाता है और उसके बाद बड़ी राजकुमारी सेनापति के पास जाती है और उसे भी साथ चलने को कहती है. कुछ समय बीत जाने के बाद सेनापति राणा जी महाराज के कक्ष में जाता है और राजकुमारीयों के मिल जाने और साथ चलने की बात कहता है. राजा भी उसके साथ चल देता है. यह सब इतनी जल्दी घट जाता है कि जादुगर को राजा से मिलने का समय ही नही मिल पाता. जादुगर, राजा के कक्ष की और जा रहा था कि उसे दोनों कुमारीयां मिलती हैं. जादुगर बड़ी राजकुमारी से राजा के बारे में पूछता है तो कुमारी उसे भी साथ चलने को कहती है. अब जादुगर की निगाहें कुछ कड़ी हो जातीं है.

“कहां चलना है?” जादुगर पूछता है.
“हमारे साथ.” बड़ी कुमारी स्तब्ध सी खड़ी कहती है.
“वहीं जहां आपने राजा को रखा है.” जादूगर हल्की सी मुस्कान के साथ कहता है.
           इतना सुनते ही दोनों कुमारियों की आंखें श्याम वर्णी हो जाती है और वो जादुगर की और लपक पड़ती हैं. जादुगर के हाथ घुमाते ही दोनों राजकुमारियां अपनी-अपनी जगह पर जड़ सी हो जाती हैं. अब जादूज अपने एक-एक हाथ से दोनों की आंखों को ठक लेता है. जादुगर के हाथ हटाते ही कुमारीयों की आंखें पुनः सामान्य हो जातीं है और वो मानो किसी सम्मोहन से बाहर आ जाती हैं. उसी पल सुपर्णा, जादूज से खुद के महल में होने का कारण पूछती है. जादुगर उसे पूरा वाक्या सुन देता है.
           अब जादुगर को उन सभी लोगों को ढूंढना था जिन्हें राजकुमारीयों ने साथ चलने को कहा था. जो उसके लिए मुश्किल न था. जादुगर एक तहखाने में पहुंचता है जहां का नज़ारा देख वह हैरान और भयभीत हो जाता है. वहां मेजर और सेनापति की फ़ौज के साथ राजा भयावह स्थिति में बंधा हुआ था. किसी का सिर रस्सियों से ढका हुआ था तो किसी को एक डंडे पर जानवर की तरह उल्टा बाँधा गया था, किसी की गर्दन दिवार के साथ सटा कर बाँधी गई थी. राजा को एक ‘x’ के आकार में बांधा गया था. जादुगर सभी को आजाद करता है और सभी बाहर आ जाते हैं.
वहां जादूगरनी की हवेली में जादुगरनी अपने आप पर ही गुस्सा हुए जा रही थी कि कैसे वो लापरवाह हो गई और उसने राजकुमारीयों को जादुगर के पास जाने से नहीं रोका. इस बात से नराज़ वो अपने नौकर ‘कूब’ का कूब हमेशा की तरह और ज्यादा बढ़ाकर इसलिए दण्डित करती है कि उसने भी उसे यह सुझाव नही दिया. इस तरह लिल्लीपुट एक बार फिर से संकट से उभर जाता है.
           लेकिन संकट के ये बादल चंद्रा और संयूरी नाम की जोड़ी के सिर पर मंडराते ही रहते हैं. पहले संयूरी ने चंद्रा के साथ ‘एम्यूजमेंट पार्क’ में अच्छा खासा मजाक कर डाला था और आज चंद्रा की बारी थी. आज के दिन दोनों ही एक ऊंचे पहाड़ की सैर करने का मन बनाते हैं. पहाड़ की खूब सैर की जाती है और कुछ लम्हे वहां बैठकर खाना खाने में बिताए जाते हैं. तीन-चार घंटों की इस सैर के बाद दोनों ही वापिस चलने का फैसला लेते हैं. वापसी में चंद्रा, संयूरी से ये कहकर कार की चाबी मांगता है कि आज वो भी ड्राइविंग करने के मूड में है. संयूरी उसे झट से कार की चाबी थमा देती है, इस बात से अनजान कि आज उसके परेशान होने की बारी थी.
           पहले तो उतरते हुए सफर बड़ा ही सुहाना लग रहा था. लेकिन धीरे-धीरे कर की रफ्तार बढ़ने लगती है और बेकाबू सी होकर चलने लगती है. संयूरी के लाख कहने पर भी चंद्रा कार की रफ्तार कम नहीं करता और उसी ढंग से कार दौड़ाता रहता है. एक मोड़ पर तो कार, दूसरी कार से टकराते-टकराते बचती है जिस वजह से चंद्रा को भी कार कच्चे रास्ते पर उतारनी पड़ती है. अब संयूरी चींखने-चिल्लाने लगी थी लेकिन चंद्रा पर इसका कोई भी असर नहीं हो रहा था. वो भी अपनी झूठी हंसी के द्वारा संयूरी को चिढ़ा रहा था. पहाड़ी की ढलान खत्म होते-होते संयूरी की हालत देखने वाली थी. उसके बाल बिखरे हुए थे और चेहरे का रंग उड़ चुका था जैसे उसने कोई डरावनी चीज़ देख ली हो. पसीने से तर पूरा शरीर डर के मारे कांप रहा था. चंद्रा ड्राइविंग सीट से निकलकर संयूरी के कांपते हाथों पर कार की चाबी रख देता है.
उस दिन के बाद संयूरी कभी भी चंद्रा को कार चलाने के लिए नहीं देती.
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                                                      MONTH’10न’ MAY
लॉस्ट द चंद्रा, प्रेम परीक्षा.
माय फर्स्ट डेट, द थ्री डेज जर्नी
                                                                          सुबह के छे बजे होंगे, चंद्रा सोया हुआ था कि उसके मोबाइल की घंटी बजती है. चंद्रा बिना आंखें खोले ही मेज पर रखे अपने मोबाइल को ढूंढने लगता है. मोबाइल उसके हाथ के धक्के से नीचे गिर जाता है. अब चंद्रा उठकर मोबाइल उठाता है और देखने लगता है कि सुबह-सुबह कोन फ़ोन कर रहा था. तभी फिर से घंटी बज उठती है, वो संयूरी की कॉल थी. कॉल उठाने पर चंद्रा की ‘गुड मोर्निंग’, कॉल न उठाने के लिए डांट से खाने से होती है.
           चंद्रा हैरान होता है कि मिस रेड्डी आज इतनी सुबह कैसे उठ गई थी. संयूरी उसे बताती है कि उसे एक सपना पड़ा था जिसमें वो एक ऐसे ‘जू पार्क’ में थी जहां पिंजरों में जानवरों की जगह इंसान बंद थे. हर तरह के जानवर टूरिस्ट बनकर पिंजरों में बंद उन इंसानों को देखने के लिए आ रहे थे, जिस तरह से इंसान चिड़िया घरों में बंद अपने मनपसन्द जानवरों को देखने के लिए जाते हैं. अब वो चंद्रा को आगे बताती है कि वहां ‘टूअर गाइड’ की तरह एक मोटा सा बन्दर बहुत से जानवरों को अलग-अलग पिंजरे दिखा रहा था जिनमें हर क्षेत्र के इंसान बंद किये गए थे, चीनी, जापानी, भारतीय, रशियन, यूरोपियन, अफ़्रीकी हर जगह के. हर पिंजरे के सामने उस इंसान की प्रजाति का नाम, निवास स्थान, रुचियाँ, पहनावा आदि बहुत सी जानकारियाँ लिखी हुई थीं. हर पिंजरे में एक इंसान से लेकर पूरा परिवार बंद था. उन्हें हर प्रकार की सुविधाएं दी गई थीं लेकिन वो कुछ ख़ास खुश नजर नहीं आ रहे थे.
           तभी वो बताती है कि वो भी एक पिंजरे में अकेली बंद थी. उसने सिम्पल सा दिखने वाला सूट पहना हुआ था. वो बताती है कि बहुत से जानवर टूरिस्ट बनकर उसके पिंजरे को देख रहे थे. तभी एक अजगर उसके पिंजरे के बाहर लगे एक बोर्ड को पढ़ता है, ‘चिढ़-चिढ़ी औरत’, ‘पागल इंसान और हर तरह के फ्रीक्स आगे मिलेंगे, सावधान रहें!’ वो आगे बताती है कि बोर्ड पढ़ने के बाद वो अजगर सलाखों के अंदर घुस जाता है और संयूरी के सामने उसकी उंचाई के बराबर खड़ा हो जाता है. यह कहकर कि उसे मसालेदार भोजन पसंद है वो अजगर अपना भयानक मुंह खोलकर संयूरी पर हमला कर देता है जिससे संयूरी की नींद टूट जाती है. अब चंद्रा के पास हंसने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा था. वो ठहाके लगाकर जोर-जोर से हंसने लगता है.
“मिस्टर चंद्रा यहां मेरा डर के मारे बुरा हाल था और तुम मेरे ऊपर हंस रहे हो. हंसना बंद करो नहीं तो मैं तुम्हारे दांत तोड़ दूंगी. हंसते रहना फिर.” संयूरी चिढ़ कर बोलती है.
“हंसूं नहीं तो.....और क्या करूं? धूप डालूं, तुम्हे? उस दिन ‘जू’ में तुमने उस अजगर को जो शीशा ठोक-ठोक कर तंग किया था.......उसी का बदला लेने पहुंचा था वो तुम्हारे पास.” चंद्रा लगातार हंस रहा था.
“बेवकूफी थी मेरी जो मैने ये बात तुम्हारे साथ शेयर की. सोचा था तुम ‘सिम्पथी’ दिखाओगे...लेकिन. खैर छोड़ो आज पापा ने शाम को तुम्हे बुलाया है, जरूरी काम है.” ये कहते हुए संयूरी का गुस्सा कुछ शांत लग रहा था.
“टाइम नहीं है मेरे पास.” चंद्रा उसे चिढ़ाने के लिए कहता है.
“मिस्टर चंद्रा, मेरे पापा एक प्रोडूसर हैं, उनके आंध्र प्रदेश में फार्मस हैं और भी कई छोटे-मोटे ‘बिस्नस’ एक-साथ सम्भालते हैं वो. फिर भी तुमसे मिलने के लिए उनके पास टाइम होता है और तुम्हारे पास टाइम नहीं है! ठहरो मैं पापा

को बोलूंगी कि वो तुमसे बिना ‘अपॉइंटमेंट’ के न मिलें. कह दिया.....शाम को देर न करना.” संयूरी गुस्सा करती है.
“मेरा अपॉइंटमेंट तो दे दीजिये, मिस....” इतना सुनते ही संयूरी दूसरी और से कॉल काट देती है.
           शाम हो गई थी और चंद्रा, संयूरी के घर पर बैठा था. मय्यर साहब उसके सामने सोफे पर थे. मय्यर साहब, चंद्रा से संयूरी और उसकी शादी के लिए उसके माता-पिता से बात करने के लिए कहते हैं. इसके लिए चंद्रा, मय्यर साहब से कहता है कि दो हफ्तों के बाद वो अपने घर चंबा जाने वाला है. अपने घर एक महीने की छुट्टी काटने के बाद वो अपने माता-पिता के साथ मुंबई आएगा. वो समय इसके लिए ठीक रहेगा. मय्यर रेड्डी इसके लिए राजी हो जाते हैं. अब मय्यर रेड्डी चंद्रा को एक आश्चर्यजनक बात बताता है कि संयूरी की ये जिद है कि चंद्रा, मय्यर की आने वाली फिल्म में ‘को-एक्टर’ का रोल करे. संयूरी ये चाहती थी कि चंद्रा भी फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाए. इस पर चंद्रा कशमकश में पड़ जाता है कि ये कैसी जिद थी. चंद्रा किसी भी एंगल से एक मूवी एक्टर नहीं लगता था और नाकामी के बाद खुद का मजाक उड़ाया जाना भी नहीं चाहता था. इस पर मय्यर रेड्डी उसे बताता है कि संयूरी तो उसे ‘मेन रोल’ देने की जिद कर रही थी.
“अंकल आपको तो पता है, संयूरी कितनी पागल है. लेकिन आप कहां उसकी बातों में आकर अपने करोड़ों डुबाना चाहते हैं? उसे तो कुछ समझ है नहीं, बस ‘बक बक’.....” चंद्रा अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि तभी वहां संयूरी आ धमकती है.
“मिस्टर चंद्रा! क्या कहा तुमने अभी...?” संयूरी हॉल की सीढ़ियां उतरती है और तेज कदमों के साथ सीधे ही चंद्रा की और बढ़ती है, जैसे उसे खा जान चाहती हो.
“क्या....अब क्या.....क्या कहा मैने.” अपनी ‘चार्जिंग टाईग्रेस’ उर्फ़ ‘घायल शेरनी’ के गुस्से से डरकर चंद्रा भी पीछे हटने लगता है, जैसे उसे अंदेशा था कि गुस्साई संयूरी अब उसे पकड़कर पीटने ही वाली थी. लेकिन संयूरी उसके सामने आकर रुक जाती है.
“मिस्टर चंद्रा, मैं तुम्हे पागल नजर आती हूं. अब तुम्हे वो रोल हर हाल में करना होगा. मैं साबित करके रहूंगी कि मैं सही हूं और तुम गलत. पापा......’को-एक्टर’ की फीस डबल कर दीजिए. मैं भी देखती हूं कैसे नहीं करते हो तुम रोल.” संयूरी अपने पिता को आदेश देते हुए कहती है.
“बेटा.....!?” मय्यर साहब संयूरी की और शिकायत भरे लहजे से देखते हैं. वो संयूरी के फीस डबल करने के फैसले से नाखुश दिख रहे थे.
“पापा.......” लेकिन संयूरी गुस्से में कहकर अपना इरादा बता देती है.
“ओके....!” संयूरी के तेवर देखकर मय्यर साहब मजबूरी में उसका फैसला मान लेते हैं.
           अब इस बात पर चंद्रा और संयूरी में बहस शुरू हो जाती है. चंद्रा रोल नहीं करना चाहता था लेकिन संयूरी का इरादा चंद्रा को फिल्म इंडस्ट्री में लाने का पक्का था. अब चंद्रा शादी के लिए संयूरी की इस शर्त को गलत ठहराता है. जिसपर संयूरी इसे शर्त न कहकर इसे उसकी इच्छा पूर्ति बताती है जिसे चंद्रा को हर हाल में पूरा करना ही था. मय्यर साहब चल रहे इस झगड़े को चुप-चाप देख रहे थे.
“पापा आप देख रहे हैं, कैसे ये मेरी बात नहीं मान रहा और मुझे खाने को दोड़ रहा है.” संयूरी खुद की चलती न देख मय्यर साहब को हस्तक्षेप करने के लिए कहती है.

“मैं तुम्हे खाने को दोड़ रहा हूं? या तुम जब से आई हो, ऐसे बात कर रही हो जैसे मुझे खा जाना चाहती हो. आप तो सब देख रहे हैं न अंकल?” चंद्रा भी पलटवार करता है.
“अब आप दोनों के बीच मैं क्या कहूं? मेरी तो एक ही सलाह है बेटा, इससे पहले कि तुम दोनों एक-दूसरे को खा जाओ, शादी कर लो. थोड़ी तुम उसकी मानो, थोड़ी ये तुम्हारी माने.” मय्यर साहब ने हल्के से चंद्रा को इशारा कर  डाला था.
           चंद्रा ने इशारा समझने में जरा सी भी देरी नहीं की थी. कुछ देर की चुपी के बाद चंद्रा भी संयूरी के आगे एक शर्त रख देता है कि फिल्म में वो तभी काम करेगा जब संयूरी भी उसकी एक शर्त मानेगी. इस पर भी जब संयूरी बवाल मचाने लगती है तो चंद्रा वहां से जाने का नाटक करने लगता है. संयूरी उसे रोककर शर्त बताने के लिए कहती है. चंद्रा अपनी शर्त बताते हुए कहता है कि फिल्म के लिए वो हर नियम पूरे करेगा. लेकिन इसके बदले में संयूरी को भी उसके घर चंबा जाकर पूरा एक महीना बिना सुख-सुविधाओं के काटना होगा. उसे भी वैसे ही गुजारा करना होगा जिस तरह उसका परिवार रहता है. किसी भी महंगी चीज़ के उपयोग की उसे इजाजत नहीं होगी और घर के सभी काम करने होंगे. बाज़ार आने-जाने के लिए पैदल भी चलन पड़ सकता है.
           शर्त कुछ ऐसी थी कि मय्यर रेड्डी साहब भी खामोश हो गए थे. संयूरी की बोलती तो बंद ही हो गई थी. चंद्रा के अपनी शर्त का जवाब मांगने पर संयूरी बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली जाती है. वो शायद इन सभी शर्तों को एकसाथ पचा नहीं पाई थी. मय्यर साहब, चंद्रा से थोड़ी छूट मांगने की कोशिश करते हैं, जैसे वहां रहने के समय में कमी, सुविधाओं में छूट, पैदल चलने वाली बात पर छूट. लेकिन चंद्रा इसे संयूरी के बदलाव के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बताते हुए उन्हें राजी कर लेता है. अगली सुबह चंद्रा की नींद टूट जाती है क्योंकि संयूरी उसे कॉल कर रही थी. चंद्रा कॉल उठाता है:
“आज फिर से सुबह-सुबह? क्या बात है मिस रेड्डी आज फिर से कोई सपना देख लिया क्या?” चंद्रा संयूरी को चिढ़ाने के अंदाज में कहता है.
“रात को सही से सो ही नहीं पाई तो सपना कहां से पड़ेगा.” संयूरी की आवाज में उनींदा साफ-साफ झलक रहा था.
“कल रात तो आपने कॉल तक करनी पसंद नहीं की थी, गुस्सा उतर गया क्या?” चंद्रा फिर से उसे चिढ़ाता है.
“वो कल मुझे नींद जल्दी आ गई थी, इसलिए कॉल नहीं कर पाई. अगर मैं नहीं कर पाई तो क्या तुम नहीं कर सकते थे, मिस्टर चंद्रा. और बार-बार क्या ताने मारे जा रहे हो. पापा की मूवी प्रोड्क्शन जल्द ही शुरू होने वाली है, तैयार रहना. पापा ने थोड़ा वजन कम करने के लिए कहा है. बाकी वो सम्भाल लेंगे.” संयूरी शांत होते हुए कहती है.
“तुम जो कहोगी मैं सब करूंगा लेकिन मेरी शर्त पूरी होगी, तब.” चंद्रा के इतना कहते ही कॉल कट जाती है.
           संयूरी शायद अभी भी उसकी शर्तों को पचा नहीं पा रही थी. अब बचपन से अपनी हर बात को पूरा करवाने वाली लड़की को ये सब बंधन भला कैसे मंजूर होते? इसी तरह से कुछ दिन और बीत जाते हैं. अलबत्ता तो अब संयूरी आमतोर पर चंद्रा से मूवी पर काम करने की बात करत